गुरुवार, 7 सितंबर 2017

गौरी लंकेश हत्या : एक नागरिक की हत्या या एक बौद्धिक आतंकवादी का अंत

1999 में कारगिल का युद्ध हो रहा था, मैं छात्र जीवन में था.उस समय सोशल मीडिया और अन्य संसाधनों की पहुच न होने के कारण करगिल नाम भी युद्ध से पहले नही सुना था.न ही बाकी ज्ञान बहुत ज्यादा था..रेडियो या टीवी पर रोज युद्ध की खबरे सुनता था। कई बार खबर आती थी की फलाने चौकी पर लड़ाई में हमारे 7 जवान मारे गए और पाकिस्तानियों ने आंख में गोली मारी, सर में गोली मारी आदि..मन दुखी होता था, हालाँकि वो सैनिक मेरे घर के नही होते थे, मगर भारत की रक्षा के लिए जान गवाने वाला हर व्यक्ति स्वाभाविक रुप से हम सभी के कुटुंब का होगा क्योंकि उसका जीवन हमारे लिए लड़ते हुए बीत गया,अतः दुःख होता था। ज
ब किसी दिन खबर आती थी,पाकिस्तान के 8 या 10 सैनिक मारे गए तो मन में प्रसन्नता और आत्मसंतुष्टि होती थी जबकि मारे जाने वाले दुश्मन देश के सैनिक से मेरी कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नही होती थी..बस ये लगता था कि इन लोगो ने हमारे सैनिको की जान ली है, अतः मारे गये पाक सैनिको से कोई सम्वेदना नही..और ये विचार मेरा अकेला नही था भारत के 90% जनता को पाकिस्तानी सैनिकों के मरने पर खुश होती थी...
आज सोशल मीडिया का युग है। भारत में एक ऐसा वर्ग है जिसने भारत से बौद्धिक और हथियार वाला, दोनो युद्ध छेड रखा है..जब उनके हथियार वाले नक्सली, हमारे सैकड़ो CRPF के जवानों को मारते हैं,उनके अंग तक काट ले जाते हैं तब उसी गद्दार देशद्रोही दोगली मानसिकता के कुछ जेएनयू के बौद्धिक वामपंथी नक्सली जेएनयू में CRPF जवानों के मारे जाने का जश्न मनाते हैं,और नक्सलियों का तीसरा डोमेन जो बौद्धिक आतंकवादी टाइप पत्रकारों का है वो जवानो की हत्या को टीवी डिबेट,अखबार,पत्रिका में सही ठहराते हुए जवानो को बलात्कारी हत्यारा बोलता है..
ये लोग पाकिस्तानी सैनिको से ज्यादा खतरनाक हैं। ये हमारे आपके बीच में रहते हैं,भारत की बर्बादी के जंग के नारे लगाते हैं,आतंकवादी अफजल को हीरो और स्वतंत्रता सेनानी कहते हैं, और इनकेे पास मीडिया और अखबार के एक बड़े वर्ग का नियंत्रण है...
दो दिन पूर्व इसी भारत विरोधी गैंग के बुद्धिजीवी डोमेन वाली एक पत्रकार(??) गौरी लंकेश  की हत्या अज्ञात लोगों ने कर दी..हत्या होते ही मुझे उन CRPF जवानों की लाशें याद आ गई जिनको बुरी तरह से काट पीट कर मारने के बाद पेट चीरकर उसमें बम लगा दिया था इन वामपंथियों ने...उन जवानों की हत्या को जायज और सही ठहराते हुए "लंकेश पत्रिका" में, 6 माह की सजायाफ्ता स्वर्गीय "गौरी लंकेश" ने कई आर्टिकल लिखे थे..उस समय कोई हो हल्ला नही हुआ क्योंकि भारत के सैनिक वोट बैंक नही हैं।।
विरोध किसी भाजपा या कांग्रेस के विरोधी पत्रकार का नही है। सामान्यतया आदर्श पत्रकारिता सत्ता के विरोध में रहती ही है। विरोध #भारत_विरोधी_मानसिकता का है। बस ये याद रखिये की आज हम करगिल से बड़ी जंग लड़ रहे है। दुश्मन घर में है,वो कभी जेएनयू में भारत की बर्बादी के नारे लगाते है, कभी जंतर मंतर पर आतंकवादी अफजल के लिए आंदोलन करता है तो कभी टीवी पर जोकरों के साथ स्क्रीन काला करता है।।
और मुझे अपने भारतीय सैनिकों की हत्या में शामिल या समर्थन करने वाले किसी भी व्यक्ति (चाहे वो नेता हो,या पत्रकार या कोई और...) की मृत्यु पर उतना ही दुख,सम्वेदना और कष्ट है,जितना कारगिल युद्ध के समय एक पाकिस्तानी सैनिक के मारे जाने की खबर पर होता था..
भारत का संविधान इतना "सहृदय" है कि वो कसब के लिए भी वकील मुहैया कराता है,वो रात को 2 बजे याकूब के लिए भी सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करता है..."लंकेश " को भी न्याय मिले,मेरी भारत के संविधान में पूरी आस्था है..
आशुतोष की कलम से

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