गुरुवार, 29 नवंबर 2012

भाई राजीव दीक्षित के बाद स्वदेशी आंदोलन की दिशा-नौ दिन चले अढ़ाई कोस

मित्रों इस पोस्ट पर कुछ भी लिखने से पहले मै एक बात पहले से स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की मै भाई राजीव दीक्षित का एक प्रबल समर्थक हूँ एवं उनके आदर्शो के अनुसार कार्य  करने की कोशिश करता हूँ। इस पोस्ट का उद्देश्य किसी भी प्रकार से भी भाई राजीव दीक्षित या किसी सम्बद्ध पर प्रश्न उठाना नहीं मगर एक स्वाभाविक समर्थक होने के कारण अपने प्रश्न और विचार आज राजीव भाई को श्रद्धांजलि  देने के बाद प्रकट करना चाहता हूँ। राजीव भाई के विषय मेरी पिछली पोस्ट कृपया यहाँ पढ़ें। 
राजीव दीक्षित किसी परिचय का मोहताज शब्द नहीं है जैसा की पहले भी कई अवसरो पर मै कह चुका हूँ की आधुनिक भारत मे यदि दो महापुरुषों की बात करू तो राजीव भाई और विवेकानंद  को काफी  ही पाता हूँ।राजीव भाई का आंदोलन आजाद इंडिया मे था और विवेकानंद का गुलाम भारत मे ॥मगर उद्देश्य दोनों ही समय,हिंदुस्थान मर चुके स्वाभिमान को जगाना था. 
राजीव भाई के दुखद निधन के बाद जो अपूर्णीय क्षति हुई उस रिक्त स्थान को भर पाना असंभव सा प्रतीत हो रहा था । मगर मुझे और मेरे जैसे कई राजीव भाई के  अनुयायियों को ये जान कर बहुत ही संतुष्टि हुई की राजीव भाई के आंदोलन की अगली कड़ी स्वदेशी भारत पीठम के रूप मे भाई प्रदीप दीक्षित जी आगे बढ़ा रहे हैं। इसी सन्दर्भ में  पिछले साल भाई प्रदीप दीक्षित जी का व्याख्यान ६ नवम्बर 2011 (रविवार) को नई दिल्ली में जनकपुरी स्थित आर्य समाज मंदिर में भाई अरुण अग्रवालजी के देखरेख एवं प्रबंधन  में संपन्न हुआ था । उसके बाद हम कई राज्यों से समर्पित कार्यकर्ता वर्धा पहुचे और विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम वहाँ आयोजित हुए। 
मगर धीरे धीरे जैसे जैसे समय  बीतता गया ऐसा  अनुभव हुआ की कई समर्पित कार्यकर्ता धीरे धीरे इस आंदोलन के प्रति उदासीन होते गए उनके अपने तर्क थे । इस बीच हालाँकि आंदोलन से जुडने वाले लोगो की भी कमी नहीं थी । कुछ मुद्दो पर व्यक्तिगत रूप से मै भी व्यक्तिगत रूप से सहमत नहीं था मगर यदि एक बहुत बड़ा जनजागरण का अभियान चल रहा हो तो किसी व्यक्ति विशेष की असहमति ज्यादा महत्त्व नहीं रखती। मगर पिछले कुछ दिनो मे धरताल पर कार्य करते समय एवं सामाजिक  संचार के साधनो के माध्यम से मुझे ऐसा प्रतीत हुआ की एक हम सभी राजीव भाई के समर्थको के साथ साथ एक ऐसा समूह समाज मे तैयार हो रहा है जो अब तक राजीव भाई के विरोध मे आ चुका है ।शायद  आने वाले दिनो मे ये ज्यादा मुखर हो । दुख की बाद ये है ये एक बड़ा वर्ग सिर्फ राजीव भाई के आंदोलन के प्रबन्धको की नाकामी के कारण उनका विरोध कर रहा है ॥ 
इनमे से कुछ लोग कभी राजीव दीक्षित के समर्थक या कुछ लोग तटस्थ लोग हैं  ॥मैंने अपने अनुभवों और सर्वेक्षण के आधार पर कुछ बाते पायी है जो इस ब्लॉग के माध्यम से सामने रख रहा हूँ ॥ इससे आप सहमत भी हो सकते हैं या असहमत क्यूकी ये मेरा अपने स्तर से किया गया व्यक्तिगत  सर्वेक्षण है । यदि कटु लगे तो क्षमा प्रार्थी हूँ । ये सारे सर्वेक्षण उत्तर भारत के है ।  

1 ऐसा कई कार्यकर्ताओं  को लग रहा है की राजीव भाई का आंदोलन सिर्फ सीडी बेचने का धंधा बन के रह गया है । किसी सार्वजनिक मुद्दे पर इसकी उपस्थिती न के बराबर या स्टॉल लगाने तक होती है । आन्दोलन के लोग भावनाओ को बेचने से आगे कुछ नहीं कर रहे है । 

ज़्यादातर आंदोलन शहरो के इर्द गिर्द सीमित है (शायद महाराष्ट्र इसका अपवाद हो)। यदि ग्रामीण क्षेत्रों मे कुछ कार्य हो रहा है तो फिर प्रबंधन की कमी के कारण आस पास के लोगो तक इसकी खबर नहीं पहुच पाती है.

3 आंदोलन के कुछ क्षेत्रों के कर्णधार  कम से कम समय मे ज्यादा से ज्यादा प्रसिद्ध होना चाहते हैं,या दूसरे शब्दों मे कह ले तो हर दूसरा व्यक्ति अपने आप को राजीव भाई ही समझ रहा है उनके जैसा बनने का प्रयास करने मे कोई बुराई नहीं मगर उन तथाकथित लोगो को ये सर्वदा ध्यान रखना होगा की  "राजीव दीक्षित " के लिए समाज का हित सर्वोपरि था । 

4  पिछले साल के कार्यक्रम मे Paid Poets का विचार काफी लोगो को निरर्थक लगा॥ कई लोगो को ऐसा प्रतीत हुआ की कई तथाकथित स्थापित कवि लोग राजीव भाई को श्रद्धांजलि देने की बजाय अच्छी ख़ासी कमाई  और प्रचार के उद्देश्य से वर्धा पधारे थे । जबकि सुदूर राज्यों से आने वालों का उद्देश्य कुछ और था । 

5 भाई राजीव दीक्षित के आंदोलन को आगे बढ़ाने मे भारत स्वाभिमान का एक विशेष योगदान था क्यूकी भारत स्वाभिमान मे गाँव गाँव तक फैला हुआ संगठन है मगर स्वदेशी भारत पीठम और भारत स्वाभिमान के कार्यकर्ताओं के बीच पिछले साल वर्धा मे 30 नवम्बर को स्वदेशी मेले के दौरान पोस्टर लगाने को ले कर हुए विवाद ने ये स्पष्ट कर दिया की इन दोनों संगठनो के बीच सब कुछ अच्छा नहीं है । 
इस विषय पर मैंने भारत स्वाभिमान के कुछ  वरिष्ठ लोगो से बात की उनके अनुसार कुछ एक लोग जो उस समय स्वदेशी भारत पीठम वर्धा मे थेवो भारत स्वाभिमान हरिद्वार कार्यालय से निष्कासित/स्वेछा से चले गए लोग थे,अतः उन लोगो का स्वामी रामदेव के संबंध मे विचार नकारात्मक था जो गाहे बेगाहे संचार और सामाजिक मीडिया के साधनो द्वारा  सामने भी आता था। इसके कारण भी स्वामी रामदेव  के भारत स्वाभिमान ने  स्वदेशी भारत पीठम से दूरी बना ली । हलाकी  कौन सही  है ये एक अलग विषय था। इस विषय मे वर्धा कार्यालय तक कई लोगो ने अपने विचार पहुचाए मगर कार्यवाही कुछ खास नहीं हुई। मुझे नहीं लगता की स्वामी रामदेव इस साल वर्धा आएंगे यदि आए भी तो ये सिर्फ राजीव भाई को श्रद्धांजलि प्रेषण और भाई प्रदीप दीक्षित जी से व्यक्तिगत संबंधो के कारण होगा। 

