शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

जनगणमन- जार्ज पंचम का स्तुतिगान या भारत का राष्ट्रगान ?

लेख लंबा है अतः समय निकाल के ही पढें.जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता....
रविंद्र नाथ टैगोर द्वारा लिखित यह गीत भारत के का राष्ट्रगान है इस गीत को लेकर कुछ सच कुछ मिथक और कुछ पूर्वाग्रह है मेरे कई मित्रों ने इस पर मुझे अपना विचार देने के लिए कहा परंतु मैं स्वयं ही इस मुद्दे पर निर्णय और संशय की स्थिति में था अतः कुछ लिखने से भरसक बचता था परंतु समस्या से भागना उसका समाधान नहीं अतः इस गीत की सत्यता को भी हमें ढूंढना और स्वीकार करना होगा।

जनगणमन अधिनायक जय हे,
भारत भाग्य विधाता...
तो इन पंक्तियों में "अधिनायक" अर्थात "डिक्टेटर या किंग" कौन है? कौन है भारत का भाग्य विधाता गुरुदेव की लिखी इस कविता में ?? तव शुभ आशीष मांगेगाहे तव जय गाथा..आखिर इन पंक्तियों में किसकी "जय गाथा" गाते हुए उससे आशीष माँगा जा रहा है??

दो घटनाएं एक ही समय पर घट रही थी पहली 27 दिसंबर 1911 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन शुरू होना था और दूसरा 30 दिसम्बर को भारतको गुलाम बना के रखने  वाले ब्रिटेन का राजा जार्ज पंचम कलकत्ता पधारने वाले था।
यदि आप ये सोच रहे हैं की कांग्रेस का अधिवेशन जार्ज पंचम के दौड़के विरोध की रणनीति के लिए था तो आप बिलकुल ही गलत हैं, इस अधिवेशन में जार्ज पंचम के प्रति निष्ठा और सम्मान प्रकट करते हुए इस अधिनायक पर पूरी श्रद्धा व्यक्त की गई थी। यदि उस समय के विभिन्न घटनाओं और भारतीय और बिदेशी अख़बारों में छपी ख़बर का संदर्भ लेकर जनगणमन के इतिहास की कड़ियों को जोड़े तो जनगणमन अधिनायक गीत "जार्ज पंचम के स्वागत के लिए लिखा गया गीत प्रमाणित होता है.."
ये आज से लगभग 106 साल पहले की बात है उस समय " वंदेमातरम" शब्द सांप्रदायिक नहीं हुआ करता था उस समय हिंदू मुसलमान सभी धर्मों के अनुयाई एवं क्रांतिकारी वंदे मातरम भारत माता की जय के नारे के साथ फांसी के फंदे पर झूल जाते थे कांग्रेस एवं अन्य पार्टियों की जो अधिवेशन भी होते थे उनका प्रारंभ वंदे मातरम गीत के साथ ही होता था। अब जॉर्ज पंचम के भारत आने के समय के कुछ अखबारों की रिपोर्टों को मैं आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं जिसमें जन गण मन अधिनायक गीत के बारे में लिखा गया है।

● ‘
कांग्रेस पार्टी के अधिवेशन की शुरुआत ईश्वर की प्रशंसा में गाए गए एक बंगाली मंगलगान से हुई। इसके बाद किंग जॉर्ज पंचम के प्रति निष्ठा जताते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया। बाद में उनका स्वागत करते हुए एक गाना गाया गया।अमृत बाजार पत्रिका 28 दिसम्बर
●‘कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन महान बंगाली कवि रवींद्रनाथ टैगोर के लिखे एक गीत से प्रारंभ हुआ। उसके बाद किंग जॉर्ज पंचम के प्रति निष्ठा व्यक्त करते हुए एक प्रस्ताव पारित हुआ।द बंगाली 
● “When the proceedings of the Indian National Congress began on Wednesday 27th December 1911, a Bengali song in welcome of the Emperor was sung. A resolution welcoming the Emperor and Empress was also adopted unanimously.” (Indian, Dec. 29, 1911)
●“The Bengali poet Rabindranath Tagore sang a song composed by him specially to welcome the Emperor.” (Statesman, Dec. 28, 1911)
● "The proceedings began with the singing by Rabindranath Tagore of a song specially composed by him in honour of the Emperor.” (Englishman, Dec. 28, 1911)


इन सारी रिपोर्टों को यदि एक साथ देखा जाये तो ये स्पष्ट है कि "जन गण मन" प्राथमिक रूप से तो जार्ज पंचम के सम्मान के गीत के रूप में ही गाया गया। सामान्यतया  हम सभी जनगणमन के पहले पैरा को गाते हैं हम सभी जनगणमन यदि गीत के अन्य पांक्तियों को देखें तो ज्यादा स्पष्टता से इस मुद्दे को समझ जा सकता है।
सम्पूर्ण जनगणमन सुनने के लिए यहाँ देखें



जनगणमन  की एक पंक्ति कहती है..

