शनिवार, 21 जुलाई 2012

अयोध्या एवं राम जन्मभूमि का इतिहास -2(History of Ayodhya and Ram Temple-2)


पिछली पोस्ट में आप ने पढ़ा की किस प्रकार महाराजा विक्रमादित्य ने श्री राम जन्मभूमि का पुनर्निर्माण तीर्थराज प्रयाग की आज्ञा अनुसार कराया  चौदहवी शताब्दी तक विभिन्न आक्रमणों के बाद भी राम जन्मभूमि  का अस्तित्व बचा रहा। हालाँकि आठवी शताब्दी से मुश्लिम लुटेरों का हिन्दुस्थान पर आक्रमण शुरू हो गया था मगर संगठित हिन्दू प्रतिरोध के कारण वो हिन्दुस्थान पर अधिकार नहीं कर पाए। १४ वी शताब्दी तक हिन्दुओं की शक्ति क्षय होने लगा और मुगलों का हिन्दुस्थान पर प्रभुत्त्व स्थापित होने लगा,हिन्दुस्थान मुग़ल आतताइयों के अधीन आया तो प्रथम शासक बाबर हुआ। बाबर दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुआ और उस समय जन्मभूमि महात्मा श्यामनन्द जी महाराज  के अधिकार क्षेत्र में थी। महात्मा श्यामनन्द उच्च कोटि के ख्यातिप्राप्त सिद्ध महात्मा थे। इनका प्रताप चारो और फैला था और हिन्दुधर्म के मूल सिधान्तो के अनुसार  महात्मा श्यामनन्द किसी भी प्रकार का भेदभाव किसी से नहीं रखते थे। यहाँ एक बार ध्यान देने योग्य बात ये है की जब जब हिन्दुधर्म के लोगो ने सहृदयता दिखाई है उसका खामियाजा आने वाले समय में पीढ़ियों को भुगतना पड़ा
महात्मा श्यामनन्द की ख्याति सुनकर ख्वाजा कजल अब्बास मूसा आशिकान अयोध्या आये और महात्मा श्री
 महात्मा श्यामनन्द के साधक शिष्य हो गए। महात्मा जी के सानिध्य में ख्वाजा कजल अब्बास मूसा को रामजन्मभूमि का इतिहास एवं प्रभाव विदित हुआ और उनकी श्रद्धा जन्मभूमि में हो गयी। ख्वाजा कजल अब्बास मूसा ने महात्मा श्यामनन्द से आग्रह किया की उन्हें वो अपने जैसी दिव्य सिद्धियों को प्राप्त करने का मार्ग बताएं। महात्मा श्यामनन्द ने ख्वाजा कजल अब्बास मूसा से कहा की हिन्दू धर्म के अनुसार सिद्धि प्राप्ति करने के लिए तुम्हे योग की शिक्षा दी जाएगी, मगर वो तुम सिद्धि के स्तर तक नहीं कर पाओगे क्यूकी हिन्दुओं जैसी पवित्रता तुम नहीं रख पाओगे। अतः  महात्मा श्यामनन्द  ने ख्वाजा कजल अब्बास मूसा को रास्ता सुझाते हुए कहा की “तुम इस्लाम धर्म की शरियत के अनुसार ही अपने ही मन्त्र "लाइलाह इल्लिलाह" का नियमपूर्वक अनुष्ठान करो”। इस प्रकार मैं उन महान  सिद्धियों को प्राप्त करने में तुम्हारी सहायता करूँगा। महात्मा श्यामनन्द के सानिध्य में बताये गए मार्ग से ख्वाजा  कजल अब्बास मूसा ने सिद्धियाँ प्राप्त कर ली और उनका नाम भी  महात्मा श्यामनन्द के ख्यातिप्राप्त शिष्यों में लिया जाने लगा। ये सुनकर जलालशाह नाम का एक फकीर भी  महात्मा श्यामनन्द  के सानिध्य में आया और सिद्धि प्राप्त करने के लिए ख्वाजा की तरह अनुष्ठान करने लगा।
जलालशाह एक कट्टर मुसलमान था, और उसको एक ही सनक थी, हर जगह इस्लाम का आधिपत्य साबित करना। जब जन्मभूमि की महिमा और प्रभाव को उसने देखा तो उसने अपनी लुटेरी मानसिकता दिखाते हुए उसने उस स्थान को खुर्द मक्का या छोटा मक्का साबित करने या यूँ कह लें उस रूप में स्थापित करने की कुत्सित  आकांक्षा जाग उठी। जलालशाह ने  ख्वाजा कजल अब्बास मूसा के साथ मिलकर ये विचार किया की यदि इस मदिर को तोड़ कर मस्जिद बनवा दी जाये तो महात्मा श्यामनन्द की जगह हमे मिल जाएगी और चूकी अयोध्या की जन्मभूमि हिन्दुस्थान में हिन्दू आस्था का प्रतीक है तो यदि यहाँ जन्मभूमि पर मस्जिद बन गया तो इस्लाम का परचम हिन्दुस्थान में स्थायी हो जायेगा। धीरे धीरे जलालशाह और ख्वाजा कजल अब्बास मूसा इस साजिश को अंजाम देने की तैयारियों में जुट गए ।

