रविवार, 19 जून 2011

जूही-इरफ़ान प्रेमकथा : ना जन्म का हो बंधन-2



मित्रों  जूही-इरफ़ान प्रेमकथा : ना जन्म का हो बंधन-१ में आप सभी ने पढ़ा की किस तरह  कुरान की पवित्र शिक्षा लेने आया हुआ एक युवक अपने प्रेमजाल में एक युवती जूही को फंसा कर उसका शारीरिक और मानसिक शोषण करता है....प्रस्तुत है आगे की कथा..

अचानक जूही की नींद खुली तो ८ बज चके थे उसके बगल में असलम सोया हुआ था..स्तब्ध जूही ने अपने फर्श पर बिखरे कपड़ों में अपना तार तार होते चरित्र और व्यक्तित्व  की परिकल्पना कर ली और बिस्तर पर  फैला खून आंसुओं की शक्ल में अब आने वाले जीवन की एक भयावह कहानी लिखने वाला था....

अपने अस्तव्यस्त कपड़ों को समेटते हुए जूही बेसुध कर्तव्यविमूढ  सी एकटक छत की और देखे जा रही थी...आहट से असलम भी उठ गया..
जूही मुझे माफ़ कर दो अल्लाह की कसम मैंने ऐसा जानबूझ कर नहीं किया,पता नहीं कैसे मैं अपनी भावनाओं पर काबू नहीं कर पाया और ये सब हो गया..." इरफ़ान ने जूही के कंधे पर अपना हाथ रखते हुए कहा"
मुझे मत छुओ तुम्हारी हवस पूरी हो चुकी है,इसको भावनाओं का नाम दे कर मुझे झांसे में मत रखो...तुमने मुझे कही  मुह दिखाने लायक नहीं छोड़ा, इस जिन्दगी से अच्छा मैं अभी अपनी जान दे दूंगी ...मुझे जीना नहीं है....."ये कहते हुए जूही फफक फफक कर रो पड़ी"..
इससे पहले असलम अपनी अगली चाल चलता जूही अपने घर की और जा चुकी थी..जैसे जैसे जूही घर की और पहुच रही थी उसकी अंतरात्मा और मस्तिष्क में द्वन्द चाल रहा था की घर तक जाऊ या यही कहीं अपनी जान दे दूँ ...फिर उसका खुद से सवाल ..मेरे मरने के बाद माँ का क्या??कितनी बदनामी होगी??छोटी बहन बीमार है उसकी शादी नहीं होगी इतनी बदनामी के बाद.इसी उधेड़बुन में कब घर आ गया उसे पता नहीं चला..
कहाँ इतनी देर लगा दी बेटी घर में सब परेशान हैं.." हरप्रीत  आंटी की आवाज से जूही थोडा संयत हुई".

कही नहीं मम्मी पार्लर में मेरी सहेली मिल गयी थी निशा उसके साथ बाज़ार चली गयी थी....." जूही ने अपनी माँ से बिना नजरे मिलाये उत्तर देते हुए अपने कमरे का रुख किया"
रात में नींद जूही की आँखों से कोसो दूर थी..बार बार उसे अपने मुर्खता पर पछतावा हो रहा था की वो असलम के घर क्यों गयी??  जैसे तैसे जूही ने खुद को समझा लिया की वो इस बात को जीवन का एक बुरा अध्याय मान कर भूल  जाएगी.. धीरे धीरे लगभग १ माह बीतने को आये..धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो रहा था मगर  असलम बिच बिच में एस एम एस द्वारा जूही से मिन्नतें और माफ़ी मांगता रहता था अपने कुकृत्य के लिए...
आज सुबह अचानक भोर में जूही की तबियत ख़राब हो गयी..उल्टियाँ आता देख हरप्रीत   आंटी उसे रेगुलर चेक अप के लिए पास के आर्मी अस्पताल में ले गयी....शाम को रिपोर्ट देखते ही घर में कोहराम मच गया ...जूही पेट से है...
बता बेटी अब में इस समाज में खुद तुम्हे या तेरी छोटी बहन को कहाँ ले कर जाऊ..कौन रिश्ता करेगा तुझसे तेरी बहन से ..आखिर हमारी परवरिश में क्या कमी रह गयी थी जो तुने ऐसा किया...आदि आदि उलाहने  देते हुए हरप्रीत    आंटी दिवार पर सर पटक कर रोये जा रही थीं ...
आखिर कर जूही के सब्र का बांध भी टूट गया ..बिलखते हुए उस दिन की ब्यथा कथा और इरफ़ान के किये गए कुकर्मों को उसने हरप्रीत  आंटी से बताया...
खैर अब बारी थी इस विपत्ति से बाहर आने की तो हरप्रीत आंटी ने सादिक मियां के घर जा के चर्चा करने का प्रयास किया...सादिक मियां एक समाधान और साथ में शर्त रख दी की..असलम और जूही का निकाह करा देते हैं मगर उससे पहले आप सभी को इश्लाम धर्म स्वीकार करना होगा...अब हरप्रीत आंटी असमंजस में ,,
हाथ जोड़ते हुए उन्होंने असलम से कहा बेटा अब हमारी इज्ज़त तुम्हारे निर्णय पर है..इश्लाम स्वीकार कर  के मैं अपनी छोटी बेटी का भविष्य अंधकार में नहीं डाल सकती..तुम्ही कुछ बोलो..    
असलम ने नजरे जमीन में गडाए हुए कहा .." में सादिक भाई जैसा कह रहे हैं वैसा ही करूँगा बाकि आप खुद फैसला कर लें की आप को क्या करना है..."

