सोमवार, 7 सितंबर 2015

OROP का इतिहास

#OROP का #इतिहास
आज कल वन रैंक वन पेंशन का बहुत हो हल्ला है लेकिन इस विवाद की नींव किसने रक्खी ये भी जान लीजिये.तथ्य ये बताते हैं की सैनिकों पर इस अत्याचार की नींव कांग्रेस ने रक्खी.कैसे आइये जानते हैं..
सन 1947 में जब देश आजाद हुआ तो तबसे सेना का मनोबल तोड़ने वाले कर्म कांग्रेस ने किये हैं.देश के आजाद होने के तुरंत बाद कांग्रेस ने वेतन का पुनर्निर्धारण किया.चूँकि राजनितिक पार्टियों का कोई अपना सेना में नहीं होता अतः कांग्रेस ने सेना के वेतन में 30% की कटौती कर दी और चूँकि लूट सिविलियन की सहायता से मचानी थी अतः सिविलियन अधिकारियों बाबूओं और ब्यूरोक्रेट्स के वेतन में कोई कटौती नहीं की गयी..
यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है की सिविल अफसर अपना कार्यकाल सामन्यतया पूरा कर लेते हैं जबकि सेना के लोग कभी शहीद होते हैं कभी बम गोलियों से अपंग हो कर रिटायर हो के पेंशन के सहारे घर पर बैठते हैं..
चूँकि सेना के अधिकारी पहले रिटायर होते थे और उनकी तनख्वाह नेहरू ने 30% घटा दी थी अतः रिटायर होने के समय अंतिम आहरित वेतन(LAST DRAWN SALARY) का 70% पेंशन के रूप में दिया गया और सिविलियन ब्यूरोक्रेट्स जिनकी तनख्वाह एक पैसे भी नहीं घटाई गयी थी उनको अंतिम आहरित वेतन का 30% पेंशन दी गयी.. कांग्रेस की सैनिको और सेना की नीति क्या रही है ये आधे से ज्यादा समय बिदेश में बिताने वाले कांग्रेसी रक्षा मंत्री वी के मेनन के संसद और कैबिनेट मीटिंग में दिए गए वक्तव्यों से पता चलता है जिनके अनुसार हमे बार्डर पर सेना रखने कि क्या जरूरत है सेना हटा देनी चाहिए और रक्षा मंत्रालय का बजट घटा देना चाहिये..इन्ही के कार्यकाल में 1962 की जंग हम हारे थे..
बांग्लादेश युद्ध के बाद जब भारतीय सैनिको ने 90 हजार पाकिस्तानियों को आत्मसमर्पण करवाया और पाकिस्तान ने घुटने टेक दिए उस समय सैनिक प्रोत्साहन की उम्मीद कर रहे थे और कांग्रेस ने 1973 में तीसरे वेतन आयोग में एक और बड़ा झटका सैनिको को दिया..ब्यूरोक्रेट्स द्वारा निर्धारित होने वाले वेतन आयोग में सेना और सिविलियन को तथाकथित बराबरी पर लाने के लिए सिविल सेवाकर्मियों की पेंशन 30%से बढ़ाकर 50% कर दी गयी और सेनाकर्मियों की पेंशन 70%से घटकर 50% कर दी गयी.अर्थात कांग्रेस ने दूसरी बार सेना के वेतन और पेंशन में बड़ी कटौती कर दी. ज्ञातव्य हो की आजादी के समय सैनिको का वेतन घटाते समय एवं ब्यूरोक्रेट्स का वेतन वही रक्खा गया था तब कांग्रेस को समानता की याद नहीं आई थी..
