गुरुवार, 10 अगस्त 2017

दूसरा पक्ष: योगी जी को एक अध्यापक का पत्र


पत्र का कंटेंट यूपी के अलग अलग हिस्सों के सरकारी स्कूलों के अध्यापको के अलग अलग अनुभव से संकलित है।
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प्रिय मुख्यमंत्री महोदय,
उत्तर प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था सुधारने की आप की पहल अत्यंत ही स्वगतयोग्य कदम है। महोदय सामान्यतया समाज में सरकारी मास्टर की प्रायोजित छवि एक नाकारा,हारमखोर टाइप व्यक्ति की बनाई जाती है ।
एक सरकारी प्राइमरी स्कूल का अध्यापक आप से कुछ अपने मन की बात साझा करना चाहता है।
मेहनत से पढ़ाई किया,CTET पास किया और मेरिट में आया तो ये नौकरी मिली। बहुत कुछ करना चाहता था मगर नियुक्ति पत्र मिलने से पहले किस विद्यालय पर जाना है,इसका निर्धारण "विशेष व्यस्था" के तहत हुआ और चूकी ईमानदारी का कीड़ा मेरे अंदर था अतः उस विशेष व्यवस्था का हिस्सा नही बना और अपने मकान से 50 किलोमीटर दूर का एक विद्यालय मिला। फिर भी खुश था की "कर्तव्य पथ पर जो मिला यह भी सही वह भी सही" गुनगुनाते हुए ज्वाइन करने गया तो मेरे एक वरिष्ठ की टिप्पणी थी "नया नया जोश है थोड़े दिन में ठंढा हो जाएगा"..मैने ये सोचा की सम्भबतः मेरे वरिष्ठ काम नही करना चाहते इसलिए ऐसा कह रहे हैं।

महोदय अब अपना पहला दिन बताता हूँ। अपने घर से 50 किलोमीटर दूर अनजान गांव में, सुबह सुबह स्कूल गया तो हमारे हेडमास्टर साहब झाड़ू कुदाल लेकर लेकर कुत्ते और बिल्ली की टट्टी साफ कर रहे थे। समय का तकाजा देखते हुए मैने भी सफाई के लिए हाथ बढ़ाया तो उन्होने मुस्कराते हुए कहा "माटसाहब आदत डाल लीजिये"..मैने पूछा सफाई कर्मचारी कहा है??? वो आता है 10-15 दिन में एक बार ...मैने कहा कम्प्लेन कीजिये विभाग में... फिर वही जबाब मिला "नया नया जोश है ठंढ़ा हो जाएगा मास्टरसाहब......"बाद में उन्होंने बताया स्थानीय नेताओं के घर सफाईकर्मी काम करता है, हम इतनी दूर इस गांव में लड़ाई कैसे करें?? विभाग में ऊपर तक पहुच है नेता जी की...जैसे तैसे कुछ बच्चे आये और एक बारामदे में बैठकर शोर मचाने लगे मैने कहा एक से पाँच तक अलग अलग बैठाते हैं जबाब मिला "नया नया जोश........" वैसे बाद में समझ आया कि अध्यापक दो हैं कमरे तीन हैं और पढ़ाना 1 से 5 तक के लड़कों को है..तीन कमरों में से एक ओर गांव के किसी व्यक्ति ने कब्जा किया था। एक कि हालत ऐसी थी कि फर्श टूटा ऊपर से छत टपक रही थी..खैर कुछ छात्रों को एकमात्र बचे अपेक्षाकृत अच्छे कमरे में बैठाया और कुछ को सामने के बागीचे में आम के पेड के नीचे झाड़ू लगा कर। एक बच्चे ने कहा गुरु जी दीजिये मैं झाड़ू लगा दूँ तो अचानक याद आया की हर गली में कैमरे लेकर स्वनामधन्य पत्रकार टाईप वीर घूम रहै हैं,बच्चे से झाड़ू लगवाने के आरोप में नौकरी भी जाएगी। खैर झाड़ू लगा के कक्षा 3,4,5 को पेड़ के नीचे बैठाया और हेडमास्टर साहब 1 और 2 को एक साथ बैठाकर पढाने लगे। महोदय मैंने देखा कि आप के RTE के नियम के तहत ऐसे लडके को कक्षा 4 में प्रवेश देने के लिए बाध्य था जिसे क ख ग वर्णमाला नही आता था। अब मुझे वो अलादीन का चिराग ढूंढना था, जिससे कि उस बच्चे को सिलेबस के हिसाब से "प्रकाश संश्लेषण" पढा सकूं जिसे वर्णमाला भी नही आती..सबसे कॉपी निकालने को कहा तभी मेरे हेडमास्टर साहब ने बुलाया, मास्साहब जल्दी आइये। पढ़ाना छोड़ उनके पास गया तो उन्होंने कहा की पढ़ाई बाद में होगी,ऊपर आए आदेश आया है की दिए गए फार्मेट में स्कूल बच्चों आदि की डिटेल 2 घंटे मे देना है। चपरासी,सफाईवाला,अध्यापक के बाद अब मैं क्लर्क बन चुका था,हालांकि पहाडा पढ़ने को कहा था ,कुछ बच्चे पढ़ते रहे और कुछ पास के बगीचे में खेलने लगे हल्ला मचाने लगे,RTE ऐक्ट के तहत आप ने मेरे हाथ से डंडा छीन लिया है,फेल कर नही सकता,नाम काट नही सकता..अतः कुछ ज्यादा कर नही सकता था।
2 घंटे बाद वो लिस्ट विभाग को पहुचाने गया क्योंकि डाकिया और कुरियर वाला भी मैं ही हूँ..

वापस आया तो मिड डे मील बन चुका था हेडमास्टर साहब ने "खाना चेक किया गया" वाले कालम में रजिस्टर पर साइन करने को कहा। मैं चेक करने गया.. रजिस्टर में सब्जी दाल और रोटी थी मगर बनी तो खिचड़ी थी ,खाने की कोशिश किया दो चम्मच भी नही खा पाया, अभी तक जिंदा बची रही अंतरात्मा रो रही थी कि ये खाना बच्चे कैसे खाएंगे? मैने हेडमास्टर साहब से बताया, उन्होंने बोला कि इमोशनल मत होइए खाना मैं नही बनाता मुखिया जी बनवाते हैं ।जो बनवाते थे उनके पास गया तो जबाब था कि "नया नया आये हैं मास्साहब..बगल के गांव में चूल्हा ही नही जला महीनों से, उससे तो बहुत अच्छे हैं हम" वैसे भी आप पढाने मे ध्यान दीजिए घर बार से दूर आये हैं नौकरी करने न कि लड़ाई करने.हताश हो के हेडमास्टर साहब के पास गया और कहा कि कम्प्लेन करूँगा। उन्होंने कहा की ये भी कर लो "नया नया जोश है...." मैने तुरंत अधिकारी को फोन लगाया और स्थिति बताई उन्होने कहा मास्टर साहब  प्रेक्टिकल बनिये एडजेस्ट करके चलना पड़ता है।थोड़ी ही देर में मुखिया जी की XUV विद्यालय गेट पर थी।मेरे कम्प्लेन की जानकारी उनतक पहुच गई थी। मुखिया जी ने मुझे पुनः अपने दो मुस्टंडों के साथ खड़ा हो के समझाया मास्टर साहब सिस्टम में आप नए हैं, आराम से पढ़ाइये दो चार दिन न भी आएंगे तो हम लोग देख लेंगे कोई समस्या नही होगी ।हम ये अकेले नही लेते, सब तक पहुचता है।कम्प्लेन का फायदा नही..बगल के एक गांव के मास्टर की गांव वालों द्वारा कुटाई का उदाहरण भी दे दिया गया..ख़ैर ये हरामखोर बनने और अपना जमीर बेचने का पहला दिन था जिसकी गवाही मिड डे मील के रजिस्टर पर किया गया मेरा हस्ताक्षर चीख चीख के दे रहा था..आज की पढ़ाई पूरी हुई..

महोदय अगले दिन मुझे गांव मे जा के सर्वे करना था क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने कोई डेटा मांगा था जिसको तुरंत देना था । अतः अगले दिन मैं सफाईकर्मी,चपरासी के बाद मास्टर नही बन पाया उस दिन सर्वेयर बना रहे..बच्चे बागीचे में खेलते रहे.. हेडमास्टर साहब कभी कक्षा 1 तो 2 तो कभी 5 के बच्चे को संभालते रहे.. 3 -4 दिन बाद मैं के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया तो आधो के पास कॉपी पेंसिल नही। पूछने पर बताया कि पापा बम्बई कमाते हैं पैसा भेजेंगे तो खरीदा जाएगा,कुछ ने कहा कि अगले हफ्ते बाजार से ले आएंगे..महोदय हमारा सत्र तो अप्रैल से शुरू हो जाता है मगर किताब मिलना शुरू होती है जुलाई से और अर्धवार्षिक परीक्षा बीतने के बाद भी पूरी किताबे नही मिलती।कई विषयों की किताबें पूरे साल नही मिली।पता करने पर जबाब आया जब छप के आएगा मिल जाएगा। सरकार का काम है ऐसे ही होगा..रोपिया सोहनी और कटिया के समय बच्चे खेतो में जाते हैं और अधिकारीगण हमारे पीछे की बच्चे कहाँ है।महोदय पढ़ाई के लिए सोशल अवेयरनेस वाले प्रोग्राम का बजट किस गड्ढे में जाता है जो हम मास्टर कटिया में सहायता करने के लिए भी तैयार होते हैं...क्योंकि बच्चा तभी आएगा जब कटिया हो जाएगा..
कुछ बच्चे एक दिन चौराहे पर मिले और बताया कि गुरु जी अब मैं बोरे पर जमीन पर बैठकर नही पढूंगा .. शिशु मंदिर में 50 रुपया फीस है और बेंच पंखा दोनो है..उधर सरकार की ओर से अध्यापको को गुणवत्ता मेंटेन करने की वार्निंग जारी हो चुकी थी। बोरे पर टपकती छत में 2 अध्यापक,गुणवत्ता के साथ क्लर्क,चपरासी,स्वीपर की नौकरी के बाद 1 से 5 क्लास को पढ़ाते हुए । सुना है मि लार्ड ने बेंच लगवाने को कहा था मगर आज तक वो कागज से आगे नही आया...

ख़ैर चूंकि "नया नया जोश था अतः पढ़ाना जारी रखा.."खुद के घर से बोरा ले आया,कॉपी पेंसिल बच्चों को दी अब भी वो घर से काम करके नही आते क्योंकि उनके अभिभावक की काउंसलिंग का काम भी हमारा है और वो हम कर नही पाते क्योंकि पापा बम्बई कमाते हैं मम्मी पर्दा करती है,बाबा अनपढ़ है।। 6 माह बीत गए, मुझे सफाईकर्मी,चपरासी,क्लर्क,सर्वेयर,और समय मिले तो मास्टर की नौकरी करते करते..किताबे अब भी पूरी नही जो मिली भी वो बच्चे के बस्ते मे धूल खा रही है।बच्चे वर्णमाला सीख गए किताब अब भी नही पढ़ पाते.. साहब की चेकिंग हुई ।।पीठ थपथपाई गई..ये तो क ख ग भी नही जानते थे मास्साहब आप ने कमाल कर दिया 3 का बच्चा अब वर्णमाला सुना सकता है। मैं कुंठित गर्व के साथ छद्म संतुष्टि के अहंकार में मुस्करा दिया...

मैंने कमरे फर्श छत और चटाई की बात की...हाँ हाँ सब मिलेगा..सब कुछ नोट करके साहब ले गए..चेकिंग हुए 4 माह बीत गए ..कुछ नही बदला......सुना है साहब की बदली होने वाली है..आज साहब से मिलने गया.. सर वो बच्चे आज भी पेड़ के नीचे ही पढ़ते हैं..कुछ व्यवस्था.....तभी साहब ने बीच में रोकते हुए कहा शासन से फंड अगले 6-8 महीने में आएगा ..उसके बाद जो अधिकारी होगा उसको एप्लिकेशन दीजियेगा..बारिश आती रही बच्चे खेलते रहे..छत टपकती रही बच्चे खेलते रहे..मैं कुर्सियां तोड रहा था मैं धीरे धीरे मैं हरामखोर हो रहा था..ड्रेस वितरण शुरू है और उसी "विशेष व्यवस्था" के तहत ड्रेस खरीदना है..वही जो बताई गई है ..

अचानक एक दिन अन्तरात्मा जाग गई.. मिड डे मील से लेकर ड्रेस..स्कूल की चटाई थाली से लेकर टपकती छत..सफाईकर्मी की गैरहाजरी से लेकर विशेष व्यस्था का काला सच फाइल में बना कर डीएम कार्यालय दे आया..सम्भबतः डीएम साहब ने वार्निंग दे दी साहब को...

और आज सुबह मेरा विद्यालय 8 बजकर एक मिनट पर चेक हुआ..हेडमास्टर साहब 8 बजकर 5 मिनट पर आने के अपराध में स्पष्टीकरण देंगे और शिक्षण अधिगम में कमी पाई जाने कर्तव्यों का सम्यक निर्वाहन न करने के कारण मैं निलबिंत करके किसी अन्य गांव में भेज दिया गया...मुखिया जी क़ह रहे हैं मैने पहले कहा था सब सिस्टम है मास्साहब..मगर आप का "नया नया जोश ले डूबा आपको........."

6माह बाद......