हरप्रीत  आंटी अश्रुपूरित नैनो के साथ सादिक मियां के घर से वापस आ गयी...घर आ कर उन्होंने जूही के गर्भपात का एक कठिन फैसला लिया..इसके लिए उन्होंने जूही को पास के शहर में रहने वाली अपनी एक विश्वस्त सहेली के यहाँ भेज दिया... 
हॉस्पिटल पहुच कर जूही जब बेड पर लेटी तो उसे  उसे सामने दीवार पर लगा एक पोस्टर दिखा जिसमें लिखा था "माँ मेरा कसूर क्या है जो तुम मुझे मार रही हो".......


शायद इन पंक्तियों ने जूही की मातृत्व को जागृत कर दिया और उसने भ्रूण हत्या न करने का निर्णय किया  और वो चुपचाप हॉस्पिटल से बाहर आ गयी.....
बाहर आ के उसने असलम को फ़ोन किया " असलम ,मुझे मेरे अपने जीवन से कोई लगाव नहीं मगर  मैं अपने गर्भ में पल रहे इस बच्चे को नहीं मर सकती..तुम्ही कोई रास्ता बताओ"
असलम ने फिर सादिक भाई का पुरे परिवार का इश्लाम स्वीकार करने का टेप जूही को सुना दिया...फिर थोड़ी न नुकुर के बाद असलम ने एक सुझाव दिया..

