मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

"जेहादन आयशा" का हनीट्रैप,आईएसआई का जाल और ध्रुव सक्सेना(PAK ISI SPY Aisha)

मध्य प्रदेश की तथाकथित साम्प्रदायिक भाजपा सरकार की पुलिस ने 11 आईएसआई के संदिग्ध एजेंटों को पकड़ा है जिसमें एक भी मुसलमान नहीं है..दिग्विजय सिंह से लेकर अन्य सभी शेखुलर नेताओं में यह बताने की होड़ लग गई है कि पकड़े गए 11 ISI के सहयोग करने वाले लोगो में कोई भी मुसलमान नहीं है.हालांकि ये सूचना पूरी  सत्य नहीं है 

तथ्य ये है कि "
आयशा उर्फ़ आशिया  नाम की महिला ने अपने हुश्न के जाल में फसाकर "राशनकार्ड" बनवा बनवा कर इन लोगो से ये काम कराया और हनीट्रैप में फसाने वाली "जेहदान आयशा" भी इन 11 लोगों के साथ गिरफ्तार की गई है मगर मिडिया को "आयशा" दिखती कहाँ है???"जेहादन आयशा उर्फ़ आशिया"  ने बड़ी ही शातिराना तरीके से कई लड़कों की तरह "ध्रुव सक्सेना" नाम के लड़के को अपने प्रेमजाल में फास रखा था और उससे वो हवाला कारोबार कराती थी. बाद में ध्रुव ने भाजपा ज्वाइन कर ली और बाद में जब ATS  ने ध्रुव और आयश समेत 11 लोगों को गिरफ्तार किया तो पता चला की ये हवाला कारोबार ISI  के इशारे पर हो रहा था और देवबंदी छाप आतंक के पैरोकारों ने इसे भाजपा बजरंगदल और पता नहीं किस किस से जोड़ दिया..
ध्रुव सक्सेना को अपने प्रेमजाल में फासने के साथ साथ "जेहादन आयशा उर्फ़ आशिया " ध्रुव के साथ भोपाल के न्यू मिनाल रेजीडेंसी  में एक ही फ्लैट में रहती थी और ध्रुव ने आयशा उर्फ़ आशिया से निकाह करने के लिए धर्म परिवर्तन की योजना बनाई थी  तब तक हवाला रैकेट पकड़ा गया और पता चला की हवाला का रैकेट "जेहादन आयशा उर्फ़ आशिया " के माध्यम से ISI  चला रही है। मतलब इसमें मालिक आयशा उर्फ़ आशिया थी और बाकी उसके कर्मचारी जिसमें कुछ को वो पैसे तो कुछ को अपना जिस्म फ़ीस के रूप में देती थी। 
मगर मेरा मुद्दा वो 11 है जो "आयशा" की जमात से नहीं है.. कोई भी मुसलमान नहीं है,कोई भी मुसलमान नहीं है यह बात बार-बार दोहरा कर दिग्विजय सिंह और उनके जैसे शेखुलर नेताजी लोग स्वयं यह साबित और स्वीकार कर रहे हैं कि ज्यादातर मामलों में ISI के एजेंट मुस्लिम समुदाय से ही होते हैं। अगर आज तक आई एस आई के पकड़े गए एजेंटों की गिरफ्तारियों को देखा जाए तो लगभग 99% गिरफ्तारियां एक समुदाय विशेष के लोगों की हुई है।और ईमाम बुखारी जी ने एक बार यहाँ तक कहा था कि "हाँ मैं ISI का एजेंट हूँ किसी की हिम्मत हो तो गिरफ्तार करके दिखाये"।।
