बुधवार, 5 दिसंबर 2012

अयोध्या एवं राम जन्मभूमि का इतिहास -5(History of Ayodhya and Ram Temple-5)



जन्मभूमि के लिए हुए अनेको संघर्ष : स्वामी बलरामचारी, बाबा वैष्णव दास, एवं सिक्खो के गुरुगोविंद सिंह द्वारा जन्मभूमि के रक्षार्थ युद्ध, औजरंगजेब की करारी हार। सन 1664 के हमले मे हजारो निर्दोष हिंदुओं की हत्या और बचा हुआ राम मंदिर ध्वस्त ॥
RAM MANDIR DEMOLISHED BY MUGHALS
(5)स्वामी बलरामचारी द्वारा आक्रमण: रानी जयराज कुमारी और   स्वामी महेश्वरानंद   जी के बाद यद्ध का नेतृत्व स्वामी बलरामचारी जी ने अपने हाथ में ले लिया।  स्वामी बलरामचारी  जी ने गांवो गांवो में घूम कर रामभक्त हिन्दू युवको और सन्यासियों की एक मजबूत सेना तैयार करने का प्रयास किया और जन्मभूमि के उद्धारार्थ २० बार आक्रमण किये. इन २० हमलों में काम से काम १५ बार स्वामी बलरामचारी ने जन्मभूमि पर अपना अधिकार कर लिया मगर ये अधिकार अल्प समय के लिए रहता था थोड़े दिन बाद बड़ी शाही फ़ौज आती थी और जन्मभूमि पुनः मुगलों के अधीन हो जाती थी. स्वामी बालरामचारी  का २० वां आक्रमण बहुत प्रबल था  और शाही सेना को काफी क्षति उठानी पड़ी। उस समय का मुग़ल शासक अकबर था वो स्वामी बलरामचारी की वीरता से प्रभावित हुआ और शाही सेना का हर आते हुए दिन के साथ  इन युद्धों से क्षय हो रहा था..धीरे धीरे देश के हालत मुगलों के खिलाफ होते जा रहे थे अतः अकबर ने अपने दरबारी टोडरमल और बीरबल से इसका हल निकालने को कहा। 
विवादित  ढांचे के सामने स्वामी बलरामचारी ने एक चबूतरा बनवाया था जब जन्मभूमि थोड़े दिनों के लिए उनके अधिकार में आई थी। अकबर ने बीरबल और टोडरमल के कहने पर खस की टाट से उस चबूतरे पर ३ फीट का एक छोटा सा मंदिर बनवा दिया. लगातार युद्ध करते रहने के कारण स्वामी बलरामचारी का स्वास्थ्य गिरता चला गया और पयाग कुम्भ के अवसर पर त्रिवेणी तट पर स्वामी बलरामचारी की मृत्यु हो गयी ..इस प्रकार स्वामी बलरामचारी के आक्रमणों और हिन्दू जनमानस के रोष के कारण अकबर ने विवादित ढांचे के सामने एक छोटा मंदिर बनवाकर आने वाले आक्रमणों और हिन्दुस्थान पर मुगलों की  ढीली होती पकड़ से बचने का एक राजनैतिक प्रयास किया. 
इस नीति से कुछ दिनो के लिए ये झगड़ा शांत हो गया। उस चबूतरे पर स्थित भगवान राम की मूर्ति का पूजन पाठ बहुत दिनो तक अबाध गति से चलता रहा। हिंदुओं के पुजा पाठ या घंटा बजने पर कोई मुसलमान विरोध नहीं करता यही क्रम शाहजहाँ के समय भी चलता रहा।सन 1640 मे सनकी इस्लामिक शासक औरंगजेब के हाथ सत्ता आई वो पूर्णतया हिंदुविरोधी और दमन करने वाला था। उसने लगभग 10 बार अयोध्या मे मंदिरों को तोड़ने का अभियान चलकर यहाँ के सभी प्रमुख मंदिरों की मूर्तियों को तोड़ डाला।
(6) बाबा वैष्णव दास के नेतृत्व मे आक्रमण: राजयसिंहासन पर बैठते हि सबसे पहले औरंगजेब का ध्यान अयोध्या की ओर गया । हिंदुधर्मविरोधी औरंगजेब ने अपने सिपहसालार जाँबाज खा के नेतृत्व मे एक विशाल सेना अयोध्या की ओर भेज दी। पुजारियों को ये बात पहले हि मालूम हो गयी अतः उन्होने भगवान की मूर्ति पहले ही छिपा दी। पुजारियों ने रातो रात घूमकर हिंदुओं को इकट्ठा किया ताकि प्राण रहने तक जन्मभूमि की रक्षा की जा सके। उन दिनो अयोध्या के अहिल्याघाट पर परशुराम मठ मे समर्थ गुरु श्री रामदास जी महाराज जी के शिष्य श्री वैष्णवदास जी दक्षिण भारत से यहाँ विधर्मियों से देश को मुक्त करने के प्रयास मे आए हुए थे। औरंगजेब के समय बाबा श्री वैष्णवदास जी ने जन्मभूमि के उद्धारार्थ 30 बार आक्रमण किये। इन आक्रमणों मे अयोध्या के आस पास के गांवों के सूर्यवंशीय क्षत्रियों ने पूर्ण सहयोग दिया जिनमे सराय के ठाकुर सरदार गजराज सिंह और राजेपुर के कुँवर गोपाल सिंह तथा सिसिण्डा के ठाकुर जगदंबा सिंह प्रमुख थे। ये सारे वीर ये जानते हुए भी की उनकी सेना और हथियार बादशाही सेना के सामने कुछ भी नहीं है अपने जीवन के आखिरी समय तक शाही सेना से लोहा लेते रहे और अंततः वीरगति को प्राप्त हुये। ठाकुर गजराज सिंह का मकान तक बादशाह के हुक्म पर खुदवा डाला। ठाकुर गजराज सिंह के वंशज आज भी सराय मे मौजूद हैं। आज भी फैजाबाद जिले के आस पास के सूर्यवंशीय क्षत्रिय सिर पर पगड़ी नहीं बांधते,जूता नहीं पहनते, छता नहीं लगाते,उन्होने अपने पूर्वजों के सामने ये प्रतिज्ञा ली थी की जब तक श्री राम जन्मभूमि का उद्धार नहीं कर लेंगे तब तक जूता नहीं पहनेंगे,छाता नहीं लगाएंगे,पगड़ी नहीं बाधेंगे। तत्कालीन कवि जयराज के एक दोहे मे ये भीष्म प्रतिज्ञा इस प्रकार वर्णित है ॥
        जन्मभूमि उद्धार होय, जा दिन बरी भाग।
        छाता जग पनही नहीं
,
 और न बांधहि पाग॥ 

