गुरुवार, 7 जुलाई 2016

सिकंदर(Alexander‬ ‪)- विश्वविजेता या एक पराजित लुटेरा शासक ? Part-1

बचपन में आप सब ने पढ़ा होगा की जब सिकंदर और राजा पोरस का युद्ध हुआ तो पोरस हार गया और सिकंदर के सामने पकड़ के लाया गया .जब सिकंदर ने पूछा की पोरस तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जाये तो पोरस ने कहा जैसा की एक राजा को एक राज के साथ करना चाहिए और सिकंदर ने पोरस को मुक्त कर दिया.. 
क्या आप ने कभी सोचा है की सिकंदर जैसे राजा से ये उम्मीद रखना की वो बंदी बना के लाये गए राजा पोरस को,जिसने कभी उसके सामने आत्मसमर्पण नहीं किया, को इतनी आसानी से छोड़ देगा या पोरस जैसा वीर खुद लड़ते लड़ते बलिदान होने के स्थान पर खुद को बंदी बनाने के लिए प्रस्तुत करेगा ? दरअसल इन प्रश्नों पर कभी हमने विचार करने की आवश्यकता नहीं समझी क्यूकी भारतीय संस्कृति के विरोधी वामपंथी इतिहासकार अंग्रेजो के समय से नेहरूकाल हर समय पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से हमे अप्रमाणिक भारतीय संस्कृति विरोधी घुट्टी किताबो,पाठ्यक्रम एवं पूर्वनिर्धारित शोधों के माध्यम से पिलाते रहे और तार्किक साहित्य एवं इतिहास के आभाव में हम आजदी के बाद भी कुटिल वामपंथी भारतीय संस्कृति विरोधी इतिहास को पढ़ते रहे और आने वाले पीढ़ियों को स्थानांतरित करते गए. यथार्थ ये है की सिकंदर एक बर्बर राजा था जिसके विश्व विजय का स्वप्न भारत में आ के पोरस से युद्ध के बाद ख़त्म हो गया और सिकंदर उस युद्ध में बुरी तरह पराजित हुआ. यूनानी इतिहासकारों ने झूठ फैलाया की सिकंदर पोरस से जीता और यूरोप के अविकसित लोग जिनके सामने भारत की तुलना में अर्धविकसित यूनानी सभ्यता(तब तक ये लोग भारतीय सभ्यता से अनजान थे) सबसे महान थी,उन्होंने इसे आंख मूंद कर स्वीकार कर लिया फिर अंग्रेजो से ये झूठ भारत में मैकाले पद्धति से आया फिर उसी इतिहास को पाश्चात्य नेहरूवादी सोच और भारतीय संस्कृति विरोधी वामपंथियों ने हमारे सामने परोस दिया. इससे पहले विषय पर लौटूं आप सब से ये साझा करना चाहता हूँ इस लेख को लिखने की प्रेरणा मुझे इतिहास कर गंगाराम सम्राट की पुस्तक सिकंदर की पराजय को पढने के बाद मिली जिसमे तथ्यों को बहुत ही तार्किक ढंग से रखा गया है और उन्ही सन्दर्भों को अपेक्षाकृत सरल भाषा में आप के सामने रखने का प्रयास कर रहा हूँ.
इससे पहले भारत युद्ध के बारे में जाने सिकंदर एवं उसके राज्य का संक्षेप में इतिहास जान लेना होगा. ईसा पूर्व छठी शताब्दी से ईसा पूर्व चौथी शताब्दी तक ईरान के विभिन्न शासकों ने आक्रमण कर के यूरोप के विभिन्न हिस्सों तथा मिस्र पर अधिकार कर लिया था. कालांतर में इनकी आने वाली पीढ़ियों ने यूनान (greece) पर भी अधिकार का प्रयास किया एथेंस को कब्जे में ले लिया मगर कुछ समय बात जब इनकी शक्ति घटी तो ये यूनान एवं यूरोप के विभिन्न हिस्सों में अप्रभावी होते चले गए. ईरान से मुक्त हुए यूरोप के ये हिस्से आपस में ही उलझने लगे और ईरान बाहर से धन भेजकर इनमे युद्ध करवाता रहा. इन्ही में से एक क्षेत्र था “मेसीडोन्या” . ईसा से चार शताब्दी पूर्व यहाँ का शासक “फिलिप” बना और इसने थोड़े ही समय में “मेसीडोन्या” को शक्तिशाली बना दिया और यूरोप के अन्य छोटे छोटे राज्य इसके नेतृत्त्व में आ गए. अभी वह ईरान पर कब्जे को सोच ही रहा था की अचानक “फिलिप” की मृत्यु हो गयी . उसके मृत्यु के सन्दर्भ में आगे तथ्य देखें जायेंगे संभवतः वह अपनी स्त्री की कृपा के कारण धोखे से मारा गया .
