सोमवार, 24 दिसंबर 2012

क्या व्यक्ति के बुद्धिलब्धि (Intelligence quotient) का मानक उसकी उम्र है ???


व्यक्तिगत प्रसंग:

आज एक अनजान से विषय से सामना हुआ किसी मित्र के घर बैठे हुए एक स्वनामधन्य स्वयंभू सावरकर और गोडसे के तथाकथित उत्तराधिकारी से मुलाक़ात का सौभाग्य(??) प्राप्त हुआ । हिन्दुत्व की बड़ी बड़ी ड़िंगे हाँकने वाले संगठन के तथाकथित मुखिया से मैंने  एक  दो सुझाव और प्रश्न पूछ लिए । जब तक उनकी हाँ मे हाँ मिलता रहा तब तक ठीक था जैसे ही उन्हे लगा की उनका सामना पाकिस्तानी हिंदुओं और हिन्दू अत्याचार जैसे मुद्दो पर होगा उन्होने जबाब न देते हुए मेरे लिए एक टिप्पणी दी की ये बचकाने सवाल है और तुममे बचपना है । मालूम हो की उस महापुरुष ने अपनी उम्र 44 साल बताई और मै अपने जीवन के 31 वर्ष पूरे कर चुका हूँ । उनके अनुसार आज कल की जेनरेशन समझ ही नहीं सकती । 

इतने वाहियात तरह के तर्क एक हिंदुवादी संस्था के तथाकथित मुखिया के मुह से सुनकर उस संगठन के दिशा और दशा का अंदाजा खुद ही लगा सकते हैं। एक प्रश्न और तथ्य उन तथाकथित मुखिया से भी की, इस जेनरेशन के नासमझी का वृक्ष,कुछ लोगो की हिन्दू धर्म और वीर सावरकर, महात्मा नथुराम जैसे वीरो के नाम पर की जा रही गुंडागर्दी और दलाली की खाद पा कर ही परिपक्व होता है ।
मैंने सोचा क्यू न कुछ हिन्दुस्थान के महापुरुषों को आज याद करे इससे कम से कम हमारे तथाकथित नेता जी लोगो के इतिहास ज्ञान की पुनरावलोकन करने का एक मौका भी मिलेगा।


1 विवेकानंद: 39 साल का पूरा जीवन और 32 साल की उम्र मे पूरे विश्व मे हिन्दुत्व का डंका बजाने
   वाले निर्विवाद महापुरुष। 

2 रानी लक्ष्मी बाई:
 30 साल की उम्र मे अंग्रेज़ो के खिलाफ क्रांति का नेतृत्व करने वाली अमर बलिदानी झाँसी वाली रानी। 

3  नथुराम गोडसे : 39 साल की अल्पायु मे गांधी को मोक्ष दिया और हिंदुस्थान के हिंदुओं के हृदय सम्राट।

4 भगत सिंह:  23 वर्ष की अल्पायु मे बलिदान। भगत सिंह भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। भगतसिंह ने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला कियावह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है। इन्होंने केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप इन्हें २३ मार्च१९३१ को इनके दो अन्य साथियोंराजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया गया। 

5  सुखदेव: 33 साल की अल्पायु मे २३ मार्च १९३१ को इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ लाहौर सेण्ट्रल जेल में फाँसी के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को हिन्दुस्तान के अमर शहीदों की सूची में अहमियत के साथ दर्ज करा दिया ।
6 चन्द्रशेखर आजाद : 25 साल  की उम्र मे बलिदान : चन्द्रशेखर आज़ाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन और तेज हो गयाउनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्वरतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े। आजाद की शहादत के सोलह वर्षों बाद १५ अगस्त सन् १९४७ को हिन्दुस्तान की आजादी का उनका सपना पूरा तो हुआ किन्तु वे उसे जीते जी देख न सके। आजाद अपने दल के सभी क्रान्तिकारियों में बड़े आदर की दृष्टि से देखे जाते थे। सभी उन्हें पण्डितजी ही कहकर सम्बोधित किया करते थे। वे सच्चे अर्थों में पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिलके वास्तविक उत्तराधिकारी जो थे।

7 मंगल पांडे: सन् १८५७ के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत थे। क्रांति के समय और फांसी दिये जाने के समय इनकी उम्र 30 साल थी ।

8 राम प्रसाद बिस्मिल: काकोरी कांड के क्रांतिकारी । 28 साल की उम्र मे काकोरी कांड से अंग्रेज़ सत्ता हो हिला के रख दिया और 30 साल की उम्र मे बलिदान।

9 खुदीराम बोस :  भारतीय स्वाधीनता के लिये मात्र १९ साल की उम्र में हिन्दुस्तान की आजादी के लिये फाँसी पर चढ़ गये। । मुज़फ्फरपुर जेल में जिस मजिस्ट्रेट ने उन्हें फाँसी पर लटकाने का आदेश सुनाया थाउसने बाद में बताया कि खुदीराम बोस एक शेर के बच्चे की तरह निर्भीक होकर फाँसी के तख़्ते की ओर बढ़ा था। जब खुदीराम शहीद हुए थे तब उनकी आयु 19 वर्ष थी। शहादत के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे उनके नाम की एक ख़ास किस्म की धोती बुनने लगे।

10
  करतार सिंह साराभा:19 साल की उम्र मे लाहौर कांड के अग्रदूतों मे एक होने के कारण फांसी की सजा । देश के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान।
11  अशफाक़ उल्ला खाँ:27 साल की उम्र मे देश के लिए प्राणो की आहुती देने वाले वीर हुतात्मा।
12  उधम सिंह : 14  साल की उम्र से लिए अपने प्रण को उन्होने 39 साल की उम्र मे पूरा किया और देश के लिए फांसी चढ़े। उन्होने जालियाँवाला बाग हत्याकांड के उत्तरदायी जनरल डायर को लन्दन में जाकर गोली मारी और निर्दोष लोगों की हत्या का बदला लिया। 

13  गणेश शंकर विद्यार्थी: 25 साल की उम्र से सक्रिय 40 साल की उम्र मे हिन्दुत्व की रक्षा के लिए बलिदान। 
14 राजगुरु:भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे । 23 साल की उम्र मे इन्हें भगत सिंह और सुखदेव के साथ २३ मार्च १९३१ को फाँसी पर लटका दिया गया था ।

15 राजीव दीक्षित: आधुनिक भारत मे 23 साल की उम्र से ही आजादी बचाओ आंदोलन की नींव रक्खी 43 साल की उम्र मे हत्या।

कम से कम इन उदाहरणो से हम ये तो कह ही सकते हैं की व्यक्ति के बुद्धिलब्धि (Intelligence quotient) का मानक उसकी उम्र है ??? और यदि  है तो बुद्धिलब्धि के मामले मे समान्य युवा तथाकथित हिन्दुत्व के दुकानदारो से ज्यादा बुद्धिलब्ध है।  ऐसी सोच संकुचित मानसिकता की पराकाष्ठा को दिखाती है। कम से कम ऐसे उत्तराधिकारी को देख महात्मा गोडसे की आत्मा खुश तो नहीं ही हो रही होगी। चलिये कम से कम इसी कारण से हिंदुस्थान के महान वीर एक बार फिर याद किए गये। 