खैर अब इससे जो बड़ी बात है, कि इन पकड़े गए 11 लोगों में से एक भारतीय जनता पार्टी के मीडिया सेल से जुड़ा रहा है। अगर आई एस आई का एजेंट TMC, SP, BSP, INC या किसी देवबंदी छाप पार्टी से पकड़ा जाता है तुझे कोई आश्चर्य की बात नहीं होती क्योंकि पहले भी ऐसा होता रहा है....मगर यदि आईएसआई के एजेंटों ने भारतीय जनता पार्टी के मीडिया सेल पर घुसपैठ कर ली है तो सचमुच एक गंभीर मामला है और भारतीय जनता पार्टी को इस बात पर विचार करना होगा कि, किस आधार पर अपने विभिन्न कार्यालयों में लोगों का प्रवेश कराया जा रहा है। अन्यथा विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जायेगा..
अक्सर जब कोई "मुस्लिम समुदाय" का ISI एजेंट पकड़ा जाता है तो एजेंट के अलावा सम्बंधित धर्मगुरु और नेता जी लोग उसको निर्दोष होने का सर्टिफिकेट दे देते हैं और कई केस में वो "जेहादी प्रोफ़ेसर जिलानी" की तरह बरी हो जाते हैं(बाइज्जत बरी नही होते कम सबूतों के कारण और वोटबैंक के दबाव के कारण होते हैं)।ठीक इसी प्रकार उत्तरप्रदेश की सरकार ने संकटमोचन मंदिर में बम फोड़कर दर्जनों को चीथड़े कर देने वालों से "समुदाय विशेष" का होने के कारण मुकद्दमा वापस ले लिया था तब कोर्ट ने कहा था
"आज आतंकियों पर से मुकद्दमा वापस ले रहे हो कल भारत रत्न दे देना"।।
मगर मेरा मानना है ऐसा तुष्टिकरण इन 11 के केस में नहीं होगा और होना भी नहीं चाहिए ...सरकार को एक और बाद ध्यान रखना होगा की इन 11 लोगो का पूरा जीवन जेल में ही बीते और तबाह हो जाये ताकि दोबारा कोई हिन्दू ISI की अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष सहायता करने की जुर्रत न करे..मुझे पूरा भरोसा है कि अभी तक "देवबंद के फतवे" की तरह किसी हिन्दू "मठ, अखाड़े या मंदिर" ने ये नहीं कहा कि ये बेचारे निर्दोष भटके हुए हिन्दू नौजवान है, न ही कोई भाजपा का कोई नेता इनकेे पक्ष में आया है क्योंकि भारत में बम फोड़कर फांसी पा कर भी निर्दोष और शहीद होने की इम्युनिटी और तमगा केवल "याकूब" "अफजल" और "जिलानी" को मिल सकता है किसी "ध्रुव सक्सेना" को नहीं...