(7) 
) बाबा वैष्णव दास एवं सिक्खो के गुरुगोविंद सिंह द्वारा जन्मभूमि के रक्षार्थ युद्ध: जैसा की पहले बताया जा चुका है की औरंगजेब ने गद्दी पर बैठते ही मंदिर को ध्वस्त करने के लिए जबांज खाँ के नेतृत्व मे एक जबरजस्त सेना भेज दी थी, बाबा वैष्णव दास को इस बात की भनक लगी बाबा वैष्णव दास के साथ साधुओं की एक सेना थी जो हर विद्या मे निपुण थी इसे चिमटाधारी साधुओं की सेना भी कहते थे । जब जन्मभूमि पर जबांज खाँ ने आक्रमण किया तो हिंदुओं के साथ चिमटाधारी साधुओं की सेना की सेना मिल गयी और उर्वशी कुंड नामक जगह पर जाबाज़ खाँ  की सेना से सात दिनो तक भीषण युद्ध किया । चिमटाधारी साधुओं के चिमटे के मार से मुगलो की सेना भाग खड़ी हुई। इस प्रकार चबूतरे पर स्थित मंदिर की रक्षा हो गयी ।
जाबाज़ खाँ की पराजित सेना को देखकर औरंगजेब बहुत क्रोधित हुआ और उसने जाबाज़ खाँ को हटकर एक अन्य सिपहसालार सैय्यद हसन अली को  50 हजार सैनिको की सेना देकर अयोध्या की ओर भेजा और साथ मे ये आदेश दिया की अबकी बार जन्मभूमि को तहस नहस कर के वापस आना है ,यह समय सन 1680 का था ।
बाबा वैष्णव दास ने अपने संदेशवाहको द्वारा सिक्खों के गुरु गुरुगोविंद सिंह से युद्ध मे सहयोग के लिए पत्र के माध्यम संदेश भेजा । गुरुगोविंद सिंह उस समय आगरे मे सिक्खों की एक सेना ले कर मुगलो को ठिकाने लगा रहे थे। पत्र पा के गुरु गुरुगोविंद सिंह सेना समेत अयोध्या आ गए और ब्रहमकुंड पर अपना डेरा डाला । ज्ञातव्य रहे की ब्रहमकुंड वही जगह जहां आजकल गुरुगोविंद्सिंह की स्मृति मे सिक्खों का गुरुद्वारा बना हुआ है। बाबा वैष्णव दास के जासूसों द्वारा ये खबर आई की हसन आली 50 हजार की सेना और साथ मे तोपखाना ले कर अयोध्या की ओर आ रहा है । इसे देखते हुए एक रणनीतिक निर्णय के तहत बाबा वैष्णव दास एवं सिक्खो के गुरुगोविंद सिंह ने अपनी सेना को तीन भागों मे विभक्त कर दिया । पहला दल सिक्खों के एक छोटे से तोपखाने के साथ फैजाबाद के वर्तमान सहादतगंज के खेतो के पास छिप गए । दूसरा दल जो क्षत्रियों का था वो रुदौली मे इस्लामिक सेना से लोहा लेने लगे। और बाबा वैष्णव दास का तीसरा दल चिमटाधारी जालपा नाला पर सरपत के जंगलो मे जगह ले कर  मुगलो की प्रतीक्षा करने लगा।
शाही सेना का सामना सर्वप्रथम रुदौली के क्षत्रियों से हुआ एक साधारण सी लड़ाई के बाद पूर्वनिर्धारित रणनीति के अनुसार वो पीछे हट गए और चुपचाप सिक्खों की सेना से मिल गए । मुगल सेना ने समझा की हिन्दू पराजित हो कर भाग गये,इसी समय गुरुगोविंद सिंह के नेतृत्व मे सिक्खों का दल उन पर टूट पड़ा,दूसरे तरफ से हिंदुओं का दल भी टूट पड़ा सिक्खों ने मुगलो की सेना के शाही तोपखाने पर अधिकार कर लिया दोनों तरफ से हुए सुनियोजित हमलो से मुगलो की सेना के पाँव उखड़ गये सैय्यद हसन अली भी युद्ध मे मारा गया। औरंगजेब हिंदुओं की इस प्रतिक्रिया से स्तब्ध रह गया था इस करारी हार के बाद औरंगजेब ने कुछ समय तक अयोध्या पर हमले का कार्यक्रम स्थगित कर दिया । हिंदुओं से मिली इस हार का वर्णन औरंगजेब आलमगीर नामे मे कुछ इस प्रकार लिखता है