" जूही चलो हम भाग के निकाह कर लेते हैं ,मेरा एक खास दोस्त है लाहौर में वो सब व्यवस्था  कर देगा नेपाल के रस्ते हम पाकिस्तान जा के अपनी एक अलग दुनिया बसा लेंगे...और तुम्हारी माँ और बहन को भी धर्म परिवर्तन नहीं करना पड़ेगा..सादिक भाई भी बिच में नहीं आयेंगे तब….
जैसे व्यक्ति एक बार दलदल में फस जाये तो जितना ही हाथ पैर मारता है उतना ही दलदल में फसता चला जाता है कही जूही उसी राह पर तो नहीं थी??..हलाकि एक ऐसे व्यक्ति के विश्वास पर, अपना आने वाला जीवन समर्पित कर देना, जिसने धोखे से अपनी वासना तृप्ति के भावनाओं का सहारा लिया हो ,बहुत मुश्किल था मगर जूही के पास इस मुसीबत से बचने और परिवार को बचाने का सिर्फ यही एकमात्र रास्ता नजर आया.और उसने असलम को इस बात के लिए दुखी मन से हाँ कर दिया..
अगले दिन जूही और असलम का एक-एक पत्र मिला अपने अपने घरों में और जूही असलम निकल पड़े नेपाल के लिए .नेपाल पहुच कर जूही असलम ने निकाह रचाया और अब जूही बन चुकी थी जमीला बेगम. 
लगभग १० दिनों बाद असलम और जमीला (जूही) के नाम का पासपोर्ट आ चूका था और लाहौर  के पास एक छोटे से कस्बे में चले गए....वहां पर पहले से ही सारी व्यवस्था देख कर जमीला (जूही) ने असलम से पूछा की 
क्या ये सब तुम्हारे  दोस्त का है ?? 
असलम ने बताया की उसे यहीं  एक सिक्यूरिटी कम्पनी में नौकरी मिल गयी है और ये मकान भी कंपनी में दिया है...हलाकि वो इस प्रश्न को टाल गया की पाकिस्तान आते आते ही उसे नौकरी और मकान कैसे मिल गया"
समय बीतता गया जमीला (जूही) को जुड़वाँ बच्चे पैदा हुए दोनों बेटे नाम अनिश और अब्दुल ...समय बीतते बीतते असलम के जमीला (जूही) के प्रति व्यवहार में परिवर्तन आने लगा...हद एक दिन तब हो गयी जब स्थानीय बम विस्फोट में असलम का नाम आया और पुलिस उसे पूछते  हुए आई..जब जमीला (जूही) ने असलम से ज्यादा जानने की कोशिश  की तो असलम ने हर बार की तरह जमीला (जूही) की पिटाई कर दी..किनारे पड़े बच्चे जमीला (जूही) के साथ रोये जा रहे थे और असलम पाकिस्तान से बाहर जाने का प्रबंध करने लगा..अब तक ये बात साफ हो चुकी थी की असलम एक कट्टर स्थानीय इस्लामिक ग्रुप के लिए कम करता था जिसका काम आतंक की फसल तैयार करना था..
जैसे तैसे असलम जमीला (जूही) को लेकर नेपाल के रस्ते पुनः भारत आया और ४ साल बाद पुनः सादिक मियां के के घर के सामने ...सादिक मियां जो अब तक असलम की कारस्तानियों के बारे में जान चुके थे उन्होंने पहले ही असलम को अपने घर में शरण देने से मना कर दिया..थक हार कर असलम मिया को हरप्रीत   आंटी की याद आई और असलम मिया जमीला (जूही),और अपने दो बच्चों के ले कर हरप्रीत  आंटी के घर पर..

कांपते हाथो से जमीला (जूही) ने घंटी बजायी....दरवाजा खुलते ही अपनी माँ  और छोटी बहन जसलीन को ४ साल बाद देख  जमीला (जूही) उनसे लिपट कर फूट फूट कर रो पड़ी.. हरप्रीत आंटी आखिर थी तो उसकी माँ ..पूरी राम कहानी सुनने के बाद उन्होंने अपनी बेटी दामाद को अपने घर में रहने की इजाजत दे दी कम से कम बेटी आँख के सामने तो रहेगी....असलम को भी जसलीन आंटी ने समझाया की तुम्हारा भारत में कोई आपराधिक रिकार्ड तो है नहीं तो यही कहीं कोई काम शुरू कर लो.. असलम मियां ने भी एक दुकान खोल ली पास में ही और समयचक्र चलता रहा...अब हरप्रीत  आंटी के घर से पूजा की घंटियों की जगह अजान एवं नमाज के सुर आने लगे..नियति का लिखा मान कर हरप्रीत आंटी ने इसे स्वीकार कर लिया था....