6 बाबा रामदेव और स्वदेशी भारत पीठम के विचार लगभग एक ही है अतः स्वाभाविक है की जब तक किसी एक एक संगठन ने "विचारों का व्यवसायीकरण" नहीं किया है तब तक सब सही रहेगा॥ स्वामी रामदेव का संगठन पहले से ही स्वदेशी उत्पादो के प्रचार प्रसार एवं व्यवसाय मे है अतः स्वदेशी भारत पीठम जब भी आंशिक या पूर्णतया कोई व्यावसायिक परियोजना शुरू करता है, भारत स्वाभिमान इसे अपने स्वदेशी व्यापार मे एक अन्य साझीदार/प्रतिस्पर्धी की तरह देखेगाअतः धरातल पर सहयोग संभव नहीं है ।

अब एक ऐसा विषय जो इन सब से इतर है । राजीव भाई के कुछ व्याख्यानों पर जो समाज मे प्रसारित किए जा रहे हैं उस पर कुछ लोगो को आपत्ति है। जैसा की सभी जानते हैं की राजीव भाई के शोध कार्यों मे उनकी टीम का भी एक महत्त्वपूर्ण योगदान होता था जो उनके दिशानिर्देशों पर काम करती थी। ये एक स्वाभाविक सी बात है की कुछ तथ्यों और आंकड़ो मे कुछ बाते ऐसी हो जिससे सहमत न हुआ जा सके । जाने अनजाने उन तथ्यों को प्रसारित किया जा रहा है जिससे की एक विचारधारा के लोगो को समस्या और कुछ का महिमामंडन होता है । अब राजीव भाई तो इन प्रश्नो का उत्तर देने के लिए हैं नहीं और उनके आंदोलन के तथाकथित प्रबन्धक इन आपतियों पर कोई संग्यान नहीं लेते। "इस्कॉन मंदिर" ,"मंगल पांडे" "महात्मा गांधी" ,"वीर सावरकर" ,"गौ हत्या का कारण अंग्रेज़??जैसे धर्म और इतिहास के अनेक मुद्दे  संवेदनशील मुद्दो पर इस आंदोलन के विचार स्पष्ट नजर नहीं आते । न ही कोई ऐसा माध्यम है जहाँ से इन बातों का स्पष्टीकरण मिल सके । 
अतः कई लोग सिर्फ कुछ एक विवादित मुद्दों के स्पष्टीकरण न मिलने के कारण या तो उदासीन या विरोध मे आ गए है । इससे नुकसान ये है कुछ 1-2% बातों  को गलत दिखाकर वो सारे शोधकार्यों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। 

राजीव भाई का पार्थिव शरीर 
8 राजीव भाई की आकस्मिक मृत्यु और उसपर उठते प्रश्नो पर आज तक कोई स्पष्ट विचार नहीं आया जिससे इस मुद्दे पर नित्य नयी नयी कहानियाँ बनाई जाती रहती है । आंदोलन से जुड़े कुछ लोग ऐसे भी है जो आलोचना करने वालों पर व्यक्तिगत हो कर और आक्रामक हो कर प्रतिक्रिया देने लगते है जबकि उन्हे धैर्यपूर्वक ये समझना चाहिए की आलोचनाओ से सुधार और परिष्करण की नीव पड़ती है। 

ये देखकर अत्यंत प्रसन्नता होती है की राजीव भाई के आंदोलन से लाखो लोग जुड़ रहे है मगर ये एक कटु सत्य है की प्रबंधन की कमी के कारण उसी प्रकार कुछ लोग आंदोलन से दूर भी होते जा रहे हैं। उन्हे स्थायी रूप से जोड़े रखने के लिए कोई योजना नहीं दिखाई देती।विचारो और आंदोलन की दशा और दिशा का संवर्धन पिछले सालो मे हुआ है उससे बहुत जायदा संतुष्टि  समर्थको को नहीं हुई होगी। 

इन सारे विरोधाभाषों के बाद राजीव भाई का एक स्वाभाविक समर्थक  होने के कारण  अपने सभी मित्रों को  इस आंदोलन से जुडने का अनुरोध करता हूँ और ऐसा विश्वास है की  भाई प्रदीप जी के नेतृत्व मे ये आंदोलन सफल होगा और राजीव भाई की विचारधारा का क्रियान्वयन वास्तविकता के धरातल पर सक्रिय रूप से आने वाले वर्षों मे दिख पाए।

राजीव भाई जी को उनके जन्मदिवस एवं द्वितीय पुण्यतिथि पर सादर नमन एवं श्रद्धांजलि.

रविवार, 25 नवंबर 2012

इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद और उसका मूल कारण ( भाग-2)

इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद और उसका मूल कारण ( भाग-1) मे आप ने पढ़ा की तमाम संधियों और युद्धों के बाद भी किस प्रकार  इज़राइल और फिलिस्तीन का विवाद अब अरबों यहूदियों,यूरोप और संयुक्त राष्ट्र के बीच एक जटिल समस्या बन गया ॥ भाग 1 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे 

