बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

जीसस गायत्री मन्त्र ईसाईयों द्वारा धर्मांतरण का नया तरीका (Conversion)

मैंने काफी पहले भाई राजीव दीक्षित भाई के गुरूजी प्रोफेसर धर्मपाल की एक पुस्तक पढ़ी थी "Despoliation and Defaming of India" पुस्तक में ब्रिटेन की संसद,जिसे हाउस ऑफ कामंस के नाम से जाना जाता है, उसकी प्रोसीडिंग्स लिखी थी।मैकाले से लेकर अन्य कई वरिष्ठ ब्रिटेन के सांसदों ने अपने विचार उसमें दिए थे।हाउस ऑफ कामंस ने उस डिबेट का टॉपिक ही था "द ब्रिटिश डिबेट ऑन क्रिश्चिनाइजेशन ऑफ इंडिया"। इस डिबेट में ब्रिटेन की संसद में सांसदों ने अपने अपने विचार रखें 22 जून 1813 को विलियम बिलबर फोर्स जो कि ब्रिटेन के हाउस ऑफ कामंस का सदस्य था, उसने उसने एक "क्रिश्चनाइज्ड इंडिया" को ब्रिटेन की ड्यूटी बताते हुए भारत को किस प्रकार ईसाईकरण किया जाए या भारत का इसाईकरण क्यों आवश्यक है इस पर अपने विचार रखे. 1 जुलाई 1813 को ब्रिटेन हाउस ऑफ कॉमंस में पुनः विलियम बिलबर फोर्स की दूसरी स्पीच हुई मुद्दा वही था भारत का इसाईकरण। इसके बाद जेम्स मिल और टीबी मैकाले की स्पीच हुई जिसमें ये योजना बनाई गई थी कि आने वाले समय में किस प्रकार भारत को एक ईसाई राज्य बनाना है.
आजादी के बाद सत्ता का स्थानांतरण नेहरू जी जैसे व्यक्तियों के हाथ में किया गया इसके पीछे भी टी बी मैकाले की वही नीति थी कि भारत में हमें मानसिक रूप से अंग्रेजों की एक पीढ़ी तैयार करनी है जो देखने में भारतीय हो। नेहरू जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अंग्रेजों की भारत को क्रिश्चनाइज करने की रणनीति को उर्वरा भूमि मिल गई इसी क्रम में अंग्रेजों ने भारत सरकार पर अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए विभिन्न क्रिश्चियन मिशीनरीयों को भारत भेजा और बड़े पैमाने पर भारत में धर्मांतरण का खेल हुआ जिसका परिणाम ये है कि आज पूरा नार्थ ईस्ट ईसाई है. अब चूकि हमारे शासक बौद्धिक रूप से अंग्रेज वर्ग से संबंधित थे और नेहरु जी ने तो स्वयं भी स्वीकार किया है कि वह बाई चांस हिंदू है अगर नेहरू के शब्दों में कहें "आई एम अ हिंदू बाई चांस" इस कारण धर्मान्तरण और आसान हो गया।
जब ईसाई मशीनरी यहां आए तो वह इस बात को अच्छी तरीके से जानते थे कि भारत की जनता को सीधे-सीधे उनके धर्म को गाली देकर, नीचा दिखा कर बड़े पैमाने पर धर्मांतरित नहीं किया जा सकता है। तब उन्होंने एक नया खेल खेला जो की अनवरत आज भी जारी है वह हमारे प्रतीक चिन्हों को स्वीकार करने लगे अगरबत्ती दिखाना,हवन करना,गेरुआ वस्त्र पहनना,यहां तक कि कमंडल खड़ाऊं और चंदन लगाना यह सब करके वह भोले-भाले हिंदुओं की जीवन में प्रवेश करते थे और धीरे-धीरे कृष्ण और राम की तस्वीर के जगह पर ईसा मसीह की तस्वीर रखकर पूजा प्रारंभ कर आते थे और इसी क्रम में उस व्यक्ति की आने वाली पीढ़ी पूर्णतया ईसाई होती थी.. ये कार्यक्रम सन 1813 से आज तक जारी है...
नीचे एक वीडियो आप लोगों से शेयर कर रहा हूं वही रणनीति हिंदुओं को धर्मांतरित करने के लिए हिंदुओं की ही प्रतीक चिन्हों का उपयोग करो अब तक हम सभी गायत्री मंत्र सुनते आए थे अब "जीसस मंत्र" बन गया और यह बनाने वाले भी कोई अंग्रेज नहीं चंद टुकड़ों की खातिर परिवर्तित हुए मैकाले के मानसपुत्र हैं. सरकार और समाज को बहुत गंभीरता से "एंटी कन्वर्जन ला" पर विचार करना होगा अन्यथा इश्लामिक जेहादियों से इतर समाज का एक स्लो प्वाइजन, ये क्रास लटका कर मन्त्र पढ़ने वाले मैकाले विचारों के दलाल भी दे रहे हैं..
आशुतोष की कलम से

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