बुधवार, 20 जुलाई 2016

सिकंदर(Alexander‬ ‪)- विश्वविजेता या एक पराजित लुटेरा शासक ? Part-2

सिकंदर के भारत में विजय और पोरस को पराजित करने की जो झूठ गाथा कांग्रेस पोषित कम्युनिष्ट इतिहासकारों ने लिखी थी उसको सिकंदर के समसामयिक ग्रीक और रोमन इतिहासकारों ने ही झुठला दिया..इसी सन्दर्भ में सिकंदर की पराजय पोस्ट की पहली कड़ी ,मैंने कुछ दिन पहले पोस्ट की थी उसे आप इस लिंक पर http://goo.gl/UO8hkG पढ़ सकते हैं..अब आगे बढ़ते हैं,
तक्षशिला नरेश आम्भी से सिकन्दर की पुरानी मित्रता और पोरस से शत्रुता का झूठ : तक्षशिला नरेश आम्भी का चित्रण वामपंथी कम्युनिष्ट इतिहासकारों ने इस प्रकार किया है की उसका पोरस से बैर था और इसी कारण सिकंदर के साथ वह जा मिला. और सिन्धु नदी आसानी से पार कर गया, अब यूनानी लेखक कर्टियस(curtius Quintus) के अनुसार तक्षशिला नरेश आम्भी और सिकंदर की पहली वार्ता इस प्रकार थी
●●“what occasion is there for wars between you and me ,if you are not come to take from us our
water and other necessaries of life; the only thing reasonable men will take up arms for? As to gold and silver and other possessions, if I am richer than you, I am willing to oblige you with part; If I am poor, I had no objection to sharing in your booty.’’ (Plutarch, Page no 20)●●

मतलब आम्भी ने कहा की यदि तुम हमारा अन्न जल छिनने के लिए नहीं आये हो,जिसके लिए युद्ध हुआ करते हैं तो हम क्यू लड़ें??और यदि तुम्हे सोना,चांदी या धन की इच्छा से आये हो और मानते हो की मैं तुमसे ज्यादा धनी हूँ तो मैं इसका एक हिस्सा देकर तुम पर एहसान करना चाहूँगा और यदि तुम्हे ऐसा लगता है की तुम धनी हो तो, तो तुम्हारे लूटे हुए धन में से लेने में मुझे संकोच नहीं है.

इतना सुनने के बाद कोई नहीं कह सकता की इनमे मित्रता रही होगी और कोई स्वाभिमानी विजेता रहता तो तक्षशिला नरेश आम्भी का सर काट देता या स्वयं डूब मरता मगर ऐसा नहीं हुआ और किसी स्वार्थवश इन दोनों को मित्रता यहाँ हो गयी. मित्रता क्यू हुई इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है न तो रोमन न ही यूनानी न ही भारतीय इतिहास में इसका विवरण उपलब्ध है. परन्तु यहाँ उस एक झूठ से पर्दा अवश्य उठ जाता है जो कांग्रेस पोषित कम्युनिष्ट इतिहासकारों ने फैलाया है की तक्षशिला नरेश आम्भी से सिकन्दर की पुरानी मित्रता और पोरस से शत्रुता थी..
सिकंदर ने विभिन्न राजाओं के पास अपनी अधीनता स्वीकार करने हेतु दूत भेजे..पोरस ने सिकंदर के दूत से कहवा भेजा कि, सिकंदर से अब मुलाकात युद्ध के मैदान में ही होगी.और उसने झेलम किनारे अपनी सेना को तैयार रहने को कहा ..पोरस का पडोसी अभिसार नरेश था जिससे पोरस की मित्रता थी और इन दोनों ने साथ मिलकर कई राज्यों को जीता था. अभिसार नरेश की रिश्तेदारी उन अश्वको से भी थी जिन्होंने सर्वप्रथम सिकंदर की सेना को 9 माह रोके रक्खा था .उन्होंने “ओनस(Aornus)” दुर्ग पर सिकंदर के अधिकार के बाद कई अश्वाकों को अपने राज्य में शरण भी दी थी. अतः अभिसार नरेश अनिर्णय में थे की सिकंदर का साथ दें या पुराने मित्र पोरस का...अतः उन्होंने सिकंदर के भेजे गए दूत को बंदी बना लिया जिससे की सिकंदर को सही स्थिति पता न चले और वो स्वयं पोरस से मिलने की तैयारी में लग गए . सिकंदर को अभिसार नरेश की इस चाल का आभास हो गया और वो अपने नए नए बने मित्र तक्षशिला नरेश आम्भी के साथ दोनों सेनाओ को लेकर झेलम किनारे पोरस से युद्ध करने चले आये और इस युद्ध में पोरस अकेला रह गया था .पोरस की सेना झेलम किनारे कडीग्राम के पास थी और वहां शत्रु की हलचल देख रही थी.झेलम में बाढ़ थी नदी की विकराल बाढ़ को देखकर नदी पार करना असंभव था .
इस पस्थिति में सिकन्दर की मनोदशा का वर्णन निम्न दो वक्तव्यों से हो जाता है.

