बुधवार, 30 दिसंबर 2015

नोबल का मच्छर और राजीव गांधी (Sri Lankan Civil War)

क्या आप जानते हैं जब 2000 भारतीय सैनिको की हत्या कांग्रेस के नोबल के कीड़े ने कर दी??आप सभी ने सुना होगा की राजीव गांधी की हत्या लिट्टे के उग्रवादियों ने कर दी थी..मगर मोहनदास करमचंद गांधी की हत्या तरह ये कम ही लोग जान पाये की राजीव गांधी की हत्या क्यों की गयी?? श्रीलंका में लिट्टे
दो दिन पहले एक कांग्रेसी नेता मनीष तिवारी ने "नोबल का मच्छर" नरेंद्र मोदी  की पाक यात्रा के लिए उपयोग किया तो राजीव गांधी जी याद आ गए..
अंग्रेजो के जमाने में तमिलो की एक बडी सख्या श्रीलंका(सीलोन) के चायबगानो में नौकरों के रूप में कार्यकरने ले जाई गयी जो कालान्तर में वहीँ बस गयी. वहां का सबसे बड़ी जनसंख्या वाला समुदाय सिंहली था। 1948 में स्वतंत्रता के बाद श्रीलंका में तमिलो को नागरिकता के अधिकार से वंचित कर दिया गया क्योंकि वो भारत से आ के बसे थे. बाद में बने कानूनों के अनुसार भारतीय मूल के तमिल श्रीलंका में जहां वो सदियो पहले आ के बस गए थे दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में थे जैसे वर्तमान में पाकिस्तानी हिंदुओं का हाल है..विरोध हुआ.अत्याचार हुआ.. तमिलो के विरोध में दंगे हुए हजारो तमिल मारे गए..और तमिलो की पार्टी पर प्रतिबन्ध लगा के तमिलों के गृहभूमि पूर्वी प्रान्त में सिंहलियों को बसा दिया गया..श्रीलंका के तमिलो पर भारत आने या आके पढाई करने पर प्रतिबन्ध लगाया गया..भारत के अखबार, पत्रिकाएंश्रीलंका में प्रतिबंधित कर दिए गए..तमिलो को स्कूलों कॉलेजों में दाखिल नहीं मिलता था. तमिलों की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले जाफना में तमिल प्रतीकों पुस्तकालयों को आग लगा दी गयी..
परिणामस्वरूप अपने ही देश में दोयम दर्जे के नागरिक हो चुके तमिलो ने छोटे छोटे समूहों में सशत्र विद्रोह कर दिया. उसके बाद पुरे देश में तमिल विरोधी भावनाएं बढ़ गयी और सडको पर तमिलों का कत्लेआम और नरसंहार होने लगा..सरकार और तमिलो दोनों का खून बहा और कालान्तर में पीड़ित शोषित तमिल समुदाय को "वेलुपिल्लई प्रभाकरण" नाम के विद्रोही नेता नेें सभी तमिल विद्रोही समूहों को एक बैनर के नीचे ला के "LTTE"(Liberation Tigers of Tamil Eelam) बना के अलग तमिल इलम की मांग करते हुए युद्ध शुरू कर दिया और श्रीलंका के कई क्षेत्रों में कब्ज़ा कर लिया..उनकी अपनी सेना..अपने हथियार..अपने विमान सब थे..
चूकी श्रीलंका सरकार श्रीलंका के तमिलों के नरसंहार और दमन पर लगी थी इसलिए श्रीलंका से सटे भारत में बसे तमिल इसका विरोध करने लगे..तात्कालिक राजीव गांधी कांग्रेस सरकार ने मौके की नजाकत भांपते हुए लिट्टे और प्रभाकरण का परोक्ष समर्थन कर दिया जिससे की तमिलनाडु में कांग्रेस का वोट बैंक मजबूत हो जाये.भारतीय सेना ने तमिलनाडु के जंगलों में बकायदा ट्रेनिंग कैम्प लगा के प्रभाकरण और लिट्टे के लड़ाकों को
सैनिक ट्रेनिंग,हथियार और पैसे उपलब्ध कराये..इससे तमिलनाडु में लिट्टे की जड़ और मजबूत ही गयी..लिट्टे का प्रमुख प्रभाकरण नई दिल्ली में राजीव गांधी का ख़ास मेहमान हुआ करता था जिसकी कांग्रेस सरकार राजकीय मेहमान की तरह आवभगत करती थी..अब श्रीलंका सरकार भी चाहती थी की लिट्टे के बढ़ते प्रभाव के कारण श्रीलंका टूट सकता है अतः कोई समझौता किया जाये इसमें भारत प्रमुख भूमिका अदा करता..
इसी समय सन 1987 में भारत के #कांग्रेसी #प्रधानमंत्री #राजीव_गांधी को #नोबल_के_मच्छर ने काट खाया और #शांति_के_नोबल पाने के चक्कर में राजीव गांधी ने #ऐतिहासिक_भूल करते हुए श्रीलंका सरकार और अन्य छोटे छोटे श्रीलंकाई तमिल समूहों के साथ समझौता कर डाला और भारत की सेना को शांति स्थापित करने के लिए श्रीलंका भेज दिया..सबसे आश्चर्यजनक ये था की सबसे बड़े LTTE समूह, जिसके स्वयं के सेना से लेकर हवाईजहाज तक थे,जिसे भारतीय सेना से ट्रेनिंग और हथियार मिले,जिसे राजीव गांधी सरकार ने पैसे दिए,और जिसका प्रमुख प्रभाकरण भारतीय सरकार का राजकीय मेहमान था उसे इसे समझौते से अलग और किनारे रक्खा गया.. मतलब जो समझौता हुआ वो सिर्फ नाम का हुआ और जो शांति के नाम पर भारत की सेना वहां भेजी गयी थी उसका असली काम वहां जा कर श्रीलंका के अनजान अपरिचित जंगलों में लिट्टे और प्रभाकरण के उन सैनिको से युद्ध करना था जिन्हें ट्रेनिंग भी उन्होंने ही दी थी,जिनके वास हथियार भी भारतीय सेना के थे जिनके पास स्ट्रेटेजी भी भारतीय सेना की थी...
अब श्रीलंका में भारतीय सेना को उनके द्वारा ट्रैंड लड़ाके,उनके द्वारा ही दिए हथियार से अपने जंगलो में चुन चुन कर मार रहे थे और #राजीव #गांधी जी नोबल शांति पुरस्कार की प्रतीक्षा में लगे रहे..
उस समय सेना में एक बात प्रचलित थी की इन्डियन एयर फ़ोर्स या एयर इण्डिया के जिस विमान से लिट्टे और प्रभाकरण से लड़ने के लिए भारतीय सैनिक और हथियार भेजे जाते थे उसी विमान से LTTE और प्रभाकरण के लिए भी हथियारों का बक्सा भेजा जाता था.
2000 से ज्यादा भारतीय सैनिक राजीव गांधी के असफल नोबल पुरस्कार अभियान में मारे गए।।अंततः रोज सैनिको की मौत के कारण सेना और जनता के दबाव में श्रीलंका से भारतीय सेना 1990 में वापस बुला ली गयी...सरकारी आकड़ो में 1255 सैनिको की मौत दर्ज की गई..लिट्टे का भी नुक्सान हुआ और श्रीलंका इस कूटनीतिक नोबल कामयाबी पर प्रसन्न था..21 मई 1991 को श्रीपेरुंबुदुरकी रैली में धनु नामक लिट्टे की एक आत्मघाती हमलावर ने राजीव गांधी की हत्या कर दी और नोबल के इस मच्छर ने एक प्रधानमंत्री को मार डाला...
इसके बाद प्रभाकरण और श्रीलंका सेना में युद्ध चलता रहा.. सन 2009 में अप्रैल के महीने में एल टापू पर लिट्टे प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण को घेर लिया गया।उसी समय भारत में लोकसकभा चुनाव हो रहे थे। प्रतीक्षा इस बात की थी की यदि राष्ट्रवादी भाजपा की सरकार बनती है तो प्रभाकरण को राजनैतिक अपराधी माना जायेगा और कांग्रेस की सरकार बनी तो गांधी परिवार के दुश्मन को सजा दी जायेगी..16 मई 2009 को भारत में चुनाव परिणाम घोषित हुए..भाजपा चुनाव हार गयी..कांग्रेस की सत्ता वापस आई. नतीजे आने के 24 घंटे के अंदर कांग्रेस और भारतीय सरकार की हरी झंडी मिलते ही 17 मई 2009 को भारतीय तमिलो के अधिकारो के लिए आजीवन लड़ने वाले "वेणुपिल्लई प्रभाकरण" के सर में गोली मार कर उसकी हत्या कर दी गयी...
प्रभाकरण के मरने के बाद भारतीय तमिलो पर जो अत्याचार शुरू हुआ उसे मानवता के सबसे बड़े अत्याचारों में एक माना जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी कई बार इसपर हस्तक्षेप किया..मगर नरसंहार और तमिलो का दमन जारी रहा....
यदि एक #शांति_के_नोबल वाले मच्छर ने राजीव गांधी को नहीं काटा होता तो आज श्रीलंका ने जो चीन को हम्बनटोटा बंदरगाह देकर हमे घेरने में सहायता की है वो नहीं होता..शायद 2 हजार से ज्यादा भारतीय सैनिक नहीं मरते..उनके बच्चे अनाथ नहीं होते..उनकी स्त्रियां विधवा नहीं होती... शायद एक स्वतंत्र तमिल ईलम प्रभाकरण के नेतृत्व में भारत का मित्र राष्ट्र होता..शायद राजीव जिन्दा होते.. शायद लाखो तमिलों की बर्बर हत्या नहीं हुई रहती......