अरब बिद्रोह के बाद ब्रिटेन की सरकार ने एक श्वेत पत्र जारी किया जिसके अनुसार हर साल मे 10 हजार यहूदी परिवारों को फिलिस्तीन मे 5 सालो के लिए बसने की अनुमति होगी। उसके बाद अरबों के अनुमोदन के बाद ही वो फिलिस्तीन मे रह सकते है। यहूदियों ने इस श्वेत पत्र को सिरे से नकार दिया । अब यहूदियों और अरबों का फिलिस्तीन पर कब्जे के लिए संघर्ष भूमिगत सशस्त्र समूहो के माध्यम से शुरू हो गया जिसमे प्रकारांतर से ब्रिटेन ,नाजी और अरब देश भी सहायक होने लगे । स्वेत पत्र के बाद यहूदियों ने अरबों के साथ साथ ब्रिटेन को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया था । अब सारे यहूदी बिद्रोही समूह एकजुट होकर ब्रिटेन के अधिकारियों क्लबो और ट्रेनों को निशाना बनाने लगे । वो किसी भी प्रकार ब्रिटेन को फिलिस्तीन से बाहर कर देना चाहते थे ।
सन 1945 मे ब्रिटेन मे लेबर पार्टी की सरकार आई और उसने यहूदियों को ये आश्वासन दिया की वो  ब्रिटेन सरकार के स्वेत पत्र को वापस लेंगे और यहूदियों की मातृभूमि का समर्थन करेंगे साथ ही साथ विश्व के हर कोने से यहूदियों के फिलिस्तीन मे पुनर्वसन की प्रक्रिया दोगुनी की जाएगी ।हालांकि यहूदी बिद्रोही समूहों के लिए ये आश्वासन भर सिर्फ काफी नहीं था उन्होने अवैध रूप से यहूदियों को फिलिस्तीन मे लाना जारी रखा । अमरीका और अन्य देशो ने भी अब ब्रिटेन पर फिलिस्तीन मे यहूदियों के पुनर्वास के लिए दबाव डालना शुरू किया । एक एंग्लो - अमेरिकन जांच के लिए समिति ने तत्काल 1 लाख यहूदियों के फिलिस्तीन मे पुनर्वास की सिफ़ारिश की । इसका अरबों ने विरोध किया और वो भी ब्रिटेन पर दबाव डालने लगे ॥ 
ये वो समय था जब ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज अस्त हो रहा था । अब ब्रिटेन के लिए फिलिस्तीन एक गले की हड्डी बन गया था ब्रिटेन ने कोई सूरत न देखते हुए उसे संयुक्त राष्ट्र के हवाले करके खुद को विवाद से अलग करने मे भलाई समझी और फिलिस्तीन के भविष्य का निर्धारण अब संयुक्त राष्ट्र के हाथो मे था ॥
संयुक्त राष्ट्र ने अर्ब और यहूदियों का फिलिस्तीन मे टकराव देखते हुए फिलिस्तीन को दो हिस्सों अरब राज्य और यहूदी राज्य(इज़राईल) मे विभाजित कर दिया । जेरूसलम जो ईसाई 
,अरब और यहूदी तीनों के लिए धार्मिक महत्त्व का क्षेत्र था उसे अंतर्राष्ट्रीय प्रबंधन के अंतर्गत रखे जाने का प्रस्ताव हुआ ।इस व्यवस्था में जेरुसलेम को " सर्पुर इस्पेक्ट्रुम "(curpus spectrum) कहा गया ।  29 नवम्बर 1947 को संयुक्त राष्ट्र मे  ये प्रस्ताव पास हो गया । यहूदियों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया जबकि अरबों ने इसे नकार दिया। इस प्रस्ताव के अंतर्गत फिलिस्तीन को दो बराबर हिस्सों अरब राज्य और यहूदी राज्य(इज़राईल) मे विभाजित किया जाना था मगर इस विभाजन मे सीमा रेखा काफी जटिल और उलझी हुई थी। इस कारण थोड़े ही दिन मे ये परिलक्षित हो गया की ये विभाजन लागू नहीं किया जा सकेगा। इस विभाजन मे फिलिस्तीन की 70% अरब लोगो को 42% क्षेत्र मिला था जबकि यही लोग विभाजन के पहले 92% क्षेत्र पर काबिज थे अतः किसी भी प्रकार से ये विभाजन अरबों को मान्य नहीं था । 
सन 1948 के मई महीने मे ब्रिटेन की सेनाएँ वापस लौट गयी हलाकी इस समय तक इज़राइल और फिलिस्तीन की वास्तविक सीमा रेखा निर्धारित नहीं हो पायी थी। अब यहूदियों और फिलिस्तीनी अरबों मे खूनी टकराव शुरू हो गया । १४ मई१९४८ को यहूदियों ने स्वतन्त्रता की घोषणा करते हुए इज़राइल नाम के एक नए देश का ऐलान  कर दिया। अगले ही दिन अरब देशों- मिस्रजोर्डनसीरियालेबनान और इराक़ ने मिलकर इज़राइल पर हमला कर दिया। इसे 1948 का युद्ध का नाम दिया गया और यही से अरब इज़राइल युद्ध की शुरुवात हो गयी। इज़राइल के इस संघर्ष को अरबों ने "नक़बा" का नाम दिया हजारो अरब बेघर हुए और इज़राइली कब्जे वाले इलाको से खदेड़ दिये गए। हालांकि इज़राइली हमेशा ये कहते आए की ये सारे अरब लोग अरब की सेनाओं को रास्ता देने के लिए भाग गए थे ,मगर इज़राइल ने एक कानून पारित किया जिसके अनुसार जो फिलिस्तीनी (अब इज़राइली अरब) नक़बा के दौरान भाग गए थे वो इज़राइल वापस नहीं आ सकते और उनकी जमीनो पर विश्व के सभी हिस्सों से आने वाले यहूदियों को बसाने लगी इज़राइली सरकार ।युद्ध के शुरुवाती कुछ महीनो मे अरब देशो  की सेना इज़राइल पर भारी पड़ रही थी जून 1948 मे एक  युद्ध विराम ने अरबों और इजराइलियो दोनों को पुनः तैयारिया करने का मौका दिया यही अरब देश गलती कर बैठे और इजराइलियों ने तैयारी पूरी की चेकोस्लोवाकिया के सहयोग से अब युद्ध का पलड़ा इजराइलियों की तरफ झुक गया और अंततः इजराइलियों की विजय और अरबों की इस युद्ध मे हार हुई । इसके साथ साथ शरणार्थी समस्या की शुरुवात ।
इज़राइल फिलिस्तीन का मानचित्र समयानुसर 
1949 मे समझौते से जार्डन और इज़राइल के बीच ग्रीन लाइन नामक सीमा रेखा का निर्धारण हुआ। वेस्ट बैंक(जार्डन नदी के पश्चिमी हिस्से) पर जार्डन और गाजा पट्टी पर मिस्र(इजिप्ट) का कब्जा हो गया । इस पूरे घटनाक्रम मे लगभग 1 लाख फिलिस्तीनी बेघर हुए॥ ये सभी फिलिस्तीनी आस पास के अरब देशो मे जा शरणार्थी के रूप मे जीवन व्यतीत कर रहे थे ॥  इज़राइल को ११ मई ,१९४९  को सयुक्त राष्ट्र की मान्यता हासिल  हुई । हलाकी अरब देशो  ने कभी भी इस समझौते को स्थायी शांति समझौते के रूप मे स्वीकार नहीं किया । और दूसरी तरफ इज़राइल भी फिलिस्तीनी  शरणार्थीयों को वापस लेने के लिए तैयार नहीं हुआ।
इसके बाद इजराइलियों और फिलिस्तीनीयों अरबों के बीच खूनी संघर्ष जारी रहा । सन 1964 मे फिलिस्तीन लिबरेशन के गठन के बाद 1965 मे फिलिस्तीनि क्रांति की शुरुवात हो गयी।फिलिस्तीन लिबरेशन का गठन इज़राइल को खतम करने के उद्देश्य से हुआ था । इधर अमरीका ने अरब मे अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए इज़राइल को हथियारों और आर्थिक मदद देनी शुरू की। जून ५,१९६७ को इजराइल ने मिस्त्र ,जोर्डन सीरिया तथा इराक के खिलाफ युद्ध घोषित किया और ये युद्ध 6 दिनो तक चला इस युद्ध ने अरब जगत के सभी समीकरणों को बदल के रख दिया इज़राइल ने 1947 के यूएन क्षेत्र से कई गुना अधिक भू भाग एवं पर कब्जा कर लिया  और अब गाजा पट्टी पर भी इज़राइली कब्जा था । 6 अक्तूबर 1973 को एक बार फिर सीरिया और मिस्र ने इज़राइल पर हमला किया मगर इसमे भी उन्हे हार का सामना करना पड़ा और भूभाग गंवाना पड़ा 1974 के अरब अरब शिखर सम्मेलन मे पीएलओ को फिलिस्तीनी लोगो का प्रतिनिधि के रूप मे अधिकृत किया ।  अब संयुक्त राष्ट्र संघ मे फिलिस्तीन का प्रतिनिधित्व पीएलओ के नेता यासर अराफात कर रहे थे । इसके बाद एक तरफ कंप डेविड से लेकर ओस्लो तक शांति समझौते होते   रहे तो दूसरी ओर पीएलओ और मोसाद मे खूनी संघर्ष जारी था। मगर इज़राइल और फिलिस्तीन की सीमा का निर्धारण नहीं हुआ ।
मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात इज़राइल को मान्यता देने वाले पहले अरब नेता बने. अरब देशों ने मिस्र का बहिष्कार किया ।अनवर सादात  ने  1977 मे इसराइली संसद में भाषण दिया. सादत ने चुकी इजराइलियो से संधि की अतः अरब चरमपंथियों ने बाद मे उनकी 1981 मे हत्या कर दी। 1987 मे फिलिस्तीनीयों ने मुक्ति के लिए आंदोलन किया और उनका इज़राइली सेनाओं से टकराव शुरू हो गया । 13 सितंबर 1993 को अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की मध्यस्थता मे इज़रायली प्रधानमंत्री यित्साक राबीन और फिलस्तीनी स्वायत्त शासन के अध्यक्ष यासिर अराफत ने नार्वे की राजधानी ओस्लो मे ओस्लो शांति समझौता किया, समझौता के अनुसार इज़राइल 1967 से अपने क़ब्ज़े वाले फिलस्तीनी इलाकों से हटेगा। एक फिलस्तीनी प्रशासन स्थापित किया जाएगा और एक दिन फिलस्तीनियों को एक देश के तौर पर स्वतंत्रता मिलेगी। गाजा पट्टी के फिलिस्तीन के कब्जे मे आते ही हमास की हिंसक गतिविधियां और तेज हो गयी और उसी अनुपात मे इज़राइली प्रतिरोध । ओस्लो समझौते से जिस अरब इज़राइल संघर्ष पर विराम लगता प्रतीत हुआ समस्या पुनः वही आ के खड़ी  हो गयी॥ समय समय पर हमास द्वारा इज़राइल पर गाजा पट्टी से हमले किए जाते रहते हैं और इज़राइल के लिए अपने नागरिकों की  आत्मरक्षा के लिए बार बार युद्ध ॥॥इजरायल हर हमले के बाद कहता है की वो हमास को निशाना बना रहा है लेकिन अरब  देश इन हमलो मे आम मुसलमानो के मारे जाने की बात कहते हैं॥   इस्लाम यहूदी और ईसाई धर्म के उत्पत्ति काल से जुड़ी हुई ये समस्या अरब और पश्चिमी जगत के  सामरिक हितो के कारण और भी जटिल होती जा रही है आज भी लाखो फिलिस्तीनी शरणार्थी घर वापसी की रह देख रहे हैं तो दूसरी ओर इज़राइल हमास के हमलो से निपट रहा है। 
गाजा पट्टी पर इज़राइली बमबारी का एक दृश्य 