जय श्री राम 


लेखक : आशुतोष नाथ तिवारी 

रविवार, 23 दिसंबर 2012

प्रायोजित कार्यक्रम बना जनांदोलन -कांग्रेस की मिसाईल बैकफायर


पिछले दिनो दिल्ली मे हुये जघन्य बलात्कार की घटना  बाद सर्द दिल्ली की फिजा मे अचानक ही उबाल सा आ गया। बच्चे बूढ़े महिलाएं सब सड़क पर आ गए। जिस प्रकार उस महिला के साथ वीभत्स तरीके से बलात्कार के बाद क्रूरता की हदे पार कर दी गयी उसके सामने एक बार पशुओं का आचरण भी कम लगे । उस दिन के बाद सड़क से संसद तक इसकी गूंज सुनाई देती रही और अचानक ही पूरे भारत मे इसके खिलाफ एक माहौल सा बना और प्रदर्शनकारी राजपथ,दस जनपथ,इंडिया गेट और जंतर मंतर पर  डट गए।
दिल्ली पुलिस वीरता दिखाते हुए
यहाँ एक बात जो निर्विवाद है वो की ये घटना निंदा की पराकाष्ठा की सीमा तक निंदनीय है मगर अचानक इतना उबाल कहा से आया पूरे देश मे ये एक विचारणीय प्रश्न है ??  क्यूकी आज के पहले भी जघन्य बलात्कार और उसके बाद हत्याएँ हुई है जिसमे 3 महीने की बच्ची से लेकर  80 साल की औरत के साथ भी ये घटनाएँ हुई मगर तब ये हिंदुस्थान क्यू नहीं जागा?? और इस बलात्कार के बाद भी दिल्ली मे एक विदेशी महिला के साथ गैंगरेप और दो बलात्कार हो गए मगर उसपर बोलने वाला कोई नहीं है ।
ये बात तो सत्य है की पिछले कुछ जनांदोलनों से सरकार के समझ मे आ गया है की जनता की भावनाओं मे उबाल है और जरा सी चिंगारी को जंगल की आग बनाया जा सकता है और इस आग मे घी का काम मीडिया और एनजीओ कर सकते हैं ॥ अन्ना और बाबा रामदेव के आंदोलन मे सरकार ने इसका नमूना देख लिया था। कांग्रेस के प्रबन्धक ये अच्छी तरह से जानते हैं की मीडिया की सहायता से जनता का के गुस्से और भावनाओं का कैसे दोहन करना है। इस बलात्कार के समय ही नरेंद्र मोदी की जीत हुई और हर जगह उनकी चर्चा थी । कांग्रेस एफ़डीआई,कोयला से लेकर आरक्षण के मुद्दे पर घिरी थी । कांग्रेस ये जानती थी की ये लहर अगर अगले 1 महीने भी चल गयी तो इसकी भारी कीमत 2014 के चुनावों मे चुकानी पड़ सकती है अतः कांग्रेस के प्रबन्धको ने हिंदुस्थान की मीडिया प्रमुख दलाली खाने वाले एनजीओऔर अपने युवा संगठनो को इस बलात्कार के खिलाफ एक जनांदोलन बनाने का  आदेश जारी किया और उसी कड़ी मे पर्दे के पीछे से कांग्रेस ने पूरे देश मे एनजीओ संठनों को वित्तीय सहायता देकर एक साथ प्रदर्शन शुरू कराये । हिंदुस्थान की गुस्से से बाहरी रोज बलात्कार और लूटमार का दंश झेलती  जनता के लिए ये एक भावनात्मक मुद्दा था और वो आ गयी सडको  पर। मिडिया को अपनी पूरी कीमत मिल चुकी थी सो उन्होने इसका जोरदार प्रमोशन किया और कुछ लोगो के मोमबत्ती जलाते जलाते हजारो लोग सड्को पर । मजबूरी मे अन्य विरोधी पार्टियां भी साथ आई शुरू मे चुप रहने वाले केजरीवाल ने भी बहती गंगा मे हाथ धोया और बाबा रामदेव भी आए ॥ 
कांग्रेस की योजना यहाँ तक सही थी मगर जनभावनाओं को उभारना शायद आसान काम है मगर काबू पाना मुश्किल। जल्दी ही कांग्रेस को समझ मे आ गया की नरेंद्र मोदी की जीत और कांग्रेस के कुकर्मों से ध्यान हटाने के लिये जनभावनाओं के ईंधन से चलने वाला "बलात्कार विरोध" का मिसाइल अब बैकफायर हो गया और जनता अब हिसाब मांग रही है बात जब तक रायसीना हिल्स की थी तब तक तो मामला सही था मगर जब आंच कांग्रेसियों के मक्का 10 जनपथ तक पहुची  तो कांग्रेस ने आनन फानन मे ये आदेश जारी किया की हर बार की तरह अब दमनचक्र चला के अब इस आक्रोश को अगले आंदोलन तक के लिये दबा दिया जाए।
इसी क्रम में महिलाओं पर बर्बर लाठीचार्ज एवं बदतमीजी भी शामिल थी . दिल्ली सरकार सोनिया गांधी और मनमोहन के आदेश पर दिल्लीपुलिस ने 7 डिग्री ठंढ मे महिलाओं पर लाठी बरसाई ,जूतों से मारा, 1 महिला पर 5 पुलिस वाले भिड़े पड़े थे ... 
कांग्रेस सरकार का आदेश पालन 
दिल्ली पुलिस वाले एक महिला को बोल रहे थे"मार साली माधरचोद रांड को" ये शब्द असभ्य हैं मगर ये है कांग्रेस की सच्चाई।  आखिर इतनी हिम्मत कैसी आई पुलिस मे??क्या ये गाली प्रियंका गांधी को पुलिस दे पाएगी?? क्या इससे महिला का अपमान नहीं हुआ ???? या जब तक किसी बहन को नंगा करके फेका न जाए तब तक वो अपमान नहीं होताअब कांग्रेस द्वारा प्रायोजित मोमबती विरोध ने दावानल का रूप ले लिया है। हालात बिगड़ता देख  10 जनपथ से अभी समचार  चैनलो को आदेश जारी किया गया की अब इसकी कवरेज बंद की जाए ।  कांग्रेस ने आखिरी पत्ता चलते हुये जाने माने क्रिकेट खिलाड़ी और कांग्रेस द्वारा मनोनीत सांसद सचिन से सन्यास की खबर को सार्वजनिक कराया ताकि मीडियाको नया मसाला मिले । सत्य ये है की सचिन ने कई दिनों पहले ही बीसीसीआई को पत्र लिख कर इस बात की घोषणा की थी। 
लेकिन कांग्रेस के सांसद और बीसीसीआई मे उचे ओहदे पर बैठे राजीव शुक्ल ने ये बात अब जाकर मीडिया मे लीक कारवाई है जिससे की दुष्कर्म के गंभीर मुद्दे को दबाने के लिए सचिन के क्रिकेट से सन्यास  के मुद्दे को अच्छे से भुनाया जा सके अगर बीसीसीआई इतनी ही ईमानदार है तो सचिन का लिखा हुआ पत्र सार्वजनिक करे।
जहां तक कांग्रेस की संवेदनशीलता का प्रश्न है तो यदि सरकार इतनी संवेदनशील थी तो संसद सत्र मे बलात्कार के खिलाफ कड़े कानून  का विधेयक ला  सकती थी या संसद का विशेष सत्र बुलाया जा सकता है। मगर शाहबानों प्रकरण मे कुछ घंटो मे फैसला करने वाली सरकार आज कुछ कार्य करने की जगह लठियाँ और गोलियां चलवा रही है ।
अब भी कांग्रेस से उम्मीद रखने वालों के लिए मै कुछ  उदाहरण देना चाहूँगाआप किससे उम्मीद कर रहे हैं कांग्रेस से ???? ये वही कांग्रेस है जिसके सांसद सेक्स करने के बदले जज बनाते हैं। कांग्रेस के बुजुर्ग नेता अवैध संतानों के बाप निकलते हैं तो कोई मदेरना जैसा नेता अभिनेत्री को रखैल बना के रखता है और मन भर जाने पर हत्या कर देता है। गोपला काँड़ा और रुचिका का केस हम क्यू भूल गए???क्यूकी कांडा ने सरकार से मीडिया नेता से एनजीओ सबको मैनेज करने के लिए 1000 करोड़  खर्च कर दिया ।
राहुल गांधी पर कथित रूप से सुकन्या के बलत्कार का आरोप 
अब एक ऐसा केस जिसपर कोई बात नहीं करना चाहता । वो है सुकन्या देवी का बलात्कार ॥ कांग्रेसी युवराज के पुराने घरेलू नौकर की बेटी॥  मध्य प्रदेश के पूर्व विधायक किशोर समरीते द्वारा दायर याचिका में आरोप लगाया गया था  कि अमेठी के बलराम सिंह की 24 वर्षीया पुत्री सुकन्या सिंह और उसका परिवार 13 दिसम्बर 2006 को राहुल गांधी से उनके संसदीय निर्वाचन में मिला था। तब से ही युवती और उसका परिवार लापता’ है। कांग्रेस नेता और उनके पांच विदेशी मित्रों’ ने कथित रूप से 24 वर्षीया सुकन्या सिंह पर बलात्कार किया।लड़की के घर इस घटना के बाद ही ताला लगा है। परिवार कहां हैइस बारे में ग्रामीण कुछ भी बताने के लिए तैयार नहीं हैं।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कांग्रेस के युवराज राहुल गाँधी को नोटिस भेज सुकन्या के बारे में बताने को कहा था। कुछ लोग ऐसा तर्क देंगे की ये याचिका कोर्ट के खारिज की थी तो उन्हे याद दिला दूँ की आज कल जज अभिसेक मनु सिंघवी की राते रंगीन करके भी बन सकते हैं तो कैसे वो युवराज के खिलाफ फैसला देंगे ?? सीडी आप सब ने देखी होगी जिसमे जज बनाने का प्रायोजित कार्यक्रम चलाया जा रहा था कांग्रेस द्वारा।
कांग्रेस इस घटना को सिर्फ अपने पाप छुपाने के अस्त्र की तरह और मोदी की छवि से ध्यान भटकाने के उद्देश्य से देख रही है। सुब्रमण्यम स्वामी ने अभी कहा की सरकार चाहे तो बिना संसद सत्र बुलाये भी एक आर्डिनेंस से कानून बना सकती है मगर हम कांग्रेस से बलात्कार के खिलाफ कानून बनाने की उम्मीद करके  लोकपाल काला धन,भोपाल कांड जैसा धोखा फिर खाएँगे क्यूकी अपनों के लिए फांसी का फंदा बनाना सर्वदा पीड़ादायक होता है और ये बार कांग्रेस पर भी लागू होती है ॥अंतत इस आंदोलन का पिंडदान कांग्रेस कुछ निर्दोष हत्याए और दमनचक्र चला कर अगले 24 घंटे मे कर देनी वाली है और हम सब फिर से नयी खबर के इंतजार मे ................ 