आशुतोष की कलम से
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शनिवार, 19 दिसंबर 2015

बलात्कारी अफरोज की रिहाई और केजरीवाल सरकार का बलात्कार का इनाम

दिल्ली में दिसंबर 2012 में एक लड़की का बलात्कार हुआ था और उसके बाद लोहे की सरिया उसके अंगो में डालकर तड़पा तड़पा कर हत्या की गयी थी.. उस लड़की काल्पनिक नाम "निर्भया" रखा गया। महीनो तक हल्ला हुआ कानून बना कैंडिल जलायी गयी..दरिंदो की की गिरफ़्तारी हुई..इसमें से एक दरिंदा अफरोज 18 साल से कम का था,इस ने दीदी बोलकर सबसे पहले लड़की को बस में बिठाया फिर सामूहिक बलात्कार के बाद निर्भया के विभिन्न अंगो में लोहे की राड डालकर उसकी वीभत्स हत्या की। कम उम्र होने के कारण
कानून ने उसे 3 साल बालसुधार गृह में भेजा और उसने दूध पीकर कैरम खेलते खेलते 3 साल काट लिए. अब कानून के अनुसार उसने अपनी सजा काट ली है परन्तु इस दरिन्दे को रिहा करना क्या सभी समाज के लिए उपयुक्त होगा ?? क्या ऐसा संभव नहीं की ये दरिंदा दोबारा किसी महिला को इसी प्रकार की वीभत्स मौत दे? क्या इसकी संभावना नहीं की दरिंदा अफरोज दोबारा किसी लड़की को दीदी कहके उसका बलात्कार कर दे ??
ऐसे कई संशय है जिससे वर्तमान केंद्र सरकार भी सहमत है इसी कड़ी में मोदीसरकार कोर्ट से ये कह रही है की ये लड़का और खतरनाक होकर किसी और की बहन या बिटिया को निर्भया की तरह तड़पा तड़पा के मार सकता है अतः इसे किसी अच्छे NGO की निगरानी में रक्खा जाये खुला न छोड़ दिया जाए. हालाकि कोर्ट ने कानून का हवाला  देते हुए उसे रिहा करने का आदेश दिया है..आखिरी उम्मीद राष्ट्रपति या सुप्रीम कोर्ट से है,जिसकी संभावना कम है ..
यदि इस दरिन्दे अफरोज ने खुद के 18 साल से थोडा कम होने के कारण क़ानून का फायदा  उठा के अपनी रिहाई का रास्ता बना लिया है तो क्यों न सरकार इसकी तस्वीर और पहचान सार्वजनिक कर दे जिससे फिर कोई निर्भया अफरोज की हवस और हैवानियत का शिकार न होने पाए..दूसरी ओर सबसे दुखद ये है की अरविन्द केजरीवाल ने अब उस राक्षस को खुला छोड़ने के साथ साथ उसे 10000 रूपये तथा सभी आवश्यक सहायता देने की घोषणा की है..क्या अफरोज जैसे बलात्कारी को पैसे देकर हमारी बेटियों महिलाओं की सुरक्षा होगी??  ये वोट वोट बैंक की राजनीति अब कितना और गिराएगी हमारे राज नेताओं को ??? ईश्वर न करें मगर निर्भया की जगह अरविन्द केजरीवाल जी की  अपनी बिटिया होती तो भी वोट पाने के लिए ऐसा ही करते??
दुखद है मगर आज का सत्य यही है की 20 दिसंबर को अफरोज रिहा हो जायेगा और हर छोटी छोटी बात पर भारत के प्रधानमंत्री की अवहेलना करने वाली गाली देनी वाली केजरीवाल सरकार निर्भया के बलात्कारी अफरोज  पैसे रूपये से लेकर हर आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने को प्रतिबद्ध है.. .