अब इसका जब कार्यान्वन हुआ तो जिन सैनिको ने सन 47,62,65,72की लड़ाइयां लड़ी थी उनका वेतन 30% कम हो गया और पेंशन 20% कम हो गया.लड़ाइयों में घायल होकर अपंग होने के कारण समयपूर्व रिटायर होने वालों सैनिको की पेंशन भी 20% घट गयी..और ब्यूरोक्रेट्स तथा सिविलियन जो 60 साल तक बिना किसी खतरे के सरकारी नौकरी करते थे उनका वेतन 20% बढ़ा दिया गया..सैनिको को मिला वन रैंक वन पेंशन का झुनझुना.. जो सैनिक सन 80 में रिटायर हुआ उसकी पेंशन उस समय के हिसाब से मिलती थी और 2010 वाले में उसी पद से रिटायर होने वाले को उससे ज्यादा पेंशन मिलती थी..इसे समान करने के कांग्रेसी आश्वासन के झुनझुने का नाम था OROP वन रैंक वन पेंशन..
इसके बाद सं 72 से सैनिक वो झुनझुना बजा रहे थे..कई वेतन आयोग आये मगर ब्यूरोक्रेटस की जकड़ के कारण हमेशा ब्यूरोक्रेट्स अपने वेतन भत्तों आदि में वृद्धि कर लेते और सेना को इधर उधर करके घुमाते रहते. सरकारे आती रही जाती रही मगर कोई भी इसे चुनावी वादे से ज्यादा आगे नहीं ले जा पाया..वाजपेयी जी के समय कुछ कार्य प्रारम्भ हुआ मगर मंत्रालयों में बैठे आईएएस अधिकारीयों के अड़ंगे के आगे वाजपेयी जी भी इसका समाधान नहीं निकाल पाये.. उसके बाद 10 साल कांग्रेस रही और उसके समय सेना का क्या हाल था हर सैनिक और अधिकारी जानता है..अतः कांग्रेस ने OROP पर कोई सार्थक प्रयास नहीं किया..कांग्रेस ने जले पर मिर्च और नमक लगाया 500 करोड़ रूपये OROP के लिए दे कर क्योंकि 10 हजार करोड़ का खर्च आना था इसमें..अतःअब इस 20 गुना कम धनराशि से कैसे समस्या समाधान हो ये मनमोहन सिंह ही जानते रहे होंगे.
2014 में मोदी सरकार आई जो सेना की हितैषी मानी जाती है और उन्होंने दशको से चली आ रही इस समस्या का समाधान किया..जब मोदी सरकार और सैनिको के प्रतिनिधियों की OROP पर वार्ता हो रही थी उस समय भी ब्यूरोक्रेट्स ने अपनी पूरी ताकत लगा दी थी इसे अटकाने की इसलिए 14 माह का समय लग गया.आग में घी डाल रहे थे सेना प्रतिनिधियों में घुस गए कुछ रंगे सियार..
मगर मोदी ने इसमें व्यक्तिगत रूचि ले कर ब्यूरोक्रेट्स और सेना के प्रतिनिधियों में घुस आये रंगे सियारों को किनारे करकें OROP लागू कर दिया और भारतीय सैनिको को सच्चा सम्मान दिया.. इस प्रकार इस बड़े प्रकरण और समस्या का सकारात्मक समाधान हुआ..
अब एक विचरणीय बिंदु ये है की जंतरमंतर पर भारतीय सेना के पूर्व सैनिको के साथ जो रंगे सियार भी मोदी के विरोध में मोर्चा खोले हुए थे क्या उनकी तोप के गोले कांग्रेस शासन में खत्म हो गए थे??जब कांग्रेस सैनिको की जायज मांगोंपर विचार करने से ही इनकार देती थी उस समय क्या इन सियारों को जंतर मंतर का रास्ता नहीं दिखता था??
अब जब नरेंद्र मोदी ने इस समस्या का समाधान कर दिया उसके बाद भी धरना प्रदर्शन करने के लिए पूर्व सैनिको को उकसाने वाले सियारों को सीधे चुनाव लड़ कर अपनी राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा पूरी करनी चाहिए न की धरना दे कर.....

आशुतोष की कलम से

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आप को ये लेख कैसा लगा अपने विचार यहाँ लिखे..