पूरब-पश्चिम आशे
तव सिंहासन पाशे
प्रेमहार हय गांथा।
जनगण-ऐक्य-विधायक जय हे
भारत भाग्यविधाता!
जय हेजय हेजय हे
जय-जय-जय-जय हे
इन पंक्तियों मे पूरब पश्चिम के सिंहासन किसको माला पहनाते थे इसका स्वाभाविक उत्तर है वह ब्रिटेन और उसका राजा जार्ज पंचम..
जनगणमन की एक और पंक्ति कहती है..
तव करुणारुण रागेनिद्रित भारत जागे
तव चरणे नत माथा।
जय-जय-जय हेजय राजेश्वर,
भारत भाग्यविधाता,
इन पंक्तियो में किस राजेश्वर की बात हो रही है जिसके चरणों मे मस्तक झुकाया जा रहा हैसम्भवतः जार्ज पंचम..


तो स्थितियां यही बताती हैं कि यह गीत जार्ज पंचम के लिए ही लिखा गया था। सबसे बड़ी बात ये है कि उस समय अखबारों और मीडिया में इस जार्ज पंचम के स्तुति गीत की जो खबरें छपी थी उनका विरोध कभी रविन्द्र नाथ टैगोर जी ने नही किया। ऐसा भी माना जाता है कि जार्जपंचम अपने इस स्तुतिगान से इतना प्रभावित था कि इसका पारितोषिक रविन्द्र नाथ टैगोर को "गीतांजली" के लिए "साहित्य का नोबल" के रूप में दिया गया।


मगर अब इसके दूसरे पक्ष को देखें तो इस घटना के के सालों बाद जब आजादी आंदोलन ने जोकर पकड़ा और "वंदे मातरम" मुस्लिम लीग के कट्टर नेताओं को साम्प्रदायिक लगने लगा तब अचानक 25 साल बाद गुरुदेव का इस गीत पर स्पष्टीकरण आया. स्पष्टीकरण के समय जलियावाला बाग़ हत्याकांड हो गया था,भगतसिंग राजगुरु सुखदेव को  सरकार ने फांसी के फंदे पर लटका दिया था अतः इस गीत को लेकर रविन्द्रनाथ टैगोर की घोर आलोचना होने लगी इससे विचलित रविन्द्र नातं टैगोर ने जो स्पष्टीकरण दिया वो इस प्रकार है..10 नवंबर 1937 को पुलिन बिहारी सेन को लिखे उनके पत्र से भी पता चलता है। उन्होंने लिखा- “ मेरे एक दोस्तजो सरकार के उच्च अधिकारी थेने मुझसे जॉर्ज पंचम के स्वागत में गीत लिखने की गुजारिश की थी। इस प्रस्ताव से मैं अचरज में पड़ गया और मेरे हृदय में उथल-पुथल मच गयी। इसकी प्रतिक्रिया में मैंने जन-गण-मन’ में भारत के उस भाग्यविधाता की विजय की घोषणा की जो युगों-युगों सेउतार-चढ़ाव भरे उबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरते हुए भारत के रथ की लगाम को मजबूती से थामे हुए है। नियति का वह देवता’, ‘भारत की सामूहिक चेतना का स्तुतिगायक’, ‘सार्वकालिक पथप्रदर्शक’ कभी भी जॉर्ज पंचमजॉर्ज षष्ठम् या कोई अन्य जॉर्ज नहीं हो सकता। यह बात मेरे उस दोस्त ने भी समझी थी। सम्राट के प्रति उसका आदर हद से ज्यादा थालेकिन उसमें कॉमन सेंस की कमी न थी।
19 मार्च 1939 को उन्होंने पूर्वाशा’ में लिखा– ‘अगर मैं उन लोगों को जवाब दूंगाजो समझते है कि मैं मनुष्यता के इतिहास के शाश्वत सारथी के रूप में जॉर्ज चतुर्थ या पंचम की प्रशंसा में गीत लिखने की अपार मूर्खता कर सकता हूँतो मैं अपना ही अपमान करूंगा। संभवतः ये उत्तर देते समय गुरुदेव ने जनगणमन अधिनायक जय हे की इस पंक्ति का जिक्र किया है..