सबका यही मत है कि ये 11 गद्दार है और गद्दारों के लिए कोई संवेदना नहीं, कोई फतवा नहीं..बाकी "आयशा" तो निर्दोष हो ही जायगी क्योंकि वो "वोट बैंक की फसल आयशा" जो ठहरी ...कानूनन जो अधिकतम सजा है इनके अपराध के लिए वो इन्हें दी जाये.हिन्दू समाज से इनके समर्थन में कोई आवाज नही है और न ही आएगी और यही बात हमें औरों से अलग बनाती है...
भारत माता की जय...
आशुतोष की कलम से

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

प्रेम का व्यवसायीकरण (Happy Rose Day)

प्रेम अब वयस्क और समझदार हो चूका है..रोज डे, प्रपोज डे मनाने वाली जनरेशन उस भाव को नहीं समझती, जब चार लाइन लिखने में पूरा लेटरपैड खत्म हो जाता था, और कमरे में गोला बना के फेके गए आधे लिखे पत्रों का छोटा मोटा हिमालय खड़ा हो जाता था.. कई रातें किताबो के अंदर छुपाये उस पेपर पर चार लाइने लिखने में बीत जाती थी और फिर भी लगता था कुछ कमी है। और इन सब के लिए किसी #रोजड़े #प्रपोजडे की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती थी..क्योंकि निश्च्छल संवेदनाएं प्रतीक्षा क्यों करें?? उनके लिए वर्ष का कोई भी समय पवित्र है.वो सब आग्रह, अपरिपक्व आकर्षण ही सही मगर प्रेम का पुट लिए हुए था ।
आज रोजड़े प्रपोज डे की प्रतीक्षा होती है..क्योंकि सब कुछ बाजार ने नियंत्रित कर लिया है, आप की भावनाएं भी और "प्रेम का अंतिम अभीष्ट" भी बाज़ार ही निर्धारित करता है, आप को प्रेम नहीं भी होता है तो बाज़ार द्वारा करवाया जाता है बेशक
उसे आप दो महीने बाद त्याग दें.आज लिखने लिखाने के लिए स्मार्टफोन है,पहले से लिखी लाईने हैं जिसमें सिर्फ "To" और "From" बदल बदल कर "Send To Many" कर दिया जाता है। आज कल कई केस में सिर्फ "TO" बदला जाता है क्योंकि प्रेम भी बेहतर विकल्पों की तलाश में है..आज का प्रेम खुद को परिशोधित करता रहता है.रिसर्च करता रहता है और "प्रोडक्ट" में बदलाव का ऑप्शन सदैव खुला रखता है.
आज कल प्रेम में आवाज, व्यक्तित्व और आत्मा को गौड होती जा रही है और बेबी का बेस और होठ प्रधान होता जा रहा हैं...आत्मा से शुरू हुआ आख्यान देह की गोलाइयों में "कभी मेरे साथ एक रात गुजार" को अभीष्ट मान बैठा है.. पहले सिर्फ "प्रेमिका" या "प्रेमी" हुआ करते थे अब "We are just Good friends" वाला रिश्ता आ गया है..इस रिश्ते में सहूलियत है किसी भी सीमा पर जा के वापस लौट आने और फिर से "Just Good friends" बन जाने की.
प्रेम का प्रदर्शन और बाज़ारीकरण ने उसकी राधा,मीरा और सीता रूपी समर्पण की महत्ता को छीनकर "अनारकली डिस्को चली" वाले क्लब में ला के खड़ा कर दिया है.."प्रेम अब समर्पित नहीं होता,प्रेम की बोली लगती है..मॉल्स में,थियेटर में और महंगे महंगे शॉपिंग काम्प्लेक्सेज में...."और जब आप ने "बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होई??" यूरोप की अच्छाइयां तो हम स्वीकार नहीं करेंगे क्योंकि वैसा करने में हमे श्रम और उद्यम करना पड़ेगा..मगर यूरोप बुराइयाँ जरूर ले आएंगे..वो हमें शॉर्टकट में ओवरनाईट मॉडर्न बनाती है..और हमारी समाज और शिक्षा की पद्धति ऐसी ही है कि ये सब अनजाने में हम आने वाली पीढ़ी को ट्रान्सफर भी करते जा रहे हैं. राजीव भाई के व्याख्यान की दो लाइने यहाँ प्रासंगिक लगती है..
पहली ये की "यूरोप में एक समय ऐसा भी था कि प्राथमिक स्कूलों से ज्यादा गर्भपात केंद्रों या अवार्शन सेंटर्स की संख्या थी।'"
दूसरा यह कि यूरोप में "ब्रोथल्स" के सामने एक बोर्ड लगा होता था "सावधान जिसके साथ आप सेक्स करने जा रहे हैं, वो आप की बिटिया हो सकती है।".....
हैप्पी रोज डे, चॉकलेटडे, किश डे, मिस डे.....एंड सो आन टू बी कान्टीन्यूड।
आशुतोष की कलम से

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

कश्मीर की राह पर चलता पश्चिम बंगाल.सरस्वती पूजा प्रतिबंधित (Ban Saraswati pooja in WB)