“बाबरी मस्जिद के लिए काफिरो ने 20 हमले किए सबमे लापरवाही की वजह से शाही फौज ने शिकस्त खायी। आखिरी हमला जो गुरुगोविंदसिंह के साथ बाबा वैष्णव दास का हुआ उसमे शाही फौज का सबसे बड़ा नुकसान हुआ । इस लड़ाई मे शहजादा मनसबदार सरदार हसन ली खाँ भी मारे गये ।"    संदर्भ: आलमगीर पृष्ठ 623                                                                                                           
इस युद्ध के बाद साल तक औरंगजेब ने अयोध्या पर हमला करने की हिम्मत नहीं की। मगर इन चार वर्षों मे हिन्दू कुछ असावधान हो गए। औरंगजेब ने इसका लाभ उठाते हुए सान 1664 मे पुनः एक बार श्री राम जन्मभूमि पर आक्रमण किया ।इन चार वर्षों मे सभी एकत्रित हिन्दू अपने अपने क्षेत्रों मे चले गए थे।अतः ये एकतरफा युद्ध था हालाँकि कुछ पुजारियों और हिंदुओं ने मंदिर रक्षा का प्रयत्न किया मगर शाही सेना के सामने निहत्थे हिन्दू जीतने की स्थिति मे नहीं थे,पुजारियों ने रामलला की प्रतिमा छिपा दी । इस हमले मे शाही फौज ने लगभग 10 हजार हिंदुओं की हत्या कर दी ।मंदिर के अंदर नवकोण के एक कंदर्प कूप नाम का कुआं था, सभी मारे गए हिंदुओं की लाशें मुगलो ने उसमे फेककर चारो ओर चहारदीवारी उठा कर उसे घेर दिया। आज भी कंदर्पकूप “गज शहीदा” के नाम से प्रसिद्ध है,और मंदिर के पूर्वी द्वार पर स्थित है जिसे मुसलमान अपनी संपत्ति बताते हैं।
औरंगजेब ने इसका वर्णन कुछ इस प्रकार किया है । 
“लगातार चार बरस तक चुप रहने के बाद रमजान की 27वी तारीख को शाही फौज ने फिर अयोध्या की रामजन्मभूमि पर हमला किया । इस अचानक हमले मे दस हजार हिन्दू मारे गये। उनका चबूतरा और मंदिर खोदकर ज़मींदोज़ कर दिया गया । इस वक्त तक वह शाही देखरेख मे है। संदर्भ: आलमगीरनामा पृष्ठ 630                                                                                                               
शाही सेना ने जन्मभूमि का चबूतरा खोद डाला बहुत दिनो तक वह चबूतरा गड्ढे के रूप मे वहाँ स्थित था । औरंगजेब के क्रूर अत्याचारो की मारी हिन्दू जनता अब उस गड्ढे पर ही श्री रामनवमी के दिन भक्तिभाव से अक्षत,पुष्प और जल चढाती रहती थी.  
 लेख के  अगले भाग मे नाबाब शाहादत अली,नसीरुद्दीन,वाजीद ली शाह के समय हुए  युद्धों का वर्ण 