आशुतोष की कलम से

                                                                  (केजरीवाल सरकार देगी बलात्कारी अफरोज को 10,000 रूपये) 

रविवार, 29 नवंबर 2015

कश्मीरी हिन्दू जनसंहार एवं विस्थापन-आधुनिक इस्लामिक असहिष्णुता का अमिट हस्ताक्षर

ये पोस्ट सहिष्णुता और भाईचारे का हल्ला मचाने वालो सभी बुद्धिजीवियों को समर्पित है..आप में से ज्यादातर कश्मीर में मुस्लिम आतंकवादियों द्वारा किये जनसंहार से अवगत होंगे फिर भी सहिष्णुता का तकाजा है की कुछ प्रकाश डाला जाये...

कश्मीर पहले एक हिन्दू बहुल राज्य हुआ करता था कालान्तर में यहाँ इस्लाम के अनुयायियों ने अपनी जनसँख्या बढ़ानी शुरू की और हिन्दू सर्व धर्म समभाव वाली सहिष्णुता का ढोल नगाड़े पिटता रहा..आजादी के पहले से ही इस्लामिक बर्बरता का शिकार यहाँ के हिन्दू रहे थे..इस पर विस्तृत लेख मैंने अपने ब्लॉग (आशुतोष की कलम से) पर डाला था जिसे रिपोर्ट के कारण हटा दिया गया..
आजादी के समय जो बलात्कार और हत्याए हिंदुओं की की गयी उसे लिखूं तो देश में असहिष्णुता की सुनामी आ जायेगी अतः सीधे मुद्दे पर आता हूँ।आजादी के बाद से ही इस्लामिक जेहादियों द्वारा सन्1981 तक कश्मीरी हिंदुओं पर अत्यचार किया जाता रहा और धीरे धीरे वहां 5% हिन्दू बच गए..
अब जेहादियों ने सन 1989 में ये फरमान जारी कर दिया की जो भी मुसलमान नहीं है वो "काफ़िर" है..या तो मुसलमान बनो या कश्मीर छोड़ दो..अपनी वर्षो की कमाई से बनाये मकान और पुरखो का धर्म और जमीन कौन छोड़ता है..वहां बचे हिंदुओं ने सन 1989 में मुसलमान बनने और कश्मीर छोड़ने दोनों से इनकार कर दिया..परिणामस्वरूप जेहादियों ने चुन चुन कर कश्मीरी हिंदुओं को मारना शुरू किया जिसकी कुछ झलकियों से रूह काँप उठेगी..जम्मू में बसे कुछ परिवारों से मैंने बात की जिसकी भयावहता की कहानी सुनकर आप की आत्मा काँप जायेगी और शायद आप सहिष्णुता छोड़कर हथियार उठा कर जेहादियों के सफाये में लग जाये..
इस्लामिक जेहादियों ने लोगो को घर से निकाल कर चौराहे पर गोली मार दी..(1989)
जिन हिंदुओं ने कश्मीर नहीं छोड़ा उनके स्कूल जा रहे बच्चों को कई हिस्सों में काट कर उनके टुकड़े कश्मीर घाँटी के चौराहे पर लटका दिए गए।।(1989)
दो तीन साल की हिन्दू बच्चियों का सामूहिक बलात्कार किया गया और उनकी लाश बंदूक के नोक पर पूरे इलाके में इस्लामिक जेहादियों ने लहराया..(1989-90)
एक घटना के बारे में कश्मीरी पंडित और अभिनेता अनुपम खेर कहते हैं की उनकी मामी के घर मुस्लिम  जेहादियों का नोटिस आया की मुसलमान तो तुम लोग बने नहीं अब या तो कश्मीर छोड़ दो या मरने को तैयार रहो..उन लोगो ने धमकियों पर ध्यान नहीं दिया और धमकी के तीसरे या चौथे दिन उनक एक हिन्दू पडोसी का कटा हुआ सर उनके आँगन में आ के गिरा..इस दृश्य से,उनके पूरे परिवार ने जो सामान उनकी फिएट कार में आ सका,भर के कश्मीर छोड़ दिया।इस घटना के सदमे से अनुपम खेर की मामी आज भी मानसिक रूप से थोड़ी विक्षिप्त हैं..
ऐसे कितनी घटनाएं हुई जिनके बारे में पढ़कर आप की रूह कॉपी जाती है तो सोचिये उस पिता का दर्द जिसके सामने उसकी साल  की बच्ची का इस्लामिक जेहादियों ने बलात्कार किया होगा और पूरे परिवार को मार डाला होगा..
सरकारी आंकड़ो के अनुसार 1990 में लगभग लाख कश्मीरी हिंदुओं ने कश्मीर छोड़ दिया और उनके मकानों पर वहां के स्थानीय मुसलमान जेहादियों ने कब्ज़ा जमा लिया जो आज तक है.. आज वो सभी परिवार जिनका कभी अपना घर था व्यवसाय था आज दिल्ली और जम्मू में बने शरणार्थी कैंपो में 25 सालो से रह रहे हैं..और उनके घरो में मुसलमान जेहादी काबिज हैं... 
अब मेरा प्रश्न उन सभी लोगो से हैं जो पुरस्कार लौटना,असहिष्णुता का नाटक कर रहे हैं??क्या इस जनसंहार से  बड़ी असहिष्णुता इस देश में हुई होगी आज तक??और तो और कुछ हरामी ऐसे भी थे जो इस नरसंहार के समय ही पुरस्कार ले रहे थे तब इन्हें ये देश असहिष्णु नही लगा और आज ये देश को रहने लायक नहीं पा रहे..
दरअसल ये नरेंद्र मोदी और हिंदुओं का विरोध है,क्योंकि अभी मोदी सरकार ने इन लोगो को कश्मीर में अलग टाउनशिप बनाने की बात की तो ये कांग्रेसीआतंकवादियों के सुर में सुर मिलाते पाये गएकी अलग से मकान नहीं दिया जायेगा रहना हो तो उन्ही राक्षस मुस्लिम जेहादियों के साथ रहे जिन्होंने इनकी बेटियों का बलात्कार एवं बच्चों को काट के चैराहे पर लटकाया था..
बस ये समझ लीजिये जिस देश में 80% हिन्दू हैं और इस्लामिक जेहादियों के इतने घृणित अत्याचारो के बाद भी मुसलमान सुरक्षित हैं और वो अपनी जनसँख्या बढ़ा पा रहे हैं तो समझना होगा की "हिन्दुस्थान" से बड़ा सहिष्णु देश विश्व में कोई नहीं है वरना अमेरिका जैसे देश में 9/11 के बाद टोपी और दाढ़ी देखकर स्थानीय जनता ने कार्यवाही की थी और आज तक कर रही है....
नोट: लेख में लिखी सारी बातें सत्य हैं यदि संशय हो तो गूगल पर चेक करें या किसी भुक्तभोगी हिन्दू से मिलें..पोस्ट का उद्देश्य किसी धर्म की बुराई नहीं मगर सत्यता को सामने लाना है जिसे शायद आज की युवा पीढ़ी अब तक जानती नहीं है या मानती नहीं है..
एक आखिरी प्रश्न उनसे जो "आतंकवाद का मजहब" नहीं होता का ज्ञान झाड़ते हैं..क्या ये संभव है क्षेत्र से लाख से ज्यादा लोगो को बेघर मुट्ठी भर "भटके हुए नौजवान" कर पाये जब तक इस सामूहिक नरसंहार और विस्थापन में एक पूरी कौम न लगी हो????
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बुधवार, 25 नवंबर 2015