जय श्री राम

लेखक : आशुतोष नाथ तिवारी 

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

गुजरात मे फिर कमल ने किया कमाल : मोदी की विजय के मायने


जैसा की गुजरात चुनाव के नतीजे आज आ गए  और नरेंद्र मोदी पुनः बहुमत के साथ गुजरात की सत्ता पर काबिज होने जा रहे हैं। हालांकि ये बात लगभग तय थी की नरेंद्र मोदी की सरकार गुजरात मे दोबारा आने वाली है अब गुजरात चुनावों के फैसले के बाद कई बातें  निकलकर सामने आई है । सबसे स्वाभाविक बात ये है की नरेंद्र मोदी ने खुद को भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार के रूप मे स्थापित कर लिया है । अब  इस दावेदारी को औपचारिक या अनौपचारिक रखना है बहस और निर्णय  सिर्फ इसी बात का हो सकता  है । दूसरी ओर इसमे कोई दो राय नहीं की गुजरात मे विकास हुआ है मगर कम से कम नरेन्द्रमोदी और उनके प्रबन्धक ये अच्छी तरह से जानते हैं  की "विकास पुरुष" के गुणगान करना अलग बात है मगर विकास पुरुष को वोट करना दूसरी ॥ इसके ज्वलंत उदाहरण माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी 2004 मे रहे है । अब भी यदि गुजरात मे कोई निर्णायक कारक है तो वो है मुस्लिम बनाम हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण । ये एक ऐसा कटु सत्य  है जिसे हिंदुस्थान मे कश्मीर के बाद सबसे पहले गुजरात के लोगो ने स्वीकार किया है । शायद इन चुनाव परिणामो ने हिंदुस्थान मे 2030  के बाद से होने वाले चुनाओं एवं राजनीतिक परिदृश्य का एक परिलक्षण भी दिया है,वो ये है की अब आने वाले दो दसको मे भले ही राजीनीतिक पार्टियां दर्जनो हो मगर विचारधारा और गठबंधन सिर्फ दो ही होंगे । या तो आप हिन्दुत्व के समर्थक हैं या तो आप इस्लाम के झंडे के साथ है । दो दसको मे मुस्लिम जनसंख्या बढ़ेगी और आकडे बताते हैं की उस अनुपात मे हिन्दू जनसंख्या नहीं बढ़ेगी । और जम्मू और कश्मीर का उदाहरण ले तो जिस राज्य मे मुसलमान ज्यादा होंगे हिंदुओं पर अत्याचार और उनके धार्मिक रीति रिवाजों पर लगाम कसने की शुरुवात होगी और फिर हिंदुओं को मजबूरीवश या आत्मरक्षार्थ विभिन्न जतियों और सेकुलर जैसे शब्दो की परिभाषा से उठाकर "हिन्दू " बनकर किसी एक जगह वोट करना होगा जैसा कश्मीर मे हो रहा है। जनसंख्या के अनुपात से गुजरात मे अभी ध्रुवीकरण का दौर नहीं होना चाहिए था मगर मगर आतंक की पौध के बबूलरूपी काँटों ने गोधरा मे जिस प्रकार की चुभन हिन्दू समाज को दी थी वो सुसुप्त ज्वालामुखी 20 साल पहले फट पड़ा । इस बात को एक उदाहरण से और समझ सकते हैं जहां भी हिन्दू बहुसंख्यक है वहाँ बार बार सरकारे बदलती है क्यूकी वहाँ स्वाभाविक रूप से आतंकियों को सर उठाने का मौका कम मिलता है धार्मिक रीति रिवाजों मे हस्तक्षेप कम होता है अतः ध्रुवीकरण की संभावना कम हो जाती है ,इसी मौके का फायदा उठाकर "कांग्रेस" नामक पार्टी तुष्टीकरण के समर्थको के साथ सत्ता मे आ जाती है और हिमांचल प्रदेश के परिणाम इसका उदाहरण है।  हिमांचल मे हिन्दू बहुतायत है या हिंदुओं को स्वतन्त्रता है अपने विचारधारा पर चलने की अतः ध्रुवीकरण की संभावना कम है और हिन्दू विभाजित जिसका परिणाम क्या हुआ कांग्रेस पार्टी पर गंभीर आरोपो के बाद भी भाजपा सत्ता से बाहर हो गयी।   

इन सब तथ्यों से  एक बात तो स्पष्ट है की "विकास" ,प्रतिभाजीडीपीबिदेशी निवेश जैसे तथ्य उन्ही स्थानो पर चुनावी मुद्दा बन सकते हैं जहां या तो हिन्दू बहुसंख्यक  है और उसकी स्वतन्त्रता का अतिक्रमण नहीं हुआ है अल्पसंख्यक  बहुल स्थानो पर एकमात्र मुद्दा है इस्लाम का प्रचार और प्रकारांतर से  शरीयत लागू करना । 
2014 मे शायद भाजपा का एक धड़ा ये सोच रहा है की सेकुलरिज़्म का चोला ओढ़ कर कुछ अल्पसंख्यक मत आएंगे तो ये 2004 के "इंडिया शाइनिंग" के दौर मे वाजपेयी जी जैसे व्यक्तित्व को भी अल्पसंख्यक समुदाय अपना नहीं पाया । सत्य ये है की हिंदुस्थान मे अल्पसंख्यक  वोट सिर्फ उसी को मिलता है जो हिन्दू विरोधी हो । अतः इस प्रकार का आत्मघाती प्रयोग एक बुरे दिवास्वप्न से ज्यादा कुछ नहीं। 
भविष्य जो भी हो कम से कम आज मोदी जी की विजय ने हिंदुस्थान के हिंदुओं को खुश होने का एक कारण जरूर मिला है और भारतीय जनता पार्टी को 2014 चुनाओं मे सत्ता के एक सशक्त दावेदार के रूप मे उभरने के लिए संबल।
चलते चलते 
हिन्दू हो,कुछ प्रतिकार करो,तुम भारत माँ के क्रंदन काI
यह समय नहीं हैशांति पाठ और गाँधी के अभिनन्दन काII
यह समय है शस्त्र उठाने का,गद्दारों को समझाने का,
शत्रु पक्ष की धरती पर,फिर शिव तांडव दिखलाने काII
इन जेहादी जयचंदों की घर में ही कब्र बनाने का,
यह समय है हर एक हिन्दू के,राणा प्रताप बन जाने काI
इस हिन्दुस्थान की धरती पर ,फिर भगवा ध्वज फहराने काII

जय  श्री राम 

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

अयोध्या एवं राम जन्मभूमि का इतिहास -5(History of Ayodhya and Ram Temple-5)



जन्मभूमि के लिए हुए अनेको संघर्ष : स्वामी बलरामचारी, बाबा वैष्णव दास, एवं सिक्खो के गुरुगोविंद सिंह द्वारा जन्मभूमि के रक्षार्थ युद्ध, औजरंगजेब की करारी हार। सन 1664 के हमले मे हजारो निर्दोष हिंदुओं की हत्या और बचा हुआ राम मंदिर ध्वस्त ॥
RAM MANDIR DEMOLISHED BY MUGHALS
(5)स्वामी बलरामचारी द्वारा आक्रमण: रानी जयराज कुमारी और   स्वामी महेश्वरानंद   जी के बाद यद्ध का नेतृत्व स्वामी बलरामचारी जी ने अपने हाथ में ले लिया।  स्वामी बलरामचारी  जी ने गांवो गांवो में घूम कर रामभक्त हिन्दू युवको और सन्यासियों की एक मजबूत सेना तैयार करने का प्रयास किया और जन्मभूमि के उद्धारार्थ २० बार आक्रमण किये. इन २० हमलों में काम से काम १५ बार स्वामी बलरामचारी ने जन्मभूमि पर अपना अधिकार कर लिया मगर ये अधिकार अल्प समय के लिए रहता था थोड़े दिन बाद बड़ी शाही फ़ौज आती थी और जन्मभूमि पुनः मुगलों के अधीन हो जाती थी. स्वामी बालरामचारी  का २० वां आक्रमण बहुत प्रबल था  और शाही सेना को काफी क्षति उठानी पड़ी। उस समय का मुग़ल शासक अकबर था वो स्वामी बलरामचारी की वीरता से प्रभावित हुआ और शाही सेना का हर आते हुए दिन के साथ  इन युद्धों से क्षय हो रहा था..धीरे धीरे देश के हालत मुगलों के खिलाफ होते जा रहे थे अतः अकबर ने अपने दरबारी टोडरमल और बीरबल से इसका हल निकालने को कहा। 
विवादित  ढांचे के सामने स्वामी बलरामचारी ने एक चबूतरा बनवाया था जब जन्मभूमि थोड़े दिनों के लिए उनके अधिकार में आई थी। अकबर ने बीरबल और टोडरमल के कहने पर खस की टाट से उस चबूतरे पर ३ फीट का एक छोटा सा मंदिर बनवा दिया. लगातार युद्ध करते रहने के कारण स्वामी बलरामचारी का स्वास्थ्य गिरता चला गया और पयाग कुम्भ के अवसर पर त्रिवेणी तट पर स्वामी बलरामचारी की मृत्यु हो गयी ..इस प्रकार स्वामी बलरामचारी के आक्रमणों और हिन्दू जनमानस के रोष के कारण अकबर ने विवादित ढांचे के सामने एक छोटा मंदिर बनवाकर आने वाले आक्रमणों और हिन्दुस्थान पर मुगलों की  ढीली होती पकड़ से बचने का एक राजनैतिक प्रयास किया. 
इस नीति से कुछ दिनो के लिए ये झगड़ा शांत हो गया। उस चबूतरे पर स्थित भगवान राम की मूर्ति का पूजन पाठ बहुत दिनो तक अबाध गति से चलता रहा। हिंदुओं के पुजा पाठ या घंटा बजने पर कोई मुसलमान विरोध नहीं करता यही क्रम शाहजहाँ के समय भी चलता रहा।सन 1640 मे सनकी इस्लामिक शासक औरंगजेब के हाथ सत्ता आई वो पूर्णतया हिंदुविरोधी और दमन करने वाला था। उसने लगभग 10 बार अयोध्या मे मंदिरों को तोड़ने का अभियान चलकर यहाँ के सभी प्रमुख मंदिरों की मूर्तियों को तोड़ डाला।
(6) बाबा वैष्णव दास के नेतृत्व मे आक्रमण: राजयसिंहासन पर बैठते हि सबसे पहले औरंगजेब का ध्यान अयोध्या की ओर गया । हिंदुधर्मविरोधी औरंगजेब ने अपने सिपहसालार जाँबाज खा के नेतृत्व मे एक विशाल सेना अयोध्या की ओर भेज दी। पुजारियों को ये बात पहले हि मालूम हो गयी अतः उन्होने भगवान की मूर्ति पहले ही छिपा दी। पुजारियों ने रातो रात घूमकर हिंदुओं को इकट्ठा किया ताकि प्राण रहने तक जन्मभूमि की रक्षा की जा सके। उन दिनो अयोध्या के अहिल्याघाट पर परशुराम मठ मे समर्थ गुरु श्री रामदास जी महाराज जी के शिष्य श्री वैष्णवदास जी दक्षिण भारत से यहाँ विधर्मियों से देश को मुक्त करने के प्रयास मे आए हुए थे। औरंगजेब के समय बाबा श्री वैष्णवदास जी ने जन्मभूमि के उद्धारार्थ 30 बार आक्रमण किये। इन आक्रमणों मे अयोध्या के आस पास के गांवों के सूर्यवंशीय क्षत्रियों ने पूर्ण सहयोग दिया जिनमे सराय के ठाकुर सरदार गजराज सिंह और राजेपुर के कुँवर गोपाल सिंह तथा सिसिण्डा के ठाकुर जगदंबा सिंह प्रमुख थे। ये सारे वीर ये जानते हुए भी की उनकी सेना और हथियार बादशाही सेना के सामने कुछ भी नहीं है अपने जीवन के आखिरी समय तक शाही सेना से लोहा लेते रहे और अंततः वीरगति को प्राप्त हुये। ठाकुर गजराज सिंह का मकान तक बादशाह के हुक्म पर खुदवा डाला। ठाकुर गजराज सिंह के वंशज आज भी सराय मे मौजूद हैं। आज भी फैजाबाद जिले के आस पास के सूर्यवंशीय क्षत्रिय सिर पर पगड़ी नहीं बांधते,जूता नहीं पहनते, छता नहीं लगाते,उन्होने अपने पूर्वजों के सामने ये प्रतिज्ञा ली थी की जब तक श्री राम जन्मभूमि का उद्धार नहीं कर लेंगे तब तक जूता नहीं पहनेंगे,छाता नहीं लगाएंगे,पगड़ी नहीं बाधेंगे। तत्कालीन कवि जयराज के एक दोहे मे ये भीष्म प्रतिज्ञा इस प्रकार वर्णित है ॥
        जन्मभूमि उद्धार होय, जा दिन बरी भाग।
        छाता जग पनही नहीं
,
 और न बांधहि पाग॥ 