शनिवार, 24 नवंबर 2012

इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद और उसका मूल कारण ( भाग-1)


हम अक्सर अरब इज़राईल और इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद के बारे मे सुनते रहते हैं। अभी हाल  के दिनो मे भी दोनों देश के मध्य हुए  भयानक युद्ध के कारण जानमाल की काफी क्षति दोनों पक्षो को उठानी पड़ी॥ इस विवाद के मूल मे जाए तो इस विवाद की शुरुवात 19वी शताब्दी के अंत मे प्रखर होते अरब राष्ट्रवाद और यहूदी राष्ट्रवाद मे है।
यहूदी धर्म इस्लाम और ईसाई धर्म से पूर्व का धर्म है । इनकी धार्मिक पुस्तक को ओल्ड टेस्टामेण्ट कहते हैं,जिसे बाइबिल का प्रथम भाग  या पूर्वार्ध भी कहते हैं।" पैगंबर अब्राहम (अबराहम या इब्राहिम)जो ईसा से 2000 वर्ष पूर्व हुए थे उन्हे इस धर्म का प्रवर्तक कहा जाता है  । पैगंबर अलै. अब्राहम के पोते का नाम हजरत अलै. याकूब था। हजरत अलै. याकूब का एक नाम इजरायल भी था,जिसके नाम पर आज का यहूदी राष्ट्र इजरायल है । हजरत अलै. याकूब के एक पुत्र का नाम जूदा या यहूदा था यहूदा के नाम पर ही इसके वंशज यहूदी कहलाए । अब्राहम को यहूदीमुसलमान और ईसाई तीनों धर्मों के लोग अपना पितामह मानते हैं। आदम से अब्राहमअब्राहम से मूसायहाँ तक ईसाई इस्लाम और यहूदी सभी धर्मो के पैगंबर एक ही है
मान्यताओं के अनुसार ईसा मसीह को अब्राहम का वंशज मान कर एक समुदाय ने ईसाई धर्म को मानना शुरू किया जबकि बाइबिल के ओल्ड टेस्टमेंट को मानने वालों ने ईसा मसीह  को ईश्वर का पुत्र स्वीकार नहीं किया और वो अब तक अपने मसीहा के अवतार के इंतजार मे है। ओल्ड टेस्टामेण्ट मे कही भी ये स्पष्ट नहीं है की ईश्वर का मसीहा कब अवतरित होगा। इस्लाम की तरह ये एकेश्वरवाद मे विश्वास रखते हैं । मूर्ति पूजा के विरोधी यहूदी खतने पर भी इस्लाम के साथ खड़े हुए दिखाई देते हैं।
4000 साल पुराने यहूदी धर्म का आधिपत्य मिस्र,इराकइजराइल सहित अरब के अधिकांश हिस्सों पर राज था। धीरे धीरे यहूदी भी इज़राइल और जुड़ाया कबीलो मे बट गए ये लोग फारसी यूनानी और ग्रीक कई शासनो के अधीन रहे। रोमन साम्राज्य के बाद जब ईसाई धर्म का उदय हुआ तो यहूदियो पर अत्याचार शुरू हो गए॥ इस्लाम के उदय के बाद इन पर अत्याचार का बढ़ाना  स्वाभाविक था। धीरे धीरे यहूदियों के हाथ  से उनका देश इज़राइल जाता रहा और प्राचीन काल से 20वी शदी तक यहूदियों पर जितने अत्याचार हुए हैं शायद ही किसी जाति पर हुआ हो ॥हिटलर की यहूदियों से दुश्मनी और लाखों यहूदियों की सामूहिक नर संहार इसी कड़ी का उदाहरण है। आज भी पूरा अरब जगत इज़राइल का नामोनिशान मिटा देना चाहता है ।
निरंतर होते अत्याचारो के कारण यूरोप के कई हिस्सों मे रहने वाले यहूदी विस्थापित हो कर फिलिस्तीन आने लगे। 19वी शताब्दी के  के अंत तक यहूदी मातृभूमि (Jewish Homeland") इज़राइल  की मांग जोरों शोरों से उठने लगी ।यहूदियों ने  फिलिस्तीन के अंदर एक अलग राज्य यहूदी मातृभूमि  की मांग की जो जर्मनी या तुर्की के अधीन हो । उन्होने उस समय फिलिस्तीन की मुसलमान जनसंख्या को नजरंदाज कर दिया । यहूदियों का ये सोचना की मुसलमान जनसंख्या यहूदी मातृभूमि की मांग स्वीकार होने के बाद आस पास के अरब देशो मे चली जाएगी ,इस विवाद की नीव मे था ।  यहूदियों ने उस फिलिस्तीन की कल्पना की जिसमे यूरोप से आए हुए लाखो यहूदी निर्णायक बहुमत मे होंगे । प्रथम जियोनिस्ट कांग्रेस की बैठक स्विट्जर लैंड मे हुआ और वहाँ World Zionist Organization (WZO). की स्थापना की गयी । तमाम बैठको और वार्तालापों के बाद 1906 मे विश्व यहूदी संगठन (WZO) ने फिलिस्तीन मे यहूदी मातृभूमि बनाने का निर्णय लिया ।इससे पूर्व अर्जेन्टीना को यहूदी मातृभूमि बनाने को लेकर भी चर्चा हुई थी।
यहूदियों की ये यहूदी मातृभूमि  की कल्पना फिलिस्तीन की बढ़ती हुई मुस्लिम जनसंख्या के कारण एक कभी न खत्म होने वाले विवाद का कारण बन रही थी 1914 तक फिलिस्तीन की कुल जनसंख्या लगभग 7 लाख थी जिसमे 6 लाख अरब मूस्लिम थे और लगभग 1 लाख यहूदी । प्रथम विश्व युद्ध के समय तुर्की ने जर्मनी आस्ट्रिया और हंगरी के साथ मित्र सेनाओं (जिनमे ब्रिटेन भी शामिल था) के विरोध मे  गठबंधन कर लिया। उस समय फिलिस्तीन पर तुर्की सेना का शासन था । इस युद्ध से अरबों और यहूदियों दोनों का भरी नुकसान हो रहा था उसी समय तुर्की के सैनिक शासन ने फिलिस्तीन से उन सभी यहूदियों को खदेड़ना शुरू किया जो रूस और यूरोप के अन्य देशो से आए हुए थे । इसी समय ब्रिटेन ने  अरब और फिलिस्तीन को तुर्की शासन से मुक्ति दिलाने के लिए प्रतिबद्धता जताई बशर्ते अरब देश और फिलिस्तीन तुर्की के विरोध मे मित्र सेनाओं का साथ दे।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन और फ्रांस ने एक गुप्त समझौते  जिसे Sykes-Picot Agreement भी कहते है के अंतरगत  पूरे अरब जगत को दो "प्रभाव क्षेत्रों" मे बाट दिया गया जिसमे रूस की भी स्वीकृति थी । इसके अंतरगत सीरिया और लेबनान फ्रांस के प्रभाव क्षेत्र मे जॉर्डन इराक और फिलिस्तीन ब्रिटेन के क्षेत्र मे और फिलिस्तीन का कुछ क्षेत्र मित्र देशो की संयुक्त सरकार  के क्षेत्र मे था । रूस को  लिए इस्तांबुलतुर्की और अर्मेनिया का कुछ इलाका मिल गया ।
ब्रिटेन को यूएन जनादेश के अनुसार फिलिस्तीन और यहूदी मातृभूमि का क्षेत्र  
सन 1917 मे  ब्रिटेन के विदेश सचिव लार्ड बेलफोर और यहूदी नेता लार्ड रोथसचाइल्ड के बीच एक पत्रव्यवहार हुआ जिसमे लार्ड बेलफोर ने ब्रिटेन की ओर से ये आश्वासन दिया था की फिलिस्तीन को यदियों की मातृभूमि के रूप मे बनाने के लिए वो अपना सम्पूर्ण प्रयास करेंगे हालाँकि जनसंख्या के हिसाब से फिलिस्तीन मे  मुसलमान आबादी उस समय फिलिस्तीन की कुल आबादी की तीन चौथाई से भी ज्यादा थी। इस पत्रव्यवहार को बाद मे “The Balfour declaration”. का नाम दिया गया। मगर अब फिलिस्तीन मुस्लिमो ने "Balfour declaration" का विरोध करना शुरू किया।15 अप्रैल सन 1920 को इटली मे हुए San Remo Conference(सैन रेमो कान्फ्रेंस) मे मित्र देशो ने अमरीका ने फिलिस्तीन के लिए ब्रिटेन को अस्थायी जनादेश  दिया समझौते के अनुसार ब्रिटेन जो की फिलिस्तीन का प्रशासन देखेगा वो फिलिस्तीन को यहूदियों की मातृभूमि के रूप मे विकसित करने के लिए राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ बनाएगा। 