अब विवेचना के इस बिंदु पर उस समय के राजनैतिक परिदृश्य पर नजर डालना जरुरी हो जाता है। हमारे इतिहास में एक गलत बात बताई जाती है की मुगलों ने पुरे भारत पर राज्य किया
, हाँ उन्होंने एक बड़े हिस्से को जीता था मगर सर्वदा उन्हें हिन्दू वीरो से प्रतिरोध करना पड़ा और कुछ जयचंदों के कारण उनकी जड़े गहरी हुई। उस समय उदयपुर के सिंहासन पर महाराणा संग्रामसिंह राज्य कर रहे थे जिनकी राजधानी चित्तौड़गढ़ थी।
संग्रामसिंह को राणासाँगा के नाम से भी जाना जाता है । आगरे के पास फतेहपुर सीकरी में बाबर और राणासाँगा का भीषण युद्ध हुआ जिसमे बाबर घायल हो कर भाग निकला और अयोध्या आ के जलालशाह की शरण ली(ज्ञात रहे तब तक जलालशाह और ख्वाजा कजल अब्बास मूसा के सिद्धि की धाक आस पर के क्षेत्रों में  महात्मा श्यामनन्द के सिद्धि प्राप्त साधकों  के रूप में जम चूकी थी)। इसी समय जलालशाह ने बाबर पर अपना प्रभाव किया और बड़ी सेना ले कर युद्ध करने का आशीर्वाद दिया।बाबर ने   राणासाँगा की ३० हजार सैनिको की सेना के सामने अपने ६ लाख सैनिको की सेना के साथ धावा बोल दिया और इस युद्ध में   राणासाँगा की हार हुई । युद्ध के बाद   राणासाँगा के ६०० और बाबर की सेना के ९०,००० सैनिक जीवित बचे ।
इस युद्ध में विजय पा के बाबर फिर अयोध्या आया और जलालशाह से मिला,जलालशाह ने बाबर को अपनीं सिद्धी का भय और इस्लाम के आधिपत्य की बात बताकर अपनी योजना बताई और  ख्वाजा कजल अब्बास मूसा के समर्थन की बात कही । बाबर ने अपने वजीर  मीरबाँकी खा को ये काम पूरा करने का आदेश दिया और खुद दिल्ली चला गया। अब जलालशाह ने अयोध्या को खुर्द मक्का के रूप में स्थापित करने के अपने कुत्सित प्रयासों को आगे बढ़ाना शुरू किया। सर्वप्रथम प्राचीन इस्लामिक  ढर्रे की लम्बी लम्बी  कब्रों को बनवाया गया,दूर दूर से मुसलमानों के शव अयोध्या लाये जाने लगे।  पुरे भारतवर्ष में ये बात फ़ैल गयी और भगवान राम की अयोध्या को  खुर्द मक्का बनाने के लिए कब्रों से पाट दिया गया॥
अब भी उनमे से कुछ अयोध्या में अयोध्या नरेश के महल के निकट कब्रों या मजारो के रूप में मिल जाएँगी।

