शनिवार, 13 जून 2015

नरेंद्र मोदी की बांग्लादेश यात्रा और भारत बांग्लादेश सीमा समझौता (indo bangladesh border agreement)

#भारत_बांग्लादेश_सीमासमझौता  
नरेद्र मोदी का बांग्लादेश दौरा,ऐतिहासिक सीमा समझौता- इतिहास के पन्नो को टटोले तो बांग्लादेश की किस्मत को मुग़ल काल के राजाओं ने शतरंज के खेल की बाजियों में सिमित कर के रख दिया था.हकीकत ये है की मुगलकाल में एक रियासत थी कूचबिहारऔर उसका सीमावर्ती राज्य था रंगपुर. कूचबिहार का राजा और रंगपुर का नबाब दोनों शतरंज के खेल के शौक़ीन थे. जब भी कूचबिहारके राजा और रंगपुर के नबाब में शतरंज की बाजी लगती वो दांव पर अपने अपने रियासत के एक गांव लगाते थे. कई सालो बाद इस शतरंज के खेल ने उन रियासतों का भूगोल बदल के रख दिया. अब कूचबिहारके राजा द्वारा जीते गए कई गाँव रंगपुर की सीमा थे और रंगपुर के नबाब द्वारा जीते गए कई गाँव कूचबिहारकी सीमा में थे.