संस्पेंशन वापस  हो चुका है..मेरी नियुक्ति घर के पास के एक विद्यालय में हो चुकी है..मैने "विशेष व्यवस्था" को स्वीकार कर लिया है...मुखिया जी बहुत खुश हैं मुझसे ..मास्टरी के साथ साथ ई रिक्शा चलवाने का बिजनेस शुरू कर दिया है...अब मेरी अंतरात्मा मर चुकी है।। क्या करता कितने दिन संस्पेंड रहता व्यवस्था से लड़कर...परिवार को भूख से मरने से बचाने के लिए मैंने अपनी अंतरात्मा को मार दिया...मैं हरामखोर हो गया..
क्यों बना?? किसने बनाया??छोड़िये ये सब महोदय ये मास्टर होते ही हैं नाकारा कामचोर..
धन्यवाद..

आशुतोष की कलम से
(सरकारी अध्यापकों की व्यथा कथा)

रविवार, 28 मई 2017

वीर सावरकार का माफीनामा (Truth of Mercy Petitions of Vinayak Damodar Savarkar)

आज भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे अग्रणी नाम वीर सावरकर जी की जयन्ती है..उनकी जीवनी तो कहीं न कहीं पढ़ ही लेंगे आप मगर एक बात जो अक्सर कुत्सित विरोधी विचारधारा के लोग बोलते हैं,उसका निवारण जरूरी है.. वामपंथ और गांधी परिवार की पार्टी के लोगो का कहना है की सावरकर ने अंग्रेजो के सामने घुटने टेक दिए थे और माफ़ी मांगी थी..
अब इस प्रसंग पर आने से पहले कुछ और तथ्य जानना आवश्यक है.सावरकर ने इंग्लैण्ड में बैरिस्टरी की परीक्षा पास की मगर इन्होने "ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति सदैव वफादार रहने" की शपथ लेने से मना कर दिया और इसी कारण इन्हें डिग्री नहीं दी गयी...
एक तथ्य ये भी है की महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू भी इंग्लैंड से "डिग्रीधारी बैरिस्टर" थे..ऐसा तो है नहीं की नेहरू और गांधी के लिए नियम बदले होंगे हाँ गांधी जी ने और नेहरू जी ने छात्र जीवन में ही
"ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति सदैव वफादार रहने" की शपथ ले ली थी अतः वो डिग्री धारी हो गए और सावरकर ने "अंग्रेजो का दलाल" बनने की शपथ नहीं ली तो उन्हें डिग्री नहीं मिली..
स्वतंत्रता संग्राम में वीर सावरकर गांधी,नेहरू समेत लाखो लोग शामिल थे मगर जब नेहरू और गांधी को अंग्रेज गिरफ्तार करते थे,तो वो लोग जेल में आमलेट का नाश्ता करते हुए अखबार पढ़ते हुए समय बिताते थे और वीर सावरकर को अंडमान की जेल(काला पानी) में अत्यंत कठोर सज़ा के तहत दिनभर कोल्हू में बैल की जगह खुद जुतकर तेल पेरना, पत्थर की चक्की चलाना, बांस कूटना, नारियल के छिलके उतारना, रस्सी बटना और कोंड़ो की मार सहनी पड़ती थी।
वीर सावरकर को, नेहरू की तरह जेल में खाने के लिए आमलेट नहीं मिलता था उन्हें कोड़ो की मार मिलती थी और लाइन लगा कर दो सूखी हुई रोटिया.
वीर सावरकर को, गांधी की तरह मीटिंग करने की इजाजत नहीं होती थी उन्हें तो अपनी बैरक में भी बेड़ियों में जकड़कर रखा जाता था।
आखिर अंग्रेज सावरकर से इतना भयभीत क्यों थे और नेहरू गांधी पर इतनी कृपा क्यों?? याद कीजिये इंग्लैण्ड में ली गयी "ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति सदैव वफादार रहने" की शपथ".... जो नेहरू ने तो ली थी मगर सावरकर को स्वीकार नही थी..
●अब आते हैं ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति सदैव वफादार रहने" की शपथ" ले चुके कांग्रेसियों के प्रश्न पर कि सावरकर ने अंंग्रेजो से माफ़ी मांगी थी??
प्रसंग ये था की सावरकर की प्रसिद्धि से भयभीत अंग्रेजो ने उन्हें काला पानी भेज दिया और भयंकर यातनाएं दी..अंग्रेज चाहते थे की सावरकर की मृत्यु यही हो जाये.ऐसा ही हो भी रहा था,भयंकर शारीरिक एवं मानसिक यातना और पशुओं जैसे बेड़ी में जकड कर रखने के कारण सावरकर को कई गंभीर बिमारियों ने पकड़ लिया था और लगभग वो मरने वाले थे..मगर देश को क्रांतिकारियों को ऐसे वीर की जरूरत थी.क्योंकि जंग मरकर नहीं जीती जाती.. ऐसे समय में काला पानी जेल के डॉक्टर ने ब्रिटिश हुकूमत को रिपोर्ट भेजी कि सावरकर का स्वास्थ्य अत्यंत ख़राब है और वो थोड़े दिनों के और मेहमान हैं..इस रिपोर्ट के बाद, जनता के भारी दबाव में सन् 1913 में गवर्नर-जनरल के प्रतिनिधि रेजिनाल्ड क्रेडॉक को पोर्ट ब्लेयर सावरकर की स्थिति जानने के लिए भेजा गया.. उस समय काला पानी से निकल कर भारत आकर क्रांति को आगे बढ़ाना प्राथमिकता थी,अतः वीर सावरकर ने अंग्रेजो के इस करार पत्र को स्वीकार किया और कई अन्यों को भी इसी रणनीति से मुक्त कराया,जिसका फार्मेट निम्नवत है..
"मैं (....कैदी का नाम...)आगे चलकर पुनः (....) अवधि न तो राजनीती में भाग लूंगा न ही राज्यक्रांति में.यदि पुनः मुझपर राजद्रोह का आरोप साबित हुआ तो आजीवन कारावास भुगतने को तैयार हूँ"
यहाँ ये ध्यान देने योग्य बात है कि अंग्रेजो के चंगुल से निकलने के लिए,ऐसा ही एक पत्र शहीद अशफाक उल्ला खाँ ने (जिसे कुछ लोग क़ानूनी भाषा में माफिनामा भी कह सकते हैं) भी लिखा था मगर अंग्रेज इतने भयभीत थे की उन्हें फाँसी दे दी.. तो क्या अशफाक को भी अंग्रेजो का वफादार, देश का गद्दार मान लिया जाए?? माफ़ कीजिये ये क्षमता मेरे पास नहीं मेरे लिए अशफाक देशभक्त और शहीद ही हैं,हाँ कांग्रेस या वामपंथी ऐसा कह सकते है..
"सावरकर ब्रिटिश राजसत्ता के वफादार होंगे" ऐसा उस समय का मूर्ख व्यक्ति भी नहीं मानने वाला था तो फिर अंग्रेज कैसे विश्वास करते...रेजिनाल्ड क्रेडोक ने सावरकर की याचिका पर अपनी गोपनीय टिपण्णी में लिखा "सावरकर को अपने किए पर जरा भी पछतावा या खेद नहीं है और वह अपने ह्रदय-परिवर्तन का ढोंग कर रहा है। सावरकर सबसे खतरनाक कैदी है। भारत और यूरोप के क्रांतिकारी उसके नाम की कसम खाते हैं और यदि उसे भारत भेज दिया गया तो निश्चय ही भारतीय जेल तोड़कर वे उसे छुड़ा ले जाऍंगे।"
इस रिपोर्ट के बाद कुछ अन्य कैदियों को रिहा किया गया मगर भयभीत अंग्रेजो में वीर सावरकर को जेल में ही रक्खा .लगभग एक दशक इसके बाद काला पानी जेल में बिताने के बाद 1922 में वीर सावरकर वापस हिन्दुस्थान आये..
अब आप स्वयं निर्णय कर लें की "अंडमान की जेल में कोल्हू में जूतने वाले सावरकर" अंग्रेजों के वफादार थे या "एडविना की बाहों में बाहें डालकर कूल्हे मटकाने वाले चचा नेहरू" अंग्रेजो के ज्यादा करीब थे....

आशुतोष की कलम से

शुक्रवार, 26 मई 2017

हे उज्मा तुम आईना हो भारत में रहने वाले पाकिस्तानी भारतीयों का

#उज्मा
उज्मा ने तो पाकिस्तान में, किसी के प्रेम के चक्कर में धोखा खाया और वापस आई तो, जो सर अल्लाह के अलावा कहीं न झुकाने का फरमान "सऊदी अरब" से मिला है उसे मानने से इंकार करते हुए , वो सर मातृभूमि के लिए झुक गया..और हाँ किसी बजरंगदल या आरएसएस के दबाव में नहीं .और बस एक इसी कारण चाहे तुमने 5  शादियाँ की या 15,तेरे सारे गुनाह माफ़ है उज्मा..
मगर लाखों हैं इस ओर, जिन्होंने उस ओर का पाकिस्तान नहीं देखा।उनकी पीढियां हिन्दुस्थान का खा रही हैं हिन्दुस्थान में रह रही हैं,मगर दिल पाकिस्तान के लिए धड़कता है..आँखे खोलो और देखो, तुम्हारी बिटिया को भी नहीं छोड़ा पाकिस्तानी गिद्धों ने। जीपी सिंह नामक "काफ़िर डिप्लोमेट"ने इसे दूतावास् में अपनी बिटिया की तरह रक़्खा और एक सुषमा स्वराज नाम की भाजपाई संघी बिदेश मंत्री ने दिन में चार चार बार फोन करके इसे ढांढस दिया और सुरक्षित वापस घर ले आई...मगर तुम समझोगे नहीं,बिना दोजख देखे पाकिस्तान जिंदाबाद करना छोड़ोगे नहीं.
अब जब कभी वंदे मातरम साम्प्रदायिक लगे,भारत माता की जय काफिराना लगे और पाकिस्तान के लिए प्यार उमड़े,तो एक बार अपनी बिटिया को अच्छे से देखकर उज्मा की कहानी याद कर लेना।
हे उज्मा तुम आईना हो भारत में रहने वाले पाकिस्तानी भारतीयों का....स्वागत है उज्मा....

नोट : पोस्ट का उद्देश्य उज्मा जो भारत की बेटी बनाना या महिमामंडन नहीं है बल्कि उन भारतीय मुस्लिमो और सेकुलर हिन्दुओं को पाकिस्तान का सच बताना है जो पाक के प्रति संवेदना रखते हैं,

आशुतोष की कलम से

गुरुवार, 25 मई 2017

अनोखी पहल: रेडबॉक्स और व्हाइट बॉक्स(Vijay Srivastav Deoria)

देवरिया जिले के एक अध्यापक विजय श्रीवास्तव जी जो अपने विभिन्न समाजसेवी कार्यों के कारण यहाँ जाने जाते हैं। उन्होंने इन लाल सफेद बक्सो से एक अनोखी पहल की है.. ये जो चित्र में दिख रहे लाल और सफेद बक्से दिख रहे हैं,वो बक्से से कहीं ज्यादा सैकड़ो गरीब परिवारों के लोगो के तन ढंकने का साधन है.. गर्मी के दिनों में गांवों में आग लगने की घटना आम होती है जिसमें लोगो के घर के घर जल जाते हैं और लोगो के पास तन ढंकने तक के कपडे नहीं होते हैं । इसका निदान RED BOX के रूप Vijay Srivastav जी ने ढूंढ निकाला है।
इन्होंने शहर के एक मुख्य चौैराहे पर एक बक्सा रखवा दिया है और इस बॉक्स में लोग अपनी स्वेच्छा से नए पुराने कपडे डाल देते हैं और जिस किसी अग्नि पीड़ित या गरीब को कपड़ो को जरूरत होती है वो अपनी आवश्यकतानुसार कपडे छाटकर ले जाता है.. यह प्रकिया स्वतः प्रबंधन पर चलती है न तो कपडे बक्से में डालने या निकालने पर कोई रोकटोक नहीं होता है।।
ठंढ आते आते ये बक्सा सफेद रंग में पेंट करा दिता जाता है और लोग ऊनी कपड़े कम्बल आदि ,अपने स्वेच्छा से बक्से में डाल देते हैं और जरूरतमंद लोग उसमें से ऊनी कपडे ले जाकर उपयोग करते हैं। जाड़े में भी यह प्रक्रिया नागरिकों द्वारा सहयोग एवं स्वप्रबंधन पर ही चलती है।
इस प्रयोग को आप अपने मोहल्ले,शहर कालोनी में भी कर के कई लोगो के जीवन में परिवर्तन ला सकते हैं। इसमें कोई बहुत बड़ा संसाधन और व्यय भी नहीं लगने वाला और प्रक्रिया स्थानीय लोगों के सहयोग से चलाई जा सकती है.
इस सफल प्रयोग हेतु बहुत बहुत शुभकामनायें.विजय श्रीवास्तव देवरिया जिले में सरकारी अध्यापक,साइबर क्राइम सेल के संयोजक एवं समाजसेवी हैं इनका मोबाइल संपर्क 9454552622 है...
आशुतोष की कलम से
 

मंगलवार, 23 मई 2017

अजूबी शिक्षा व्यवस्था हेतु अजूबे सुझाव (UP PRIMARY EDUCATION)