(7) 
) बाबा वैष्णव दास एवं सिक्खो के गुरुगोविंद सिंह द्वारा जन्मभूमि के रक्षार्थ युद्ध: जैसा की पहले बताया जा चुका है की औरंगजेब ने गद्दी पर बैठते ही मंदिर को ध्वस्त करने के लिए जबांज खाँ के नेतृत्व मे एक जबरजस्त सेना भेज दी थी, बाबा वैष्णव दास को इस बात की भनक लगी बाबा वैष्णव दास के साथ साधुओं की एक सेना थी जो हर विद्या मे निपुण थी इसे चिमटाधारी साधुओं की सेना भी कहते थे । जब जन्मभूमि पर जबांज खाँ ने आक्रमण किया तो हिंदुओं के साथ चिमटाधारी साधुओं की सेना की सेना मिल गयी और उर्वशी कुंड नामक जगह पर जाबाज़ खाँ  की सेना से सात दिनो तक भीषण युद्ध किया । चिमटाधारी साधुओं के चिमटे के मार से मुगलो की सेना भाग खड़ी हुई। इस प्रकार चबूतरे पर स्थित मंदिर की रक्षा हो गयी ।
जाबाज़ खाँ की पराजित सेना को देखकर औरंगजेब बहुत क्रोधित हुआ और उसने जाबाज़ खाँ को हटकर एक अन्य सिपहसालार सैय्यद हसन अली को  50 हजार सैनिको की सेना देकर अयोध्या की ओर भेजा और साथ मे ये आदेश दिया की अबकी बार जन्मभूमि को तहस नहस कर के वापस आना है ,यह समय सन 1680 का था ।
बाबा वैष्णव दास ने अपने संदेशवाहको द्वारा सिक्खों के गुरु गुरुगोविंद सिंह से युद्ध मे सहयोग के लिए पत्र के माध्यम संदेश भेजा । गुरुगोविंद सिंह उस समय आगरे मे सिक्खों की एक सेना ले कर मुगलो को ठिकाने लगा रहे थे। पत्र पा के गुरु गुरुगोविंद सिंह सेना समेत अयोध्या आ गए और ब्रहमकुंड पर अपना डेरा डाला । ज्ञातव्य रहे की ब्रहमकुंड वही जगह जहां आजकल गुरुगोविंद्सिंह की स्मृति मे सिक्खों का गुरुद्वारा बना हुआ है। बाबा वैष्णव दास के जासूसों द्वारा ये खबर आई की हसन आली 50 हजार की सेना और साथ मे तोपखाना ले कर अयोध्या की ओर आ रहा है । इसे देखते हुए एक रणनीतिक निर्णय के तहत बाबा वैष्णव दास एवं सिक्खो के गुरुगोविंद सिंह ने अपनी सेना को तीन भागों मे विभक्त कर दिया । पहला दल सिक्खों के एक छोटे से तोपखाने के साथ फैजाबाद के वर्तमान सहादतगंज के खेतो के पास छिप गए । दूसरा दल जो क्षत्रियों का था वो रुदौली मे इस्लामिक सेना से लोहा लेने लगे। और बाबा वैष्णव दास का तीसरा दल चिमटाधारी जालपा नाला पर सरपत के जंगलो मे जगह ले कर  मुगलो की प्रतीक्षा करने लगा।
शाही सेना का सामना सर्वप्रथम रुदौली के क्षत्रियों से हुआ एक साधारण सी लड़ाई के बाद पूर्वनिर्धारित रणनीति के अनुसार वो पीछे हट गए और चुपचाप सिक्खों की सेना से मिल गए । मुगल सेना ने समझा की हिन्दू पराजित हो कर भाग गये,इसी समय गुरुगोविंद सिंह के नेतृत्व मे सिक्खों का दल उन पर टूट पड़ा,दूसरे तरफ से हिंदुओं का दल भी टूट पड़ा सिक्खों ने मुगलो की सेना के शाही तोपखाने पर अधिकार कर लिया दोनों तरफ से हुए सुनियोजित हमलो से मुगलो की सेना के पाँव उखड़ गये सैय्यद हसन अली भी युद्ध मे मारा गया। औरंगजेब हिंदुओं की इस प्रतिक्रिया से स्तब्ध रह गया था इस करारी हार के बाद औरंगजेब ने कुछ समय तक अयोध्या पर हमले का कार्यक्रम स्थगित कर दिया । हिंदुओं से मिली इस हार का वर्णन औरंगजेब आलमगीर नामे मे कुछ इस प्रकार लिखता है
“बाबरी मस्जिद के लिए काफिरो ने 20 हमले किए सबमे लापरवाही की वजह से शाही फौज ने शिकस्त खायी। आखिरी हमला जो गुरुगोविंदसिंह के साथ बाबा वैष्णव दास का हुआ उसमे शाही फौज का सबसे बड़ा नुकसान हुआ । इस लड़ाई मे शहजादा मनसबदार सरदार हसन ली खाँ भी मारे गये ।"    संदर्भ: आलमगीर पृष्ठ 623                                                                                                           
इस युद्ध के बाद साल तक औरंगजेब ने अयोध्या पर हमला करने की हिम्मत नहीं की। मगर इन चार वर्षों मे हिन्दू कुछ असावधान हो गए। औरंगजेब ने इसका लाभ उठाते हुए सान 1664 मे पुनः एक बार श्री राम जन्मभूमि पर आक्रमण किया ।इन चार वर्षों मे सभी एकत्रित हिन्दू अपने अपने क्षेत्रों मे चले गए थे।अतः ये एकतरफा युद्ध था हालाँकि कुछ पुजारियों और हिंदुओं ने मंदिर रक्षा का प्रयत्न किया मगर शाही सेना के सामने निहत्थे हिन्दू जीतने की स्थिति मे नहीं थे,पुजारियों ने रामलला की प्रतिमा छिपा दी । इस हमले मे शाही फौज ने लगभग 10 हजार हिंदुओं की हत्या कर दी ।मंदिर के अंदर नवकोण के एक कंदर्प कूप नाम का कुआं था, सभी मारे गए हिंदुओं की लाशें मुगलो ने उसमे फेककर चारो ओर चहारदीवारी उठा कर उसे घेर दिया। आज भी कंदर्पकूप “गज शहीदा” के नाम से प्रसिद्ध है,और मंदिर के पूर्वी द्वार पर स्थित है जिसे मुसलमान अपनी संपत्ति बताते हैं।
औरंगजेब ने इसका वर्णन कुछ इस प्रकार किया है । 
“लगातार चार बरस तक चुप रहने के बाद रमजान की 27वी तारीख को शाही फौज ने फिर अयोध्या की रामजन्मभूमि पर हमला किया । इस अचानक हमले मे दस हजार हिन्दू मारे गये। उनका चबूतरा और मंदिर खोदकर ज़मींदोज़ कर दिया गया । इस वक्त तक वह शाही देखरेख मे है। संदर्भ: आलमगीरनामा पृष्ठ 630                                                                                                               
शाही सेना ने जन्मभूमि का चबूतरा खोद डाला बहुत दिनो तक वह चबूतरा गड्ढे के रूप मे वहाँ स्थित था । औरंगजेब के क्रूर अत्याचारो की मारी हिन्दू जनता अब उस गड्ढे पर ही श्री रामनवमी के दिन भक्तिभाव से अक्षत,पुष्प और जल चढाती रहती थी.  
 लेख के  अगले भाग मे नाबाब शाहादत अली,नसीरुद्दीन,वाजीद ली शाह के समय हुए  युद्धों का वर्ण 