बौधिक जेहाद के नये पैगम्बर आमिरखान का चरित्र बताती उसकी अवैध संतान "जान"


जून 1998 में आमिर खान की एक फ़िल्म आई थी "गुलाम". फ़िल्म के सेट पर आमिर खान की मुलाक़ात "जेसिका हाइंस्" नाम की लेखिका से हुई.इसी महिला ने अमिताभ की बायोग्राफी भी लिखी थी। धीरे धीरे आमिर ने इस बिदेशी महिला को फ़िल्मी दुनिया का चकाचौध दिखाकर अपने ऐय्याशी के लिए प्रयोग करना शुरू कर दिया। उसके बाद आमिर ने जेसिका को प्यार के झांसे में फसा कर "लिव इन" व्यवस्था के अंतर्गत अपने वासना पूर्ति का स्थायी साधन बना लिया..समय बीतता गया और एक दिन जेसिका ने आमिर को बताया की वो गर्भवती है अर्थात आमिर खान के बच्चे की माँ बनने वाली है और आमिर से विवाह का प्रस्ताव रक्खा तो आमिर ने सबसे पहले उस महिला पर "एबॉर्शन" यानि गर्भपात कराने का दबाव बनाया मगर जब उस महिला ने बच्चे की "भ्रूणहत्या" करने से मना कर दिया तो आमिर को गर्भवती महिला के साथ रहने और उसे स्वीकारने में अपनी अय्याशी में खलल पड़ता दिखा तो उसने महिला को पहले किसी बहाने लन्दन भेजा फिर इण्डिया से खबर भिजवा दी की या तो बच्चे की "भ्रूणहत्या" करो या सारे सम्बन्ध भूल जाओ. उस महिला ने उस बच्चे को जन्म देने का निर्णय लिया और आमिर और जेसिका हाइंस के अवैध सम्बन्ध का परिणाम के रूप में एक बालक का जन्म हुआ जिसका नाम "जान" है..
सन 2005 में जेसिका ने बच्चे को उसका हक़ दिलाने का प्रयास किया मामला टीवी मिडिया में छाया रहा मगर आमिर खान ने ऊपर तक पहुँच और पैसे के बल पर मामला दब गया और सलटा लिया गया..आज आमिर का वो लड़का लगभग 12 साल का है और मॉडलिंग करता है..
मैंने जेहादी आमिर का "सत्यमेव जयते" आज तक नहीं देखा मगर इसने भ्रूणहत्या पर जरूर कार्यक्रम किया होगा ऐसी आशा है..आखिर ऐसी दोगलपंथी की अपने बच्चे तक को न स्वीकारो??? आज आमिर को भारत में ‪#‎असहिष्णुता‬ दिख रही है क्या अपने बच्चे को माँ के पेट में ही मारने का कुत्सित प्रयास सहिष्णुता माना जाये..ये तो एक केस है ऐसे पता नहीं कितने "जान" आमिर की ऐय्याशी के कारण विश्व के किसी कोने में किराए के बाप की तलाश में होंगे। इसी आमिर खान ने अपने बड़े मानसिक रूप से अस्वस्थ भाई और अभिनेता "फैजल खान" को आमिर ने अपने घर में जबरिया बंधक बना के रक्खा था और आमिर के पिता के कोर्ट जाने के बाद कोर्ट के आदेश पर आमिर के पिता को फैजल खान की कस्टडी मिली..
खैर ये तो है इस जेहादी अभिनेता का चरित्र जिसे हम और आप "मिस्टर परफेक्ट" और फलाना ढिमका कहते हैं। सरकारो की मजबूरी होती है इस प्रकार के प्रसिद्ध लोगो को ढोना सर पर बैठाना क्योंकि करोडो युवा ऐसे नचनियों को आदर्श बना बैठे हैं...मगर इसके पीछे हम और आप है जो इनकी फिल्मो को हिट कराते हैं ये अरबो कमा कर भी ‪#‎भारत_माता‬ का खुलेआम ‪#‎अपमान‬ करके पुरे देश को विश्व में बदनाम करते हैं.
आइये आमिर और शाहरुख़ से ही शुरुवात करें की इन नचनियों की फ़िल्म नहीं देखेंगे। अगर इन के नाच गाने पर फिर भी किसी का दिल आ गया है तो जल्द से जल्द इसकी हर रिलीज होने वाली फ़िल्म की CD को इंटरनेट मार्केट में डाल दें जिससे इन जेहादियों को मिलने वाली रेवेन्यू पर रोक लगे...
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सोमवार, 9 नवंबर 2015