यूपी में अध्यापको द्वारा, पशुगणना,बालगणना, जनगणना,चुनाव,मिड डे मील,ड्रॉपआउट गणना,
टीकाकरण,कीड़ी की दवा देना,पल्स पोलियो की दवा,आयरन टैबलेट,आधार कार्ड बनवाने,स्कूल रंगवाने,पत्र पहुचाने के बाद जो एक दिन में 42 घंटे शेष बचते हैं उसके लिए अब सरकार ने कुछ नया सोचा है..
●अब गुरु जी स्कूलों में भैंस दूहेंगे.
● दो घंटे झाड़ू लेकर सफाई भी करेंगे..
झाड़ू लेकर कुत्ता बिल्ली गाय भैंस द्वारा किया गोबर, मलमूत्र तो रोज साफ़ ही करते थे गुरु जी अब बाकी भैस दुहना रह गया था.. मगर इसके बाद भी एक दिन में 36 घंटे बच रहे हैं अध्यापक के पास, ये तो सरासर अकर्मण्यता है इसके लिए कुछ अन्य सुझाव जो शिक्षा की गुणवत्ता को ऑक्सफोर्ड के समकक्ष ला के खड़ा कर देंगे..
●अंडा लाभकारी है अतः प्रोटीन की कमी से जूझ रहे बच्चों हेतु मुर्गी पालन भी स्कूल में हो।।और गुरु जी मुर्गी के बच्चे को दाना खिलाएं..मुर्गी किसी अन्य स्कूल के मुर्गे के साथ भाग जाने की स्थिति में गुरु जी पर गैरजमानती धाराओं में FIR दर्ज हो..
●विद्यालय के सामने खाली पड़ी ग्राम सभा आदि की जमीन पर गेंहू,दाल या चावल उगाने की जिम्मेदारी गुरु जी की हो जिससे की मीड डे मील में समस्या न आये..फसल को नीलगाय या मौसम से हुई क्षति को गुरु जी के वेतन से वसूला जाये..
● विद्यालयों में चोरी की घटना को देखते हुए गुरु ज़ी लोग पारी बांधकर रोज रात 8 से सबह 6 तक चौकीदार की ड्यूटी करें..चोरी होने पर सभी गुरु जी लोगों का एक माह का वेतन काटकर प्रधानध्यापक को सस्पेंड किया जाये..
● बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में नाव आदि चलवाने, और पानी कम होने पर, प्रोटीन का मुख्य स्रोत मछली को जाल लेकर पकड़ने की जिम्मेदारी उस गांव के अध्यापको की हो..प्रतिदिन हर अध्यापक को कम से कम 4 किलो मछली पकड़ कर मछली और जाल के साथ सेल्फी भेजने का प्रावधान हो..
● बच्चों को नहलाने,उनके कपडे साफ़ करने,शौच आदि साफ़ सफाई का काम क्लासटीचर के जिम्मे हो।किसी लड़के के कपडे गंदे मिले तो अध्यापक का इंक्रीमेंट रोक दिया जाये..
● शिक्षा के निजीकरण माफिया द्वारा "प्रायोजित जनमत" बना के गुरु जी को कोसते रहें की इनको क्या काम है? फ्री का वेतन पा जाते हैं.संभव हो तो महीने में 5% अध्यापकों का निलंबन हो और 15% का इंक्रीमेंट रोका जाये..
पूरा विश्वास है की इस् प्रकार शिक्षा गुणवत्ता के नए शिखर को पा जायेगी और आने वाले दिनों में कान्वेंट और शिशु मंदिर के पंखे और बेंच वाले कमरों में पढ़ने वाले बच्चे अपने स्कूल से नाम कटवाकर, हमारे प्राथमिक स्कूलों के टाट पट्टी पर बैठकर पढ़ने आएंगे...
Narendra Modi जी MYogiAdityanath जी व्यथित ह्रदय से ये पोस्ट लिख रहा हूँ की अब भी प्राथमिक शिक्षा की मूल समस्याओं को एड्रैस करने की जगह हम भैंस और झाड़ू में उलझे हैं..सिर्फ अध्यापक की जिम्मेदारी तय करने से सिस्टम नहीं सुधरने वाला है..अध्यापक तो फ्रंटलाइन का सिपाही है और उसे जैसा आदेश और परिवेश मिलेगा वैसा करेगा मगर नीति निर्धारण में व्यवहारिकता नहीं आई तो, आज का एक भैंस पालने का सुझाव,जिसे संभवतः शासन रिजेक्ट कर दें, कल के प्राथमिक शिक्षा का भविष्य भी हो सकता है..
आशा है नई सरकार इन बिंदुओं पर भी संज्ञान लेगी..
आशुतोष की कलम से

रविवार, 21 मई 2017

जय भीम जय मीम एकता का सच (Truth of Jai Bhim Jai meem)

दो तस्वीरें साझा कर रहा हूँ, दिल्ली के जंतर मंतर पर "भीम सेना" नाम के एक संगठन के प्रदर्शन के सन्दर्भ में..
भीमसेना का कहना है कि उनके असली दुश्मन हिन्दू है.
मुस्लिम और ईसाई समुदाय के साथ उन्हें कोई समस्या नहीं है..अब बात तस्वीरों की..तस्वीर एक: उत्तर प्रदेश के लखनऊ की सन 2012 की जब "जय भीम" के आराध्य "बुद्ध" पर "जय मीम" ने बेलचे और फावड़ों से हमला किया था.और "भीम सेना" शायद किसी बिल में घुसी हुई थी..


तस्वीर दो: बामियान अफगानिस्तान में विश्व की सबसे बड़ी "बुद्ध प्रतिमाएं" थी.
जय मीम ने तोप लगवा कर उड़वा दिया और "भीम सेना" या इसके जैसों की पैंट गीली पीली हो गई किसी की हिम्मत नहीं हुई मुह खोलने की..मुझे नहीं लगता कि हिन्दू समुदाय भारत में कभी इतना अतिवादी हुआ होगा की बुद्ध का ये हाल किया होगा.मगर राजनीति ऐसी घटिया है कि बुद्ध का ये हाल करने वाले अच्छे हैं और बुद्ध पूर्णिमा मनाने वाले असहिष्णु अत्याचारी..
जैसा की मैंने पहले भी कहा है कि Narendra Modi और भाजपा को 2019 में सिर्फ एक ही तरीक़े से हराया जा सकता है वो है हिन्दू समाज में जातीय विद्वेष को भड़काकर.. यूपी के चुनाव परिणाम आते ही ये प्रयास तेज हुआ है और उसी प्रसंग का अवैध परिणाम है "भीम सेना"..इनको भीम से कुछ लेना देना नहीं इनका टारगेट है जातीय भावना को भड़काकर चुनाव की बिसात बिछाना...
कृपया ऐसे आयोजनों से सावधान रहें। याद कीजिये पुरस्कारवापसी, रोहितवेमुला और असहिष्णुता और बिहार चुनाव..अब 2019 से पहले ये "असहिष्णुता पार्ट 2" की तैयारी है. खैर राजनीति में विपक्ष चाले चलने को स्वतंत्र है सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है इस "असहिष्णुता 2" वाले सामाजिक वायरस का एंटीवायरस ढूंढें...
आशुतोष की कलम से

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

गंगा अरबी तहजीब की सहिष्णुता और बिजनौर का शिव मंदिर (Dispute in Bijnor over loudspeaker)

मुसलमान,हिन्दू,सेकुलर या गंगा अरबी तहजीब की भाईचारा गैंग के लोग भी पढ़े.आज सोनू निगम ने अजान से नींद खराब होने का एक बयान दिया, इस बयान का विरोध करूँ या समर्थन ये सोच ही रहा था कि इस खबर पर नजर पड़ी..
उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बाहुल्य गांव जोगिरामपुरी बिजनौर में , एक प्राचीन शिव मंदिर पर मुसलमानों ने लाउडस्पीकर लगाने का विरोध किया, और इस पर विवाद बढ़ता गया..हिंदुओं को गांव छोड़ने का नोटिस दे दिया गया.कई लोग मकान बेचकर जाने की तैयारी में लग गए.
■■ पहला प्रश्न ये है कि यदि मस्जिद पर लाउडस्पीकर लग सकता है तो मंदिर पर क्यों नहीं??कहाँ गई सहिष्णुता?? या ये केवल हिंदुओं की ठेकेदारी है.
खैर समझौता हुआ अब जब समझौता हुआ तो मुस्लिम समाज की शर्ते देखिये..

● मुस्लिम समाज ने कहा कि मंदिर पर लाउडस्पीकर लगाने की अनुमति दी जाती है.मुस्लिम बहुल क्षेत्र में देश की कोर्ट,सरकार या व्यवस्था नहीं बल्कि स्थानीय मुसलमान निर्णय देंगे...
सोचिये अगर किसी मस्जिद के लाउडस्पीकर का विरोध, हिंदू समाज कर देता तो मीडिया और सेकुलर बिरादरी छाती कूट कूट कर मर जाती है।
● मुस्लिम बहुल गांव मे मंदिर पर लाउडस्पीकर लगाने के समझौते की दूसरी शर्त यह है कि लाउडस्पीकर का उपयोग ,हिन्दू सिर्फ त्योहारों में ही कर सकेंगे ।
इस हिसाब से अगर हिंदू बहुल एरिया में हिंदू ये मांग करने लगे कि मस्जिद के लाउडस्पीकर का प्रयोग सिर्फ मुस्लिम त्योहारों में किया जाएगा तो इसे धार्मिक रीति रिवाजों पर हमला बोलकर मीडिया के दलाल और सेकुलर विधवा विलाप शुरू कर देंगे..
● तीसरी शर्त ये है कि लाउडस्पीकर का प्रयोग सिर्फ आरती के लिए किया जाएगा,मतलब यदि हमें वहां कीर्तन करना हो तो हम लाउडस्पीकर का प्रयोग नहीं कर सकते हैं। 
यदि ऐसा ही हिन्दू बहुल क्षेत्र में , मुसलमानों के केस में कह दिया जाए की मस्जिद के लाउडस्पीकर का प्रयोग सीमित और निर्धारित कार्यों के लिए किया जाएगा तो इस देश में असहिष्णुता की सुनामी आ जाएगी...
●मुस्लिम बहुल गांव में मंदिर पर लाऊडस्पीकर लगाने की एक और शर्त लगाई गई, ईद के दौरान और नमाज के समय मंदिर उस लाउड स्पीकर का प्रयोग आरती के लिए भी नहीं कर सकता है। 
(अब अगर यही बात दूसरा पक्ष हिंदू बहुल एरिया में लागू करें और यह कहे कि मस्जिद के लाउडस्पीकर का प्रयोग नवरात्रि एवं आरती के समय नहीं किया जाएगा तो इसे अल्पसंख्यकों की स्वतंत्रता पर हमला करार दे दिया जाएगा)

इस पोस्ट पर कई लोग कह सकते हैं कि भाई मेरे यहां तो मुसलमान ऐसा नहीं करते हैं तो भरोसा रखिए आप वहां पर बहुसंख्यक होंगे....यह कोई पहला उदाहरण नहीं है. कश्मीर से आपकी पूजा ही नहीं बंद कराई गई बल्कि सन 1989 में साढ़े चार लाख कश्मीरी हिंदुओं को हत्या बलात्कार लूट जैसे कुख्यात तरीकों का उपयोग करके अपने ही घर कश्मीर घाटी से बाहर कर दिया गया और आज वह साढ़े चार लाख कश्मीरी हिन्दू, दिल्ली और जम्मू के फुटपाथ और कैंपों में ही अपने देश में शरणार्थी बने बने हुए हैं..उनकी इज्जत,घरपरिवार रिश्ते सब गंगा- अरबी तहजीब की भेंट चढ़ गए..कश्मीर ही क्यों जनाब, इस गंगा-अरबी तहजीब ने तो पश्चिम बंगाल में आपसे दुर्गा पूजा और सरस्वती पूजा करने का अधिकार भी छीन लिया है और कई जिलों में दुर्गा पूजा प्रतिबंधित है.. और अब बारी उत्तर प्रदेश की। शायद योगी सरकार इसे कुछ सालों के लिए टाल दे मगर बात प्रदेश की नहीं बात स्वीकार्यता की है .. आप जब संख्या में ज्यादा होंगे तो हमारे पास "पलायन,मॄत्यु या धर्मांतरण" किसी एक को चुनना पड़ता है...ऐसा क्यों सोचियेगा...
मेरी समस्या आपके अजान से कभी नहीं है लेकिन आपको हमेशा मेरी आरती,मेरा हवन,मेरा यज्ञ "काफिराना कुफ्र" लगता है और इस बात का इतिहास गवाह है कि जिस जगह पर आप बहुसंख्यक होते हैं, वहां पहले हमारी धार्मिक स्वतंत्रता,पूजा पाठ करने का अधिकार छीन लिया जाता है और फिर हमारे घर बार और इसके बाद भी अगर हमनेे वहाँ से पलायन नहीं किया तो बलात्कार और हत्या...विश्व केे नहीं ये सब भारत के ही उदाहरण हैं।

मैं अब सोच रहा हूँ की आज तक "अजान से मेरी नींद खराब नहीं हुई" ??क्या मैं सेकुलर हूँ??? क्या दिल्ली या गोरखपुर के किसी फुटपाथ पर बना शरणार्थी कैम्प अगले 30-40 साल बाद मेरा पता होगा???