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

भाई राजीव दीक्षित के बाद स्वदेशी आंदोलन की दिशा-नौ दिन चले अढ़ाई कोस

मित्रों इस पोस्ट पर कुछ भी लिखने से पहले मै एक बात पहले से स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की मै भाई राजीव दीक्षित का एक प्रबल समर्थक हूँ एवं उनके आदर्शो के अनुसार कार्य  करने की कोशिश करता हूँ। इस पोस्ट का उद्देश्य किसी भी प्रकार से भी भाई राजीव दीक्षित या किसी सम्बद्ध पर प्रश्न उठाना नहीं मगर एक स्वाभाविक समर्थक होने के कारण अपने प्रश्न और विचार आज राजीव भाई को श्रद्धांजलि  देने के बाद प्रकट करना चाहता हूँ। राजीव भाई के विषय मेरी पिछली पोस्ट कृपया यहाँ पढ़ें। 
राजीव दीक्षित किसी परिचय का मोहताज शब्द नहीं है जैसा की पहले भी कई अवसरो पर मै कह चुका हूँ की आधुनिक भारत मे यदि दो महापुरुषों की बात करू तो राजीव भाई और विवेकानंद  को काफी  ही पाता हूँ।राजीव भाई का आंदोलन आजाद इंडिया मे था और विवेकानंद का गुलाम भारत मे ॥मगर उद्देश्य दोनों ही समय,हिंदुस्थान मर चुके स्वाभिमान को जगाना था. 
राजीव भाई के दुखद निधन के बाद जो अपूर्णीय क्षति हुई उस रिक्त स्थान को भर पाना असंभव सा प्रतीत हो रहा था । मगर मुझे और मेरे जैसे कई राजीव भाई के  अनुयायियों को ये जान कर बहुत ही संतुष्टि हुई की राजीव भाई के आंदोलन की अगली कड़ी स्वदेशी भारत पीठम के रूप मे भाई प्रदीप दीक्षित जी आगे बढ़ा रहे हैं। इसी सन्दर्भ में  पिछले साल भाई प्रदीप दीक्षित जी का व्याख्यान ६ नवम्बर 2011 (रविवार) को नई दिल्ली में जनकपुरी स्थित आर्य समाज मंदिर में भाई अरुण अग्रवालजी के देखरेख एवं प्रबंधन  में संपन्न हुआ था । उसके बाद हम कई राज्यों से समर्पित कार्यकर्ता वर्धा पहुचे और विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम वहाँ आयोजित हुए। 
मगर धीरे धीरे जैसे जैसे समय  बीतता गया ऐसा  अनुभव हुआ की कई समर्पित कार्यकर्ता धीरे धीरे इस आंदोलन के प्रति उदासीन होते गए उनके अपने तर्क थे । इस बीच हालाँकि आंदोलन से जुडने वाले लोगो की भी कमी नहीं थी । कुछ मुद्दो पर व्यक्तिगत रूप से मै भी व्यक्तिगत रूप से सहमत नहीं था मगर यदि एक बहुत बड़ा जनजागरण का अभियान चल रहा हो तो किसी व्यक्ति विशेष की असहमति ज्यादा महत्त्व नहीं रखती। मगर पिछले कुछ दिनो मे धरताल पर कार्य करते समय एवं सामाजिक  संचार के साधनो के माध्यम से मुझे ऐसा प्रतीत हुआ की एक हम सभी राजीव भाई के समर्थको के साथ साथ एक ऐसा समूह समाज मे तैयार हो रहा है जो अब तक राजीव भाई के विरोध मे आ चुका है ।शायद  आने वाले दिनो मे ये ज्यादा मुखर हो । दुख की बाद ये है ये एक बड़ा वर्ग सिर्फ राजीव भाई के आंदोलन के प्रबन्धको की नाकामी के कारण उनका विरोध कर रहा है ॥ 
इनमे से कुछ लोग कभी राजीव दीक्षित के समर्थक या कुछ लोग तटस्थ लोग हैं  ॥मैंने अपने अनुभवों और सर्वेक्षण के आधार पर कुछ बाते पायी है जो इस ब्लॉग के माध्यम से सामने रख रहा हूँ ॥ इससे आप सहमत भी हो सकते हैं या असहमत क्यूकी ये मेरा अपने स्तर से किया गया व्यक्तिगत  सर्वेक्षण है । यदि कटु लगे तो क्षमा प्रार्थी हूँ । ये सारे सर्वेक्षण उत्तर भारत के है ।  

1 ऐसा कई कार्यकर्ताओं  को लग रहा है की राजीव भाई का आंदोलन सिर्फ सीडी बेचने का धंधा बन के रह गया है । किसी सार्वजनिक मुद्दे पर इसकी उपस्थिती न के बराबर या स्टॉल लगाने तक होती है । आन्दोलन के लोग भावनाओ को बेचने से आगे कुछ नहीं कर रहे है । 

ज़्यादातर आंदोलन शहरो के इर्द गिर्द सीमित है (शायद महाराष्ट्र इसका अपवाद हो)। यदि ग्रामीण क्षेत्रों मे कुछ कार्य हो रहा है तो फिर प्रबंधन की कमी के कारण आस पास के लोगो तक इसकी खबर नहीं पहुच पाती है.

3 आंदोलन के कुछ क्षेत्रों के कर्णधार  कम से कम समय मे ज्यादा से ज्यादा प्रसिद्ध होना चाहते हैं,या दूसरे शब्दों मे कह ले तो हर दूसरा व्यक्ति अपने आप को राजीव भाई ही समझ रहा है उनके जैसा बनने का प्रयास करने मे कोई बुराई नहीं मगर उन तथाकथित लोगो को ये सर्वदा ध्यान रखना होगा की  "राजीव दीक्षित " के लिए समाज का हित सर्वोपरि था । 

4  पिछले साल के कार्यक्रम मे Paid Poets का विचार काफी लोगो को निरर्थक लगा॥ कई लोगो को ऐसा प्रतीत हुआ की कई तथाकथित स्थापित कवि लोग राजीव भाई को श्रद्धांजलि देने की बजाय अच्छी ख़ासी कमाई  और प्रचार के उद्देश्य से वर्धा पधारे थे । जबकि सुदूर राज्यों से आने वालों का उद्देश्य कुछ और था । 

5 भाई राजीव दीक्षित के आंदोलन को आगे बढ़ाने मे भारत स्वाभिमान का एक विशेष योगदान था क्यूकी भारत स्वाभिमान मे गाँव गाँव तक फैला हुआ संगठन है मगर स्वदेशी भारत पीठम और भारत स्वाभिमान के कार्यकर्ताओं के बीच पिछले साल वर्धा मे 30 नवम्बर को स्वदेशी मेले के दौरान पोस्टर लगाने को ले कर हुए विवाद ने ये स्पष्ट कर दिया की इन दोनों संगठनो के बीच सब कुछ अच्छा नहीं है । 
इस विषय पर मैंने भारत स्वाभिमान के कुछ  वरिष्ठ लोगो से बात की उनके अनुसार कुछ एक लोग जो उस समय स्वदेशी भारत पीठम वर्धा मे थेवो भारत स्वाभिमान हरिद्वार कार्यालय से निष्कासित/स्वेछा से चले गए लोग थे,अतः उन लोगो का स्वामी रामदेव के संबंध मे विचार नकारात्मक था जो गाहे बेगाहे संचार और सामाजिक मीडिया के साधनो द्वारा  सामने भी आता था। इसके कारण भी स्वामी रामदेव  के भारत स्वाभिमान ने  स्वदेशी भारत पीठम से दूरी बना ली । हलाकी  कौन सही  है ये एक अलग विषय था। इस विषय मे वर्धा कार्यालय तक कई लोगो ने अपने विचार पहुचाए मगर कार्यवाही कुछ खास नहीं हुई। मुझे नहीं लगता की स्वामी रामदेव इस साल वर्धा आएंगे यदि आए भी तो ये सिर्फ राजीव भाई को श्रद्धांजलि प्रेषण और भाई प्रदीप दीक्षित जी से व्यक्तिगत संबंधो के कारण होगा। 

6 बाबा रामदेव और स्वदेशी भारत पीठम के विचार लगभग एक ही है अतः स्वाभाविक है की जब तक किसी एक एक संगठन ने "विचारों का व्यवसायीकरण" नहीं किया है तब तक सब सही रहेगा॥ स्वामी रामदेव का संगठन पहले से ही स्वदेशी उत्पादो के प्रचार प्रसार एवं व्यवसाय मे है अतः स्वदेशी भारत पीठम जब भी आंशिक या पूर्णतया कोई व्यावसायिक परियोजना शुरू करता है, भारत स्वाभिमान इसे अपने स्वदेशी व्यापार मे एक अन्य साझीदार/प्रतिस्पर्धी की तरह देखेगाअतः धरातल पर सहयोग संभव नहीं है ।