अब जलालशाह ने  मीरबाँकी खां के माध्यम से मंदिर के विध्वंस का कार्यक्रम बनाया जिसमे ख्वाजा  कजल अब्बास मूसा  भी शामिल हो गए । बाबा श्यामनन्द जी अपने सड़क मुस्लिम शिष्यों की करतूत देख के बहुत दुखी हुए और अपने निर्णय पर उन्हें बहुत पछतावा हुआ। भगवान का मंदिर तोड़ने की योजना के एक दिन पूर्व दुखी मन से  बाबा श्यामनन्द जी ने रामलला की मूर्तियाँ सरयू में प्रवाहित किया और खुद हिमालय की और तपस्या करने चले गए। मंदिर के पुजारियों ने मंदिर के अन्य सामान आदि हटा लिए और वे स्वयं मंदिर के द्वार पर खड़े हो गए उन्होंने कहा की रामलला के मंदिर में किसी का भी प्रवेश हमारी मृत्यु के बाद ही होगा।  जलालशाह की आज्ञा के अनुसार उन चारो पुजारियों के सर काट लिए गए. उसके बाद तो देशभर के हिन्दू राम जन्मभूमि के कवच बन कर खड़े  हो गए ॥इतिहासकार कनिंघम अपने लखनऊ गजेटियर के 66वें अंक के पृष्ठ 3 पर लिखता है की एक लाख चौहतर हजार हिंदुओं की लाशे  गिर जाने के पश्चात  मीरबाँकी  अपने मंदिर ध्वस्त करने के अभियान मे सफल हुआ और  उसके बाद जन्मभूमि के चारो और तोप लगवाकर मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया.. ज्ञातव्य रहे की मंदिर को बचने के लिए ये युद्ध भीटी के राजा, राजा महताब सिंह ने लड़ा था और वीर गति को प्राप्त हुए एवं विवादित ढांचे का निर्माण किस प्रकार हुआ (जिसे कुछ भाई बाबरी मस्जिद का नाम भी देते हैं) इसका विस्तृत विवरण मैं अगली पोस्टों में दूंगा..  

सन्दर्भ:प्राचीन भारतलखनऊ गजेटियरलाट राजस्थान,रामजन्मभूमि का इतिहास(आर जी पाण्डेय),अयोध्या का इतिहास(लाला सीताराम),बाबरनामा

जय श्री राम 

8 टिप्‍पणियां:

  1. सह्रदयता और सदाशयता का अक्सर दुरूपयोग होता है| इस वजह से इन सदगुणों को त्यागा नहीं जाना चाहिए, बल्कि दूसरों के कुत्सित इरादों के प्रति जागरूक रहा जाए और पात्र\कुपात्र\सुपात्र का ध्यान जरूर रखा जाए|

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  2. उत्तर
    1. घोष ॥अबकी बार शिव का त्रिनेत्र खुलेगा ॥आप निश्चिंत रहे जेहादी और उनके दलाल दोनों साफ होंगे इस बार

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    2. ये घोष ही है जो हर जगह सुनाई पड़ता है, यही हिन्दुओ के असली दुश्मन है... देखा छुपकर हमला करते है. आप इन्हें नहीं खोज शकोगे वैसे खोजने की जरुर भी नहीं - कही भी मिल जायेंगे.

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  3. shath san vinay kutil sang preeti ,Sahaj kripan sang sundar neeti yahi galti ati uttam om namah shivaya

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  4. इतिहास को उसका सही सन्दर्भ मिलेगा सेकुअल्र वादी ज़मींदोज़ होंगें इस दफा इनके लिए एक शैर -सामने दर्पण के जब तुम आओगे ,अपनी करनी पे बहुत पछताओगे ,कल चला सिक्का तुम्हारे नाम का आज खुद को भी चला न पाओगे ... . कृपया यहाँ भी दस्तक देवें -
    ram ram bhai
    सोमवार, 23 जुलाई 2012
    कैसे बचा जाए मधुमेह में नर्व डेमेज से

    कैसे बचा जाए मधुमेह में नर्व डेमेज से

    http://veerubhai1947.blogspot.de/

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  5. hindu me etna buddhi hota hai ki wah achche aur bure ko pahchan sake hmesh achche ko hi apne sath rakhna chahea. aur kishi samudia me sabhi bure nahi hote hai jaise ki ram rahim sab ek hai. jai sri ram

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  6. ये हम ही तो हिन्दु हैं जो इतना सब होते हुयें हिन्दु विरोधियों का साथ देते हैं। जब धर्म से बढ़कर स्वार्थ ऊपर आ जाये तो समझ लेना चाहिये कि उस धर्म में सामर्थ्य नहीं रह गया हैं और समय आ चुका हैं कि उसे त्याग कर अन्य मजबूत धर्म की ओक अग्रसर हुआ जाय। वह दिन दूर नहीं दिखता जब हिन्दुत्व भी प्रचीन मिस्त्री, रोमन और ग्रीक धर्मों की तरह कहानियों में ही रह जायेगा। वहीं दूसरी तरफ इस्लाम चहुओर से आतंकवाद के लियें पूरे वैश्विक समाज में भर्त्सना झेल रहा हैं लेकिन उसके इतर इस्लीम के अनुयायियों में निरन्तर इजाफा हो रहा हैं, अकेले जर्मनी में चार हजार लोग इस्लाम स्वीकार कर लेते हैं। हमारे भारत में भी हिन्दु मुस्लिम बन रहे हैं। क्या किसी को मालूम हैं कि कोई मुसलमान इस्लाम की कट्टरता से तंग आकर, इस्लाम का परित्याग कर दिया हों?

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