रविवार, 28 मई 2017

वीर सावरकार का माफीनामा (Truth of Mercy Petitions of Vinayak Damodar Savarkar)

आज भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे अग्रणी नाम वीर सावरकर जी की जयन्ती है..उनकी जीवनी तो कहीं न कहीं पढ़ ही लेंगे आप मगर एक बात जो अक्सर कुत्सित विरोधी विचारधारा के लोग बोलते हैं,उसका निवारण जरूरी है.. वामपंथ और गांधी परिवार की पार्टी के लोगो का कहना है की सावरकर ने अंग्रेजो के सामने घुटने टेक दिए थे और माफ़ी मांगी थी..
अब इस प्रसंग पर आने से पहले कुछ और तथ्य जानना आवश्यक है.सावरकर ने इंग्लैण्ड में बैरिस्टरी की परीक्षा पास की मगर इन्होने "ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति सदैव वफादार रहने" की शपथ लेने से मना कर दिया और इसी कारण इन्हें डिग्री नहीं दी गयी...
एक तथ्य ये भी है की महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू भी इंग्लैंड से "डिग्रीधारी बैरिस्टर" थे..ऐसा तो है नहीं की नेहरू और गांधी के लिए नियम बदले होंगे हाँ गांधी जी ने और नेहरू जी ने छात्र जीवन में ही
"ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति सदैव वफादार रहने" की शपथ ले ली थी अतः वो डिग्री धारी हो गए और सावरकर ने "अंग्रेजो का दलाल" बनने की शपथ नहीं ली तो उन्हें डिग्री नहीं मिली..
स्वतंत्रता संग्राम में वीर सावरकर गांधी,नेहरू समेत लाखो लोग शामिल थे मगर जब नेहरू और गांधी को अंग्रेज गिरफ्तार करते थे,तो वो लोग जेल में आमलेट का नाश्ता करते हुए अखबार पढ़ते हुए समय बिताते थे और वीर सावरकर को अंडमान की जेल(काला पानी) में अत्यंत कठोर सज़ा के तहत दिनभर कोल्हू में बैल की जगह खुद जुतकर तेल पेरना, पत्थर की चक्की चलाना, बांस कूटना, नारियल के छिलके उतारना, रस्सी बटना और कोंड़ो की मार सहनी पड़ती थी।
वीर सावरकर को, नेहरू की तरह जेल में खाने के लिए आमलेट नहीं मिलता था उन्हें कोड़ो की मार मिलती थी और लाइन लगा कर दो सूखी हुई रोटिया.
वीर सावरकर को, गांधी की तरह मीटिंग करने की इजाजत नहीं होती थी उन्हें तो अपनी बैरक में भी बेड़ियों में जकड़कर रखा जाता था।
आखिर अंग्रेज सावरकर से इतना भयभीत क्यों थे और नेहरू गांधी पर इतनी कृपा क्यों?? याद कीजिये इंग्लैण्ड में ली गयी "ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति सदैव वफादार रहने" की शपथ".... जो नेहरू ने तो ली थी मगर सावरकर को स्वीकार नही थी..
●अब आते हैं ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति सदैव वफादार रहने" की शपथ" ले चुके कांग्रेसियों के प्रश्न पर कि सावरकर ने अंंग्रेजो से माफ़ी मांगी थी??