अब एक ऐसा विषय जो इन सब से इतर है । राजीव भाई के कुछ व्याख्यानों पर जो समाज मे प्रसारित किए जा रहे हैं उस पर कुछ लोगो को आपत्ति है। जैसा की सभी जानते हैं की राजीव भाई के शोध कार्यों मे उनकी टीम का भी एक महत्त्वपूर्ण योगदान होता था जो उनके दिशानिर्देशों पर काम करती थी। ये एक स्वाभाविक सी बात है की कुछ तथ्यों और आंकड़ो मे कुछ बाते ऐसी हो जिससे सहमत न हुआ जा सके । जाने अनजाने उन तथ्यों को प्रसारित किया जा रहा है जिससे की एक विचारधारा के लोगो को समस्या और कुछ का महिमामंडन होता है । अब राजीव भाई तो इन प्रश्नो का उत्तर देने के लिए हैं नहीं और उनके आंदोलन के तथाकथित प्रबन्धक इन आपतियों पर कोई संग्यान नहीं लेते। "इस्कॉन मंदिर" ,"मंगल पांडे" "महात्मा गांधी" ,"वीर सावरकर" ,"गौ हत्या का कारण अंग्रेज़??जैसे धर्म और इतिहास के अनेक मुद्दे  संवेदनशील मुद्दो पर इस आंदोलन के विचार स्पष्ट नजर नहीं आते । न ही कोई ऐसा माध्यम है जहाँ से इन बातों का स्पष्टीकरण मिल सके । 
अतः कई लोग सिर्फ कुछ एक विवादित मुद्दों के स्पष्टीकरण न मिलने के कारण या तो उदासीन या विरोध मे आ गए है । इससे नुकसान ये है कुछ 1-2% बातों  को गलत दिखाकर वो सारे शोधकार्यों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। 

राजीव भाई का पार्थिव शरीर 
8 राजीव भाई की आकस्मिक मृत्यु और उसपर उठते प्रश्नो पर आज तक कोई स्पष्ट विचार नहीं आया जिससे इस मुद्दे पर नित्य नयी नयी कहानियाँ बनाई जाती रहती है । आंदोलन से जुड़े कुछ लोग ऐसे भी है जो आलोचना करने वालों पर व्यक्तिगत हो कर और आक्रामक हो कर प्रतिक्रिया देने लगते है जबकि उन्हे धैर्यपूर्वक ये समझना चाहिए की आलोचनाओ से सुधार और परिष्करण की नीव पड़ती है। 

ये देखकर अत्यंत प्रसन्नता होती है की राजीव भाई के आंदोलन से लाखो लोग जुड़ रहे है मगर ये एक कटु सत्य है की प्रबंधन की कमी के कारण उसी प्रकार कुछ लोग आंदोलन से दूर भी होते जा रहे हैं। उन्हे स्थायी रूप से जोड़े रखने के लिए कोई योजना नहीं दिखाई देती।विचारो और आंदोलन की दशा और दिशा का संवर्धन पिछले सालो मे हुआ है उससे बहुत जायदा संतुष्टि  समर्थको को नहीं हुई होगी। 

इन सारे विरोधाभाषों के बाद राजीव भाई का एक स्वाभाविक समर्थक  होने के कारण  अपने सभी मित्रों को  इस आंदोलन से जुडने का अनुरोध करता हूँ और ऐसा विश्वास है की  भाई प्रदीप जी के नेतृत्व मे ये आंदोलन सफल होगा और राजीव भाई की विचारधारा का क्रियान्वयन वास्तविकता के धरातल पर सक्रिय रूप से आने वाले वर्षों मे दिख पाए।

राजीव भाई जी को उनके जन्मदिवस एवं द्वितीय पुण्यतिथि पर सादर नमन एवं श्रद्धांजलि.

रविवार, 25 नवंबर 2012

इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद और उसका मूल कारण ( भाग-2)

इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद और उसका मूल कारण ( भाग-1) मे आप ने पढ़ा की तमाम संधियों और युद्धों के बाद भी किस प्रकार  इज़राइल और फिलिस्तीन का विवाद अब अरबों यहूदियों,यूरोप और संयुक्त राष्ट्र के बीच एक जटिल समस्या बन गया ॥ भाग 1 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे 