मित्रों आज यह पोस्ट में बहुत ही व्यथित मन से लिख रहा हूँ। हमारी राजनैतिक प्रतिबद्धताएं कुछ भी हो सकती है कोई भारतीय जनता पार्टी का समर्थक हो सकता है कोई सपा बसपा या कांग्रेस का, मगर इन सब से इधर हम एक मनुष्य है और एक हिंदू है। ऐसा माना जाता है कि हिंदू धर्म के अनुयायी स्वभाव से सहिष्णु एवं सर्वधर्म समभाव को मानने वाले होते हैं इसका प्रत्यक्ष उदाहरण पारसी कौम है जिसका अस्तित्व पूरे विश्व से खत्म हो गया मगर वह अपनी मान्यताओं के साथ हिन्दू बहुल भारत में सुख सुविधा एवं शांति से रह रही है।
खैर बात पारसी कौम कि नहीं मैं आज स्पष्टतया वार्ता रेडिकल इस्लाम के अनुयायियों के संदर्भ में करना चाहूंगा। जहां भी इस विशिष्ट प्रकार के इस्लाम धर्म को मानने वाले अनुयायियों की संख्या कुल जनसंख्या का 30% से अधिक हो जाती है वहां अन्य धर्मावलंबियों की स्वतंत्रता का हनन एवं अतिक्रमण शुरू हो जाता है जैसे यह जनसंख्या 50% से ऊपर होती है,अन्य धर्मावलंबियों के पास सिर्फ यही रास्ता बचता है कि या तो वह लोग इस्लाम धर्म स्वीकार कर लें या उस क्षेत्र को छोड़कर चले जाए। जहां पर इस्लामिक अनुयायियों की जनसंख्या 50% से अधिक हो चुकी है तो एक और काम किया जाता है गैर मुस्लिमों को काफिर घोषित करके उनकी हत्या शुरू कर दी जाती है,उनकी बच्चियों का रेप किया जाता है,उनकी महिलाओं को चौराहे पर नंगा किया जाता है और इन सब अत्याचारों से तंग आकर या तो वह इस्लाम स्वीकार कर लेता है या क्षेत्र से छोड़ कर चला जाता है।
आपको यह बात अतिशयोक्ति लग सकती है मगर स्वतंत्र भारत में जम्मू और कश्मीर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जहां इस्लाम के अनुयायियों की जनसंख्या बढ़ते ही कश्मीर के हिंदुओं को उनके घरों से बेघर कर दिया गया।उनकी बच्चियों का बलात्कार हुआ और आज वह दिल्ली और जम्मू के शरणार्थी कैंप में अपने ही देश में शरणार्थी बने 27 साल से जीवन गुजार रहे हैं। भारत में कई अन्य राज्य हैं जहां हिंदू जनसंख्या बहुसंख्यक है वहां पर मुसलमान या अन्य धर्मावलंबी बहुत ही आसानी से अपना जीवन यापन और व्यापार आजीविका चला रहे हैं मगर यह सहिष्णुता इस्लामिक बहुल क्षेत्रों में हिंदू जनसंख्या के साथ कभी नहीं दिखाई जाती है। ईद के अवसर पर बेगानी शादी में दीवाने हिंदू अब्दुल्लाओं को तो आपने देखा ही होगा वह लोग अपने अन्य हिंदू मित्रों को ईद मुबारक ईद मुबारक का संदेश भेजते रहते हैं । मगर जब बात आती है हिन्दू त्योहारों की तो ये सहिष्णुता किस कब्रिस्तान में दफ़न कर दी जाती है..सरस्वती पूजा और दुर्गापूजा हिंदुओं का नहीं पूरे भारत का त्यौहार है भारत की संस्कृति का द्योतक है.कश्मीर में तो हिंदु त्योहार की आप सोच ही नहीं सकते। माँ दुर्गा और विद्या की देवी सरस्वती की पूजा अब पश्चिम बंगाल में प्रतिबंधित कर दी गई और कारण ये है कि मुसलमान बिरादरी सरस्वती पूजा का विरोध कर रही है क्योंकि इस्लाम में सरस्वती पूजा हराम है और एक प्रमुख वजह ये है कि वहां जनसँख्या 30% से ज्यादा पहुच चूंकि है तो दूसरे धर्म वालों के अधिकार ख़त्म होने चाहिए..