आशुतोष की कलम से

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

कश्मीरी पत्थरबाज जेहादी के सेना की जीप में बांधे जाने वाले वीडियों का सच


भारतीय सेना का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें सेना की एक जीप के सामने एक कश्मीरी पत्थरबाज को सेना जीप के बोनट पर बांध के घुमा रही है. देखकर अद्भुत शांति मिली और सबने समर्थन भी किया..इससे पहले जम्मू और कश्मीर में चुनाव के समय सेना पर के जवानों पर हमले की,पत्थरबाजी की,थप्पड़ मारने की और लात से मारने के वीडियो सामने आ चुके थे.. कश्मीरी पत्थरबाज को जीप के बोनट पर बांध के घुमाने वाले वीडियो का सबसे पहले विरोध करने वालों में  जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला थे अब इस घटनाक्रम की पूरी और सत्य जानकारी जान लीजिए जिसका सन्दर्भ लेखिका सूचि सिंह कालरा द्वारा स्थानीय जवानों व्यक्तियों से अनौपचारिक बातचीत है.
यह वीडियो जम्मू और कश्मीर के बड़गांव का है जो कि 9 अप्रैल 2017 को रिकॉर्ड किया गया है.
9 अप्रैल को जम्मू और कश्मीर में उपचुनाव हो रहे थे और एक बूथ पर पत्थरबाज जेहादियों की भीड़ ने हमला कर दिया. इस बूथ की सुरक्षा ITBP के जवान और जम्मू कश्मीर के पुलिस लोग कर रहे थे।पोलिंग खत्म होने के समय लगभग 900 पत्थरबाज जेहादियों  ने पोलिंग बूथ की सुरक्षा में लगे जवानों पर हमला कर दिया..  प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उनके हाथ में बड़े बड़े पत्थर थे,और वह उसे ITBP और जम्मू कश्मीर के पुलिस के जवानों के ऊपर फेंक रहे थे..अब 900 जेहादियों  की भीड़ और उन से लोहा लेने के लिए आईटीबीपी और जम्मू कश्मीर के सिर्फ नौ जवान..आईटीबीपी के जवानों ने यह जान लिया कि अगर वह कुछ नहीं करते हैं,तो वह जिंदा नहीं बचेंगे..पत्थरबाज किस प्रकार भारतीय सेना का अपमान करते हैं या उन पर हमला करते हैं या आप पूर्व के वीडियो में देख चुके हैं कि किस प्रकार पत्थरबाज भारतीय सेना के सशस्त्र जवानों को थप्पड़ मार रहे हैं और उन पर लात चला रहे हैं ..
जवानों ने इस स्थिति को बिगड़ता देख, नजदीकी आर्मी स्टेशन के कमांडर को एक SOS  मैसेज भेजा,,आर्मी कमांडर ने तुरंत ही एक 17 जवानो की क्विक रिस्पांस टीम(QRT) को एक जीप और एक बस के साथ भेजा... 900 जेहादियों की भीड़ पोलिंग बूथ के बाहर खड़ी थी जो उन और ITBP और जम्मू कश्मीर के जवानों को मार डालना चाहती थी... जब क्यूआरटी की टीम उन नौ जवानों के सहयोग के लिए वहां पहुंची तो उन्हें भी यह समझ में आ गया कि 17 लोगों की क्यूआरटी टीम 900 लोगों की भीड़ से नहीं निपट सकती,जो हाथों में पत्थर और हथियार लेकर खड़े हैं...
कमांडर ने यह सोचा कि यदि इस भीड़ पर फायरिंग की जाती है तो,कई लोग मारे जाएंगे परिस्थितियां और बिगड़ेगी. क्यूआरटी टीम के कमांडर के सामने अपने 17 क्यूआरटी टीम के जवानों के साथ-साथ बूथ के अंदर फंसे नौ आईटीबीपी और जम्मू और कश्मीर पुलिस के जवानों को बचाने की भी जिम्मेदारी थी..मांडर ने एक स्मार्ट डिसीजन लेते हुए उन पत्थरबाजों में से एक पत्थर बाज को पकड़ा और जीप के बोनट पर बांध दिया.. कमांडर का यह तरीका कामयाब हुआ क्योंकि आर्मी की जीप  पर जेहादियों का एक साथी बंधा  हुआ था ,अतः 900 लोगों में से किसी ने भी उस जीप पर पत्थरबाजी नहीं की और QRT टीम के 17 सदस्य, आईटीबीपी और जम्मू और कश्मीर पुलिस के 9 सदस्य जीवित अपने नजदीकी सेना के बेस पर पहुंच गए...कमांडर की सूझबूझ से फायरिंग का आदेश नहीं देना पड़ा जिससे कि कई पत्थरबाज जेहादियों की भी जान बच गई...

अब उमर अब्दुल्ला और प्रॉस्टिट्यूट मीडिया की गैंग इस वीडियो पर जो स्यापा कर रही है उस चित्र के पीछे की असली कहानी तो अब हमारे सामने है नमन है भारतीय सेना को,जो ऐसे विषम परिस्थितियों में भी अपने सैनिकों के साथ-साथ कश्मीर में भारत के टुकड़े पर ही पल  रहे भारतविरोधी जेहादियों के जीवन की भी चिंता करती है।
आप सभी से अनुरोध है कि कृपया भारतीय सेना के शौर्य और सुझबूझ कि  ये गाथा सबसे शेयर करें जिससे कि अफवाह बाज गिरोहों को भारतीय सेना को बदनाम करने का कोई मौका ना मिले ... जय हिंद

आशुतोष की कलम से

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

जय भीम (दलित उद्धार के तथाकथित ठेकेदारों के लिए विशेष JAI BHIM

हिंदुओं के घर में एक कहावत है कि,हिंदुओं के बच्चे और बूढें का व्यक्तित्व, इच्छा एक जैसी हो जाती है.. कई आर उनके निर्णयों में अपरिपक्वता झलकती है और ऐसे अपरिपक्व निर्णयों और बातों का परिवार के सदस्य
"बच्चे और बुजुर्ग को एक श्रेणी में" मानते हुए इस बात का कभी भी बुरा नहीं मानते क्योंकि बुजुर्ग के दुनिया से विदाई का समय आ रहा होता है यही संस्कार भी है.
बाबा साहेब की अध्यक्षता में 7 लोगो द्वारा लिखे गए भारत के संविधान में बेकार पड़े कानूनों को खत्म करके Narendra Modi जी बाबा साहेब का "BHIM" ऐप चला रहे हैं..कांग्रेस ने संविधान की किताब में सुविधा से चीरा लगा के इसे "कांस्टीट्यूशनल अमेंडमेंट्स" का नाम दे दिया । अभी GST ने 101वां चीरा लगाके पैबंद जोड़ी है..लेकिन जब संविधान की समीक्षा कर किताब ओर नया जिल्द लगाने की बात आएगी तो BHIM ऐप हैंग होने लगता है.अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे, कानूनों का कामा फुलस्टाफ 70 साल में नहीं बदला पाये हमारे लोकतंत्र के डॉक्टर.
अब जिक्र बाबा साहेब का है तो उनके विचारों का जिक्र ना हो तो बात अधूरी रह जाएगी बाबा साहब का भारत पर सबसे बड़ा एहसान ये रहा कि उन्होंने जिन्ना की तरह देश के टुकड़े करने का ख्वाब नहीं देखा। मुसलमानों के बारे में बाबा साहब की स्पष्ट राय थी कि हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते हिंदुओं को पाकिस्तान से भारत आ जाना चाहिए और मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए। यदि स्वाभाविक रूप से हिंदू राष्ट्र हिंदुस्तान में, मुसलमान रहे तो वह जेहाद करेंगे और यह भविष्य में गृह युद्ध का कारण बनेगा। अब बाबा साहब सही थी या गलत इसका निर्णय मैं नहीं कर सकता।
बाबा साहब ने हिंदू धर्म में रहकर आजीवन छुआछूत का विरोध किया और दलितों को उनका सम्मान दिलाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई मगर जब हिंदू परिवार के इस बुजुर्ग वटवृक्ष के दुनिया से विदाई का समय आया तो अपनी मृत्यु से 57 दिन पूर्व इस हिंदू परिवार के बुजुर्ग ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और साथ ही साथ ब्रह्मा विष्णु महेश अवतार एवं ब्राह्मणों द्वारा प्रतिपादित की जाने वाली हर किसी कर्मकांड का निषेध कर दिया। मुझे नहीं मालूम इस निषेध में उनके ब्राह्मण उपनाम आंबेडकर एवं सारस्वत ब्राम्हण पत्नी शारदा कबीर उर्फ सविता अंबेडकर का बहिष्कार शामिल था या नहीं। मृत्यु के 57 दिन पूर्व किए गए इस निषेध को जानकर हिंदुओं की वही कहावत याद आती है जो कि मैंने इस लेख के प्रारंभ में कहा था..
बाबा साहब इस दुनिया से चले गए लेकिन उनके अनुयायियों ने निषेध जारी रखा मगर आज "जय भीम" करके बाबा साहब के नाम पर हो हल्ला करने वाले लोगों के विचारों में कई बार दोहरा चरित्र परिलक्षित होता है।
● ये स्वयंभू मूलनिवासी "जयभीम और जय मीम" का नारा लगाते हैं क्या तब अंबेडकर के विचारों का अपमान नहीं होता जो उन्होंने मुसलमानों के बारे में व्यक्त किया था?? यहाँ "जय भीम" के नाम पर कुछ लोग अपना दोहरा चरित्र दिखा देते हैं.
● वह बाबा साहेब के ब्राम्हण गुरु कृष्णा महादेव आंबेडकर और बाबा साहब की ब्राह्मण पत्नी शारदा कबीर उर्फ सविता आंबेडकर का निषेध कर देते हैं क्योंकि वह एक सारस्वत ब्राह्मण थी ,मगर मगर बाबा साहब के ब्राह्मण अध्यापक द्वारा दिए गए ब्राह्मण उपनाम आंबेडकर का निषेध नहीं कर पाते..
● वो लोग रमाबाई अंबेडकर के नाम से संस्थान योजनाएं और पार्क बनवाते हैं जिन्हें आंबेडकर की धर्मपत्नी के रूप में उनके परिवार ने चुना (विवाह के समय आंबेडकर जी 14 के साल थे अतः वो परिपक्व नहीं थे) मगर जिस शारदा कबीर को परिपक्व आंबेडकर ने रमाबाई की मृत्यु के बाद पत्नी के रूप में चुना और उसने अंतिम समय तक उनकी सेवा की उस महिला को शायद कोई नहीं जानता, उसके अध्याय को ही मिटा दिया गया..क्या ये बाबा साहेब अंबेडकर के चुनाव का विरोध न माना जाये???
● कुछ अंति उत्साही "जयभीम" वाले मूल निवासी दो कदम आगे बढ़कर अम्बेडकर की दूसरी पत्नी "शारदा कबीर" को चरित्रहीन तक बता देते हैं,बस इसलिए क्योंकि वो सारस्वत ब्राम्हण थी. तो क्या वो अंबेडकर के चुनाव के चरित्र पर प्रश्न उठाकर अंबेडकर का अपमान नहीं करते?? और इनसे इतर वो क्या कहना चाहते हैं कि जो व्यक्ति एक चरित्रहीन स्त्री के जाल में फस गया उसने इतना बड़ा संविधान सही सही कैसे लिखा होगा? या फिर मीठा मीठा गप्प और कड़वा कड़वा थू थू....
● जय भीम बोलकर वो, ब्रह्मा विष्णु महेश राम सीता कृष्ण को गाली देंगे।ब्राम्हणों को पाखंडी बताएंगे मगर बच्चे के अन्नप्राशन से लेकर मुंडन या विवाह हिन्दू कर्मकांड पद्धति से कराएंगे और जब भगवान को कोसते कोसते एक दिन दुनिया से जाने का समय हो जायेगा तो अन्तिम संस्कार भी हिन्दू पद्धति से ही होगा..
आंबेडकर जी के जन्मदिवस पर ये बाते आवश्यक थी क्योंकि दुनिया में कोई पूर्ण नहीं होता कुछ कमियां रहती है, चाहे आंबेडकर हो सावरकर हो या गांधी.अच्छी बातों को ग्रहण न करके, उनके नकारत्मकता को स्वीकारने की जल्दी हो गई है आजकल।। आज समाज में "जय भीम" का नाम लेकर ही सबसे ज्यादा "भीम" की शिक्षाओं का अपमान उनके विचारधारा के तथाकथित ठेकेदार करते आ रहे हैं..और इसके पीछे कुत्सित मकसद है राजनैतिक स्वार्थ और एक ख़ास वर्ग का विरोध जो तमाम बेड़िया डालने के बाद भी आज खुद की जगह प्रमाणिकता से समाज में बनाये हुए है....
बाबा साहेब के जन्मदिवस की शुभकामनायें.
जय भीम....
आशुतोष की कलम से.

बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर के जन्मदिवस पर विशेष



चित्र: संविधान लिखने वाले कमेटी क सभीे सदस्य (बाबा साहेब प्रथमपंक्ति में मध्य में) 
भारत के पहले कानून मंत्री एवं भारत के संविधान के ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के जन्मदिवस् की शुभकामनायें...
संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी एवं बाबा साहेब के जीवन से सम्बंधित कुछ अन्य तथ्य ...
डाक्टर आंबेडकर के अलावा संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी में 6 सदस्य और एक कांस्टिट्यशनल एडवाइजर थे जिनके नाम
● गोविन्द बल्लभ पन्त (उत्तरप्रदेश के प्रथम।मुख्यमंत्री)
● कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी(केएम मुंशी (पूर्व गृह मंत्री बॉम्बे)
● अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर(पूर्व-एडवोकेट जनरल,मद्रास स्टेट)
●एन गोपालस्वामी अयंगर (पूर्व प्रधानमंत्री जम्मू और कश्मीर
● बीएल मित्तर( पूर्व एडवोकेट जनरल-भारत) बाद में जिन्हीने इस्तीफा दिया और माधव राव (वडोदरा के राजा के क़ानूनी सलाहकार) ने इनकी जगह ली
●मोहम्मद सदुल्लाह (असम के पूर्व मुख्यमंत्री)
●डीपी खेतान (खेतान बिजनेस परिवार से और एक बड़े वकील ) उनक़ी मृत्यु के बाद टीटी कृष्णामाचारी ने उनकी जगह ली..
● कांस्टिट्यशनल एडवाइजर सर बेनेगल नरसिंह राव थे जो बाद में इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस में प्रथम भारतीय जज बने)

बाबा साहेब के जीवन के कुछ अन्य तथ्य

◆डाक्टर आंबेडकर ने सामाजिक भेद भाव के विरुद्ध अभियान चलाया। दलितों, श्रमिकों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया।
◆डाक्टर भीमराव आंबेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत थे और उनके पिता, भारतीय सेना की महू छावनी में सेवा में सूबेदार के पद पर कार्यरत थे। महू छावनी में ही भीमराव का जन्म हुआ..
◆ बाबा साहेब का नाम पहले भीमराव था..उनके एक ब्राह्मण शिक्षक कृष्णा महादेव आंबेडकर जो उनसे विशेष स्नेह रखते थे, ने उनके नाम में अपना उपनाम ‘आंबेडकर’ जोड़ दिया। तो कृष्णा महादेव ने भीमराव को "भीमराव आंबेडकर" बनाया और आज भी बाबा साहेब को "आंबेडकर" उपनाम से दुनिया जानती है।
◆महाराज बड़ौदा सयाजीराव गायकवाड़ ने छात्र भीमराव अंबेडकर को फेलोशिप देकर बिदेश पढ़ने के लिए भेजा और डॉक्टर अंबेडकर ने वहां अपनी उच्च शिक्षा पूरी की।
◆ 1906 में इनका विवाह हुआ और डाक्टर आंबेडकर की पत्नी का नाम रमाबाई था। सन 1935 में रमाबाई का देहांत हो गया।
◆ "शारदा कबीर नाम की सारस्वत ब्राह्मण से डॉक्टर अंबेडकर ने दूसरा विवाह किया और अपना नया नाम सविता अंबेडकर रख लिया.शारदा कबीर ने अंतिम समय तक बाबा साहेब की सेवा किया.
◆डाक्टर अंबेडकर ने कहा कि हिन्दू मुस्लिम एकता एक अंसभव कार्य हैं भारत से समस्त मुसलमानों को पाकिस्तान भेजना और हिन्दुओं को वहां से बुलाना ही
एक हल है । मुस्लिम कानूनों के अनुसार भारत हिन्दुओं
और मुसलमानों की समान मातृभूमि नहीं हो सकती । वे भारत जैसे गैर मुस्लिम देश को इस्लामिक देश बनाने में जिहाद आतंकवाद का संकोच नहीं करते । (प्रमाण सार डा अंबेडकर सम्पूर्ण वाग्मय , खण्ड १५१)
◆अपनी मृत्यु से लगभग 52 दिन पूर्व डॉक्टर आंबेडकर ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और ब्रम्हा विष्णु महेश और अवतारों के अस्तित्व को नकारते हुए कहा कि मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में कोई आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा...
◆ब्राम्हण उपनाम एवं पत्नी को व्यक्तिगत जीवन में स्वीकार किये डाक्टर आंबेडकर ने अपनी से 52 दिन पूर्व किये धर्म परिवर्तन के समय कहा कि "मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूँगा"।।
आशुतोष की कलम से

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

ट्रिपल तलाक: मौलवियों की कुंठित काम पिपासा को शांत करने का एक साधन

सनातन धर्म में सती प्रथा की परंपरा थी। सती प्रथा एक ऐसी प्रथा थी जिसमें, किसी महिला का पति मर जाता था तो महिला पति के साथ ही उसी चिता में जल जाती थी.संभवतः सतयुग,द्वापर,त्रेता तक, योग दैनिक जीवन का एक हिस्सा था और महिला स्वेच्छा से योग के द्वारा चिता में बैठे-बैठे अपने प्राण त्याग देती थी..ऐसे योग का वर्णन आज भी उपलब्ध है.. मैं स्वेच्छा से चिता में बैठने वाली प्रथा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जब कलयुग में भी रानी पद्मनी ने हजारों महिलाओं के साथ जौहर किया था,तो न तो समाज ने, ना ही सनातन धर्म ने उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य किया था...युग बदले और कालांतर में स्वेच्छा से चिता में बैठने वाली इस प्रथा ने बहुत ही विभत्स रूप ले लिया। बाल विवाह की व्यवस्था भी कुरीति का रूप ले चुकी थी। एक 8 साल की बच्ची का पति यदि मर जाता था तो उसे सती प्रथा के अनुसार चिता में जलकर मरना होता था, और प्रथा का स्वरूप इतना विकृत हुआ कि यदि महिला की सहमति नहीं हुई तो भी उसे जबरिया जिंदा चिता में डालकर जला दिया जाने लगा। धीरे-धीरे इस प्रथा का विरोध हुआ कानून बनाए गए और यह प्रथा आज खत्म हो गई । क्या इससे हिंदू धर्म समाप्त हो गया या सनातन धर्म पर कोई खतरा आ गया?? ऐसा नहीं हुआ क्योंकि भगवान श्री कृष्ण ने गीता में स्वयं ही कहा है कि "परिवर्तन ही संसार का नियम है। काल समय परिस्थिति के अनुसार हमारी मान्यताएं विचारधाराएं कानून और यहां तक की पूजा पद्धति भी बदलती रही है परंतु इससे परमात्मा के होने की मूल भावना नहीं बदल जाती है...

कुरान में कहीं भी तीन तलाक का जिक्र नहीं..ये तीन तलाक और फिर कुछ केसेज में हलाला प्रथा, सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के शरीर को भोगने की मौलवियों की कुत्सित मानसिकता एवं कुंठित काम पिपासा को शांत करने का एक साधन मात्र है । आज जब पूरे भारत की मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक और हलाला के खिलाफ खड़ी हो गई हैं, तो मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड नाम के एक इश्लामिक ठेकेदारी वाले एनजीओ को, मुसलमान बिरादरी में पिछले 40 से ज्यादा सालों से चली आ रही बादशाहत खत्म होने का खतरा मंडराने लगा है। ज्यादा संभावना है कि कोर्ट या सरकार , मुस्लिम महिलाओं के ऊपर तीन तलाक के माध्यम से किए जा रहे अत्याचार को कानून बनाकर खत्म कर दें । विरोध बढ़ता देख मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड नाम के NGO के उपाध्यक्ष ने यह कहा है कि वह डेढ़ साल में ट्रिपल तलाक को खत्म कर देंगे । जब ट्रिपल तलाक कुरान में लिखा ही नहीं है तो यह डेढ़ साल का वक्त किस लिए?? विश्व की सबसे ज्यादा मुस्लिम जनसंख्या वाला देश इंडोनेशिया या मध्य पूर्व के अनेको मुस्लिम देशों में तीन तलाक की प्रथा को खत्म किया कर दिया गया है, और उन देशों के सामने भारत के मौलाना नाक रगड़ते रखते हैं तो क्या वह सभी देश "कुफ्र" कर रहे हैं ??? यह एक विचारणीय प्रश्न है।
एक छोटे से घरेलू विवाद में किसी महिला का शौहर अमेरिका या सऊदी अरब से बैठे-बैठे WhatsApp पर उसको तलाक तलाक तलाक लिख कर भेज देता है और वह कानूनन मान्य हो जाता है । इसके बाद शौहर का गुस्सा शांत होता है और उसे अफसोस होता है कि यह मैंने क्या कर दिया?? लेकिन ट्रिपल तलाक कानून के अनुसार अब उस लड़की को किसी मौलवी (ज्यादातर केस में ) या किसी अन्य पुरुष के साथ निकाह करना पड़ेगा। यह सांकेतिक नहीं होगा ,वह पुरुष या मौलवी उस स्त्री के साथ संभोग करेगा थोड़ा और स्पष्ट समझा दूँ तो उसके साथ सेक्स करेगा और इस बात का ध्यान रखा जाएगा कि महिला दूसरे पुरुष से गर्भवती ना हो जाए इसके बाद एक निश्चित समयावधि (इद्दत) के बाद वह पुरुष उस महिला को फिर तलाक दे देगा और पुनः वह महिला अपने पहले पति के साथ रह सकेगी..
इतना वीभत्स, इतना घिनौना व्यवहार क्या कोई भी मुसलमान अपनी बेटी या बहन, जिसे उसने बहुत ही नाजो से पाल पोस कर बड़ा किया है उसके साथ होना पसंद करेगा ??? यदि आप का उत्तर हाँ है तो बेशक आप तीन तलाक का समर्थन कीजिए और अपनी बहनों का बेटियों का हलाला कराइए और यदि आप अपनी बहन-बेटियों की इज्जत और जीवन को सुरक्षित और खुशहाल रखना चाहते हैं तो, सामने आकर इस कुप्रथा का विरोध कीजिए और सती प्रथा की तरह ट्रिपल तलाक की भी अमानवीय प्रथा को खत्म करने की पहल कीजिए.
आशुतोष की कलम से

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था

अत्यन्त साधारण सी तस्वीर और अत्यन्त साधारण सा नाम "मोहनलाल भास्कर" शायद हममे से बहुत कम इनके बारे में जानते हों.. सन 1971 में विवाह के एक वर्ष के ही भीतर इन्हें पाकिस्तान में लाहौर से भारत के लिए जासूसी करने के अपराध में पाकिस्तानी सेना ने गिरफ्तार किया इसमें कोई शक नहीं कि मोहनलाल भास्कर रा के एक एजेंट थे और पाकिस्तान में रहकर पाकिस्तान के न्यूक्लियर प्रोग्राम की खुफिया जानकारियां एकत्रित करके भारत को भेज रहे थे। भारत की एक अन्य एजेंट की गद्दारी के कारण मोहनलाल भास्कर पकड़े गए और उसके बाद इनके ऊपर मुकदमा चलाया गया। मुकदमों के साथ यातनाओं और दरिंदगी का वह लंबा दौर मोहनलाल भास्कर ने लाहौर ,कोट लखपत,मियांवाली, मुल्तान और पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में झेला जिसका वर्णन करते करते उन्होंने एक पूरी किताब ही लिख डाली और उसी किताब के कुछ से निकली भारत सरकार के प्रति एक मूल भावना को मैं उद्धत कर रहा हूं।
मोहनलाल भास्कर कहते हैं कि अगर मुझे अपने लिए किसी पेशे का चुनाव करना पड़े तो जासूसी मेरे लिए आखिरी विकल्प होगा.. ...जैसा कि हर जासूस के केस में होता है कोई भी देश उसे अपना जासूस स्वीकार नहीं करता और उसे एक सामान्य नागरिक बताया जाता है।इस मामले में सरकारें ज्यादा कुछ कर भी नहीं कर सकती क्योंकि औपचारिक रुप से वह यह स्वीकार नहीं कर सकती कि उन्होंने अपना जासूस किसी और देश में सूचना एकत्रित करने के लिए भेजा है। यह बात जासूस भी जानते हैं कि पकड़े जाने की स्थिति में सरकार उन्हें अपना नहीं मानेगी।
मोहनलाल भास्कर के पकड़े जाने के बाद भी यही हुआ भारत सरकार ने उन्हें भारत का नागरिक तो बताया मगर यह मानने से इनकार कर दिया कि वह भारत के जासूस हैं। पाकिस्तान में उन पर मुकदमा चला और किसी प्रकार से वह मौत की सजा से बच गए और 14 साल की उम्र कैद हुई, दूसरी ओर भारत सरकार ने मोहनलाल भास्कर के घर लिखे गए पत्र में मोहनलाल भास्कर को एक सामान्य भारतीय बताया और यह कहा कि अन्य भारतीयों के साथ उनकी भी रिहाई के प्रयास जारी हैं।भारत में पाकिस्तान की भी कुछ जासूसों को पकड़ रखा था और लगभग 7 वर्ष बाद जासूसों के अदला-बदली के प्रोग्राम में पाकिस्तानी जासूस के बदले में उन्हें भारत भेजा गया मगर वह 7 वर्ष मोहनलाल भास्कर के लिए कुछ इस प्रकार भी थे कि सामान्य व्यक्ति उस प्रताड़ना और दरिंदगी से या तो मर जायेगा या पागल हो जाएगा..
खैर कितने दिनों में मोहनलाल भास्कर ने पाकिस्तानी सरकार की सारी दरिंदगी झेलते हुए भी भारत की कोई भी खुफिया जानकारी लीक नहीं की। मोहनलाल भास्कर की रिहाई में डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन का भी एक प्रमुख योगदान रहा जिन्होंने भारत सरकार से मोहनलाल भास्कर की पैरवी की थी।जब मोहनलाल भास्कर भा वापस भारत आ गए तो कुछ दिनों तक तो उनके या सरकारी तामझाम और आने वालों की भीड़ लगी रही मगर धीरे-धीरे भीड़ छटने लगी और मोहनलाल भास्कर को 2 जून की रोटी का भी प्रबंध करना मुश्किल हो गया।
मगर दुश्मन देश के साथ-साथ अपने देश की भी सरकारें जासूसों के प्रति कितनी क्रूर होती हैं इसका अनुभव मोहनलाल को पूर्व में अपने व्यक्तिगत मित्र और उस समय भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से भेंट करने के बाद हुआ। मोहनलाल भास्कर ने मोरारजी से कहा कि जो भारतीय एजेंट या जासूस पाकिस्तान में पकड़े जाने जाते हैं और पाकिस्तानी जेलों में कई कई वर्षों तक भयानक यातनाएं सहते हैं, उनको तथा उनके परिवार को भारतीय सरकार को पेंशन या उचित पुरस्कार देना चाहिए, जिससे कि उनके रोजी रोटी का प्रबंध हो सके ।। 
मोहनलाल भास्कर कहते हैं कि मेरे इस निवेदन पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का जो उत्तर था उसको सुनने के बाद उनका खून खौल उठा और अगर उनके पास पिस्तौल होती तो वह तब तक गोलियां बरसाते जब तक कि पूरी गोलियां खत्म नहीं हो जाती। मोरारजी देसाई का जवाब था कि हम पाकिस्तान के किये की सजा क्यों भुगतें ??क्या तुम्हारा मतलब है कि अगर पाकिस्तानी सरकार तुम्हे 20 साल तक कैद में रखती तो हम तुम्हें 20 साल का मुआवजा देते???
ध्यान दीजिए क्या वह व्यक्ति बोल रहा था जिसने इमरजेंसी में सिर्फ 19 महीने की कैद काटी और कैद में सहे तथाकथित अत्याचारों के नाम की दुहाई देकर प्रधानमंत्री की गद्दी हासिल कर ली थी और उन्होंने महीने अपनी पार्टी से संबंध जो भी लोग कैद में थे उनके लिए मोटी मोटी पेंशन भी तय कर दी थी.. अगर पाकिस्तानी जेल में प्रताड़ना से मोहनलाल भास्कर पाकिस्तान में ही मर जाते तो भारत सरकार उनके परिवार के साथ क्या व्यवहार करती इसका अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं।
मोहनलाल भास्कर तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के व्यवहार से इतना दुखी थे कि उन्होंने कहा कि मैं अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करके आज यह कहना चाहता हूं कि देशभक्ति के नाम का सहारा लेकर इस देश में सैकड़ों नौजवानों की जिंदगी से खिलवाड़ किया जाता है। कुछ लोग तो बेकारी का शिकार होकर इस धरने में फंसते हैं लेकिन उन्हें मिलता कुछ नहीं है बस बॉर्डर क्रॉस करते हुए दुश्मन की गोली, दुश्मन की जेल और अनगिनत अत्याचार.... यह सोच कर हैरान होती है कि भारत के तत्कालीन पाखंडी मूत्रपान करने वाले प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के पास स्मगलरों और गुंडों को अपने घर बुलाकर तीन-तीन दिन तक उनकी मेहमाननवाजी करने और उनकी समस्या सुलझाने का समय था तो था मगर जिन्होंने इस देश के लिए जान की बाजी लगाकर दुश्मन की फांसी की कोठरियों में अपना जीवन बिता दिया उनके लिए संवेदना के दो शब्द भी सरकार के पास नहीं थे..
हांलाकि अपनी पुस्तक के अंतिम भाग में मोहनलाल भास्कर ने यह माना है कि उन्होंने जो किया वह देश पर एहसान नहीं बल्कि देश के लिए अपना फर्ज निभाया मगर मोरारजी देसाई सरकार से उनकी घृणा इस स्तर की थी की पुस्तक के अंत में उन्होंने लिखा कि मोरारजी देसाई को छोड़कर जिस किसी की भी भावना मेरे लेखन से आहत हुई है उनसे मैं माफी मांगता हूँ....
........................
इतना लंबा
लेख लेख लिखने का मतलब यही था की आप और हम समझ सके कि सैनिकों के अलावा भी एक गुमनाम लोगो की दुनिया होती है जो प्रचार से दूर होती है..उसमें सेना के अफसर से लेकर बेरोजगार नौजवान होते हैं। कइयों की लाश नहीं मिलती.. कइयों को अपने देश में ही संदेहास्पद परिस्थिति में मरना पड़ता है और कइयों को इस देशभक्ति का इनाम ये मिलता है कि उन्हें और उनके परिवार को आजीवन न्याय नहीं मिलता और विडंबना ये की सरकार की मर्जी के बिना वो कुछ बोल भी नहीं सकते..ऐसे सभी बलिदानियों एवं उनके परिवार वालों को नमन ।।
आशुतोष की कलम से