अरब बिद्रोह के बाद ब्रिटेन की सरकार ने एक श्वेत पत्र जारी किया जिसके अनुसार हर साल मे 10 हजार यहूदी परिवारों को फिलिस्तीन मे 5 सालो के लिए बसने की अनुमति होगी। उसके बाद अरबों के अनुमोदन के बाद ही वो फिलिस्तीन मे रह सकते है। यहूदियों ने इस श्वेत पत्र को सिरे से नकार दिया । अब यहूदियों और अरबों का फिलिस्तीन पर कब्जे के लिए संघर्ष भूमिगत सशस्त्र समूहो के माध्यम से शुरू हो गया जिसमे प्रकारांतर से ब्रिटेन ,नाजी और अरब देश भी सहायक होने लगे । स्वेत पत्र के बाद यहूदियों ने अरबों के साथ साथ ब्रिटेन को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया था । अब सारे यहूदी बिद्रोही समूह एकजुट होकर ब्रिटेन के अधिकारियों क्लबो और ट्रेनों को निशाना बनाने लगे । वो किसी भी प्रकार ब्रिटेन को फिलिस्तीन से बाहर कर देना चाहते थे ।
सन 1945 मे ब्रिटेन मे लेबर पार्टी की सरकार आई और उसने यहूदियों को ये आश्वासन दिया की वो  ब्रिटेन सरकार के स्वेत पत्र को वापस लेंगे और यहूदियों की मातृभूमि का समर्थन करेंगे साथ ही साथ विश्व के हर कोने से यहूदियों के फिलिस्तीन मे पुनर्वसन की प्रक्रिया दोगुनी की जाएगी ।हालांकि यहूदी बिद्रोही समूहों के लिए ये आश्वासन भर सिर्फ काफी नहीं था उन्होने अवैध रूप से यहूदियों को फिलिस्तीन मे लाना जारी रखा । अमरीका और अन्य देशो ने भी अब ब्रिटेन पर फिलिस्तीन मे यहूदियों के पुनर्वास के लिए दबाव डालना शुरू किया । एक एंग्लो - अमेरिकन जांच के लिए समिति ने तत्काल 1 लाख यहूदियों के फिलिस्तीन मे पुनर्वास की सिफ़ारिश की । इसका अरबों ने विरोध किया और वो भी ब्रिटेन पर दबाव डालने लगे ॥ 
ये वो समय था जब ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज अस्त हो रहा था । अब ब्रिटेन के लिए फिलिस्तीन एक गले की हड्डी बन गया था ब्रिटेन ने कोई सूरत न देखते हुए उसे संयुक्त राष्ट्र के हवाले करके खुद को विवाद से अलग करने मे भलाई समझी और फिलिस्तीन के भविष्य का निर्धारण अब संयुक्त राष्ट्र के हाथो मे था ॥
संयुक्त राष्ट्र ने अर्ब और यहूदियों का फिलिस्तीन मे टकराव देखते हुए फिलिस्तीन को दो हिस्सों अरब राज्य और यहूदी राज्य(इज़राईल) मे विभाजित कर दिया । जेरूसलम जो ईसाई 
,अरब और यहूदी तीनों के लिए धार्मिक महत्त्व का क्षेत्र था उसे अंतर्राष्ट्रीय प्रबंधन के अंतर्गत रखे जाने का प्रस्ताव हुआ ।इस व्यवस्था में जेरुसलेम को " सर्पुर इस्पेक्ट्रुम "(curpus spectrum) कहा गया ।  29 नवम्बर 1947 को संयुक्त राष्ट्र मे  ये प्रस्ताव पास हो गया । यहूदियों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया जबकि अरबों ने इसे नकार दिया। इस प्रस्ताव के अंतर्गत फिलिस्तीन को दो बराबर हिस्सों अरब राज्य और यहूदी राज्य(इज़राईल) मे विभाजित किया जाना था मगर इस विभाजन मे सीमा रेखा काफी जटिल और उलझी हुई थी। इस कारण थोड़े ही दिन मे ये परिलक्षित हो गया की ये विभाजन लागू नहीं किया जा सकेगा। इस विभाजन मे फिलिस्तीन की 70% अरब लोगो को 42% क्षेत्र मिला था जबकि यही लोग विभाजन के पहले 92% क्षेत्र पर काबिज थे अतः किसी भी प्रकार से ये विभाजन अरबों को मान्य नहीं था । 
सन 1948 के मई महीने मे ब्रिटेन की सेनाएँ वापस लौट गयी हलाकी इस समय तक इज़राइल और फिलिस्तीन की वास्तविक सीमा रेखा निर्धारित नहीं हो पायी थी। अब यहूदियों और फिलिस्तीनी अरबों मे खूनी टकराव शुरू हो गया । १४ मई१९४८ को यहूदियों ने स्वतन्त्रता की घोषणा करते हुए इज़राइल नाम के एक नए देश का ऐलान  कर दिया। अगले ही दिन अरब देशों- मिस्रजोर्डनसीरियालेबनान और इराक़ ने मिलकर इज़राइल पर हमला कर दिया। इसे 1948 का युद्ध का नाम दिया गया और यही से अरब इज़राइल युद्ध की शुरुवात हो गयी। इज़राइल के इस संघर्ष को अरबों ने "नक़बा" का नाम दिया हजारो अरब बेघर हुए और इज़राइली कब्जे वाले इलाको से खदेड़ दिये गए। हालांकि इज़राइली हमेशा ये कहते आए की ये सारे अरब लोग अरब की सेनाओं को रास्ता देने के लिए भाग गए थे ,मगर इज़राइल ने एक कानून पारित किया जिसके अनुसार जो फिलिस्तीनी (अब इज़राइली अरब) नक़बा के दौरान भाग गए थे वो इज़राइल वापस नहीं आ सकते और उनकी जमीनो पर विश्व के सभी हिस्सों से आने वाले यहूदियों को बसाने लगी इज़राइली सरकार ।युद्ध के शुरुवाती कुछ महीनो मे अरब देशो  की सेना इज़राइल पर भारी पड़ रही थी जून 1948 मे एक  युद्ध विराम ने अरबों और इजराइलियो दोनों को पुनः तैयारिया करने का मौका दिया यही अरब देश गलती कर बैठे और इजराइलियों ने तैयारी पूरी की चेकोस्लोवाकिया के सहयोग से अब युद्ध का पलड़ा इजराइलियों की तरफ झुक गया और अंततः इजराइलियों की विजय और अरबों की इस युद्ध मे हार हुई । इसके साथ साथ शरणार्थी समस्या की शुरुवात ।
इज़राइल फिलिस्तीन का मानचित्र समयानुसर 
1949 मे समझौते से जार्डन और इज़राइल के बीच ग्रीन लाइन नामक सीमा रेखा का निर्धारण हुआ। वेस्ट बैंक(जार्डन नदी के पश्चिमी हिस्से) पर जार्डन और गाजा पट्टी पर मिस्र(इजिप्ट) का कब्जा हो गया । इस पूरे घटनाक्रम मे लगभग 1 लाख फिलिस्तीनी बेघर हुए॥ ये सभी फिलिस्तीनी आस पास के अरब देशो मे जा शरणार्थी के रूप मे जीवन व्यतीत कर रहे थे ॥  इज़राइल को ११ मई ,१९४९  को सयुक्त राष्ट्र की मान्यता हासिल  हुई । हलाकी अरब देशो  ने कभी भी इस समझौते को स्थायी शांति समझौते के रूप मे स्वीकार नहीं किया । और दूसरी तरफ इज़राइल भी फिलिस्तीनी  शरणार्थीयों को वापस लेने के लिए तैयार नहीं हुआ।
इसके बाद इजराइलियों और फिलिस्तीनीयों अरबों के बीच खूनी संघर्ष जारी रहा । सन 1964 मे फिलिस्तीन लिबरेशन के गठन के बाद 1965 मे फिलिस्तीनि क्रांति की शुरुवात हो गयी।फिलिस्तीन लिबरेशन का गठन इज़राइल को खतम करने के उद्देश्य से हुआ था । इधर अमरीका ने अरब मे अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए इज़राइल को हथियारों और आर्थिक मदद देनी शुरू की। जून ५,१९६७ को इजराइल ने मिस्त्र ,जोर्डन सीरिया तथा इराक के खिलाफ युद्ध घोषित किया और ये युद्ध 6 दिनो तक चला इस युद्ध ने अरब जगत के सभी समीकरणों को बदल के रख दिया इज़राइल ने 1947 के यूएन क्षेत्र से कई गुना अधिक भू भाग एवं पर कब्जा कर लिया  और अब गाजा पट्टी पर भी इज़राइली कब्जा था । 6 अक्तूबर 1973 को एक बार फिर सीरिया और मिस्र ने इज़राइल पर हमला किया मगर इसमे भी उन्हे हार का सामना करना पड़ा और भूभाग गंवाना पड़ा 1974 के अरब अरब शिखर सम्मेलन मे पीएलओ को फिलिस्तीनी लोगो का प्रतिनिधि के रूप मे अधिकृत किया ।  अब संयुक्त राष्ट्र संघ मे फिलिस्तीन का प्रतिनिधित्व पीएलओ के नेता यासर अराफात कर रहे थे । इसके बाद एक तरफ कंप डेविड से लेकर ओस्लो तक शांति समझौते होते   रहे तो दूसरी ओर पीएलओ और मोसाद मे खूनी संघर्ष जारी था। मगर इज़राइल और फिलिस्तीन की सीमा का निर्धारण नहीं हुआ ।
मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात इज़राइल को मान्यता देने वाले पहले अरब नेता बने. अरब देशों ने मिस्र का बहिष्कार किया ।अनवर सादात  ने  1977 मे इसराइली संसद में भाषण दिया. सादत ने चुकी इजराइलियो से संधि की अतः अरब चरमपंथियों ने बाद मे उनकी 1981 मे हत्या कर दी। 1987 मे फिलिस्तीनीयों ने मुक्ति के लिए आंदोलन किया और उनका इज़राइली सेनाओं से टकराव शुरू हो गया । 13 सितंबर 1993 को अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की मध्यस्थता मे इज़रायली प्रधानमंत्री यित्साक राबीन और फिलस्तीनी स्वायत्त शासन के अध्यक्ष यासिर अराफत ने नार्वे की राजधानी ओस्लो मे ओस्लो शांति समझौता किया, समझौता के अनुसार इज़राइल 1967 से अपने क़ब्ज़े वाले फिलस्तीनी इलाकों से हटेगा। एक फिलस्तीनी प्रशासन स्थापित किया जाएगा और एक दिन फिलस्तीनियों को एक देश के तौर पर स्वतंत्रता मिलेगी। गाजा पट्टी के फिलिस्तीन के कब्जे मे आते ही हमास की हिंसक गतिविधियां और तेज हो गयी और उसी अनुपात मे इज़राइली प्रतिरोध । ओस्लो समझौते से जिस अरब इज़राइल संघर्ष पर विराम लगता प्रतीत हुआ समस्या पुनः वही आ के खड़ी  हो गयी॥ समय समय पर हमास द्वारा इज़राइल पर गाजा पट्टी से हमले किए जाते रहते हैं और इज़राइल के लिए अपने नागरिकों की  आत्मरक्षा के लिए बार बार युद्ध ॥॥इजरायल हर हमले के बाद कहता है की वो हमास को निशाना बना रहा है लेकिन अरब  देश इन हमलो मे आम मुसलमानो के मारे जाने की बात कहते हैं॥   इस्लाम यहूदी और ईसाई धर्म के उत्पत्ति काल से जुड़ी हुई ये समस्या अरब और पश्चिमी जगत के  सामरिक हितो के कारण और भी जटिल होती जा रही है आज भी लाखो फिलिस्तीनी शरणार्थी घर वापसी की रह देख रहे हैं तो दूसरी ओर इज़राइल हमास के हमलो से निपट रहा है। 
गाजा पट्टी पर इज़राइली बमबारी का एक दृश्य 

शनिवार, 24 नवंबर 2012

इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद और उसका मूल कारण ( भाग-1)