“फिलिप” की मृत्यु के बाद 326 ईसा पूर्व में उसका पुत्र अलेक्जेंडर(सिकंदर) “मेसीडोन्या का शासक बना. उसे उत्तराधिकार में एक शक्तिशाली राज्य शक्तिशाली सेना प्राप्त हुई . कुछ समय पश्चात अलेक्जेंडर(सिकंदर) ने अपने पिता के राह पर चलते हुए इरान पर हमला किया और इरान के अपेक्षाकृत कमजोर हो चुके शासक दारा को हरा कर कुछ वर्षों में इरान पर कब्ज़ा कर लिया. इरान के बाद विश्वविजय अभियान का स्वपन देखने वाले अलेक्जेंडर (सिकंदर) ने भारत की ओर अपना रुख किया.
खैर अब विषय पर वापस लौटते हैं की सिकंदर की विजय हुई या पराजय या क्या पोरस सिकंदर से हारा था ? इसके लिए कई आधुनिक भारतीय राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने तथ्य दिए हैं मगर मैकाले के मानस पुत्र इसे ये कह के नकार देंगे की राष्ट्रवाद की भावना से लिखे इतिहास में पोरस की जीत जबरिया सिद्ध की जा रही है. अतः मैंने प्रयास किया है सिकंदर के बारे में लिखने वाले यूनानी और रोमन इतिहासकारों के ही लिखे तथाकथित ग्रंथों से तथ्य ले के ये साबित किया जाए की पोरस,सिकंदर से हारा नहीं था. खैर इस लेख का उद्देश्य ये नहीं की हम ये साबित कर दें की सिकंदर को हमने हरा दिया,प्रमुख उद्देश्य ये है की जो पोरस के हार का झूठ फैलाया गया है उसका तार्किक खंडन हो जाये . सिकंदर जीता या हारा इस पर इस लेख को केन्द्रित करने के स्थान पर मैंने इस लेख में प्रयास किया है ये सिद्ध करने का की “पोरस सिकंदर से नहीं हारा था ”
एक विचित्र तथ्य ये भी है की यदि भारत के परिप्रेक्ष्य में ये युद्ध इतना महत्त्वपूर्ण और बड़ा था तो इसका कोई भारतीय उल्लेख नहीं मिलता है. यूरोपियन लोगो ने भी इन्ही इतिहासकारों के कथन के आधार पर सिकंदर को विजेता घोषित कर दिया. ये तथाकथित इतिहासकार/कहानी लेखक हैं ,
●एरियन(Arrian),
●जस्टिन (justin),
●कर्टियस(curtius Quintus),
●डायोडोरस(Diodorus),
●प्लूटार्क(plutrach).
इनमे से कर्टियस(curtius Quintus) रोमन है बाकी सब यूनानी हैं. एक तथ्य ये भी है की इनमे से कोई भी लेखक सिकंदर का समकालीन लेखक नहीं था.
सिकन्दर के आक्रमण का पहला चरण अश्वको से युद्ध : सिकन्दर ने जब भारत पर आक्रमण किया तो उसका पहला सामना “अश्वक” नामक क्षत्रियों से हुआ जो हिन्दुकुश तथा सिन्धु नदी के मध्य वाले प्रदेश में रहते थे. सिकंदर की गाथा गाने वाले यूनानी इतिहासकारों ने इसे ‘अस्पोई’ (ASSACNI) कहा है. ये लोग पोरस जैसे राजाओं की अपेक्षा कमजोर थे फिर भी इन्होने सिकंदर की सेनाओं को वीरता पूर्वक रोक दिया और लगभग 9 माह तक यहाँ युद्ध रुक रुक कर चलता रहा. सिकंदर ने यहाँ ये खुबसूरत गांवों को तहस नहस कर डाला और नागरिको स्त्रियों बच्चों की हत्याएं की.. नागरिको पर अमानुषिक बर्बर अत्याचार के कारण सिकन्दर के प्रति लोगो की भावना, विद्रोही बन गयी. सिकंदर का अश्वाकों से अंतिम मुकाबला सिन्धु के समीप “ओनस(Aornus)” के दुर्ग में हुआ. सिकंदर की सेना दुर्ग के साथ साथ गांवों में घुसकर भी मारकाट कर रही थी और अश्वक इससे निपटने में असमर्थ थे अतः उन्होंने दुर्ग छोड़ दिया और पहाड़ो में चले गए और सिकंदर ने दुर्ग पर विजय प्राप्त कर ली.
रोमन लेखक कर्टियस के शब्दों में “सिकंदर ने दुर्ग पर विजय प्राप्त की शत्रु पर नहीं”
ओनस(Aornus)के दुर्ग को सिकंदर ने अपने विश्वासपात्र शाशिगुप्त को सौंप दिया जो अफगान राजवंश का था और सिकंदर-पारसी युद्ध में बक्ट्रिया(bactria) में सिकंदर के खिलाफ लड़ा था और सिकंदर की विजय होता देख उससे जा मिला.
लेख के अगले(दूसरे) भाग में तक्षशिला नरेश आम्भी से सिकन्दर की पुरानी मित्रता और पोरस से शत्रुता का झूठ और सिकंदर पोरस युद्ध की सत्यता का विश्लेषण..

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