7 टिप्‍पणियां:

  1. आशुतोष जी यह ज्ञात इतिहास है जो आपने लिखा, वो कितने दुष्ट रहे होगें जिन्होंने इतिहास तक नहीं लिखने दिया। 600 इसवी में सम्राट हर्ष के समय भारत बौद्ध राष्ट्र था, सरे बौद्धों को बेरहमी से मार डाला गया तथा शूद्र बनाया गया। उनका इतिहास तक मिटा दिया गया। वो कितने जालिम रहे होगे कभी सोचा। भारत में पैदा हुआ बौद्ध धर्म भारत से मिट गया। मिटने वाले क्या कोई बाहर के थे?

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    1. हालांकि आप ने इस विषय से संबन्धित टिप्पणी नहीं की है । अतः जबाब देना जरूरी नहीं नहीं। फिर भी मेरे कुछ बिन्दुओं पर विचार कीजिये ।शायद उत्तर आप स्वयं पा जाएँ।
      1 मै कोई इतिहास लिखने नहीं बैठा हूँ अतः ये सारे तथ्य किसी न किसी के खोजे होंगे जो सेकुलर लोगो ने दबा दिये उन्हे विभिन्न भाषाओं और पुस्तकों से निकालकर आपकेसामने लाने भर का कार्य कर रहा हूँ।
      2 यहाँ राम मंदिर और हिंदुओं पर मूगलो के के अत्याचार की बात हो रही थी वो आप ने स्वतः मान ली की हुआ था.
      3 आप की बात "भारत में पैदा हुआ बौद्ध धर्म भारत से मिट गया" से सहमत नहीं हो सकता,क्यूकी यदि मिटाना ही होता तो इसे पैदा होने और पनपने का मौका ही नहीं देता हिन्दू धर्म। हमारे यहाँ सबको भोजन मिल जाता है इसलिए कुछ प्राणी अभी भी ऐसे जीवित हैं जो हिंदुस्थान मे हिन्दू धर्म पर अनर्गल आरोप लगाते हैं ।
      4" सारे बौद्धों को बेरहमी से मार डाला गया तथा शूद्र बनाया गया। " ये पंक्ति आप के मानसिक दिवलियेपन की परिचायक है । किस आधार पर आप कह रहे हैं ऐसा। शूद्र जन्म से या जबरजसती नहीं बनाए जाते ये हमारे स्वयं के कर्म होते हैं जो शूद्र बनाते हैं। आलोचना करते करते आप "गीता के उपदेश" भी भूल गए।

      5 वैसे अभी एक देश से मुसलमान दिल्ली मे शरण लेने आए हैं किस शांतिप्रिय "धर्मं शरणम" वाले लोगो ने उन्हे भगाया ये तो इतिहास और वर्तमान मे मिल जाएगा । और श्रीलंका को भी याद रखिएगा क्या हो रहा है...

      6 हिंदुस्थान निर्विवाद व्यक्तित्व "विवेकानंद" के अनौपचारिक विचार "बुद्ध" के बारे मे आप जैसे विद्वान ज्यादा बेहतर जानते होंगे ...

      भगवान राम आप सभी को सद्बुद्धि दे

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  2. "ये पंक्ति आप के मानसिक दिवलियेपन की परिचायक है । "

    आशुतोष जी आप के इन शव्दों के बाद भी क्या चर्चा जरी रखी जा सटी है ?

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    1. हिन्दू धर्म विरोधियों से निरर्थक अतार्किक चर्चा करने के लिए समय और क्षमता दोनों नहीं है मेरे पास...
      मेरा मत स्पष्ट है॥ हिन्दू धर्म विरोधियों और सेकुलर विषाणुओं से मै कोई वार्ता नहीं करना चाहता और नहीं उन्हे निमंत्रण देता हूँ।

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  4. आप जैसे लोगो की राष्ट्र विरोधी गतविधियो के कारण देश 800 साल से गुलाम है, आगे क्या इरादा है?

    राजपूत काल की नीचताओ का वास्तविक इतिहास जानोगे तो मुस्लिमो के अत्याचार कम दिखाई देंगे।

    FDI के विषय पर शूद्र नेताओ का रुख देख चुके हो!

    वुद्धिमानो के लिये इशारा काफी होता है।

    मूर्खो से बात करने का मुझे भी शौख नहीं है।

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  5. महाराज यह अकिंचन अयोध्या एवं राम जन्मभूमि का इतिहास -6 हेतु आतुर है। तनिक सुध यहाँ की भी लीजिऐ

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