IsupportNamo

#IsupportNamo #भक्त_हूँ_मैं
"कहते हैं सफलता के कई बाप होते हैं और असफलता अनाथ होती है।" आज जो व्यक्ति भारत का नेतृत्व कर  रहा है,वो भारत को नयी दिशा नए साँचे में ढाल रहा है।।रोज 18 घंटे काम करता है।।आप की हमारी गालियां सुनता है।।संभव है कुछ गलतियां भी कर रहा हो मगर इसकी नियत सही है।
कम से कम आज के दिन मैं Narendra Modi का विरोध करके खुद के अवसरवादी होने का परिचय नहीं देने वाला। अंतिम क्षण तक इस व्यक्ति के समर्थन में रहूँगा जब तक की प्रतिस्पर्धा में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को इससे बेहतर विकल्प न मिल जाएं।।आप चाहे तो मुझे #भक्त कहें या #पेड_कार्यकर्त्ता कोई समस्या नहीं।।
इसमें भी संशय नहीं की ये हार मोदी की है मगर एक कार्यकर्त्ता होने के कारण इस समय मोदी को गाली देना और दोष देने की जगह तब तक मोदी के साथ खड़ा रहने का समय है,जब तक मोदी अपने  विरोधियों को प्रतिउत्तर न दे सके।। आवश्यक आलोचना और विरोध दर्ज कराने का समय आगे आएगा जो मैं भी करता हूँ समय समय पर..
आज भाजपा जीत जाती तो कई बरसाती मेंढक #नमोनमः करते और संभवतः उनके उलट मैँ भाजपा की गलतिया भी गिनाता जो सुधार हेतु आवश्यक थी। मगर आज असफलता हाथ लगी है तो भाजपा समर्थक होने के कारण इस असफलता में मेरा हिस्सा जरूर है,जो मुझे स्वीकार्य है।
एक ठोकर लगी है संभव है कुछ और भी ठोकरें लग जाए मगर इससे सफर ख़त्म नहीं होता।।यदि 2 सीटो पर मनोबल गिरा कर वाजपेयी जी बैठ जाते तो भाजपा का अस्तित्व सपना होता. ऐसे भी कार्यकर्त्ता है जिन्होंने पूरा जीवन लगाया और एक जगह भी भाजपा की सरकार नहीं देखना नसीब हुआ अपने जीवन काल में । हम भाग्यशाली हैं जो आधे से ज्यादा भारत में भाजपा को सत्ता और प्रभाव में देख रहे हैं। और हमारे सामने कौन हैं ??वो लोग जो दशको बाद भी राज्यों की सीमा से आगे नहीं बढ़ पाये...कल ही दशको के कम्युनिष्ट राज के बाद #केरल_में_कमल की कलियाँ दिखनी शुरू हुई है। बिहार में जीत होती तो अच्छा था मगर हार हुई है तो सब ख़त्म हो गया ऐसा नहीं है। अब भी जनसमर्थन भाजपा के पास है मगर उतने बड़े स्तर का नहीं जुटा पाये जो एकजुट ही चुके विपक्ष+मिडिया+NGO गैंग से लोहा ले कर सरकार बना सके।।
तो सभी भाजपा और राष्ट्रवाद समर्थको निराशा के भाव अपने मन में न आने दें और पूरे मनोयोग से लगे रहे हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की सेवा में..सत्ता साधन है साध्य नहीं..आज साधन नहीं है कल मिल जायेगा।।
मगर नरेंद्र मोदी जैसी नेतृत्व की पूंजी दशको में एक बार ही मिलती है,उसे बचाये रखें।।
मेरा नेता मेरा आदर्श कल भी राष्ट्रवादी नरेंद्र दामोदर दास मोदी था,आज भी है कल भी रहेगा...
भारत माता की जय

आशुतोष(#एक_भक्त) की कलम से

सोमवार, 7 सितंबर 2015

OROP का इतिहास

#OROP का #इतिहास
आज कल वन रैंक वन पेंशन का बहुत हो हल्ला है लेकिन इस विवाद की नींव किसने रक्खी ये भी जान लीजिये.तथ्य ये बताते हैं की सैनिकों पर इस अत्याचार की नींव कांग्रेस ने रक्खी.कैसे आइये जानते हैं..
सन 1947 में जब देश आजाद हुआ तो तबसे सेना का मनोबल तोड़ने वाले कर्म कांग्रेस ने किये हैं.देश के आजाद होने के तुरंत बाद कांग्रेस ने वेतन का पुनर्निर्धारण किया.चूँकि राजनितिक पार्टियों का कोई अपना सेना में नहीं होता अतः कांग्रेस ने सेना के वेतन में 30% की कटौती कर दी और चूँकि लूट सिविलियन की सहायता से मचानी थी अतः सिविलियन अधिकारियों बाबूओं और ब्यूरोक्रेट्स के वेतन में कोई कटौती नहीं की गयी..
यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है की सिविल अफसर अपना कार्यकाल सामन्यतया पूरा कर लेते हैं जबकि सेना के लोग कभी शहीद होते हैं कभी बम गोलियों से अपंग हो कर रिटायर हो के पेंशन के सहारे घर पर बैठते हैं..
चूँकि सेना के अधिकारी पहले रिटायर होते थे और उनकी तनख्वाह नेहरू ने 30% घटा दी थी अतः रिटायर होने के समय अंतिम आहरित वेतन(LAST DRAWN SALARY) का 70% पेंशन के रूप में दिया गया और सिविलियन ब्यूरोक्रेट्स जिनकी तनख्वाह एक पैसे भी नहीं घटाई गयी थी उनको अंतिम आहरित वेतन का 30% पेंशन दी गयी.. कांग्रेस की सैनिको और सेना की नीति क्या रही है ये आधे से ज्यादा समय बिदेश में बिताने वाले कांग्रेसी रक्षा मंत्री वी के मेनन के संसद और कैबिनेट मीटिंग में दिए गए वक्तव्यों से पता चलता है जिनके अनुसार हमे बार्डर पर सेना रखने कि क्या जरूरत है सेना हटा देनी चाहिए और रक्षा मंत्रालय का बजट घटा देना चाहिये..इन्ही के कार्यकाल में 1962 की जंग हम हारे थे..
बांग्लादेश युद्ध के बाद जब भारतीय सैनिको ने 90 हजार पाकिस्तानियों को आत्मसमर्पण करवाया और पाकिस्तान ने घुटने टेक दिए उस समय सैनिक प्रोत्साहन की उम्मीद कर रहे थे और कांग्रेस ने 1973 में तीसरे वेतन आयोग में एक और बड़ा झटका सैनिको को दिया..ब्यूरोक्रेट्स द्वारा निर्धारित होने वाले वेतन आयोग में सेना और सिविलियन को तथाकथित बराबरी पर लाने के लिए सिविल सेवाकर्मियों की पेंशन 30%से बढ़ाकर 50% कर दी गयी और सेनाकर्मियों की पेंशन 70%से घटकर 50% कर दी गयी.अर्थात कांग्रेस ने दूसरी बार सेना के वेतन और पेंशन में बड़ी कटौती कर दी. ज्ञातव्य हो की आजादी के समय सैनिको का वेतन घटाते समय एवं ब्यूरोक्रेट्स का वेतन वही रक्खा गया था तब कांग्रेस को समानता की याद नहीं आई थी..
अब इसका जब कार्यान्वन हुआ तो जिन सैनिको ने सन 47,62,65,72की लड़ाइयां लड़ी थी उनका वेतन 30% कम हो गया और पेंशन 20% कम हो गया.लड़ाइयों में घायल होकर अपंग होने के कारण समयपूर्व रिटायर होने वालों सैनिको की पेंशन भी 20% घट गयी..और ब्यूरोक्रेट्स तथा सिविलियन जो 60 साल तक बिना किसी खतरे के सरकारी नौकरी करते थे उनका वेतन 20% बढ़ा दिया गया..सैनिको को मिला वन रैंक वन पेंशन का झुनझुना.. जो सैनिक सन 80 में रिटायर हुआ उसकी पेंशन उस समय के हिसाब से मिलती थी और 2010 वाले में उसी पद से रिटायर होने वाले को उससे ज्यादा पेंशन मिलती थी..इसे समान करने के कांग्रेसी आश्वासन के झुनझुने का नाम था OROP वन रैंक वन पेंशन..
इसके बाद सं 72 से सैनिक वो झुनझुना बजा रहे थे..कई वेतन आयोग आये मगर ब्यूरोक्रेटस की जकड़ के कारण हमेशा ब्यूरोक्रेट्स अपने वेतन भत्तों आदि में वृद्धि कर लेते और सेना को इधर उधर करके घुमाते रहते. सरकारे आती रही जाती रही मगर कोई भी इसे चुनावी वादे से ज्यादा आगे नहीं ले जा पाया..वाजपेयी जी के समय कुछ कार्य प्रारम्भ हुआ मगर मंत्रालयों में बैठे आईएएस अधिकारीयों के अड़ंगे के आगे वाजपेयी जी भी इसका समाधान नहीं निकाल पाये.. उसके बाद 10 साल कांग्रेस रही और उसके समय सेना का क्या हाल था हर सैनिक और अधिकारी जानता है..अतः कांग्रेस ने OROP पर कोई सार्थक प्रयास नहीं किया..कांग्रेस ने जले पर मिर्च और नमक लगाया 500 करोड़ रूपये OROP के लिए दे कर क्योंकि 10 हजार करोड़ का खर्च आना था इसमें..अतःअब इस 20 गुना कम धनराशि से कैसे समस्या समाधान हो ये मनमोहन सिंह ही जानते रहे होंगे.
2014 में मोदी सरकार आई जो सेना की हितैषी मानी जाती है और उन्होंने दशको से चली आ रही इस समस्या का समाधान किया..जब मोदी सरकार और सैनिको के प्रतिनिधियों की OROP पर वार्ता हो रही थी उस समय भी ब्यूरोक्रेट्स ने अपनी पूरी ताकत लगा दी थी इसे अटकाने की इसलिए 14 माह का समय लग गया.आग में घी डाल रहे थे सेना प्रतिनिधियों में घुस गए कुछ रंगे सियार..
मगर मोदी ने इसमें व्यक्तिगत रूचि ले कर ब्यूरोक्रेट्स और सेना के प्रतिनिधियों में घुस आये रंगे सियारों को किनारे करकें OROP लागू कर दिया और भारतीय सैनिको को सच्चा सम्मान दिया.. इस प्रकार इस बड़े प्रकरण और समस्या का सकारात्मक समाधान हुआ..
अब एक विचरणीय बिंदु ये है की जंतरमंतर पर भारतीय सेना के पूर्व सैनिको के साथ जो रंगे सियार भी मोदी के विरोध में मोर्चा खोले हुए थे क्या उनकी तोप के गोले कांग्रेस शासन में खत्म हो गए थे??जब कांग्रेस सैनिको की जायज मांगोंपर विचार करने से ही इनकार देती थी उस समय क्या इन सियारों को जंतर मंतर का रास्ता नहीं दिखता था??
अब जब नरेंद्र मोदी ने इस समस्या का समाधान कर दिया उसके बाद भी धरना प्रदर्शन करने के लिए पूर्व सैनिको को उकसाने वाले सियारों को सीधे चुनाव लड़ कर अपनी राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा पूरी करनी चाहिए न की धरना दे कर.....