प्रसंग ये था की सावरकर की प्रसिद्धि से भयभीत अंग्रेजो ने उन्हें काला पानी भेज दिया और भयंकर यातनाएं दी..अंग्रेज चाहते थे की सावरकर की मृत्यु यही हो जाये.ऐसा ही हो भी रहा था,भयंकर शारीरिक एवं मानसिक यातना और पशुओं जैसे बेड़ी में जकड कर रखने के कारण सावरकर को कई गंभीर बिमारियों ने पकड़ लिया था और लगभग वो मरने वाले थे..मगर देश को क्रांतिकारियों को ऐसे वीर की जरूरत थी.क्योंकि जंग मरकर नहीं जीती जाती.. ऐसे समय में काला पानी जेल के डॉक्टर ने ब्रिटिश हुकूमत को रिपोर्ट भेजी कि सावरकर का स्वास्थ्य अत्यंत ख़राब है और वो थोड़े दिनों के और मेहमान हैं..इस रिपोर्ट के बाद, जनता के भारी दबाव में सन् 1913 में गवर्नर-जनरल के प्रतिनिधि रेजिनाल्ड क्रेडॉक को पोर्ट ब्लेयर सावरकर की स्थिति जानने के लिए भेजा गया.. उस समय काला पानी से निकल कर भारत आकर क्रांति को आगे बढ़ाना प्राथमिकता थी,अतः वीर सावरकर ने अंग्रेजो के इस करार पत्र को स्वीकार किया और कई अन्यों को भी इसी रणनीति से मुक्त कराया,जिसका फार्मेट निम्नवत है..
"मैं (....कैदी का नाम...)आगे चलकर पुनः (....) अवधि न तो राजनीती में भाग लूंगा न ही राज्यक्रांति में.यदि पुनः मुझपर राजद्रोह का आरोप साबित हुआ तो आजीवन कारावास भुगतने को तैयार हूँ"
यहाँ ये ध्यान देने योग्य बात है कि अंग्रेजो के चंगुल से निकलने के लिए,ऐसा ही एक पत्र शहीद अशफाक उल्ला खाँ ने (जिसे कुछ लोग क़ानूनी भाषा में माफिनामा भी कह सकते हैं) भी लिखा था मगर अंग्रेज इतने भयभीत थे की उन्हें फाँसी दे दी.. तो क्या अशफाक को भी अंग्रेजो का वफादार, देश का गद्दार मान लिया जाए?? माफ़ कीजिये ये क्षमता मेरे पास नहीं मेरे लिए अशफाक देशभक्त और शहीद ही हैं,हाँ कांग्रेस या वामपंथी ऐसा कह सकते है..
"सावरकर ब्रिटिश राजसत्ता के वफादार होंगे" ऐसा उस समय का मूर्ख व्यक्ति भी नहीं मानने वाला था तो फिर अंग्रेज कैसे विश्वास करते...रेजिनाल्ड क्रेडोक ने सावरकर की याचिका पर अपनी गोपनीय टिपण्णी में लिखा "सावरकर को अपने किए पर जरा भी पछतावा या खेद नहीं है और वह अपने ह्रदय-परिवर्तन का ढोंग कर रहा है। सावरकर सबसे खतरनाक कैदी है। भारत और यूरोप के क्रांतिकारी उसके नाम की कसम खाते हैं और यदि उसे भारत भेज दिया गया तो निश्चय ही भारतीय जेल तोड़कर वे उसे छुड़ा ले जाऍंगे।"
इस रिपोर्ट के बाद कुछ अन्य कैदियों को रिहा किया गया मगर भयभीत अंग्रेजो में वीर सावरकर को जेल में ही रक्खा .लगभग एक दशक इसके बाद काला पानी जेल में बिताने के बाद 1922 में वीर सावरकर वापस हिन्दुस्थान आये..
अब आप स्वयं निर्णय कर लें की "अंडमान की जेल में कोल्हू में जूतने वाले सावरकर" अंग्रेजों के वफादार थे या "एडविना की बाहों में बाहें डालकर कूल्हे मटकाने वाले चचा नेहरू" अंग्रेजो के ज्यादा करीब थे....