हम अक्सर अरब इज़राईल और इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद के बारे मे सुनते रहते हैं। अभी हाल  के दिनो मे भी दोनों देश के मध्य हुए  भयानक युद्ध के कारण जानमाल की काफी क्षति दोनों पक्षो को उठानी पड़ी॥ इस विवाद के मूल मे जाए तो इस विवाद की शुरुवात 19वी शताब्दी के अंत मे प्रखर होते अरब राष्ट्रवाद और यहूदी राष्ट्रवाद मे है।
यहूदी धर्म इस्लाम और ईसाई धर्म से पूर्व का धर्म है । इनकी धार्मिक पुस्तक को ओल्ड टेस्टामेण्ट कहते हैं,जिसे बाइबिल का प्रथम भाग  या पूर्वार्ध भी कहते हैं।" पैगंबर अब्राहम (अबराहम या इब्राहिम)जो ईसा से 2000 वर्ष पूर्व हुए थे उन्हे इस धर्म का प्रवर्तक कहा जाता है  । पैगंबर अलै. अब्राहम के पोते का नाम हजरत अलै. याकूब था। हजरत अलै. याकूब का एक नाम इजरायल भी था,जिसके नाम पर आज का यहूदी राष्ट्र इजरायल है । हजरत अलै. याकूब के एक पुत्र का नाम जूदा या यहूदा था यहूदा के नाम पर ही इसके वंशज यहूदी कहलाए । अब्राहम को यहूदीमुसलमान और ईसाई तीनों धर्मों के लोग अपना पितामह मानते हैं। आदम से अब्राहमअब्राहम से मूसायहाँ तक ईसाई इस्लाम और यहूदी सभी धर्मो के पैगंबर एक ही है
मान्यताओं के अनुसार ईसा मसीह को अब्राहम का वंशज मान कर एक समुदाय ने ईसाई धर्म को मानना शुरू किया जबकि बाइबिल के ओल्ड टेस्टमेंट को मानने वालों ने ईसा मसीह  को ईश्वर का पुत्र स्वीकार नहीं किया और वो अब तक अपने मसीहा के अवतार के इंतजार मे है। ओल्ड टेस्टामेण्ट मे कही भी ये स्पष्ट नहीं है की ईश्वर का मसीहा कब अवतरित होगा। इस्लाम की तरह ये एकेश्वरवाद मे विश्वास रखते हैं । मूर्ति पूजा के विरोधी यहूदी खतने पर भी इस्लाम के साथ खड़े हुए दिखाई देते हैं।
4000 साल पुराने यहूदी धर्म का आधिपत्य मिस्र,इराकइजराइल सहित अरब के अधिकांश हिस्सों पर राज था। धीरे धीरे यहूदी भी इज़राइल और जुड़ाया कबीलो मे बट गए ये लोग फारसी यूनानी और ग्रीक कई शासनो के अधीन रहे। रोमन साम्राज्य के बाद जब ईसाई धर्म का उदय हुआ तो यहूदियो पर अत्याचार शुरू हो गए॥ इस्लाम के उदय के बाद इन पर अत्याचार का बढ़ाना  स्वाभाविक था। धीरे धीरे यहूदियों के हाथ  से उनका देश इज़राइल जाता रहा और प्राचीन काल से 20वी शदी तक यहूदियों पर जितने अत्याचार हुए हैं शायद ही किसी जाति पर हुआ हो ॥हिटलर की यहूदियों से दुश्मनी और लाखों यहूदियों की सामूहिक नर संहार इसी कड़ी का उदाहरण है। आज भी पूरा अरब जगत इज़राइल का नामोनिशान मिटा देना चाहता है ।
निरंतर होते अत्याचारो के कारण यूरोप के कई हिस्सों मे रहने वाले यहूदी विस्थापित हो कर फिलिस्तीन आने लगे। 19वी शताब्दी के  के अंत तक यहूदी मातृभूमि (Jewish Homeland") इज़राइल  की मांग जोरों शोरों से उठने लगी ।यहूदियों ने  फिलिस्तीन के अंदर एक अलग राज्य यहूदी मातृभूमि  की मांग की जो जर्मनी या तुर्की के अधीन हो । उन्होने उस समय फिलिस्तीन की मुसलमान जनसंख्या को नजरंदाज कर दिया । यहूदियों का ये सोचना की मुसलमान जनसंख्या यहूदी मातृभूमि की मांग स्वीकार होने के बाद आस पास के अरब देशो मे चली जाएगी ,इस विवाद की नीव मे था ।  यहूदियों ने उस फिलिस्तीन की कल्पना की जिसमे यूरोप से आए हुए लाखो यहूदी निर्णायक बहुमत मे होंगे । प्रथम जियोनिस्ट कांग्रेस की बैठक स्विट्जर लैंड मे हुआ और वहाँ World Zionist Organization (WZO). की स्थापना की गयी । तमाम बैठको और वार्तालापों के बाद 1906 मे विश्व यहूदी संगठन (WZO) ने फिलिस्तीन मे यहूदी मातृभूमि बनाने का निर्णय लिया ।इससे पूर्व अर्जेन्टीना को यहूदी मातृभूमि बनाने को लेकर भी चर्चा हुई थी।
यहूदियों की ये यहूदी मातृभूमि  की कल्पना फिलिस्तीन की बढ़ती हुई मुस्लिम जनसंख्या के कारण एक कभी न खत्म होने वाले विवाद का कारण बन रही थी 1914 तक फिलिस्तीन की कुल जनसंख्या लगभग 7 लाख थी जिसमे 6 लाख अरब मूस्लिम थे और लगभग 1 लाख यहूदी । प्रथम विश्व युद्ध के समय तुर्की ने जर्मनी आस्ट्रिया और हंगरी के साथ मित्र सेनाओं (जिनमे ब्रिटेन भी शामिल था) के विरोध मे  गठबंधन कर लिया। उस समय फिलिस्तीन पर तुर्की सेना का शासन था । इस युद्ध से अरबों और यहूदियों दोनों का भरी नुकसान हो रहा था उसी समय तुर्की के सैनिक शासन ने फिलिस्तीन से उन सभी यहूदियों को खदेड़ना शुरू किया जो रूस और यूरोप के अन्य देशो से आए हुए थे । इसी समय ब्रिटेन ने  अरब और फिलिस्तीन को तुर्की शासन से मुक्ति दिलाने के लिए प्रतिबद्धता जताई बशर्ते अरब देश और फिलिस्तीन तुर्की के विरोध मे मित्र सेनाओं का साथ दे।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन और फ्रांस ने एक गुप्त समझौते  जिसे Sykes-Picot Agreement भी कहते है के अंतरगत  पूरे अरब जगत को दो "प्रभाव क्षेत्रों" मे बाट दिया गया जिसमे रूस की भी स्वीकृति थी । इसके अंतरगत सीरिया और लेबनान फ्रांस के प्रभाव क्षेत्र मे जॉर्डन इराक और फिलिस्तीन ब्रिटेन के क्षेत्र मे और फिलिस्तीन का कुछ क्षेत्र मित्र देशो की संयुक्त सरकार  के क्षेत्र मे था । रूस को  लिए इस्तांबुलतुर्की और अर्मेनिया का कुछ इलाका मिल गया ।
ब्रिटेन को यूएन जनादेश के अनुसार फिलिस्तीन और यहूदी मातृभूमि का क्षेत्र  
सन 1917 मे  ब्रिटेन के विदेश सचिव लार्ड बेलफोर और यहूदी नेता लार्ड रोथसचाइल्ड के बीच एक पत्रव्यवहार हुआ जिसमे लार्ड बेलफोर ने ब्रिटेन की ओर से ये आश्वासन दिया था की फिलिस्तीन को यदियों की मातृभूमि के रूप मे बनाने के लिए वो अपना सम्पूर्ण प्रयास करेंगे हालाँकि जनसंख्या के हिसाब से फिलिस्तीन मे  मुसलमान आबादी उस समय फिलिस्तीन की कुल आबादी की तीन चौथाई से भी ज्यादा थी। इस पत्रव्यवहार को बाद मे “The Balfour declaration”. का नाम दिया गया। मगर अब फिलिस्तीन मुस्लिमो ने "Balfour declaration" का विरोध करना शुरू किया।15 अप्रैल सन 1920 को इटली मे हुए San Remo Conference(सैन रेमो कान्फ्रेंस) मे मित्र देशो ने अमरीका ने फिलिस्तीन के लिए ब्रिटेन को अस्थायी जनादेश  दिया समझौते के अनुसार ब्रिटेन जो की फिलिस्तीन का प्रशासन देखेगा वो फिलिस्तीन को यहूदियों की मातृभूमि के रूप मे विकसित करने के लिए राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ बनाएगा। 

इस जनादेश के अनुसार फिलिस्तीन मे यहूदी हितो को देखने वाली अजेंसी "The Jewish Agency for Palestine,"  से ब्रिटेन का प्रशासन सामंजस्य बना के यहूदी हितों एवं उनके पुनर्वास को आसान करेगा। सन 1920 मे ही ब्रिटेन ने सर हरबर्ट सैमुएल को ब्रिटेन  के फिलिस्तीन कमे पहले  उच्चायुक्त के रूप मे भेजा। (सैन रेमो कान्फ्रेंस) मे जो क्षेत्र यहूदी मातृभूमि के लिए निर्धारित किया गया था वो यहूदी संगठनो की मांग की अपेक्षा काफी बड़ा क्षेत्र था । ये बात भी काही जाने लगी की ये निर्धारण चर्च ने किया और कही कही ऐसे भी विचार रखे गए की ब्रिटेन के पास यहूदी मातृभूमि के लिए कोई सुदृढ़ खाका नहीं था।
सन 1922 मे ब्रिटेन ने जनादेश  वाले हिस्से को दो हिस्सों मे बाट दिया पहला हिस्सा जो अपेक्षाकृत बड़ा था वो ट्रांसजार्डन(बाद मे जार्डन) कहा गया और छोटा हिस्सा फिलिस्तीन कहा गया। दोनों हिस्से ब्रिटेन के प्रभाव क्षेत्र मे ही थे । बाद मे जार्डन को एक स्वतंत्र देश के रूप मे मान्यता मिल गयी । मगर इसके साथ यहूदियों का एक बड़ा हिस्सा इसे अपने साथ किए गए विश्वासघात के रूप मे देखने लगा क्यूकी  प्रस्तावित यहूदी मातृभूमि का एक बहुत बड़ा हिस्सा ट्रांसजार्डन के रूप मे उनके हाथ से निकाल चुका था ।
ट्रांसजार्डन अलग करने के बाद बचा क्षेत्र 
अब जैसा की मित्रदेशों का ब्रिटेन को जनादेश था फिलिस्तीन मे एक स्थानीय और स्वशासनीय सरकार का प्रबंध मगर यहूदी ऐसे किसी भी स्वशासनीय सरकार  के प्रबंध से डरे हुए थे क्यूकी इसमे जनसंख्या के अनुपात से अरबों की  बहुलता हो जाती दूसरी तरफ अरबों को कोई भी ऐसी व्यवस्था स्वीकार नहीं थी जिसमे यहूदियों की कोई भी भागीदारी हो। अतः किसी भी प्रकार की व्यवस्था नहीं बन पायी॥ 

अब धीरे धीरे अरबों और यहूदियों मे टकराव शुरू हो गया और दंगे होने लगे । अरबों के अनुसार फिलिस्तीन मे यहूदियों के विश्व के अन्य हिस्सो से आ के बसने  के कारण फिलिस्तीनी अरबों को निर्वासित होना पड़ेगा । नाजियों से पहले भी पोलैंड और पूर्वी यूरोप के कई भागो से यहूदी फिलिस्तीन आने लगे हिटलर के नाजी शासन मे यहूदी एजेंसियों ने हिटलर से एक समझौता कर हजारो लोगो को फिलस्तीन मे बसाकर उनकी जान बचाई। सन 1936 मे अरबों ने विद्रोह  कर दिया। विद्रोह का कारण ब्रिटेन के फौजों द्वारा  एक मुस्लिम धर्मगुरु की हत्या थी जो फिलिस्तीन मे यहूदियों और ब्रिटेन के खिलाफ झण्डा उठाए हुए था। इस विद्रोह मे हजारो अरब और यहूदी मारे गए। इस विद्रोह को हवा देने मे यहूदियों का कट्टर दुश्मन हिटलर और इटली के फासिस्ट शामिल थे । इसके बाद इंग्लैंड ने एक प्रस्ताव रखा जिसमे एक  यहूदी मातृभूमि दूसरा फिलिस्तीनी अरबों का क्षेत्र होगा इसे अरब देशो ने नकार दिया ॥

अगले लेख मे संयुक्त राष्ट्र द्वारा इज़राइल फिलिस्तीन का विभाजन ,गजापट्टी का स्थानातरण और फिलिस्तीन इज़राइल के मध्य हुए कई समझौते एवं कभी न खतम होने वाले युद्ध का वर्णन