सोमवार, 6 मार्च 2017

मीडिया के कुचक्र में फसता राष्ट्रीय संघ सेवक -डॉक्टर कुंदन चंद्रावत की बर्खास्तगी

● राष्ट्रीय संघ सेवक के नेता डॉक्टर कुंदन चंद्रावत ने केरल में संघ के कार्यकर्ताओं की रोज रोज हो रही हत्याओं से व्यथित होकर भावावेश में ये बयान दे दिया कि, केरल के मुख्यमंत्री का जो सर काट कर लाएगा उसको वो अपनी जीवन भर की पूंजी वो मकान दे देंगे जिसकी कीमत एक करोड तो होगी ही..अब यह एक उत्तेजना में दिया गया बयान था मगर बयान तो दिया गया था, बाद में उन्होंने संघ के कहने पर, इस पर माफ़ी भी मांगी मगर संघ ने, जिसपर फासीवादी होने का आरोप लगता है उसने उन्हें बर्खास्त कर दिया..
● पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का एक मुस्लिम नेता इमरान मसूद मोदी की बोटी बोटी काटने की धमकी देता है।कांग्रेस न उसकी निंदा करती है ना उस पर कोई कार्यवाही करती है । उसने कभी अपने इस बयान के लिए माफी भी नहीं मांगी और इस विधानसभा चुनाव में वह राहुल गांधी के चहेतों में शामिल था..
● पिछले कई दशकों से केरल में वामपंथियों द्वारा हिंदुओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्थकों की थोक में हत्याएं की गई मगर ना तो वामपंथियों ने इस पर कोई अफसोस जताया ना ही कोई कार्यवाही की।।।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बुद्धिजीवियों से भरा हुआ वैचारिक रूप से बहुत ही उच्च सोच वाला संगठन है। मगर मेरी अल्प बुद्धि में जो बात समझ में आ रही है कि हम वही गलतियां कर रहे हैं,जो कभी मुगलों के साथ युद्ध में हमारे हिन्दू राजाओं ने की। मुगल हमेशा हमारे बच्चों और महिलाओं को टारगेट करते रहे और हम आदर्शवाद के उच्चतम स्तर का लबादा ओढ़े हुए युद्ध करते थे.मुग़ल सैनिक युद्ध के समय अपने परिवार महिला बच्चों की चिंता से मुक्त रहते थे क्योंकि अगर हिन्दू उन्हें पाएंगे तो सम्मान से घर भेज देंगे जबकि हिन्दू योद्धा इसी चिंता में रहते हुए युद्ध लड़ते थे की अगर उनका परिवार महिलाएं बेटियां मुगलो के हाथ लग गई यो तो चौराहे पर नंगी घुमाई जाएँगी इसलिए एक ओर सैनिक युद्ध के लिए प्रस्थान करता दूरी और जौहर के लिए चिताएं सजा दी जाती थी की हिन्दू स्त्रियों की इज्जत बच जाए जान भले ही जाये...
इस प्रकार नैतिक उच्चता के मानदंड स्थापित करके आप मारे ही जायेंगे, जैसा केरल में खा रहे हैं और ज्यादा से ज्यादा एक दो राज्यों में अंतिम समय में सरकार बना लें.. यहाँ हलाहल को हलाहल से धोने की जरूरत है..सर काटने वालों के सामने सहिष्णुता और चरखा कातने की विचारधारा ने लाखों की हत्या करवाई और भारत का विभाजन कराया.मेरे समझ से भले ही आरएसएस कुंदन जी का समर्थन न करती मगर मिडिया के दबाव में आ कर उनको संघ के दायित्यों से मुक्त करना,समर्पित कार्यकर्ताओं में निराशा का भाव ले आएगा...
आशुतोष की कलम से

गुरुवार, 2 मार्च 2017

कन्हैया और उमर खालिद की मां की चू......डी

कन्हैया और उमर खालिद की मां की
चू......डी।
अगर ऊपर की लाइन आपको और अभद्र, असंसदीय और अश्लील लगी तो इस पोस्ट को पूरा पढ़िए और समझिए।ऐसा लिखने का उद्देश्य कहीं से भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से किसी का अपमान करना या किसी को अपशब्द करना कहना नहीं था, परंतु परिस्थितियों को समझाने के लिए इस प्रकार का शब्द प्रयोग करना पड़ा....
अगर आप मेरी पोस्ट की पहली लाइन को देखें और जरा भी समझदार हैं, तो मुझे अभद्र भाषा बोलने वाला कह सकते हैं, परंतु क्या आप यह बात कोर्ट ने साबित कर सकते हैं??? नहीं, क्योंकि कोर्ट में जब दलील दी जाएगी तो मैं कहूंगा की इसमें "चू......ड़ी" शब्द का प्रयोग किया गया है, जोकि कहीं से भी अभद्र नहीं है.. और सभी यह जानते रहेंगे कि मैं क्या कहना चाहता हूं परंतु फिर भी बरी हो जाऊंगा...
कन्हैया,उमर खालिद,अनिर्वान या जो भी देशद्रोही वामपंथी विचारधारा के लोग हैं, भारतीय न्यायपालिका में इसी "चू...डी" के कारण बच जाते हैं, वो पूरे 1 घंटे नारे लगाएंगे हम ले के रहेंगे आजादी,कश्मीर मांगे आजादी, मणिपुर मांगे आजादी,बंगाल मांगे आजादी,बस्तर मांगे आजादी,हम लेकर रहेंगे आजादी और अंत के 1 मिनट में यह बोलेंगे गरीबी और सामंतवाद से आजादी और यही एक मिनट उन्हें कोर्ट से बऱ़ी करा देगा...और इसी कारण आज सब पूछते हैं कि अगर देशद्रोही हैं तो साबित करके दिखाओ...
ठीक वैसे ही जैसे जैसे शराब का विज्ञापन बंद होने के बाद बैगपाइपर , नाम की शराब बनाने वाली कंपनी पूरे विज्ञापन को बैगपाइपर सोडा के नाम पर चलाती है, मगर हम सब समझ जाते हैं कि यह सोडा नहीं शराब का विज्ञापन है.ठीक उसी प्रकार जैसे सिगरेम्स कंपनी 100 पाइपर नाम की दारू का प्रचार 100 पाइपर कैसेट्स और सीडीज के नाम पर करती है,मगर सभी जानते हैं कि वो दारु परोस रही है...मगर ये सभी शराब कम्पनियाँ कोर्ट में बच जाएँगी, क्योंकि वह कहेगी कि हम तो सोडा कैसेट और सीडी बेच रहे थे...
इसी प्रकार की आजादी बेचने वाली दूकान वामपंथी कम्युनिष्टों ने खोली है.. दरअसल वो कश्मीर और बस्तर की आजादी के नारे लगाकर पाकिस्तान चीन का समर्थन और भारत का विरोध ही करते हैं, मगर भारत की न्यायपालिका द्वारा लात ना खाना पड़े इसलिए अंत में एक पंक्ति गरीबी और सामंतवाद से आजादी जोड़कर अपने आप को बचा लेते हैं..
भारत के कानून के अनुसार ना तो दारु का विज्ञापन बंद हुआ, ना तो कन्हैया और खालिद की माँ की चू....ड़ी पर कोई समस्या होगी और ना ही कश्मीर बस्तर और मणिपुर की आजादी के नारे पर किसी को सजा मिलेगी...भारत के कानून में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है...
एक और बात, जब नगर निगम की सरकारी दवाओं के छिड़काव से भी कुछ मच्छर बच जाते हैं,तो उसे मारने की जिम्मेदारी नागरिकों की होती है, चाहे हाथ से मारे या कोई और स्प्रे से...भारत को भी इन लाल मच्छरों से आजादी चाहिए..
आशुतोष को कलम से

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

जेहाद समर्थक-कांग्रेस

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में प्रस्तुत किये गए संविधान के इंडियन पैनल कोड की धारा- 212 में प्रावधान है कि अपराधी को भागने में मदद करने वाले को अपराधी मानते हुए कानूनन मुकदमा चलाया जाएगा और उसे 5 साल तक जेल की सजा हो सकती है। मुझे मालूम नहीं कि भारत के एक अभिन्न हिस्से,जम्मू और कश्मीर में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का संविधान चलता है या नहीं इतना जरूर मालूम है कि पार्टियां बाबा साहब के नाम के खाद पानी से अपने वोट बैंक की फसल लहलहाती रहती है।
ताजा मामला जम्मू कश्मीर का है, जहाँ सेना प्रमुख विपिन रावत के एक बयान पर मोहर्रम का माहौल बना हुआ है। मोहर्रम मनाने वाली प्रमुख पार्टी है कांग्रेस और सेकुलर कीड़े। घटनाक्रम कुछ इस प्रकार का था कि जम्मू कश्मीर में कुछ आतंकवादी छिपे हुए थे और भारतीय सेना और उन जेहादियों के बीच एनकाउंटर हो रहा था । जब तक आतंकवादी भारतीय सेना पर गोलियां चला रहे थे तब तक तो कोई समस्या नहीं थी, लेकिन जैसे ही भारतीय सेना आतंकवादियों के सामने भारी पड़ने लगी और उनको 72 हूरों के दर्शन कराने लगी ठीक उसी समय जम्मू कश्मीर के स्थानीय मुसलमानों ने सेना के ऊपर पत्थर फेंकना शुरु कर दिया और मस्जिदों से सेना के खिलाफ तकरीरें शुरू कर दी जिससे कि आतंकवादियों को भागने का मौका मिल सके।खैर जैसे-तैसे तकरीरों और पत्थरों से बचते हुए भारतीय सेना ने अपना अपरेशन पूरा किया..इससे पहले भी जम्मू कश्मीर में सेना के ऑपरेशन शुरू होते ही मस्जिदों के लाउडस्पीकर से "पाकिस्तान जिंदाबाद" के नारे लगने शुरू हो जाते रहे हैं..इस ऑपरेशन के बाद सेना प्रमुख विपिन रावत का एक बयान आया कि आतंकवादियों की सहायता करने वाला या सेना की कार्यवाही में व्यवधान उत्पन्न करने वाले लोग भी आतंकवादियों के साथ माने जाएंगे।
मेरे समझ से एक भारतीय होने के कारण,किसी को इसमें कोई समस्या या कष्ट नहीं होना चाहिए मगर तुष्टीकरण की राजनीति इस हद तक हावी हो चुकी है तुरंत आनन फानन में कांग्रेस पार्टी ने सेना प्रमुख के इस बयान का विरोध करना शुरु कर दिया।।आखिर कांग्रेस क्या कहना चाहती है?? यदि हमारे भारतीय सेना के जवान आतंकवादियों के खिलाफ युद्ध लड़ रहे हैं और स्थानीय लोग उनके ऊपर ग्रेनेड और पत्थर फेंक रहे हैं तो क्या सेना के जवान उनको सिर्फ इसलिए मिठाई बाटे की उनके ऊपर हमला करने वाले मुसलमान धर्म को मानते हैं और इसके लिए मस्जिदों से निर्देश दिया जा रहा था?? कांग्रेस ने सेना प्रमुख के बयान पर इस प्रकार हो हल्ला मचाया कि अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें सफाई भी देनी पड़ी।
कांग्रेस ने शायद यह बयान उत्तर प्रदेश चुनाव को देखते हुए मुस्लिम वोटों के तुष्टिकरण के परिप्रेक्ष्य में दिया है मगर क्या ऐसा करके कांग्रेस, भारत के सभी मुसलमानों को एक ही श्रेणी में खड़ा करके जेहाद समर्थक नहीं घोषित कर रही है ?? क्या आतंकवादियों के समर्थकों के पक्ष में आवाज उठाकर कांग्रेस यह साबित नहीं कर रही है कि वह एक देशद्रोही गद्दारों आतंकवादियों का समर्थन करने वाली पार्टी बनती जा रही है ?? क्या इस मुद्दे पर चुनाव आयोग संज्ञान लेगा ?? केंद्र की सरकार में आसीन भारतीय जनता पार्टी ने एक प्रेस कांफ्रेंस करके कांग्रेस की इस बयान की निंदा की है । भाजपा के अनुसार सेना को आतंकवादियों और उसके समर्थकों से निपटने की पूरी छूट दी जानी चाहिए।।
मेरा कांग्रेस समेत सभी विपक्ष के मित्रों से अनुरोध है कि समस्या नरेंद्र मोदी से है तो Narendra Modi को जम कर कोसो,आलोचना करो या गाली दो(जैसा की अपशब्द आप लोग कहते ही रहते हैं) मगर मोदी को निचा दिखाने के चक्कर में सेना को मत कोसो , आतंकवादियों का समर्थन करके खुद को पाकिस्तान की श्रेणी में न लाओ और तो और मोदी के आलोचना के चक्कर में भारतीय संविधान का अपमान करके बाबा साहेब भीमराव का अपमान न करें....
आशुतोष की कलम से