आशुतोष की कलम से

शुक्रवार, 26 मई 2017

हे उज्मा तुम आईना हो भारत में रहने वाले पाकिस्तानी भारतीयों का

#उज्मा
उज्मा ने तो पाकिस्तान में, किसी के प्रेम के चक्कर में धोखा खाया और वापस आई तो, जो सर अल्लाह के अलावा कहीं न झुकाने का फरमान "सऊदी अरब" से मिला है उसे मानने से इंकार करते हुए , वो सर मातृभूमि के लिए झुक गया..और हाँ किसी बजरंगदल या आरएसएस के दबाव में नहीं .और बस एक इसी कारण चाहे तुमने 5  शादियाँ की या 15,तेरे सारे गुनाह माफ़ है उज्मा..
मगर लाखों हैं इस ओर, जिन्होंने उस ओर का पाकिस्तान नहीं देखा।उनकी पीढियां हिन्दुस्थान का खा रही हैं हिन्दुस्थान में रह रही हैं,मगर दिल पाकिस्तान के लिए धड़कता है..आँखे खोलो और देखो, तुम्हारी बिटिया को भी नहीं छोड़ा पाकिस्तानी गिद्धों ने। जीपी सिंह नामक "काफ़िर डिप्लोमेट"ने इसे दूतावास् में अपनी बिटिया की तरह रक़्खा और एक सुषमा स्वराज नाम की भाजपाई संघी बिदेश मंत्री ने दिन में चार चार बार फोन करके इसे ढांढस दिया और सुरक्षित वापस घर ले आई...मगर तुम समझोगे नहीं,बिना दोजख देखे पाकिस्तान जिंदाबाद करना छोड़ोगे नहीं.
अब जब कभी वंदे मातरम साम्प्रदायिक लगे,भारत माता की जय काफिराना लगे और पाकिस्तान के लिए प्यार उमड़े,तो एक बार अपनी बिटिया को अच्छे से देखकर उज्मा की कहानी याद कर लेना।
हे उज्मा तुम आईना हो भारत में रहने वाले पाकिस्तानी भारतीयों का....स्वागत है उज्मा....

नोट : पोस्ट का उद्देश्य उज्मा जो भारत की बेटी बनाना या महिमामंडन नहीं है बल्कि उन भारतीय मुस्लिमो और सेकुलर हिन्दुओं को पाकिस्तान का सच बताना है जो पाक के प्रति संवेदना रखते हैं,

आशुतोष की कलम से

गुरुवार, 25 मई 2017

अनोखी पहल: रेडबॉक्स और व्हाइट बॉक्स(Vijay Srivastav Deoria)

देवरिया जिले के एक अध्यापक विजय श्रीवास्तव जी जो अपने विभिन्न समाजसेवी कार्यों के कारण यहाँ जाने जाते हैं। उन्होंने इन लाल सफेद बक्सो से एक अनोखी पहल की है.. ये जो चित्र में दिख रहे लाल और सफेद बक्से दिख रहे हैं,वो बक्से से कहीं ज्यादा सैकड़ो गरीब परिवारों के लोगो के तन ढंकने का साधन है.. गर्मी के दिनों में गांवों में आग लगने की घटना आम होती है जिसमें लोगो के घर के घर जल जाते हैं और लोगो के पास तन ढंकने तक के कपडे नहीं होते हैं । इसका निदान RED BOX के रूप Vijay Srivastav जी ने ढूंढ निकाला है।
इन्होंने शहर के एक मुख्य चौैराहे पर एक बक्सा रखवा दिया है और इस बॉक्स में लोग अपनी स्वेच्छा से नए पुराने कपडे डाल देते हैं और जिस किसी अग्नि पीड़ित या गरीब को कपड़ो को जरूरत होती है वो अपनी आवश्यकतानुसार कपडे छाटकर ले जाता है.. यह प्रकिया स्वतः प्रबंधन पर चलती है न तो कपडे बक्से में डालने या निकालने पर कोई रोकटोक नहीं होता है।।
ठंढ आते आते ये बक्सा सफेद रंग में पेंट करा दिता जाता है और लोग ऊनी कपड़े कम्बल आदि ,अपने स्वेच्छा से बक्से में डाल देते हैं और जरूरतमंद लोग उसमें से ऊनी कपडे ले जाकर उपयोग करते हैं। जाड़े में भी यह प्रक्रिया नागरिकों द्वारा सहयोग एवं स्वप्रबंधन पर ही चलती है।
इस प्रयोग को आप अपने मोहल्ले,शहर कालोनी में भी कर के कई लोगो के जीवन में परिवर्तन ला सकते हैं। इसमें कोई बहुत बड़ा संसाधन और व्यय भी नहीं लगने वाला और प्रक्रिया स्थानीय लोगों के सहयोग से चलाई जा सकती है.
इस सफल प्रयोग हेतु बहुत बहुत शुभकामनायें.विजय श्रीवास्तव देवरिया जिले में सरकारी अध्यापक,साइबर क्राइम सेल के संयोजक एवं समाजसेवी हैं इनका मोबाइल संपर्क 9454552622 है...
आशुतोष की कलम से
 