इस जनादेश के अनुसार फिलिस्तीन मे यहूदी हितो को देखने वाली अजेंसी "The Jewish Agency for Palestine,"  से ब्रिटेन का प्रशासन सामंजस्य बना के यहूदी हितों एवं उनके पुनर्वास को आसान करेगा। सन 1920 मे ही ब्रिटेन ने सर हरबर्ट सैमुएल को ब्रिटेन  के फिलिस्तीन कमे पहले  उच्चायुक्त के रूप मे भेजा। (सैन रेमो कान्फ्रेंस) मे जो क्षेत्र यहूदी मातृभूमि के लिए निर्धारित किया गया था वो यहूदी संगठनो की मांग की अपेक्षा काफी बड़ा क्षेत्र था । ये बात भी काही जाने लगी की ये निर्धारण चर्च ने किया और कही कही ऐसे भी विचार रखे गए की ब्रिटेन के पास यहूदी मातृभूमि के लिए कोई सुदृढ़ खाका नहीं था।
सन 1922 मे ब्रिटेन ने जनादेश  वाले हिस्से को दो हिस्सों मे बाट दिया पहला हिस्सा जो अपेक्षाकृत बड़ा था वो ट्रांसजार्डन(बाद मे जार्डन) कहा गया और छोटा हिस्सा फिलिस्तीन कहा गया। दोनों हिस्से ब्रिटेन के प्रभाव क्षेत्र मे ही थे । बाद मे जार्डन को एक स्वतंत्र देश के रूप मे मान्यता मिल गयी । मगर इसके साथ यहूदियों का एक बड़ा हिस्सा इसे अपने साथ किए गए विश्वासघात के रूप मे देखने लगा क्यूकी  प्रस्तावित यहूदी मातृभूमि का एक बहुत बड़ा हिस्सा ट्रांसजार्डन के रूप मे उनके हाथ से निकाल चुका था ।
ट्रांसजार्डन अलग करने के बाद बचा क्षेत्र 
अब जैसा की मित्रदेशों का ब्रिटेन को जनादेश था फिलिस्तीन मे एक स्थानीय और स्वशासनीय सरकार का प्रबंध मगर यहूदी ऐसे किसी भी स्वशासनीय सरकार  के प्रबंध से डरे हुए थे क्यूकी इसमे जनसंख्या के अनुपात से अरबों की  बहुलता हो जाती दूसरी तरफ अरबों को कोई भी ऐसी व्यवस्था स्वीकार नहीं थी जिसमे यहूदियों की कोई भी भागीदारी हो। अतः किसी भी प्रकार की व्यवस्था नहीं बन पायी॥ 

अब धीरे धीरे अरबों और यहूदियों मे टकराव शुरू हो गया और दंगे होने लगे । अरबों के अनुसार फिलिस्तीन मे यहूदियों के विश्व के अन्य हिस्सो से आ के बसने  के कारण फिलिस्तीनी अरबों को निर्वासित होना पड़ेगा । नाजियों से पहले भी पोलैंड और पूर्वी यूरोप के कई भागो से यहूदी फिलिस्तीन आने लगे हिटलर के नाजी शासन मे यहूदी एजेंसियों ने हिटलर से एक समझौता कर हजारो लोगो को फिलस्तीन मे बसाकर उनकी जान बचाई। सन 1936 मे अरबों ने विद्रोह  कर दिया। विद्रोह का कारण ब्रिटेन के फौजों द्वारा  एक मुस्लिम धर्मगुरु की हत्या थी जो फिलिस्तीन मे यहूदियों और ब्रिटेन के खिलाफ झण्डा उठाए हुए था। इस विद्रोह मे हजारो अरब और यहूदी मारे गए। इस विद्रोह को हवा देने मे यहूदियों का कट्टर दुश्मन हिटलर और इटली के फासिस्ट शामिल थे । इसके बाद इंग्लैंड ने एक प्रस्ताव रखा जिसमे एक  यहूदी मातृभूमि दूसरा फिलिस्तीनी अरबों का क्षेत्र होगा इसे अरब देशो ने नकार दिया ॥

अगले लेख मे संयुक्त राष्ट्र द्वारा इज़राइल फिलिस्तीन का विभाजन ,गजापट्टी का स्थानातरण और फिलिस्तीन इज़राइल के मध्य हुए कई समझौते एवं कभी न खतम होने वाले युद्ध का वर्णन 

