रविवार, 4 अक्तूबर 2020

हाथरस घटना न्याय या राजनीति

हाथरस घटना पर  बहुत लिखा पढा गया। यह स्थापित सत्य है की एक लड़की की जान गई है। यहां शुरुवात में तीन पक्ष हैं, पुलिस प्रशासन, पीड़िता का परिवार,आरोपी लड़के। पुलिस ने लापरवाही और मनमानी किस हद तक कि यह पता लगाना जरूरी है। जैसे जैसे नेताजी लोग आते गए FIR में नये नये नाम और धारायें जुड़ती चली गई। जातिवाद से ग्रस्त कुंठित मानसिकता के कीड़े जातिवाद वाली नाली में खूब छपाछप भी किये। उनके लिए एक पूरी बिरादरी बलात्कारी और खूनी हो गई जबकि उनमें से कई पिस्सू सहूलियत के अनुसार उन्ही के टुकड़ों पर पलते हैं। एक और पक्ष आया नारीवाद का झंडा उठाये उनके अनुसार विश्व के सभी मर्द बलात्कारी,हत्यारे होते हैं सम्भव है उसमें इनके बाप,भाई परिवार के सदस्यों ने इनका शोषण कर कर के इस लायक बनाया की ये विश्व के सभी मर्दों को गरिया कर टीआरपी बटोर सके। एक पक्ष वामपंथियों का है जो हर बात में हिन्दू धर्म और मान्यताओं को गरियाने का कारण ढूंढ लेंगे अब वो रक्षाबंधन,नवरात्रि पर बेटीयों की पूजा,भगवान राम, कृष्ण,मंदिर सबको आडंबर बताते हुए अपना एजेंडा चलाने लगे। 

      इन सब के बीच कुछ उत्कृष्ट किस्म के बेवकूफ  हैं जो कॉपी पेस्ट की विचारधारा से बुद्धिजीवी का बाल बनने की कोशिश कर रहे हैं। कॉपी पेस्ट को बुरा नही मानता क्योंकि ज्ञान पर कॉपीराइट नही है मगर उसके लिए थोड़ी बुद्धि लगा लो। वामपंथी अपना लिखा नैरेटिव ,फ़ोटो आपको पकड़ाते हैं और आप हर घटना के बाद बुद्धिजीविता दिखाने के चक्कर में कॉपी पेस्ट चेंप कर उनका काम आसान करते हैं। कोई नारीवादी,कोई दलित चिंतक तो कोई हिन्दू धर्म को गरियाने लगेगा। दरअसल ऐसा करके आप अपने व्यक्तित्व को हल्का और हास्यास्पद बना लेते हैं। वापस मुद्दे पर आते हैं , घटना राष्ट्रीय  मुद्दा न बने इसके लिए प्रशासन ने साम दाम दंड भेद सब अपनाया। उनके अपने कारण हो सकते हैं मगर जो सरकार राम मंदिर के फैसले के बाद शांति बनाए रख सकती थी वो अंतिम संस्कार भी सुबह होने पर शांति से करवा सकती थी मगर ऐसा क्यों नही हुआ यह कारण समझ से बाहर है और वह जल्दीबाजी बहुतों पर भारी पड़ गई। कुल मिलाकर इस प्रकरण में न्याय मांगने और न्याय देने के अलावा सब हुआ। पैसे से लेकर नौकरी, प्लाट से लेकर धमकी सब कुछ दिया गया। दूसरे ओर से राजनीति और आपदा को अवसर में बदलने की बारगेनिंग की राजनिति भी होती रही। मेडिकल रिपोर्ट अब तक ये कह रही है कि रेप की पुष्टि नही हुई (रिपोर्ट सही है या गलत यह जांच का विषय है)। पीड़िता के दो तीन बयान रिकॉर्डेड हैं। एप्लिकेशन में कभी एक आदमी द्वारा मारपीट, फिर क्रमशः दो, तीन,चार द्वारा मारपीट और फिर गैंगरेप जोड़ा गया। तटस्थ रूप से देखें तो यह कारनामा पुलिस के दबाव में भी हो सकता है और यह नेताजी के उकसावे में भी हो सकता है। अब इसपर सबके अलग अलग वर्जन हैं। फिर न्याय कैसे होगा?? दबाव में या न्याय देने के लिए सरकार ने पुलिस, आरोपी और पीड़ित के परिवार का नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए कहा है। मेरे समझ से इसमें किसी को समस्या नही होनी चाहिए। यदि कोई भी आरोपी इसके खिलाफ कोर्ट में अर्जी देता है तो प्रथमदृष्टया यह स्वतः सिद्ध हो जायेगा कि वो अपराध में शामिल था। पुलिस के नार्को टेस्ट से यह पता चल जाएगा कि रिपोर्ट न लिखने के आरोप में क्या सच्चाई है क्या उन्होंने दबाव में रिपोर्ट में बदलाव किए। और सबसे अहम पीड़िता  का परिवार उसकी बेटी चली गई खोने को कुछ नही है, करवा लो नार्को जिससे यह आरोप भी खत्म हो जाये कि नेताओं के उकसावे पर केस में बहुत बातें झूठ जोड़ी गई। परिवार के पास छिपाने के लिए अगर कुछ है नही तो नार्को पॉलीग्राफी से कोई समस्या नही होनी चाहिए । अगर नार्को पॉलीग्राफ के लिए तीनों में से कोई ऐसा पक्ष है जो तैयार नही होता है तो स्वाभाविक रूप से उसकी ओर उंगली उठेगी चाहे आरोपी हो, पुलिस हो या पीड़ित... 

मेरा स्पष्ट मत है कि जो भी हो लडक़ी के हत्यारे को जल्द से जल्द फाँसी मिले या चौराहे पर गोली मार कर उसका लाइव टेलीकास्ट करा दिया जाए मगर राजनीति के कारण किसी निरपराध को न फँसाया जाये इसलिए जांच जरूर है। आशुतोष की कलम से

1 टिप्पणी:

  1. आपने बहुत अच्छी पोस्ट लिखी है. ऐसे ही आप अपनी कलम को चलाते रहे. Ankit Badigar की तरफ से धन्यवाद.

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