पतन-अभ्युदय-बन्धुर-पंथाजुग-जुग धावित जात्री,
हे चिर-सारथितव रथचक्रे मुखरित पथ दिनरात्रि
दारुण विप्लव-माझेतव शंखध्वनि बाजे,
संकट-दुःख-त्राता।
जन-गण-पथ-परिचायक जय हे
भारत भाग्यविधाता,
जय हेजय हेजय हे....
इससे ये स्पष्ट है कि
रविन्द्र नाथ टैगोर को जार्ज पंचम के स्वागत के लिए एक गीत लिखने को कहा गया था..
रविन्द्र नाथ टैगोर ने असमंजस में स्वागत गीत लिखा भी था जो “जन गण मन अधिनायक जय हे “ के रूप में जार्ज पंचम और क्विन मेरी के सम्मुख गाया भी गया था.
सन 1911 में यह बात अखबारों में आई परन्तु इसका विरोध उस स्तर पर नहीं हुआ अतः गुरुदेव ने स्पष्टीकरण भी नहीं दिया . चूकी रविन्द्रनाथ टैगोर का परिवार के कई सदस्य अंग्रेजों के साथ कार्यरत थे और उनके मधुर सम्बन्ध थे अतः असमंजस की स्थिति में रविन्द्रनाथ टैगोर ने एक ऐसा गीत लिखा जिसके कुछ हिस्से से तो भारत और उसके इतिहास का वर्णन हो और कुछ हिस्से से भारत के “तथाकथित अधिनायक” जार्ज पंचम की स्तुति भी हो जाये जिससे की समय आने पर जार्ज पंचम स्तुतिगान के कलंक से बचा जा सके..

अब इसको यदि सकारात्मक दृष्टिकोण से देखें तो मैं एक उदाहरण भारत का और एक उदाहरण ब्रिटेन का देना चाहूँगा..भारत में अंग्रेजो द्वारा भारत में बनाई गई एक बिल्डिंग है जिसे पहले “वायसराय हाउस” कहते थे, कभी ब्रिटेन की राजसत्ता का भारत में प्रतीक रहा “वायसराय हाउस” आज भारतीय लोकतंत्र के सबसे पद और तीनो सेनाओं के मुखिया “भारत के राष्ट्रपति” के औपचारिक निवास “राष्ट्रपति भवन” के रूप में जाना जाता है.हमारे देश की बिल्डिंग थी क्या हम इसे तोप लगवा के इसलिए उड़ा देते की अंग्रेजो ने बनाया है ? नहीं, हमने आजादी के पास उसका नाम बदला और भारत के स्मारक के रूप में मान्यता दी...
दूसरा उदाहरण “कोहिनूर हीरे” का है महाराजा रणजीत सिंह ने जिस हीरे को जगन्नाथ मंदिर में दान कर दिया था उसे ब्रिटेन की महारानी अपने मुकुट में लगाकर पुरे विश्व में उसे अपना घोषित करती रही. उसे कभी ऐसा नहीं लगा की उस ब्रिटिश साम्राज्य जिसका सूरज कभी अस्त नहीं होता उसकी महारानी के मुकुट को, एक राजा द्वारा एक मंदिर को दान किया गया हीरा सुशोभित करेगा...

यही बात जन गण मन  अधिनायक पर भी लागू होती है ..हमारे देश के लेखक ने एक गीत लिखा था जिसका गुलाम भारत में भले ही उस समय के भारत के तथाकथित भाग्यविधाता “जार्ज पंचम” के लिए उपयोग किया गया मगर भारत ने अपना अधिनायक और भाग्य विधाता बदल दिया है . जनगणमन लिखते समय भावना या परिस्थिति जन्य मज़बूरी जो भी रही हो मगर 
मनुष्यता के इतिहास के शाश्वत सारथी कोई जार्ज पंचाम नहीं हो सकता और ये बात स्वयं लेखक ने भी अपने स्पष्टीकरण में कही है..आज भारत आजाद है, वायसराय हाउस अब राष्ट्रपतिभवन बन चुका है  और अब जन गण मन किसी “राजा का स्तुतिगान “ न होकर भारत के स्तुतिगान के रूप में मान्यता पा चुका है.. हमने जनगणमन .... को अपना कर अपना हक़ वापस लिया है ,और प्रत्येक भारतवासी के मन में जनगणमन गाते समय उस भारत देश की छवि रहती है जिसके लिए भगत,राजगुरु चंद्रशेखर जैसे लाखो क्रांतिकारियों ने अपना जीवन होम कर दिया..

इतने शोध के बाद ये मेरा निर्णय है की जनगणमन ...मेरे लिए मेरी राष्ट्र आराधना का गीत है जिसे गाने में मुझे कोई समस्या नहीं आप का निर्णय क्या है ये आप के ऊपर छोड़ता हूँ ....
वन्दे मातरम् ,भारत माता की जय 


सूचना स्रोत : इतिहास संकलन विभाग,गूगल वेबसाइट्स ,

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