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

"जेहादन आयशा" का हनीट्रैप,आईएसआई का जाल और ध्रुव सक्सेना(PAK ISI SPY Aisha)

मध्य प्रदेश की तथाकथित साम्प्रदायिक भाजपा सरकार की पुलिस ने 11 आईएसआई के संदिग्ध एजेंटों को पकड़ा है जिसमें एक भी मुसलमान नहीं है..दिग्विजय सिंह से लेकर अन्य सभी शेखुलर नेताओं में यह बताने की होड़ लग गई है कि पकड़े गए 11 ISI के सहयोग करने वाले लोगो में कोई भी मुसलमान नहीं है.हालांकि ये सूचना पूरी  सत्य नहीं है 

तथ्य ये है कि "
आयशा उर्फ़ आशिया  नाम की महिला ने अपने हुश्न के जाल में फसाकर "राशनकार्ड" बनवा बनवा कर इन लोगो से ये काम कराया और हनीट्रैप में फसाने वाली "जेहदान आयशा" भी इन 11 लोगों के साथ गिरफ्तार की गई है मगर मिडिया को "आयशा" दिखती कहाँ है???"जेहादन आयशा उर्फ़ आशिया"  ने बड़ी ही शातिराना तरीके से कई लड़कों की तरह "ध्रुव सक्सेना" नाम के लड़के को अपने प्रेमजाल में फास रखा था और उससे वो हवाला कारोबार कराती थी. बाद में ध्रुव ने भाजपा ज्वाइन कर ली और बाद में जब ATS  ने ध्रुव और आयश समेत 11 लोगों को गिरफ्तार किया तो पता चला की ये हवाला कारोबार ISI  के इशारे पर हो रहा था और देवबंदी छाप आतंक के पैरोकारों ने इसे भाजपा बजरंगदल और पता नहीं किस किस से जोड़ दिया..
ध्रुव सक्सेना को अपने प्रेमजाल में फासने के साथ साथ "जेहादन आयशा उर्फ़ आशिया " ध्रुव के साथ भोपाल के न्यू मिनाल रेजीडेंसी  में एक ही फ्लैट में रहती थी और ध्रुव ने आयशा उर्फ़ आशिया से निकाह करने के लिए धर्म परिवर्तन की योजना बनाई थी  तब तक हवाला रैकेट पकड़ा गया और पता चला की हवाला का रैकेट "जेहादन आयशा उर्फ़ आशिया " के माध्यम से ISI  चला रही है। मतलब इसमें मालिक आयशा उर्फ़ आशिया थी और बाकी उसके कर्मचारी जिसमें कुछ को वो पैसे तो कुछ को अपना जिस्म फ़ीस के रूप में देती थी। 
मगर मेरा मुद्दा वो 11 है जो "आयशा" की जमात से नहीं है.. कोई भी मुसलमान नहीं है,कोई भी मुसलमान नहीं है यह बात बार-बार दोहरा कर दिग्विजय सिंह और उनके जैसे शेखुलर नेताजी लोग स्वयं यह साबित और स्वीकार कर रहे हैं कि ज्यादातर मामलों में ISI के एजेंट मुस्लिम समुदाय से ही होते हैं। अगर आज तक आई एस आई के पकड़े गए एजेंटों की गिरफ्तारियों को देखा जाए तो लगभग 99% गिरफ्तारियां एक समुदाय विशेष के लोगों की हुई है।और ईमाम बुखारी जी ने एक बार यहाँ तक कहा था कि "हाँ मैं ISI का एजेंट हूँ किसी की हिम्मत हो तो गिरफ्तार करके दिखाये"।।
खैर अब इससे जो बड़ी बात है, कि इन पकड़े गए 11 लोगों में से एक भारतीय जनता पार्टी के मीडिया सेल से जुड़ा रहा है। अगर आई एस आई का एजेंट TMC, SP, BSP, INC या किसी देवबंदी छाप पार्टी से पकड़ा जाता है तुझे कोई आश्चर्य की बात नहीं होती क्योंकि पहले भी ऐसा होता रहा है....मगर यदि आईएसआई के एजेंटों ने भारतीय जनता पार्टी के मीडिया सेल पर घुसपैठ कर ली है तो सचमुच एक गंभीर मामला है और भारतीय जनता पार्टी को इस बात पर विचार करना होगा कि, किस आधार पर अपने विभिन्न कार्यालयों में लोगों का प्रवेश कराया जा रहा है। अन्यथा विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जायेगा..
अक्सर जब कोई "मुस्लिम समुदाय" का ISI एजेंट पकड़ा जाता है तो एजेंट के अलावा सम्बंधित धर्मगुरु और नेता जी लोग उसको निर्दोष होने का सर्टिफिकेट दे देते हैं और कई केस में वो "जेहादी प्रोफ़ेसर जिलानी" की तरह बरी हो जाते हैं(बाइज्जत बरी नही होते कम सबूतों के कारण और वोटबैंक के दबाव के कारण होते हैं)।ठीक इसी प्रकार उत्तरप्रदेश की सरकार ने संकटमोचन मंदिर में बम फोड़कर दर्जनों को चीथड़े कर देने वालों से "समुदाय विशेष" का होने के कारण मुकद्दमा वापस ले लिया था तब कोर्ट ने कहा था
"आज आतंकियों पर से मुकद्दमा वापस ले रहे हो कल भारत रत्न दे देना"।।
मगर मेरा मानना है ऐसा तुष्टिकरण इन 11 के केस में नहीं होगा और होना भी नहीं चाहिए ...सरकार को एक और बाद ध्यान रखना होगा की इन 11 लोगो का पूरा जीवन जेल में ही बीते और तबाह हो जाये ताकि दोबारा कोई हिन्दू ISI की अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष सहायता करने की जुर्रत न करे..मुझे पूरा भरोसा है कि अभी तक "देवबंद के फतवे" की तरह किसी हिन्दू "मठ, अखाड़े या मंदिर" ने ये नहीं कहा कि ये बेचारे निर्दोष भटके हुए हिन्दू नौजवान है, न ही कोई भाजपा का कोई नेता इनकेे पक्ष में आया है क्योंकि भारत में बम फोड़कर फांसी पा कर भी निर्दोष और शहीद होने की इम्युनिटी और तमगा केवल "याकूब" "अफजल" और "जिलानी" को मिल सकता है किसी "ध्रुव सक्सेना" को नहीं...

सबका यही मत है कि ये 11 गद्दार है और गद्दारों के लिए कोई संवेदना नहीं, कोई फतवा नहीं..बाकी "आयशा" तो निर्दोष हो ही जायगी क्योंकि वो "वोट बैंक की फसल आयशा" जो ठहरी ...कानूनन जो अधिकतम सजा है इनके अपराध के लिए वो इन्हें दी जाये.हिन्दू समाज से इनके समर्थन में कोई आवाज नही है और न ही आएगी और यही बात हमें औरों से अलग बनाती है...
भारत माता की जय...
आशुतोष की कलम से

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

प्रेम का व्यवसायीकरण (Happy Rose Day)

प्रेम अब वयस्क और समझदार हो चूका है..रोज डे, प्रपोज डे मनाने वाली जनरेशन उस भाव को नहीं समझती, जब चार लाइन लिखने में पूरा लेटरपैड खत्म हो जाता था, और कमरे में गोला बना के फेके गए आधे लिखे पत्रों का छोटा मोटा हिमालय खड़ा हो जाता था.. कई रातें किताबो के अंदर छुपाये उस पेपर पर चार लाइने लिखने में बीत जाती थी और फिर भी लगता था कुछ कमी है। और इन सब के लिए किसी #रोजड़े #प्रपोजडे की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती थी..क्योंकि निश्च्छल संवेदनाएं प्रतीक्षा क्यों करें?? उनके लिए वर्ष का कोई भी समय पवित्र है.वो सब आग्रह, अपरिपक्व आकर्षण ही सही मगर प्रेम का पुट लिए हुए था ।
आज रोजड़े प्रपोज डे की प्रतीक्षा होती है..क्योंकि सब कुछ बाजार ने नियंत्रित कर लिया है, आप की भावनाएं भी और "प्रेम का अंतिम अभीष्ट" भी बाज़ार ही निर्धारित करता है, आप को प्रेम नहीं भी होता है तो बाज़ार द्वारा करवाया जाता है बेशक
उसे आप दो महीने बाद त्याग दें.आज लिखने लिखाने के लिए स्मार्टफोन है,पहले से लिखी लाईने हैं जिसमें सिर्फ "To" और "From" बदल बदल कर "Send To Many" कर दिया जाता है। आज कल कई केस में सिर्फ "TO" बदला जाता है क्योंकि प्रेम भी बेहतर विकल्पों की तलाश में है..आज का प्रेम खुद को परिशोधित करता रहता है.रिसर्च करता रहता है और "प्रोडक्ट" में बदलाव का ऑप्शन सदैव खुला रखता है.
आज कल प्रेम में आवाज, व्यक्तित्व और आत्मा को गौड होती जा रही है और बेबी का बेस और होठ प्रधान होता जा रहा हैं...आत्मा से शुरू हुआ आख्यान देह की गोलाइयों में "कभी मेरे साथ एक रात गुजार" को अभीष्ट मान बैठा है.. पहले सिर्फ "प्रेमिका" या "प्रेमी" हुआ करते थे अब "We are just Good friends" वाला रिश्ता आ गया है..इस रिश्ते में सहूलियत है किसी भी सीमा पर जा के वापस लौट आने और फिर से "Just Good friends" बन जाने की.
प्रेम का प्रदर्शन और बाज़ारीकरण ने उसकी राधा,मीरा और सीता रूपी समर्पण की महत्ता को छीनकर "अनारकली डिस्को चली" वाले क्लब में ला के खड़ा कर दिया है.."प्रेम अब समर्पित नहीं होता,प्रेम की बोली लगती है..मॉल्स में,थियेटर में और महंगे महंगे शॉपिंग काम्प्लेक्सेज में...."और जब आप ने "बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होई??" यूरोप की अच्छाइयां तो हम स्वीकार नहीं करेंगे क्योंकि वैसा करने में हमे श्रम और उद्यम करना पड़ेगा..मगर यूरोप बुराइयाँ जरूर ले आएंगे..वो हमें शॉर्टकट में ओवरनाईट मॉडर्न बनाती है..और हमारी समाज और शिक्षा की पद्धति ऐसी ही है कि ये सब अनजाने में हम आने वाली पीढ़ी को ट्रान्सफर भी करते जा रहे हैं. राजीव भाई के व्याख्यान की दो लाइने यहाँ प्रासंगिक लगती है..
पहली ये की "यूरोप में एक समय ऐसा भी था कि प्राथमिक स्कूलों से ज्यादा गर्भपात केंद्रों या अवार्शन सेंटर्स की संख्या थी।'"
दूसरा यह कि यूरोप में "ब्रोथल्स" के सामने एक बोर्ड लगा होता था "सावधान जिसके साथ आप सेक्स करने जा रहे हैं, वो आप की बिटिया हो सकती है।".....
हैप्पी रोज डे, चॉकलेटडे, किश डे, मिस डे.....एंड सो आन टू बी कान्टीन्यूड।
आशुतोष की कलम से

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

जीसस गायत्री मन्त्र ईसाईयों द्वारा धर्मांतरण का नया तरीका (Conversion)