बुधवार, 21 नवंबर 2012

डेंगू और कांग्रेसी इच्छाशक्ति के बीच झूलती कसाब की फाँसी



आज सुबह अजमल आमिर कसाब को फांसी दे दी गयी ॥ सभी हिंदुस्थानियों के लिए खुशी की मगर अप्रत्याशित खबर और पिछले 8 साल के कांग्रेस शासन की सबसे अप्रत्याशित खबर । हालांकि  मुंबई पर हमलावर के लिए ये सजा कोई अप्रत्याशित नहीं थी मगर अप्रत्याशित है फाँसी देने का समय । गुजरात चुनावों मे 1 महीने का भी समय नहीं बचा है । और ये बात पूरी तरह से काही जा सकती है की कहीं न कहीं कांग्रेस सरकार के नीति निर्धारक अफजल और कसाब के मुद्दे पर चुनावो से पहले हाथ डालकर कोई नया प्रयोग नहीं करना चाहते होंगे।  इसलिए भी फाँसी की टाइमिंग पर सवाल उठने लाज़मी है । कुछ दिनो पहले खबर आई थी की कसाब को डेंगू है ।दबे जबान मे ये बाते भी उठने लगी है कसाब डेंगू से मरा सरकार ने इज्जत बचाने के उद्देश्य से आनन फानन मे इसे फाँसी मे तब्दील कर दिया । कुछ विचारणीय है की महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री  के अनुसार कसाब को यरवडा जेल में ही दफना दिया गया मगर जेल मैन्युएल के अनुसार उस धर्म का कोई धर्मगुरु फाँसी देने के बाद अंतिम क्रिया के समय उपस्थित रहना चाहिए ध्यान रहे ओसामा को दफनाने की खबर मे भी ये ध्यान रखा गया था मगर भारत सरकार की जल्दी का कारण क्या था ? फाँसी की सजा की रेकार्डिंग(फाँसी होने के पूर्व तक की) या कोई अन्य साक्ष्य भी जारी नहीं किए गए जिससे पता चले की कसाब को फाँसी ही हुई है ।इन सारे सवालो से बचने के लिए सरकार को कसाब के फाँसी के पहले तक की रेकार्डिंग सार्वजनिक करनी चाहिएजो कांग्रेस अफजल गुरु की फाँसी पर चीख चीख कर बोलती थी की राष्ट्रपति के पास फाँसी की  दया याचिका क्रमानुसार भेजी जाएगी इसलिए अफजल को अभी फाँसी नहीं दे सकते उसी कांग्रेसी गृहमंत्रालय ने अचानक 17वें नंबर के कसाब को पहले नंबर पर क्यू रखा?? इधर कसाब का वकील ने प्रश्न उठाया है जी इसकी जानकारी उसे नहीं दी गयी॥ ऐसे सारे कई प्रश्न है जिसका जबाब आने वाले भविष्य मे कांग्रेस सरकार को देना पड़ेगा ।
प्रश्न ये भी है की सिर्फ कसाब की फाँसी ही काफी है मुंबई के गुनहगारो को सजा देने के लिए । कसाब एक  मोहरा था आईएसआई और उसके गुर्गों का ॥बाकी मास्टरमाइंड पर कोई कार्यवाही करने मे भारत सरकार सफल होगी या डोजीयर के आदान प्रदान करके कर्तव्यों की इतिश्री कर लेगी एक ओर जहां इज़राइल जैसा छोटा सा देश घर मे घुसकर हर कीमत पर अपने नागरिकों की हत्या का बदला लेता है हमारी कांग्रेस सरकार पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के साथ ट्वेन्टी ट्वेन्टी खेलने मे व्यस्त है ॥
यदि ये तथकथित फाँसी सही मान भी ली जाए तो इसे कांग्रेस की इच्छाशक्ति से ज्यादा मजबूरी कहा जा सकता है ,वैसे भी सरकार की साख गिर रही है 26/11 की चौथी बरसी से पहले कसाब को लटकाकर कांग्रेस अपने बिखरते हुए अस्तित्व को बचाने का एक आखिरी प्रयास कर रही है ॥
 हम ये कैसे भूल सकते हैं की जिन शहीदो ने अपनी जान दे कर भारतीय संसद और संसद के कर्णधारो की रक्षा की थी उनकी हत्या करने वाला अफजल अब भी जेल मे मजे से बिरयानी का आनंद ले रहा है और पिछले कई सालो से कांग्रेस ने मुस्लिम वोटो की खातिर उसे खुलेआम संरक्षण दे रखा है । इस तथाकथित फाँसी के घटनाक्रम से अब पाकिस्तान मे हिंदुस्थानी कैदी सरबजीत सिंहको जल्द से जल्द फाँसी देने की मांग उठने लगेगी और इसमे संदेह नहीं की पाकिस्तान अपनी जन्मजात मक्कारी दिखते हुए सरबजीत को फाँसी दे कर कसाब की फाँसी का जबाब दे ।
बहरहाल डेंगू और कांग्रेसी इच्छाशक्ति के बीच झूलती कसाब की फाँसी का ये समय  मुंबई हमलो मे बलिदान हुए लोगो और उनके परिवार वालों समेत समस्त हिंदुस्थानियों को शांति और खुशी देने वाला है और दिग्विजय सिंह जैसे नेता के मुह पर एक करारा तमाचा जिसके अनुसार इन हमलो मे आरएसएस जैसे राष्ट्रवादी  संगठन का हाथ था ॥

जय श्री राम

रविवार, 18 नवंबर 2012

नहीं रही अब सिंह गर्जना - बाला साहेब ठाकरे को श्रद्धांजलि


बाला साहेब ठाकरे अब हमारे बीच नहीं रहे। ये खबर अप्रत्याशित तो नहीं मगर फिर भी  ये खबर सुनकर ऐसा लगा जैसे बरसों से खड़ा वटवृक्ष जिसकी छाया मे हजारो लोग पले बढ़े वो अब नहीं रहा। शायद प्रथम बार किसी राजनेता की मृत्यु पर आम जनमानस के आँसू निकले॥ क्यूकी शायद तमाम विवादों के बाद भी बाला साहब को लोग एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप मे देखते थे जिसकी कथनी और करनी मे कोई अंतर नहीं रहा॥ बात 1960 के दशक की है जब बाला साहब ने फ़्री प्रेस जर्नल की कार्टूनिस्ट की नौकरी छोड़ कर अपने पत्र "मार्मिक" के माध्यम से सक्रिय रूप से सामाजिक मे कदम रखा ॥ ये दौर  तब श्रीमती इन्दिरा गांधी और मजबूत होते मजदूर यूनियन का था ॥ तब किसी ने नहीं सोचा था की आर के लक्ष्मण के साथ बैठ कर कार्टून बनाने वाला ये दुबला पतला व्यक्ति हिंदुस्थान की राजनीति और हिन्दुत्व की विचारधारा मे एक ऐसी अमित छाप छोड़ जाएगा जिसे उसके जाने के बाद भी नजरंदाज करना संभव नहीं होगा। "आम मराठी मानुष"के मुद्दे से राजनीति शुरू करने वाले ठाकरे की आलोचना एक क्षेत्रवादी नेता के रूप मे अक्सर होती रही है मगर इस आलोचना के पीछे कहीं न कहीं ठाकरे की स्पष्टवादिता रही है ॥ वो जैसे थे वैसे ही दिखते थे वैसा बोलते थे ॥ शायद आज कल के राजनीतिज्ञों की तरह दोगला चरित्र  उनके पास नहीं था और यही कारण है की आप उन्हे या उनकी विचारधारा के समर्थक या विरोधी हो सकते हैं उन्हे नजरंदाज नहीं कर सकते ॥क्षेत्रवाद की राजनीति का आरोप लगाने से पहले हमे वर्तमान राजनीति का समीकरण समझना होगा जो इससे भी एक सीढी नीचे गिर गया है वो है "जातिगत राजनीति" । हम भले ही एक राज्य मे हो मगर क्या आज हम आपसा मे जातिगत तौर पर नहीं बटे हैं?