आशुतोष की कलम से

शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

आतंकवादी याकूब की फांसी या मुसलमान को फाँसी

#याकूब #जिलानी #संजयदत्त #न्यायपालिका #आतंकवाद
याकूब की फांसी के समय से ही कई बंधू और नेता संजय दत्त के बचने का उदाहरण दे रहे हैं क्योंकि वो हिन्दू था..अब आगे लिखने से पहले बता दूँ की न तो मैं संजय दत्त जैसे आतंकी का समर्थक हूँ न ही कलाम जैसे DNA वाले मुसलमानो का विरोधी..
संजय दत्त के मुद्दे का स्पष्ट सा उत्तर है की क़ानूनी दृष्टि से सबूतों की अनुपलब्धता और उसकी ऊपर तक पहुच के कारण वो बचत रहा ..फिर भी अंततः 5 साल जेल की हवा खानी पड़ेगी हालांकि उसे भी फांसी होनी चाहिए थी मगर भारत का कानून ऐसा है की सौ गुनहगार छूट जाये मगर एक बेगुनाह न फसे...
अब इसे हिन्दू मुसलमान से जोड़ने वालो को सैकड़ो मुसलमानो के उदाहरण दे सकता हूँ जो संजय दत्त जैसे किसी राष्ट्रद्रोही गतिविधि में लिप्त थे मगर साक्ष्यों के अभाव में छोड़ दिए गए..एक उदहारण देना चाहूँगा संसद हमले के एक प्रमुख आरोपी और अफजल के साथ साजिशकर्ता दिल्ली यूनिवर्सिटी के अरेबिक प्रोफ़ेसर एस ए आर जिलानी का जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा बरी किया गया सिर्फ इसलिए की पुलिस उसके खिलाफ उतने सबूत नहीं दे पायी जीतना कोर्ट में आवश्यक था.. हालांकि कोर्ट ने उसे बरी करते समय ये बात मानी की उसे संसद हमले की पूर्व जानकारी थी..उसकी एक फोन काल का विवरण निम्न है जो दिल्ली पुलिस ने संसद हमले के अगले दिन टेप किया था..
Caller: (Bother of Gilani) What have you done in Delhi?
Receiver: (Gilani) It is necessary to do (while laughing) ( Eh che zururi).
Caller: Just maintain calm now.
Receiver: O.K. (while laughing)Where is Bashan?
इसके बाद फोन कट जाता है...
इसके अलावा अफजल गुरु से दिन में कई बार फोन पर जिलानी की बात होती थी जिसका कन्फर्मेशन एयरटेल और एस्सार ने अपने रिकार्ड से दिया मगर क्या बात हुई इसका पता नहीं चला..मतलब एक ओर संसद हमले की प्लानिंग हो रही है और दिन में जिलानी साहब अफजल को 10 बार फोन करके दुआ सलाम कर रहे हैं?? ये बात न आप मानेंगे न ही सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार की..
परंतु दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा की हमले की जानकारी जिलानी को थी मगर  क़ानूनी दृष्टि से साक्ष्य इतने नहीं उपलब्ध है सजा दी जा सके अतः जरुरी साक्ष्यों के आभाव में जिलानी महोदय को बरी किया जाता है...
अब संजय दत्त के नाम पर छाती कूटने वाले जिलानी को बरी करने पर कहेंगे क्या की उसे मुसलमान होने के कारण छोड़ दिया गया?इसी प्रकार मुम्बई हमलो के आरोपी सपा नेता अबू आजमी भी बच गया..उसने अपना गुनाह याकूब के सर पर डाल कर किनारा कर लिया..
भारत का कानून इतना लचीला है की कसब को भी मौका मिला और रात को 2बजे एक आतंकवादी याकूब के लिए सुप्रीम कोर्ट खुलता है तो संजय दत्त जैसा आतंकी फरलो पर मौज करता है..अतः ये सुविधा सभी संपन्न लोगो हेतु है जो जेठमलानी और भूषण जैसे वकीलों को खरीदने की क्षमता रखते हैं.. बाकी आप सब समझदार हैं की यहाँ क्या होता है...उत्तर प्रदेश में  किस प्रकार आतंकियों के ऊपर से उत्तर प्रदेश में मुकद्दमे हटाने का आदेश मुलायम ने जारी किया और कोर्ट ने कहा था की आज मुकद्दमा हटाओ कल भारत रत्न दे देना......