मंगलवार, 23 मई 2017

अजूबी शिक्षा व्यवस्था हेतु अजूबे सुझाव (UP PRIMARY EDUCATION)

यूपी में अध्यापको द्वारा, पशुगणना,बालगणना, जनगणना,चुनाव,मिड डे मील,ड्रॉपआउट गणना,
टीकाकरण,कीड़ी की दवा देना,पल्स पोलियो की दवा,आयरन टैबलेट,आधार कार्ड बनवाने,स्कूल रंगवाने,पत्र पहुचाने के बाद जो एक दिन में 42 घंटे शेष बचते हैं उसके लिए अब सरकार ने कुछ नया सोचा है..
●अब गुरु जी स्कूलों में भैंस दूहेंगे.
● दो घंटे झाड़ू लेकर सफाई भी करेंगे..
झाड़ू लेकर कुत्ता बिल्ली गाय भैंस द्वारा किया गोबर, मलमूत्र तो रोज साफ़ ही करते थे गुरु जी अब बाकी भैस दुहना रह गया था.. मगर इसके बाद भी एक दिन में 36 घंटे बच रहे हैं अध्यापक के पास, ये तो सरासर अकर्मण्यता है इसके लिए कुछ अन्य सुझाव जो शिक्षा की गुणवत्ता को ऑक्सफोर्ड के समकक्ष ला के खड़ा कर देंगे..
●अंडा लाभकारी है अतः प्रोटीन की कमी से जूझ रहे बच्चों हेतु मुर्गी पालन भी स्कूल में हो।।और गुरु जी मुर्गी के बच्चे को दाना खिलाएं..मुर्गी किसी अन्य स्कूल के मुर्गे के साथ भाग जाने की स्थिति में गुरु जी पर गैरजमानती धाराओं में FIR दर्ज हो..
●विद्यालय के सामने खाली पड़ी ग्राम सभा आदि की जमीन पर गेंहू,दाल या चावल उगाने की जिम्मेदारी गुरु जी की हो जिससे की मीड डे मील में समस्या न आये..फसल को नीलगाय या मौसम से हुई क्षति को गुरु जी के वेतन से वसूला जाये..
● विद्यालयों में चोरी की घटना को देखते हुए गुरु ज़ी लोग पारी बांधकर रोज रात 8 से सबह 6 तक चौकीदार की ड्यूटी करें..चोरी होने पर सभी गुरु जी लोगों का एक माह का वेतन काटकर प्रधानध्यापक को सस्पेंड किया जाये..
● बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में नाव आदि चलवाने, और पानी कम होने पर, प्रोटीन का मुख्य स्रोत मछली को जाल लेकर पकड़ने की जिम्मेदारी उस गांव के अध्यापको की हो..प्रतिदिन हर अध्यापक को कम से कम 4 किलो मछली पकड़ कर मछली और जाल के साथ सेल्फी भेजने का प्रावधान हो..
● बच्चों को नहलाने,उनके कपडे साफ़ करने,शौच आदि साफ़ सफाई का काम क्लासटीचर के जिम्मे हो।किसी लड़के के कपडे गंदे मिले तो अध्यापक का इंक्रीमेंट रोक दिया जाये..
● शिक्षा के निजीकरण माफिया द्वारा "प्रायोजित जनमत" बना के गुरु जी को कोसते रहें की इनको क्या काम है? फ्री का वेतन पा जाते हैं.संभव हो तो महीने में 5% अध्यापकों का निलंबन हो और 15% का इंक्रीमेंट रोका जाये..
पूरा विश्वास है की इस् प्रकार शिक्षा गुणवत्ता के नए शिखर को पा जायेगी और आने वाले दिनों में कान्वेंट और शिशु मंदिर के पंखे और बेंच वाले कमरों में पढ़ने वाले बच्चे अपने स्कूल से नाम कटवाकर, हमारे प्राथमिक स्कूलों के टाट पट्टी पर बैठकर पढ़ने आएंगे...
Narendra Modi जी MYogiAdityanath जी व्यथित ह्रदय से ये पोस्ट लिख रहा हूँ की अब भी प्राथमिक शिक्षा की मूल समस्याओं को एड्रैस करने की जगह हम भैंस और झाड़ू में उलझे हैं..सिर्फ अध्यापक की जिम्मेदारी तय करने से सिस्टम नहीं सुधरने वाला है..अध्यापक तो फ्रंटलाइन का सिपाही है और उसे जैसा आदेश और परिवेश मिलेगा वैसा करेगा मगर नीति निर्धारण में व्यवहारिकता नहीं आई तो, आज का एक भैंस पालने का सुझाव,जिसे संभवतः शासन रिजेक्ट कर दें, कल के प्राथमिक शिक्षा का भविष्य भी हो सकता है..
आशा है नई सरकार इन बिंदुओं पर भी संज्ञान लेगी..
आशुतोष की कलम से