●विसेंट स्मिथ के शब्दों में “ सिकंदर भारतीय सेना का संगठन देखकर वहीं ढीला पड गया.”
●सिकन्दर पर लिखने वाले यूनानी इतिहासकार एरियन के शब्दों में “सिकंदर ने वहां से चोरी छिपे हटने का निर्णय किया"

●●It was clear to Alexander that he could not effect the crossing at the point where Porus held the opposite bank, for his troops would be attacked as they tried to gain the shore, by a powerful and efficient army, well equipped and supported by a large number of elephants, moreover, he thought it likely that his horse, in face of an immediate attack by elephants, would be too much scared by the appearance of these beasts and their unfamiliar trumpetings to be induced to land-indeed, they would probably refuse to stay on the floats, and at the mere sight of the elephant in the distance would go mad with terror and plunge into the water long before they reached the further side.

अब यूनानी इतिहासकार एरियन को पढ़कर स्पष्ट है की सिकंदर पोरस की सेना और हाथियों को देखकर भयभीत हो गया था और उसे डर था की ये हाथी उसके घोड़ो और पैदल सैनिको को नदी में ही डूबा डूबा कर मार डालेंगे.ये देखकर सिकंदर ने ये प्रचार करवा दिया की वो कम से कम 6 माह तक झेलम किनारे रुकेगा और इस बात को सत्य सिद्ध करने के लिए कई सैनिको को घोड़ो का चारा लाने को भेज दिया. इस बीच उसने नदी का कई जगहों से मुआयना करने के बाद लगभग 6-7 सप्ताह में नदी पार करने लायक एक किनारा खोज निकाला जो की 16 मील उत्तर की ओर नदी के जंगलो से घिरे एक टापू के समीप था . अब उसने क्रेटस नाम के अधिकारी को तक्षशिला की 5000 सेना देकर वर्तमान कैम्प की निगरानी करने को कहा और छिपकर नदी पार करने वाली जगह पर सैनिको को तैनात करके स्वयं नदी पार करने को निकला सेना को आदेश था की जैसे ही सिकंदर नदी पार कर जाये नदी पार करने वाली जगह के सैनिक पीछे से पोरस के सैनिको पर हमला करे और पहले कैम्प की सेना मुख्य आक्रमण के समय उसका साथ दे. उस रात भीषण वर्षा और तूफ़ान के कारण सिकंदर के नदी पार करने की गतिविधि का ज्ञान पोरस की सेना को नहीं हो पाया और सिकंदर नदी पार कर गया.. सिकंदर का दुर्भाग्य ये था की नदी पार करके वो सही जगह न पहुच कर एक टापू पर पहुच गया और सवेरा होते ही पोरस के सैनिको को उसकी चाल का पता लगा गया और जब सिकंदर कड़ी के मैदान में पंहुचा तो सामने पोरस के सैनिको से सामना हुआ .

अगले भाग में महाराजा पोरस के पुत्र के साथ हुआ कडी के मैदान का युद्ध जिसमें सिकंदर की सेना की पोरस के सेना के हाथियों ने धज्जियाँ उड़ा दी और सिकंदर का घोडा मार गया और सिकन्दर बुरी तरह घायल हो गया..

आशुतोष की कलम से

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