आशुतोष की कलम से

आधुनिकता की दौड़ में भागता इण्डिया...

#हुक्काबार #इण्डिया #दिल्ली #सशक्तिकरण
परसो शाम दिल्ली में कुतुबमीनार से लौटते समय मित्र Kamal Kumar Singh ने दिल्ली के दिल कनाट प्लेस में एक ब्रेक लिया.दिल्ली के बदलते परिवेश का दर्शन कराने कमल जी ने मुझे पास के एक रेस्टोरेंटनुमा स्थान पर ले गए..स्थान थोडा जाना पहचाना लगा मगर परिवेश बदल गया था..इसी पहले शायद ऐसे स्थान पर अपने एक फ्रेंच अतिथि के साथ आना हुआ था..इतनी सौम्य जगह की क्या कहने.. आकर्षक रात्रि लाइटिंग और उतने ही आकर्षक लोग..खूबसूरती और आधुनिकता ऐसी की यदि इस स्थल का विकास अनवरत ऐसे चलता रहा तो आने वाले समय में खजुराहो का सजीव चित्रण कनाट प्लेस में मिलेगा. ये केजरीवाल जी की बड़ी उपलब्धि होगी यदि ये कार्य अपने कार्यकाल में पूरा करा लें..संघी राज्य मध्य प्रदेश का टूरिज्म रेवेन्यू दिल्ली आएगा..थोड़ी देर बाद कुछ खाने पीने हेतु आर्डर किया और इधर उधर नजर दौड़ाई तो लगा 22वी सदी में हरियाणा का कोई गाँव है.. सामने की खूबसूरत मेज पर आकर्षक सी दिखने वाली एक महिला और हाथ में एक पाइप जिसका एक सिरा उनके मुह में दूसरा एक उपकरण में लगा हुआ था..समझ में आ गया की इण्डिया का विकास और नारी सशक्तिकरण हो रहा था..वो मोहतरमा हुक्का पी रही थीं..साथ में एक महोदय भी थे जो समय समय पर उस हुक्के से कश लगा कर शायद आँखों से ही ये कहना चाहते थे की 20वी सदी में इस हुक्के पर हमारा एकाधिकार था. रोम रोम आहलादित कर देने वाले इस दृश्य ने मुझे इसका एहसास कराया आधुनिक इण्डिया और प्रोग्रेसिव नारी का..क्या हुआ हुक्का पीने से उसके पेट में पल रहे बच्चे के फेफड़े में संक्रमण की संभावना है...बात यहाँ पुरुष महिला समानता की है.. यदि सैकड़ो साल में हुक्के को पुरुष ने नहीं त्यागा तो आज महिला भी उसके बराबर है, धुवां उड़ाने का अधिकार उसका भी उतना ही है. इण्डिया के इस सम्मोहित करने वाले दृश्य से नजर दूसरी और की तो "बड़की बिंदी" कम्युनिष्ट टाइप एक महिला अपने ग्लास में आईस क्यूब का आर्डर करती दिखी..बड़े से लाल रंग की बिंदी और ग्लास के अंदर की दारु के लाल रंग के ग़जब के कलर कॉम्बिनेशन के सौंदर्य पर मेरे जैसा कविहृदय व्यक्ति हाथ पोछने वाली नैपकिन पर कविता लिखना शुरू ही करने वाला था की ग्लास में घुलती सफ़ेद बर्फ ने एहसास कराया की ये जो ग्लास में घुल रहा है,वो बर्फ नहीं पुरुषों का आधिपत्य है और दारु और बिंदी का कॉम्बिनेशन आज के इण्डिया के नारी के एक वर्ग का "सशक्तिकरण चिन्ह" है...ये लोग "प्रोग्रेसिव" है जो हुक्के और दारु की आधुनिकता के थ्रेशहोल्ड पर हैं  और हम और हमारा परिवेश आज तक कंजरवेटिव ही रह गए जो 'गजरे और जूड़े' पर अटके  है..खैर अब इस आधुनिक इण्डिया से निकलने की बारी थी... बिहार के एक सिन्हा साहब मैनेजर हैं यहाँ.बड़े भले आदमी.लड़का लड़की हुक्का पीते पीते आपसी सहमति से आधुनिकता के चरमोत्कर्ष तक भी पहुच जाए तो भी सिन्हा साहब आँखे फेर कर आधुनिक  सुनामी के शांत होने की प्रतीक्षा करते हैं.
हमने जब अपना बिल देखा तो नीचे की दो लाइनों में अपने सर जी केजरीवाल सर याद आ गए. केजरीवाल जी आने वाले दिनों में जीते जी हमारे ह्रदय में अमर हो जाएंगे जब जब लोग VAT वाली लाइन पढ़ेंगे दिल्ली के विकास और सर जी पर उन्हें गर्व होगा..खैर अब दिल्ली में हो तो सर जी को चन्दा देना ही पड़ेगा..बिल में बढे हुए VAT के रूप में हमने भी दिया और आधुनिक इण्डिया से विदा ली...वो लड़का लड़की तीसरी बार हुक्का मंगा चुके थे..बिंदी वाली खूबसूरती, सुरा और घुल चुकी आइस क्यूब के प्रभाव से और सुर्ख हो चुकी थी...एक म्यूजिक चल रहा था जो एल्बम The Shadows- "Return to the Alamo" का था..कभी मौका लगे तो सुनियेगा..पता चलेगा "अकेले हैं तो क्या गम है के ..संगीतकार आंनद मिलिंद ने ये इण्डिया 20 साल पहले ही घूम लिया था...इसलिए ये धुन हूबहू कॉपी करके आधुनिक इण्डिया का झंडा बनाये रक्खा है...
चलते चलते मेरी और कमल भाई की इस फ़ोटो का श्रेय बार के मैनेजर सिन्हा साहब को जाता है.....