क्या दोगली बाते करने वाले राजनेता हमे जतियों मे नहीं बाटते इस जातिगत विभाजन के शुरू से ही विरोधी रहे बाला साहेब''मराठी मानुष" की राजनीति बाला साहेब की स्थानीय राजनीतिक आवश्यकता थी मगर हिन्दुत्व की विचारधारा और भगवा ध्वज के प्रति समर्पण  उनका व्यक्तित्व था ,यही कारण है की आज उत्तर भारतीय हो या दक्षिण का हिन्दू बाला साहेब का जाना उसके लिए एक व्यक्तिगत क्षति है ।
सामना अखबार के माध्यम से अपने विचारो को आम मराठी मानुस  तक रखने वाले बाला साहेब ने हिंदीभाषियों से संपर्क बनाने के लिए "दोपहर का सामना" नाम का हिन्दी अखबार भी निकाला॥ बाला साहेब एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होने अपने मनोभावों को शत प्रतिशत अपने वक्तव्यों मे पिरोया था फिर चाहे इन्दिरा गांधी का समर्थन हो ,वाजपेयी का विरोध या हिटलर के भाषणो की प्रसंशा॥
बाबरी मस्जिद गिरने के बाद जब हर कोई ,चाहे वो भाजपा के राष्ट्रवादी नेता हो या संघ के संचालकइससे अपने आप को अलग कर रहा था "तब इसी हिन्दू शेर की ये दहाड़ थी की ये काम मेरे शिवसैनिको का है और मुझे गर्व है इस पर"॥ ये वक्तव्य किस क्षेत्रवाद का समर्थन करता है ?? बाबरी ढांचा उत्तर भारत मे था और ठाकरे मुंबई मे ॥ जब अमरनाथ यात्रा पर जेहादियों ने धमकी दी तो कश्मीर मे उनकी औकात बताने के लिए कोई हिन्दू वीर सामने आया तो बाला साहेब ॥ कभी किसी पद की इच्छा न रखते हुये हिंदुओं के हृदयरूपी सर्वोच्च पद  पर बैठने वाले बाला साहेब का ये था असली व्यक्तित्व।
बाला साहेब हमारे बीच रहे या न रहे हिंदुओं की अस्मिता के पुनर्जागरण का अभियान चलाने वाला ये हिन्दू शेर और उसका आह्वान "गर्व से कहो हम हिन्दू है ,सर्वदा हमारी अंतरात्मा की आवाज रहेगा और बाला साहेब की हिन्दू हृदय सम्राट की छवि सभी राष्ट्रवादियों के हृदय मे अमित है...
भावभीनी श्रद्धांजलि ॥

बाला साहब की यात्रा मे उमड़ा जन सैलाब और वीरान रुकी हुई मुंबई....जो कभी नहीं रुकती थी॥ 
 


खाली स्टेशन
वीरान मुंबई 




आशुतोष की कलम से ... 

रविवार, 11 नवंबर 2012

अयोध्या एवं राम जन्मभूमि का इतिहास -4(History of Ayodhya and Ram Temple-4))


जन्मभूमि के लिए हुए अनेको संघर्ष:
पिछले भाग मे आप ने पढ़ा की किस प्रकार  बाबर,वजीर मीरबाँकी खा के अत्याचारों कूटनीति और महात्माश्यामनन्द जी महाराज के दो आस्तीन में छुरा भोंकने वाले शिष्यों हजरत कजल अब्बास मूसा और जलालशाह के धोखेबाजी के फलस्वरूप रामजन्मभूमि का मंदिर गिराया गया और एक विवादित ढांचें (जिसे कुछ भाई मस्जिद का नाम देते हैं) का निर्माण हुआ ॥ अब जन्मभूमि को मुक्त करने के लिए हुए युद्धों का वर्णन ॥ बाबर के समय में चार आक्रमण:
(१) राजा महताब सिंह का पहला आक्रमण: बाबर के समय जन्मभूमि को मुसलमानों से मुक्त करने के लिए सर्वप्रथम आक्रमण भीटी के राजा महताब सिंह द्वारा किया गया। जिस समय मंदिर को गिराकर मस्जिद बनाने की घोषणा हुई उस समय सम्पूर्ण हिन्दू जनमानस में एक प्रकार से क्रोध और क्षोभ की लहर दौड़ गयी।  उस समय भीटी के राजा महताब सिंह बद्री नारायण की यात्रा करने के लिए निकले थे,अयोध्या पहुचने पर रास्ते में उन्हें ये खबर मिली तो उन्होंने अपनी यात्रा स्थगित कर दी। चुकी महताब सिंह के पास सेना छोटी थी अतः उन्हें परिणाम मालूम था मगर उन्होंने निश्चय किया की रामलला के मंदिर को अपने जीते जी ध्वस्त नहीं होने देंगे उन्होंने सुबह सुबह अपने आदमियों को भेजकर सेना तथा कुछ हिन्दुओं को की सहायता से १ लाख चौहत्तर हजार लोगो को तैयार कर लिया. बाबर की सेना में ४ लाख ५० हजार सैनिक थे। युद्ध का परिणाम एकपक्षीय हो सकता था मगर रामभक्तों ने सौगंध ले रक्खी थी रक्त की आखिरी बूंद तक लड़ेंगे जब तक प्राण है तब तक मंदिर नहीं गिरने देंगे। भीटी के राजा महताब सिंह ने कहा की बद्री नारायण की यात्रा करने के लिए निकला था यदि वीरगति को प्राप्त हुआ तो सीधा स्वर्ग गमन होगा और उन्होंने युद्ध शुरू कर दिया । रामभक्त वीरता के साथ लड़े ७० दिनों तक घोर संग्राम होता रहा और अंत में राजा महताब सिंह समेत सभी १ लाख ७४ हजार रामभक्त मारे गए बाबर की ४ लाख ५० हजार की सेना के अब तीन  हजार एक सौ पैतालीस सैनिक बचे रहे। इस भीषण कत्ले आम के बाद मीरबांकी ने तोप लगा के मंदिर गिरवाया।   

