शनिवार, 7 जनवरी 2017

महिला सशक्तिकरण के मायने..

इस पोस्ट का आशय कहीं से भी पुरुषों के व्यसनों का समर्थन या महिलाओं का अपमान नहीं है...
एक प्रश्न : जब पुरुष दारु सिगरेट चरस पी सकते हैं तो महिलाएं क्यों नहीं? ये कैसा दोगला व्यवहार है पुरुषवादी समाज का???
समाधान: प्रथम तो धर्म की बात करूँ तो नारी स्वाभाविक एवं प्राकृतिक रूप से शील का प्रतिनिधित्व करती हैं अतः व्यसनों से संयम की मर्यादा रेखा अपेक्षाकृत ज्यादा प्रबल रूप से लागू होगी मगर मुझे मालूम है इस उत्तर को मिलते ही कुछ अपरिपक्व नारियां और कुछ तथाकथित लिबरल,महिला अधिकारों के संरक्षक पुरुष ( जो की यथार्थ में मांस को नोचने वाले गिद्ध से ज्यादा मेरी नजर में नहीं हैं) मेरे ऊपर सामंती फासीवादी होने का तमगा लगा देंगे अतः वो जिस विज्ञान को आधार बनाते हैं उसी आधार पर उत्तर देने का प्रयास करता हूँ..
सिर्फ एक तथ्य यदि बच्चे का लें तो मान लीजिए एक पुरुष चरस अफीम दारु सब पीता है( जो पूर्णतया गलत है) मगर वो बच्चे के सेहत पर कितना असर डालेगा? पुरुष का प्राथमिक योगदान तो स्पर्म डोनेशन तक रहता है..इसके बाद की कल्पना कीजिये..एक माँ गर्भवती है मगर नारी सशक्तिकरण के लिए वो भी चरस पीयेगी दारु पीयेगी अपने आवारा पति की तरह...मतलब 9 महीने तक 24 घंटे अजन्मे भ्रूण के पोषण में नशा भी शामिल होता है ..याद कीजिये हमारे घर के दूध पीते बच्चे को बुखार हो जाता है क्योंकि उसकी माँ को बुखार है..बच्चा खाँसता है तो डॉक्टर माँ से कहते है। कि चावल खाना काम कीजिये आप को खांसी होगी तो बच्चे को खांसी हो जायेगी....अब वही माँ सशक्तिकरण के नाम पर कहे की मेरा पति शराबी है तो रोज 4 पैग मेरा अधिकार है क्योंकि नारी सशक्तिकरण करना है..अब उसके बच्चे पर क्या प्रभाव पड़ेगा..चलिए और आगे बढ़ते हैं बच्चे का स्वाभाविक लगाव माँ से ज्यादा होता है तो इस हिसाब से आदते भी माँ की पहले सीखेगा...
बस एक इसी उदाहरण की परिस्थितियों को सामने रखकर बताना चाहता हूँ की क्यों समाज धर्म प्रकृति ने सबके लिए अलग अलग मर्यादाएं निर्धारित की हैं. यदि पुरुष बच्चे को अपने पेट में पालता अपना दूध पिलाता तो सारी स्थितियां पुरुष पर लागू होती...
इस लेख का आशय सिर्फ इतना है कि "महिला सशक्तिकरण" का मतलब ये बिलकुल नहीं की पुरुष की "गलत और वाहियात" आदतों की बराबरी करे महिला सशक्तिकरण तब होगा जब वो पुरुष की अच्छी आदतों से प्रतिस्पर्धा करे और समाज कानून उसे इतनी ताकत दे की वो पुरुष के "नशे आदि जैसे व्यसनों" के विरोध में अपनी आवाज बिना किसी हिचकिचाहट के उठा सके..
वामपंथी और आज के तथाकथित बुद्धिनजीवी इसे नहीं समझेंगे क्योंकि उनकी नजर में महिला सशक्तिकरण ये है पुरुष अगर सिगरेट पिए तो महिला चरस पीयेगी पुरुष अगर किसी लड़की का हाथ पकड़ के लंपटइ करे तो महिला सड़क पर "किसी से कहीं भी कैसे भी" किस आफ लव करेगी....मेरे समझ से ये महिला सशक्तीकरण से ज्यादा कुछ "तथाकथित लिबरल बुद्धिजीवियों" लोगों का अपने भोग के लिए महिलाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना है..
सशक्तिकरण को सकारात्मक रखें, की नकारात्मक सशक्तिकरण व्यक्ति और समाज दोनों के लिए हानिकारक है ...
आशुतोष की कलम से

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