जय श्री राम

आशुतोष की कलम से

शनिवार, 13 जून 2015

प्रधानमंत्री मोदी की बांग्लादेश यात्रा और सीमा समझौता(Modi Bangladesh Visit)

मित्रों पिछले दो लेखों में सीमा समझौते का इतिहास वर्तमान एवं भारत के पक्ष के बाद आगे बढ़ते हुए जान लें की बांग्लादेश के लिए क्यों जरुरी था ये समझौता:

बांग्लादेश में जब से शेख हसीना सरकार आई है वो प्रोइण्डिया(भारत के पक्ष की) सरकार मानी जाती है. यदि आप याद कर सके तो आसाम में सक्रीय उल्फा नाम के संगठन का एक समय बहुत आतंक था और वो बांग्लादेश में ट्रेनिंग कैम्प और गतिविधिया चलाता था. शेख हसीना सरकार ने उल्फा के सभी ट्रेनिंग कैम्प ध्वस्त करके उसके चीफ अरविन्द राजखोवा समेत उल्फा के सभी टाप कमांडर्स को बांग्लादेश में पकड़ कर हिन्दुस्थान के हवाले कर दिया, जिनकी गिरफ्तारियां भारत के विभिन्न सीमावर्ती क्षेत्रों से दिखाई गयी. इसके अलावा बांग्लादेश में भारतीय इन्क्लेव्स में बसने वालों मुसलमानों को बांग्लादेश सरकार कोई सुविधा नहीं देती थी क्युकी वो भारतीय सीमा में थे. इन दो मुद्दों समेत भारत के पक्ष में खड़े होने के कारण कट्टर इस्लामिक ताकते और विपक्ष की नेता बेगम खालिदा जिया ने पाकिस्तान के शह पर शेख हसीना को घेरना शुरू कर दिया था अतः इस समझौते को आधार बना कर शेख हसीना अगले चुनाव में ये कह सकेंगी की सभी भारतीय इन्क्लेव बांग्लादेश के हुए और उसमे बसने वालों को बांग्लादेश सरकार सभी सुविधाएं देगी.इस समझौते के लिए शेख हसीना मोदी की कोई भी शर्त मानने को तैयार थी. शेख हसीना के बेटे का मोदी के अगवानी में आना भविष्य के नए समीकरण का संकेत दे रहा है.
चूकी शेख हसीना इसके बदले में भारत के साथ किसी भी सीमा तक सहयोग हेतु तैयार थी अतः भारत ने कुछ और समझौते किये जो सामरिक दृष्टि से भारत को सुरक्षित करने के लिए अत्यंत आवश्यक थे. जिसमे चीन के "string of pearls" योजना के दो बंदरगाह भारत को देना था जिसका विस्तृत विवरण पिछले लेख में दिया गया है।
चीन किस हद तक बांग्लादेश में घुसा है इसका दूसरा उदाहरण इस प्रकार समझ सकते हैं की जब 2002 के लगभग भारत में शोपिंग माल कल्चर आ रहा था उस समय तक चीन ने बांग्लादेश के कई हिस्सों में अपने खर्च से बड़े बड़े शोपिंग माल्स का निर्माण करा के अपनी स्थिति मजबूत करते हुए भारत को एक तरह से बांग्लादेश से बाहर कर के,बांग्लादेश को भारत विरोधी गतिविधियों का केंद्र बना दिया था.. इन सबको ध्यान में रखते हुए मोदी ने लगभग २२ समझौते किये.. चीन का व्यापारिक आधिपत्य तोड़ने और भारतीय निर्यात को बढ़ावा देने के लिए भारत ने बांग्लादेश को 2 बिलियन डालर की क्रेडिट लाइन दी है इसके अंतर्गत भारत सरकार द्वारा निर्धारित किये क्षेत्र के सामान 2 बिलियन डालर तक बांग्लादेश को क्रेडिट अर्थात उधार पर दिए जायेंगे शर्त ये है की वो सामान भारत में बने हो। “MAKE IN INDIA” मुहीम को इससे बढ़ावा मिलेगा और 50 हजार रोजगार के अवसर तुरंत उत्पन्न हो जायेंगे. इसके साथ ही साथ हम वही सामान देंगे जिसके निर्यात में हम सक्षम हैं. मोदी ने बांग्लादेश से इस बात पर भी सहमती ले ली है की बांग्लादेश भारतीय कंपनियों के लिए SEZ बनाने के लिए जमीन देगा और उस SEZ में सिर्फ भारतीय कम्पनियाँ ही अपनी यूनिट लगा सकती हैं. इस SEZ के माध्यम से चीन क बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने की दिशा में एक कदम आगे और भारत बढेगा।।
एक अन्य समझौते के तहत भारत की जीवन बिमा कंपनी LIC(भारतीय जीवन बीमा निगम) को बांग्लादेश में व्यापार की अनुमति मिल गयी है अर्थात अब LIC अपना व्यापार पडोसी देश में भी कर सकेगी.
भारत के दृष्टि से एक अन्य महत्त्वपूर्ण बात जिसपर समझौता हुआ है वह है कोलकत्ता ढाका अगरतला बस सेवा और ढाका शिलोंग गुवाहाटी बस सेवा: पूर्व में 1650 किलोमीटर की दुर्गम एवं पहाड़ी दूरी तय करके दो दिन में कोलकत्ता से अगरतला पहुचना होता था अब इस बस सेवा से दुरी लगभग 500 किलोमीटर कम हो जाएगी तथा रास्ते भी अपेक्षाकृत सुगम होंगे. और अब 14-16 घंटे में यात्री कोलकत्ता से अगरतल्ला पहुच सकेंगे.इसका सीधा असर व्यापार और दैनिक गतिविधियों पर पड़ेगा. भारतीय संसाधनों और समय की बचत होगी..
यदि समेकित रूप से भारत के पक्ष से इसका विश्लेषण किया जाए तो ये दौरा नरेंद्र मोदी के किसी भी अन्य दौरे से ज्यादा सफल है क्युकी बांग्लादेश में होने वाली हर गतिविधि भारत की आंतरिक स्थिति पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव डालती है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस शानदार उपलब्धी हेतु बधाइयाँ एवं शुभकामनाएं..


आशुतोष की कलम से