शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

आधुनिकता की दौड़ में भागता इण्डिया...

#हुक्काबार #इण्डिया #दिल्ली #सशक्तिकरण
परसो शाम दिल्ली में कुतुबमीनार से लौटते समय मित्र Kamal Kumar Singh ने दिल्ली के दिल कनाट प्लेस में एक ब्रेक लिया.दिल्ली के बदलते परिवेश का दर्शन कराने कमल जी ने मुझे पास के एक रेस्टोरेंटनुमा स्थान पर ले गए..स्थान थोडा जाना पहचाना लगा मगर परिवेश बदल गया था..इसी पहले शायद ऐसे स्थान पर अपने एक फ्रेंच अतिथि के साथ आना हुआ था..इतनी सौम्य जगह की क्या कहने.. आकर्षक रात्रि लाइटिंग और उतने ही आकर्षक लोग..खूबसूरती और आधुनिकता ऐसी की यदि इस स्थल का विकास अनवरत ऐसे चलता रहा तो आने वाले समय में खजुराहो का सजीव चित्रण कनाट प्लेस में मिलेगा. ये केजरीवाल जी की बड़ी उपलब्धि होगी यदि ये कार्य अपने कार्यकाल में पूरा करा लें..संघी राज्य मध्य प्रदेश का टूरिज्म रेवेन्यू दिल्ली आएगा..थोड़ी देर बाद कुछ खाने पीने हेतु आर्डर किया और इधर उधर नजर दौड़ाई तो लगा 22वी सदी में हरियाणा का कोई गाँव है.. सामने की खूबसूरत मेज पर आकर्षक सी दिखने वाली एक महिला और हाथ में एक पाइप जिसका एक सिरा उनके मुह में दूसरा एक उपकरण में लगा हुआ था..समझ में आ गया की इण्डिया का विकास और नारी सशक्तिकरण हो रहा था..वो मोहतरमा हुक्का पी रही थीं..साथ में एक महोदय भी थे जो समय समय पर उस हुक्के से कश लगा कर शायद आँखों से ही ये कहना चाहते थे की 20वी सदी में इस हुक्के पर हमारा एकाधिकार था. रोम रोम आहलादित कर देने वाले इस दृश्य ने मुझे इसका एहसास कराया आधुनिक इण्डिया और प्रोग्रेसिव नारी का..क्या हुआ हुक्का पीने से उसके पेट में पल रहे बच्चे के फेफड़े में संक्रमण की संभावना है...बात यहाँ पुरुष महिला समानता की है.. यदि सैकड़ो साल में हुक्के को पुरुष ने नहीं त्यागा तो आज महिला भी उसके बराबर है, धुवां उड़ाने का अधिकार उसका भी उतना ही है. इण्डिया के इस सम्मोहित करने वाले दृश्य से नजर दूसरी और की तो "बड़की बिंदी" कम्युनिष्ट टाइप एक महिला अपने ग्लास में आईस क्यूब का आर्डर करती दिखी..बड़े से लाल रंग की बिंदी और ग्लास के अंदर की दारु के लाल रंग के ग़जब के कलर कॉम्बिनेशन के सौंदर्य पर मेरे जैसा कविहृदय व्यक्ति हाथ पोछने वाली नैपकिन पर कविता लिखना शुरू ही करने वाला था की ग्लास में घुलती सफ़ेद बर्फ ने एहसास कराया की ये जो ग्लास में घुल रहा है,वो बर्फ नहीं पुरुषों का आधिपत्य है और दारु और बिंदी का कॉम्बिनेशन आज के इण्डिया के नारी के एक वर्ग का "सशक्तिकरण चिन्ह" है...ये लोग "प्रोग्रेसिव" है जो हुक्के और दारु की आधुनिकता के थ्रेशहोल्ड पर हैं  और हम और हमारा परिवेश आज तक कंजरवेटिव ही रह गए जो 'गजरे और जूड़े' पर अटके  है..खैर अब इस आधुनिक इण्डिया से निकलने की बारी थी... बिहार के एक सिन्हा साहब मैनेजर हैं यहाँ.बड़े भले आदमी.लड़का लड़की हुक्का पीते पीते आपसी सहमति से आधुनिकता के चरमोत्कर्ष तक भी पहुच जाए तो भी सिन्हा साहब आँखे फेर कर आधुनिक  सुनामी के शांत होने की प्रतीक्षा करते हैं.
हमने जब अपना बिल देखा तो नीचे की दो लाइनों में अपने सर जी केजरीवाल सर याद आ गए. केजरीवाल जी आने वाले दिनों में जीते जी हमारे ह्रदय में अमर हो जाएंगे जब जब लोग VAT वाली लाइन पढ़ेंगे दिल्ली के विकास और सर जी पर उन्हें गर्व होगा..खैर अब दिल्ली में हो तो सर जी को चन्दा देना ही पड़ेगा..बिल में बढे हुए VAT के रूप में हमने भी दिया और आधुनिक इण्डिया से विदा ली...वो लड़का लड़की तीसरी बार हुक्का मंगा चुके थे..बिंदी वाली खूबसूरती, सुरा और घुल चुकी आइस क्यूब के प्रभाव से और सुर्ख हो चुकी थी...एक म्यूजिक चल रहा था जो एल्बम The Shadows- "Return to the Alamo" का था..कभी मौका लगे तो सुनियेगा..पता चलेगा "अकेले हैं तो क्या गम है के ..संगीतकार आंनद मिलिंद ने ये इण्डिया 20 साल पहले ही घूम लिया था...इसलिए ये धुन हूबहू कॉपी करके आधुनिक इण्डिया का झंडा बनाये रक्खा है...
चलते चलते मेरी और कमल भाई की इस फ़ोटो का श्रेय बार के मैनेजर सिन्हा साहब को जाता है.....

जय श्री राम

आशुतोष की कलम से

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