जब भारत आजाद हुआ तो कूचबिहारभारत में और रंगपुर पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में शामिल हो गया. कालांतर में हिन्दुस्थान के सहयोग से बांग्लादेश बना और भारत बांग्लादेश सीमा का निर्धारण हुआ. अब समस्या पुनः उसी प्रकार रह गयी की रंगपुर (जो बांग्लादेश के हिस्से में आया ) के राजा द्वारा जिते हुए गांव जिन पर बांग्लादेश का अधिकार था वो गाँव भारत की सीमा के अन्दर आ गए और वो गाँव चारो ओर से भारत से घिरे थे.इन्हें वर्तमान में बांग्लादेशी इन्क्लेवकहा गया. ठीक इसी प्रकार कूचविहार(जो भारत के हिस्से में आया ) के राजा द्वारा जीते गांव जिनपर भारत का अधिकार था, वो बांग्लादेश की सीमा के अन्दर आ गए और चारो ओर से वो बांग्लादेशी गांवों से घिर गए थे.बांग्लादेश की सीमा के अन्दर इन भारतीय अधिकार के क्षेत्रों को भारतीय इन्क्लेवकहा गया . जबसे बांग्लादेश बना सीमा निर्धारण में दोनों तरफ के ये गाँव समस्या बने हुए थे इसलिए भारत बांग्लादेश बार्डर पर उस क्षेत्र में फेंसिंग(बाड़ लगाने का कार्य) हो नहीं पाता था और सीमा को PORAS BORDER(छिद्रित सीमा) कहा जाता था. अब न तो भारत के लिए संभव था की बांग्लादेश से चारो ओर से घिरे हुए भारतीय इन्क्लेवमें सड़क बिजली पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी पंहुचा पाए और बांग्लादेश इस नाम पर उन क्षेत्रों में कुछ नहीं कर सकता था की वो भारत के क्षेत्र हैं. ठीक इसी प्रकार बांग्लादेश के लिए संभव नहीं था की भारत से चारो ओर से घिरे हुए बांग्लादेशी इन्क्लेवमें सड़क बिजली पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं भी पंहुचा पाए और भारत इस नाम पर उन क्षेत्रों में कुछ नहीं कर सकता था क्यूकी वो बांग्लादेश के अधिकार क्षेत्र हैं।
यहीं से घुसपैठ और सीमा पर गोलाबारी का क्रम शुरू होता था. भारत के क्षेत्र में जो बांग्लादेशी इन्क्लेवथे उन में न तो बिजली थी न सडक न पानी न पुलिस न कानून. सारे अवैध धंधे और आतंकवाद के अड्डे भारत की सीमा में चल रहे हैं और भारतीय पुलिस और सेना सामने देखते हुए हाथ पर हाथ धरे हुए थी क्यूकी वो बांग्लादेशी क्षेत्र है,उसमें नहीं जाया जा सकता है. अवैध बांग्लादेशी घुसपैठीयों ने इन बांग्लादेशी इन्क्लेव को लांचिंग सेंटर बना रक्खा था और यहीं से वो घुसपैठ कर जाते थे. नकली नोटों की फैक्ट्री खुलेआम चलती थी क्युकी भारतीय सेना या प्रशासन कुछ नहीं कर सकता पडोसी देश के क्षेत्र में. उधर बांग्लादेश में भारतीय एन्क्लेव में रहने वाले भारतीयों की दुर्दशा भी थी.बांग्लादेश उन्हें अपना मानेगा नहीं और भारत वहां तक पहुच नहीं सकता हर साल इन भारतीय इन्क्लेवो एवं बंगलादेशी इन्क्लेवो के नागरिक कई सौ की संख्या में या तो बांग्लादेश राइफल्स या भारतीय सेना के हाथो,इस बार्डर के सीमांकन के संशय में मारे जाते थे. जिस किसी भी देश की सेना ने सीमा पार करते अवैध नागरिक को देखा वो उसे गोली मार देती थी और सुविधाओं के आभाव में ये नागरिक सीमा पार मज़बूरी में करते थे . इन क्षेत्रों में रहने वाले को यदि दाल या चीनी खरीदने बगल की दुकान में जाना हो तो पासपोर्ट और वीजा चाहिए...
एक तरीके से देखें तो इन सभी इन्क्लेववासियों के लिए पहचान का संकट था की वो भारत में रहते हुए भारतीय नहीं हैं और कुछ बांग्लादेश में रहते हुए बांग्लादेशी नहीं हैं. ये विवाद बांग्लादेश बनने के समय भी ऐसे ही रह गया . इंदिरा गाँधी ने शेख मुजीब के साथ सन १९७४ में ही समझौता किया मगर विभिन्न कारणों से भारत के संसद की मुहर नहीं लग पायी.मनमोहन सिंह सरकार ने इस विवाद के निपटारे के लिए इन इन्क्लेवों के अदला बदली के प्रस्ताव पर कुछ कार्य किया परन्तु पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रबल विरोध,घुसपैठ रोकने के मुद्दों पर विपक्ष की असहमति एवं सोनिया गाँधी के ऊपर अतिनिर्भरता के कारण मनमोहन सिंह इतने बड़े ऐतिहासिक फैसले को चाहते हुए भी नहीं अमल कर पाए जिसे नरेंद्र मोदी के सशक्त नेतृत्व ने दोनों देशों के पक्ष और विपक्ष दोनों को साथ ले कर कर दिखाया. समझौते के अंतर्गत बांग्लादेश की सीमा पड़ने वाले सभी 111 भारतीय इन्क्लेव बांग्लादेश के हो जायेंगे और भारत की सीमा में पड़ने वाले 51 बंगलादेशी इन्क्लेव भारतीय क्षेत्र के हो जायेंगे..
भारत के लिए क्यू जरुरी था ये समझौता : भारत सरकार की सबसे बड़ी समस्या अवैध बंगलादेशी थे जो हर रोज स्थानीय सहयोग और सीमा के पोरस होने के कारण ट्रको से भर के आ जाते थे और भारत में जनसँख्या असंतुलन पैदा कर रहे थे. मोदी ने चुनावों में भी ये मुद्दा उठाया था. अब भारत सरकार के लिए सीमांकन बिलकुल स्पष्ट हो गया और इन 51 इन्क्लेवों में चलने वाले आतंवाद के अड्डे, घुसपैठ के सेंटर,नकली नोट की फैक्ट्री को भारतीय सेना घुस कर आसानी से बंद करा सकती है और हर साल होंने वाली लाखों बांग्लादेशी घुसपैठ ख़तम हो जाएगी. पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी आतंकियों का सफाया अब भारत सरकार के हाथ में होगा.अब ऐसा संभव नहीं की कोई भारतीय क्षेत्र में बम फोड़कर, मर्डर,लूट या बलात्कार करके बगल के गांव में भाग जाए और पूरी भारतीय सेना और सुरक्षा एजेंसिया हाथ पे हाथ धरे रहें क्यूकी वो बांग्लादेशी इन्क्लेव में भाग गया है..शायद इसीलिए इस समझौते को बर्लिन की दिवार गिरनेजैसा माना जा रहा है और वास्तव में ये कहीं उससे भी बड़ा समझौता है.. कई अपरिपक्व आलोचक आलोचना का मुद्दा भारतीय इन्क्लेव के क्षेत्र को बना रहे हैं की भारत को कम भूमि मिली परन्तु एक तथ्य ये भी है की सामरिक दृष्टी से भारत अत्यंत ही शक्तिशाली होगा. पूर्व में कई सरकारों ने सीमा पर भूमि के छोटे स्तर पर कई लेन-देन सीमा पर किये समझौते के बदले ही बांग्लादेश ने चीन द्वारा बनाये गये दो बंदरगाह भारत को सौप दिए जो की सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
आशुतोष की कलम से

अगले लेख में: बांग्लादेश के लिए क्यों जरुरी था ये समझौता और भारत को अपेक्षाकृत कम जमीन मिलने की भरपाई और किस प्रकार से की गई है ।


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