मैंने काफी पहले भाई राजीव दीक्षित भाई के गुरूजी प्रोफेसर धर्मपाल की एक पुस्तक पढ़ी थी "Despoliation and Defaming of India" पुस्तक में ब्रिटेन की संसद,जिसे हाउस ऑफ कामंस के नाम से जाना जाता है, उसकी प्रोसीडिंग्स लिखी थी।मैकाले से लेकर अन्य कई वरिष्ठ ब्रिटेन के सांसदों ने अपने विचार उसमें दिए थे।हाउस ऑफ कामंस ने उस डिबेट का टॉपिक ही था "द ब्रिटिश डिबेट ऑन क्रिश्चिनाइजेशन ऑफ इंडिया"। इस डिबेट में ब्रिटेन की संसद में सांसदों ने अपने अपने विचार रखें 22 जून 1813 को विलियम बिलबर फोर्स जो कि ब्रिटेन के हाउस ऑफ कामंस का सदस्य था, उसने उसने एक "क्रिश्चनाइज्ड इंडिया" को ब्रिटेन की ड्यूटी बताते हुए भारत को किस प्रकार ईसाईकरण किया जाए या भारत का इसाईकरण क्यों आवश्यक है इस पर अपने विचार रखे. 1 जुलाई 1813 को ब्रिटेन हाउस ऑफ कॉमंस में पुनः विलियम बिलबर फोर्स की दूसरी स्पीच हुई मुद्दा वही था भारत का इसाईकरण। इसके बाद जेम्स मिल और टीबी मैकाले की स्पीच हुई जिसमें ये योजना बनाई गई थी कि आने वाले समय में किस प्रकार भारत को एक ईसाई राज्य बनाना है.
आजादी के बाद सत्ता का स्थानांतरण नेहरू जी जैसे व्यक्तियों के हाथ में किया गया इसके पीछे भी टी बी मैकाले की वही नीति थी कि भारत में हमें मानसिक रूप से अंग्रेजों की एक पीढ़ी तैयार करनी है जो देखने में भारतीय हो। नेहरू जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अंग्रेजों की भारत को क्रिश्चनाइज करने की रणनीति को उर्वरा भूमि मिल गई इसी क्रम में अंग्रेजों ने भारत सरकार पर अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए विभिन्न क्रिश्चियन मिशीनरीयों को भारत भेजा और बड़े पैमाने पर भारत में धर्मांतरण का खेल हुआ जिसका परिणाम ये है कि आज पूरा नार्थ ईस्ट ईसाई है. अब चूकि हमारे शासक बौद्धिक रूप से अंग्रेज वर्ग से संबंधित थे और नेहरु जी ने तो स्वयं भी स्वीकार किया है कि वह बाई चांस हिंदू है अगर नेहरू के शब्दों में कहें "आई एम अ हिंदू बाई चांस" इस कारण धर्मान्तरण और आसान हो गया।
जब ईसाई मशीनरी यहां आए तो वह इस बात को अच्छी तरीके से जानते थे कि भारत की जनता को सीधे-सीधे उनके धर्म को गाली देकर, नीचा दिखा कर बड़े पैमाने पर धर्मांतरित नहीं किया जा सकता है। तब उन्होंने एक नया खेल खेला जो की अनवरत आज भी जारी है वह हमारे प्रतीक चिन्हों को स्वीकार करने लगे अगरबत्ती दिखाना,हवन करना,गेरुआ वस्त्र पहनना,यहां तक कि कमंडल खड़ाऊं और चंदन लगाना यह सब करके वह भोले-भाले हिंदुओं की जीवन में प्रवेश करते थे और धीरे-धीरे कृष्ण और राम की तस्वीर के जगह पर ईसा मसीह की तस्वीर रखकर पूजा प्रारंभ कर आते थे और इसी क्रम में उस व्यक्ति की आने वाली पीढ़ी पूर्णतया ईसाई होती थी.. ये कार्यक्रम सन 1813 से आज तक जारी है...
नीचे एक वीडियो आप लोगों से शेयर कर रहा हूं वही रणनीति हिंदुओं को धर्मांतरित करने के लिए हिंदुओं की ही प्रतीक चिन्हों का उपयोग करो अब तक हम सभी गायत्री मंत्र सुनते आए थे अब "जीसस मंत्र" बन गया और यह बनाने वाले भी कोई अंग्रेज नहीं चंद टुकड़ों की खातिर परिवर्तित हुए मैकाले के मानसपुत्र हैं. सरकार और समाज को बहुत गंभीरता से "एंटी कन्वर्जन ला" पर विचार करना होगा अन्यथा इश्लामिक जेहादियों से इतर समाज का एक स्लो प्वाइजन, ये क्रास लटका कर मन्त्र पढ़ने वाले मैकाले विचारों के दलाल भी दे रहे हैं..
आशुतोष की कलम से

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

कश्मीर की राह पर चलता पश्चिम बंगाल.सरस्वती पूजा प्रतिबंधित (Ban Saraswati pooja in WB)


मित्रों आज यह पोस्ट में बहुत ही व्यथित मन से लिख रहा हूँ। हमारी राजनैतिक प्रतिबद्धताएं कुछ भी हो सकती है कोई भारतीय जनता पार्टी का समर्थक हो सकता है कोई सपा बसपा या कांग्रेस का, मगर इन सब से इधर हम एक मनुष्य है और एक हिंदू है। ऐसा माना जाता है कि हिंदू धर्म के अनुयायी स्वभाव से सहिष्णु एवं सर्वधर्म समभाव को मानने वाले होते हैं इसका प्रत्यक्ष उदाहरण पारसी कौम है जिसका अस्तित्व पूरे विश्व से खत्म हो गया मगर वह अपनी मान्यताओं के साथ हिन्दू बहुल भारत में सुख सुविधा एवं शांति से रह रही है।
खैर बात पारसी कौम कि नहीं मैं आज स्पष्टतया वार्ता रेडिकल इस्लाम के अनुयायियों के संदर्भ में करना चाहूंगा। जहां भी इस विशिष्ट प्रकार के इस्लाम धर्म को मानने वाले अनुयायियों की संख्या कुल जनसंख्या का 30% से अधिक हो जाती है वहां अन्य धर्मावलंबियों की स्वतंत्रता का हनन एवं अतिक्रमण शुरू हो जाता है जैसे यह जनसंख्या 50% से ऊपर होती है,अन्य धर्मावलंबियों के पास सिर्फ यही रास्ता बचता है कि या तो वह लोग इस्लाम धर्म स्वीकार कर लें या उस क्षेत्र को छोड़कर चले जाए। जहां पर इस्लामिक अनुयायियों की जनसंख्या 50% से अधिक हो चुकी है तो एक और काम किया जाता है गैर मुस्लिमों को काफिर घोषित करके उनकी हत्या शुरू कर दी जाती है,उनकी बच्चियों का रेप किया जाता है,उनकी महिलाओं को चौराहे पर नंगा किया जाता है और इन सब अत्याचारों से तंग आकर या तो वह इस्लाम स्वीकार कर लेता है या क्षेत्र से छोड़ कर चला जाता है।
आपको यह बात अतिशयोक्ति लग सकती है मगर स्वतंत्र भारत में जम्मू और कश्मीर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जहां इस्लाम के अनुयायियों की जनसंख्या बढ़ते ही कश्मीर के हिंदुओं को उनके घरों से बेघर कर दिया गया।उनकी बच्चियों का बलात्कार हुआ और आज वह दिल्ली और जम्मू के शरणार्थी कैंप में अपने ही देश में शरणार्थी बने 27 साल से जीवन गुजार रहे हैं। भारत में कई अन्य राज्य हैं जहां हिंदू जनसंख्या बहुसंख्यक है वहां पर मुसलमान या अन्य धर्मावलंबी बहुत ही आसानी से अपना जीवन यापन और व्यापार आजीविका चला रहे हैं मगर यह सहिष्णुता इस्लामिक बहुल क्षेत्रों में हिंदू जनसंख्या के साथ कभी नहीं दिखाई जाती है। ईद के अवसर पर बेगानी शादी में दीवाने हिंदू अब्दुल्लाओं को तो आपने देखा ही होगा वह लोग अपने अन्य हिंदू मित्रों को ईद मुबारक ईद मुबारक का संदेश भेजते रहते हैं । मगर जब बात आती है हिन्दू त्योहारों की तो ये सहिष्णुता किस कब्रिस्तान में दफ़न कर दी जाती है..सरस्वती पूजा और दुर्गापूजा हिंदुओं का नहीं पूरे भारत का त्यौहार है भारत की संस्कृति का द्योतक है.कश्मीर में तो हिंदु त्योहार की आप सोच ही नहीं सकते। माँ दुर्गा और विद्या की देवी सरस्वती की पूजा अब पश्चिम बंगाल में प्रतिबंधित कर दी गई और कारण ये है कि मुसलमान बिरादरी सरस्वती पूजा का विरोध कर रही है क्योंकि इस्लाम में सरस्वती पूजा हराम है और एक प्रमुख वजह ये है कि वहां जनसँख्या 30% से ज्यादा पहुच चूंकि है तो दूसरे धर्म वालों के अधिकार ख़त्म होने चाहिए..

.ये बच्ची पश्चिम बंगाल से है..ममता बानो की पुलिस ने इसे बर्बरता से पीटा..
अपराध ये है कि ये एक मुस्लिम बाहुल्य इलाके में रहती है और इसने स्कूल में सरस्वती पूजा मनाने का प्रयास किया..वहां के स्थानीय मुसलमानों ने कहा कि चूंकि इस्लाम में मूर्ति पूजा हराम है बंगाल में सरस्वती पूजन नहीं होगा ममता बैनर्जी सरकार ने भी इसका समर्थन कर दिया कि यदि मुसलमान बिरादरी को आपत्ति है तो पश्चिम बंगाल के स्कूलों में विद्या की देवी सरस्वती की पूजा नहीं होनी चाहिए...इस लड़की ने प्रतिरोध किया तो इसका सर फोड़ दिया गया...
अब न तो महिला अधिकार वाले आएंगे, न मानवाधिकार न बड़की बिंदी गैंग न ही मोमबत्ती गैंग..क्योंकि ये लड़की हिन्दू जो ठहरी और हिन्दू तो लात खाने के लिए ही होता है...
वैसे बंगाली हिंदुओं से मुझे जरा भी संवेदना नहीं है क्योंकि ये भविष्य उन्होंने मतदान करके खुद चुना है.जो कुछ लोगो ने इस चुनाव का विरोध किया उनके प्रति संवेदना है क्योंकि गेंहूँ के साथ घुन को पीसना पड़ता है. अब बस उसी दिन की प्रतीक्षा है को कब कश्मीर के हिंदुओं की तरह बंगालियों के घर के बाहर लिखा जाता है कि या तो बंगाल छोड़ दो,या इस्लाम स्वीकार करो या मरने और बलात्कार के लिए तैयार रहो...
अभी कुछ मित्र हल्ला मचाते आएंगे की सभी मुसलमान एक जैसे नहीं होते.तो मैं अपना प्रसंग बता दूं कि मुझे नवरात्रि, जन्माष्टमी, दुर्गापूजा की बधाइयाँ मेरे मुसलमान मित्र फोन से लेकर मेसेज के रूप में भेजते हैं मगर समस्या ये है मैं जहां रहता हूँ वहां प्रतिशत अभी 10 -12 वाला है..पश्चिमीयूपी में यही प्रतिशत 25 से 30 होते ही मंदिरों से लाउडस्पीकर उतरवाने के लिए आंदोलन होने लगते हैं फतवे जारी होने लगते हैं..बंगाल में सरस्वती और दुर्गा की पूजा प्रतिबंधित हो जाती है और कश्मीर में तो हिंदुओं को जीने का अधिकार नहीं है उन्हें गोली मार दी जाती है.और बाद में एक लाइन में समस्या का समाधान की 4 लाख लोगो को बेघर किसी इस्लाम ने नहीं राजनीति ने किया.. हाँ वही राजनीति जो पाकिस्तान सीरिया सूडान लीबिया मिस्र अफगान तुर्की जार्डन और यमन में चल रही है..वही जिसमें सिंजर की पहाड़ियों में अल्पसंख्यक यजिदियों को कुछ साल पहले तडपा तड़पा कर मार डाला गया और उनकी महिलाएं आज भी "जेहादियों" की सेक्स स्लेव या रखैल बनी हुई हैं..
जहां तक मुद्दा बंगाल का है बंगाल की जनता ने अपनी आत्महत्या स्वयं चुनी है क्योंकि ममता बानो की सरकार सिर्फ 30 से 35% रेडिकल इस्लाम को मानने वाले लोग नहीं बना सकते हैं। इसमें एक बहुत बड़ा सहयोगी वर्ग हमारे उन सेकुलर हिंदुओं का है जिनके निजी स्वार्थ के आगे उनका धर्म उनकी पूजा पद्धति उनकी संस्कृति सभी कुछ गौण हैं। "कश्मीरी पंडितों" ने यही गलती की और खामियाजा वो आज दिल्ली के फुटपाथ पर हैं और उनकी महिलाएं जेहादियों के बलात्कार का शिकार.."बंगाली हिंदुओं" ने इतिहास से सीख नहीं ली और अपनी कब्र खुद खोद ली है ममता बानो की सरकार को चुनकर..इस्लाम तो वही कर रहा है जो महमूद गजनवी,बाबर,औरंगजेब ने किया मगर आप क्या चुन रहे हैं? अपनी अक़्तमहत्या और अपने बच्चों की हत्या???? इस पर विचार कीजिये और इतने लंबे लेख के बाद न समझ आया हो तो नीचे वाला वीडियो देख लीजिये विश्वास मानिये सेकुलरिज्म का बुखार कुछ न कुछ जरूर कम होगा...

आशुतोष की कलम से