रविवार, 21 मई 2017

जय भीम जय मीम एकता का सच (Truth of Jai Bhim Jai meem)

दो तस्वीरें साझा कर रहा हूँ, दिल्ली के जंतर मंतर पर "भीम सेना" नाम के एक संगठन के प्रदर्शन के सन्दर्भ में..
भीमसेना का कहना है कि उनके असली दुश्मन हिन्दू है.
मुस्लिम और ईसाई समुदाय के साथ उन्हें कोई समस्या नहीं है..अब बात तस्वीरों की..तस्वीर एक: उत्तर प्रदेश के लखनऊ की सन 2012 की जब "जय भीम" के आराध्य "बुद्ध" पर "जय मीम" ने बेलचे और फावड़ों से हमला किया था.और "भीम सेना" शायद किसी बिल में घुसी हुई थी..


तस्वीर दो: बामियान अफगानिस्तान में विश्व की सबसे बड़ी "बुद्ध प्रतिमाएं" थी.
जय मीम ने तोप लगवा कर उड़वा दिया और "भीम सेना" या इसके जैसों की पैंट गीली पीली हो गई किसी की हिम्मत नहीं हुई मुह खोलने की..मुझे नहीं लगता कि हिन्दू समुदाय भारत में कभी इतना अतिवादी हुआ होगा की बुद्ध का ये हाल किया होगा.मगर राजनीति ऐसी घटिया है कि बुद्ध का ये हाल करने वाले अच्छे हैं और बुद्ध पूर्णिमा मनाने वाले असहिष्णु अत्याचारी..
जैसा की मैंने पहले भी कहा है कि Narendra Modi और भाजपा को 2019 में सिर्फ एक ही तरीक़े से हराया जा सकता है वो है हिन्दू समाज में जातीय विद्वेष को भड़काकर.. यूपी के चुनाव परिणाम आते ही ये प्रयास तेज हुआ है और उसी प्रसंग का अवैध परिणाम है "भीम सेना"..इनको भीम से कुछ लेना देना नहीं इनका टारगेट है जातीय भावना को भड़काकर चुनाव की बिसात बिछाना...
कृपया ऐसे आयोजनों से सावधान रहें। याद कीजिये पुरस्कारवापसी, रोहितवेमुला और असहिष्णुता और बिहार चुनाव..अब 2019 से पहले ये "असहिष्णुता पार्ट 2" की तैयारी है. खैर राजनीति में विपक्ष चाले चलने को स्वतंत्र है सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है इस "असहिष्णुता 2" वाले सामाजिक वायरस का एंटीवायरस ढूंढें...
आशुतोष की कलम से