(2) देवीदीन  पाण्डेय द्वारा द्वितीय आक्रमण:(३ जून १५१८-९ जून १५१८)  राजा महताब सिंह और लाखो हिन्दुओं को क़त्ल करने के बाद  मीरबांकी ने तोप लगा के मंदिर गिरवा दिया मंदिर के मसाले से ही मस्जिद का निर्माण हुआ पानी की जगह मरे हुए हिन्दुओं का रक्त इस्तेमाल किया गया नीव में लखौरी इंटों के साथ । उस समय अयोध्या से ६ मील की दूरी पर सनेथू नाम का एक गांव है वहां के पंडित देवीदीन पाण्डेय ने वहां के आस पास के गांवों  सराय सिसिंडा राजेपुर आदि के सूर्यवंशीय क्षत्रियों को एकत्रित किया॥   
देवीदीन  पाण्डेय  ने सूर्यवंशीय क्षत्रियों से कहा भाइयों आप लोग मुझे अपना राजपुरोहित मानते हैं ..अप के पूर्वज श्री राम थे और हमारे पूर्वज महर्षि भरद्वाज जी।  श्री राम ने महर्षि भरद्वाज से प्रयाग में दीक्षा ग्रहण की थी और अश्वमेघ में हमे १० हजार बीघे का द्वेगांवा नामक ग्राम दिया था..आज उसी मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जन्मभूमि को मुसलमान आक्रान्ता कब्रों से पाट रहे हैं और खोद रहे हैं इस परिस्थिति में हमारा मूकदर्शक बन कर जीवित रहने की बजाय जन्मभूमि की रक्षार्थ युद्ध करते करते वीरगति पाना ज्यादा उत्तम होगा॥
देवीदीन 
पाण्डेय की आज्ञा से दो दिन के भीतर ९० हजार क्षत्रिय इकठ्ठा हो गए दूर दूर के गांवों से लोग समूहों में इकठ्ठा हो कर देवीदीन पाण्डेय के नेतृत्व में जन्मभूमि पर जबरजस्त धावा बोल दिया इस एकाएक हुए आक्रमण से  मीरबाँकी  घबरा उठा।  शाही सेना से लगातार ५ दिनों तक युद्ध हुआ शाही सेना संख्या बल में काफी बड़ी थी और रामभक्त काम मगर राम के लिए बलिदान देने को तैयार । छठे दिन मीरबाँकी का सामना देवीदीन पाण्डेय से हुआ उसी समय धोखे से उसके अंगरक्षक ने एक लखौरी ईटसे पाण्डेय जी की खोपड़ी पर वार कर दिया।  देवीदीन पाण्डेय की खोपड़ी बुरी तरह फट गयी मगर उस वीर ने अपने पगड़ी से खोपड़ी से बाँधा और तलवार से उस कायर अंगरक्षक का सर काट दिया और मीरबाँकी को ललकारा। मीरबाँकी तो छिप कर बच निकला मगर तलवार के वार से महावत सहित हाथी मर गया।  इसी बीच मीरबाँकी ने गोली चलायी जो पहले ही से घायल देवीदीन पाण्डेय जी को लगी और वो जन्मभूमि की रक्षा में वीर गति को प्राप्त हुए.जैसा की देवीदीन पाण्डेय की इच्छा थी उनका अंतिम संस्कार विल्हारी घाट पर किया गया। यह आक्रमण देवीदीन जी ने ३ जून सन १५१८ को किया था और ९ जून १५१८ को २ बजे दिन में देवीदीन पाण्डेय वीरगति को प्राप्त हो गए।  देवीदीन पाण्डेय के वंशज सनेथू ग्राम के ईश्वरी पांडे का पुरवा नामक जगह पर अब भी मौजूद हैं॥
इस युद्ध की प्रमाणिकता बाबर द्वारा लिखित "तुजुक बाबरी" से प्रमाणित होती है...बाबर के शब्दों में.....
"जन्मभूमि को शाही अख्तियारों से बाहर करने के लिए जो चार हमले हुए उनमे से सबसे बड़ा हमला देवीदीन पांडे का था, इस शख्स ने एक बार में सिर्फ तीन घंटे के भीतर गोलियों की बौछार के रहते हुए भी ,शाही फ़ौज के सात सौ आदमियों का क़त्ल किया। सिपाही की ईट से खोपड़ी  चकनाचूर हो जाने के बाद भी वह उसे अपनी पगड़ी के कपडे से बांध कर लड़ा जैसे किसी बारूद की थैली में पलीता लगा दिया गया हो आखिरी में वजीर मीरबाँकी की गोली से उसकी मृत्यु हुई ॥     सन्दर्भ "तुजुक बाबरी पृष्ठ ५४०"

(3)हंसवर राजा रणविजय सिंह द्वारा तीसरा आक्रमण: देवीदीन पाण्डेय की मृत्यु के १५ दिन  बाद हंसवर के महाराज रणविजय सिंह ने आक्रमण करने को सोचा।  हालाकी रणविजय सिंह की सेना में सिर्फ २५ हजार सैनिक थे और युद्ध एकतरफा था मीरबाँकी की सेना बड़ी और शस्त्रो से सुसज्जित थी ,इसके बाद भी रणविजय सिंह ने जन्मभूमि रक्षार्थ अपने क्षत्रियोचित धर्म का पालन करते हुए युद्ध को श्रेयस्कर समझा। 10 दिन तक युद्ध चला और महाराज जन्मभूमि के रक्षार्थ वीरगति को प्राप्त हो गए।

(4) माताओं बहनों का जन्मभूमि के रक्षार्थ आक्रमण: रानी जयराज कुमारी का नारी सेना बना कर जन्मभूमि को मुक्त करने का प्रयास। रानी जयराज कुमारी हंसवर के  स्वर्गीय महाराज रणविजय सिंह की पत्नी थ।जन्मभूमि की रक्षा में महाराज के वीरगति प्राप्त करने के बाद महारानी ने उनके  कार्य को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया और तीन हजार नारियों की सेना लेकर उन्होंने जन्मभूमि पर हमला बोल दिया। बाबर की अपार सैन्य सेना के सामने ३ हजार नारियों की सेना कुछ नहीं थी अतः उन्होंने गुरिल्ला युद्ध जारी रखा और वो युद्ध रानी जयराज कुमारी ने हुमायूँ के शासनकाल तक जारी रखा जब तक की जन्मभूमि को उन्होंने अपने कब्जे में नहीं ले लिया। रानी के गुरु स्वामी महेश्वरानंद जी ने रामभक्तो को इकठ्ठा करके सेना का प्रबंध करके  जयराज कुमारी की सहायता  की। चूकी रामजन्म भूमि के लिए संतो और छोटे राजाओं के पास शाही सेना के बराबर संख्याबल की सेना नहीं होती थी अतः स्वामी महेश्वरानंद जी ने सन्यासियों की सेना बनायीं इसमें उन्होंने २४ हजार सन्यासियों को इकठ्ठा किया और रानी जयराज कुमारी के साथ , हुमायूँ के समय १० हमले जन्मभूमि के उद्धार के लिए किये और १०वें हमले में शाही सेना को काफी नुकसान हुआ और जन्मभूमि पर रानी जयराज कुमारी का अधिकार हो गया।
लगभग एक महीने बाद हुमायूँ ने  पूर्ण रूप से तैयार शाही सेना फिर भेजी ,इस युद्ध में स्वामी महेश्वरानंद और रानी कुमारी जयराज कुमारी लड़ते हुए अपनी बची हुई सेना के साथ मारे गए और जन्मभूमि पर पुनः मुगलों का अधिकार हो गया।
इस युद्ध किया वर्णन दरबरे अकबरी कुछ इस प्रकार करता है॥
"सुल्ताने हिन्द बादशाह हुमायूँ के वक्त मे सन्यासी स्वामी महेश्वरानन्द और रानी जयराज कुमारी दोनों अयोध्या के आस पास के हिंदुओं को इकट्ठा करके लगातार 10 हमले करते रहे । रानी जयराज कुमारी ने तीन हज़ार औरतों की फौज लेकर बाबरी मस्जिद पर जो आखिरी हमला करके कामयाबी हासिल की । इस लड़ाई मे बड़ी खूंखार लड़ाई लड़ती हुई जयराजकुमारी मारी गयी और स्वामी महेश्वरानंद भी अपने सब साथियों के साथ लड़ते लड़ते खेत रहे।
संदर्भ: दरबारे अकबरी पृष्ठ 301
लेख के अगले भाग मे मै कुछ अन्य हिन्दू एवं सिक्ख वीरों वर्णन दूंगा जिन्होने  जन्मभूमि के रक्षार्थ अनेकों युद्ध किए और जन्मभूमि को मुक्त करने का प्रयास किया॥ 

जय श्री राम