.ये बच्ची पश्चिम बंगाल से है..ममता बानो की पुलिस ने इसे बर्बरता से पीटा..
अपराध ये है कि ये एक मुस्लिम बाहुल्य इलाके में रहती है और इसने स्कूल में सरस्वती पूजा मनाने का प्रयास किया..वहां के स्थानीय मुसलमानों ने कहा कि चूंकि इस्लाम में मूर्ति पूजा हराम है बंगाल में सरस्वती पूजन नहीं होगा ममता बैनर्जी सरकार ने भी इसका समर्थन कर दिया कि यदि मुसलमान बिरादरी को आपत्ति है तो पश्चिम बंगाल के स्कूलों में विद्या की देवी सरस्वती की पूजा नहीं होनी चाहिए...इस लड़की ने प्रतिरोध किया तो इसका सर फोड़ दिया गया...
अब न तो महिला अधिकार वाले आएंगे, न मानवाधिकार न बड़की बिंदी गैंग न ही मोमबत्ती गैंग..क्योंकि ये लड़की हिन्दू जो ठहरी और हिन्दू तो लात खाने के लिए ही होता है...
वैसे बंगाली हिंदुओं से मुझे जरा भी संवेदना नहीं है क्योंकि ये भविष्य उन्होंने मतदान करके खुद चुना है.जो कुछ लोगो ने इस चुनाव का विरोध किया उनके प्रति संवेदना है क्योंकि गेंहूँ के साथ घुन को पीसना पड़ता है. अब बस उसी दिन की प्रतीक्षा है को कब कश्मीर के हिंदुओं की तरह बंगालियों के घर के बाहर लिखा जाता है कि या तो बंगाल छोड़ दो,या इस्लाम स्वीकार करो या मरने और बलात्कार के लिए तैयार रहो...
अभी कुछ मित्र हल्ला मचाते आएंगे की सभी मुसलमान एक जैसे नहीं होते.तो मैं अपना प्रसंग बता दूं कि मुझे नवरात्रि, जन्माष्टमी, दुर्गापूजा की बधाइयाँ मेरे मुसलमान मित्र फोन से लेकर मेसेज के रूप में भेजते हैं मगर समस्या ये है मैं जहां रहता हूँ वहां प्रतिशत अभी 10 -12 वाला है..पश्चिमीयूपी में यही प्रतिशत 25 से 30 होते ही मंदिरों से लाउडस्पीकर उतरवाने के लिए आंदोलन होने लगते हैं फतवे जारी होने लगते हैं..बंगाल में सरस्वती और दुर्गा की पूजा प्रतिबंधित हो जाती है और कश्मीर में तो हिंदुओं को जीने का अधिकार नहीं है उन्हें गोली मार दी जाती है.और बाद में एक लाइन में समस्या का समाधान की 4 लाख लोगो को बेघर किसी इस्लाम ने नहीं राजनीति ने किया.. हाँ वही राजनीति जो पाकिस्तान सीरिया सूडान लीबिया मिस्र अफगान तुर्की जार्डन और यमन में चल रही है..वही जिसमें सिंजर की पहाड़ियों में अल्पसंख्यक यजिदियों को कुछ साल पहले तडपा तड़पा कर मार डाला गया और उनकी महिलाएं आज भी "जेहादियों" की सेक्स स्लेव या रखैल बनी हुई हैं..
जहां तक मुद्दा बंगाल का है बंगाल की जनता ने अपनी आत्महत्या स्वयं चुनी है क्योंकि ममता बानो की सरकार सिर्फ 30 से 35% रेडिकल इस्लाम को मानने वाले लोग नहीं बना सकते हैं। इसमें एक बहुत बड़ा सहयोगी वर्ग हमारे उन सेकुलर हिंदुओं का है जिनके निजी स्वार्थ के आगे उनका धर्म उनकी पूजा पद्धति उनकी संस्कृति सभी कुछ गौण हैं। "कश्मीरी पंडितों" ने यही गलती की और खामियाजा वो आज दिल्ली के फुटपाथ पर हैं और उनकी महिलाएं जेहादियों के बलात्कार का शिकार.."बंगाली हिंदुओं" ने इतिहास से सीख नहीं ली और अपनी कब्र खुद खोद ली है ममता बानो की सरकार को चुनकर..इस्लाम तो वही कर रहा है जो महमूद गजनवी,बाबर,औरंगजेब ने किया मगर आप क्या चुन रहे हैं? अपनी अक़्तमहत्या और अपने बच्चों की हत्या???? इस पर विचार कीजिये और इतने लंबे लेख के बाद न समझ आया हो तो नीचे वाला वीडियो देख लीजिये विश्वास मानिये सेकुलरिज्म का बुखार कुछ न कुछ जरूर कम होगा...

आशुतोष की कलम से