जैसा की पहले हमने पढ़ा था जसलीन को एक बीमारी थी जिसे डाक्टर "मार्टिन बेल सिंड्रोम" कहते है..मतलब शारीरिक आयु से मानसिक आयु का कम होना..अब जसलीन १९ की हो चुकी थी मगर उसका व्यवहार १३ साल की बच्ची जैसा था ...असलम मिया कभी कभी जसलीन हो हास्पिटल ले कर जाते उसके इलाज के लिए .साथ साथ घर में रहने कारण धीरे धीरे असलम ,जमीला (जूही)  एवं उसके दो बच्चों के साथ जसलीन घुल मिल गयी थी..मगर कुछ दिनों से जमीला (जूही)  को असलम के व्यवहार में परिवर्तन लगने लगा वो अब जमीला (जूही) को ज्यादा समय देने लगा था, कुछ तोहफे भी ला कर देता था साथ ही साथ जसलीन को उसके मनपसंद खिलौने क्यूकी जसलीन की उम्र भले ही १९ साल थी मानसिक रूप से उसकी उम्र खिलौने लायक ही थी.. 
एक दिन असलम दुकान से जल्दी आ गया हरप्रीत आंटी और जमीला (जूही) बाज़ार के लिए जा रही थी जाते जाते दोनों बच्चों और जसलीन का ख्याल रखने के लिए असलम मियां को बोल गयी...शायद फिर अनहोनी दस्तक दे रही थी जमीला (जूही) के जीवन में ...जसलीन को घर में अकेली देख असलम के अन्दर का छुपा हुआ वासना का शैतान  फिर जग गया और जसलीन की बीमारी ने असलम का काम और आसान कर दिया और असलम की हवस का शिकार एक मानसिक रूप से कमजोर बच्ची जसलीन बन गयी....असलम ने साक्ष्य मिटने की भरपूर कोशिश भी की मगर चुकी जसलीन मानसिक रूप से बच्ची ही थी उसने घर आते ही सारी बात अपनी बहन जमीला (जूही)  से बता दिया.. जमीला (जूही)  स्तब्ध हो कर जसलीन के अस्तित्व को चीथड़े चीथड़े होने की कहानी उसके ही बालमन से सुने जा रही थी मगर उसने संयत होते हुए इसका जिक्र किसी से न करने की हिदायत देते हुए अपने कमरे में बच्चों के साथ चली गयी....रात को खाना खाते समय असलम के हाव  भाव देख कर किसी को भी ऐसा नहीं लग रहा था असलम मियां ने इतने निकृष्ट कोटि का कृत्य किया होगा. रात को सोते समय अचानक ही असलम ,जमीला (जूही)  को  बहुविवाह की खूबियाँ बताते बताते सो गया...मगर जमीला (जूही)  ने ये जाहिर नहीं होने दिया की उसे असलम के इस कुकृत्य की खबर है...
रात को अचानक जमीला (जूही)  के कमरे से बच्चों के रोने एवं चीखने की जोर जोर से आवाजें आने लगी...हरप्रीत आंटी भागी भागी  कमरे की और दौड़ी......बड़ा ही वीभत्स दृश्य ...

असलम  के पुरे शारीर पर पेट्रोल डाल कर जमीला (जूही)  ने उसे जिन्दा जला दिया था, वो एक तरफ तड़फ रहा था..जमीला (जूही)  ने अपनी नस काट कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली थी, दोनों बच्चे जमीला के  पास उसके खून में सने हुए चिल्ला रहे थे.. हरप्रीत आंटी बेहोश पड़ी थी और जसलीन का बालमन अब भी इस घटना को समझने की कोशिश कर रहा था .....

लव  जेहाद का बम फट चुका था.. लव जेहादी की शहादत ब्यर्थ नहीं गयी एक पूरा परिवार लव जेहाद का शिकार हो चुका था ....  


35 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसे दरिंदों का यही अंजाम होना चाहिय ...और नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी ...

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  2. जूही को ये काम शुरुवात में ही कर देना चाहिए था...

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  3. घृणित षड़यन्त्र, कुत्सित तरीके।

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  4. islam ka yhi vasvik chehra hai jo sb dhrmon ke ek hone ki bat krte hain ve ab to apni aankhe khol len

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  5. लव जेहाद का बम फट चुका था.. लव जेहादी की शहादत ब्यर्थ नहीं गयी एक पूरा परिवार लव जेहाद का शिकार हो चुका था ....
    सुन्दर पोस्ट

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  6. यह बात पहले समझ में आना चाहिये. बाद में तो लकीर पीटने जैसी बात रह जाती है.

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  8. बहुत ही मर्मस्पर्शी कहानी पेश किया आशुतोष जी आपने !
    लेकिन जहां तक दरिंदगी की बात है आज ये हर धर्म में मौजूद है हमें सर्वप्रथम उस दरिंदगी को दूर करना होगा !

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  9. आशुतोष, पिछली पोस्ट पर आपकी प्रोफ़ाईल एक सवाल किया था, इस बार भी वही।

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  10. आशुतोष जी निः संदेह आपकी पोस्ट बहुत अच्छी है सभी की तरह मुझे भी भाग -२ का बेसब्री से इंतजार था और ये पोस्ट आई भी और उम्दा भी है .विषय आपने बहुत अच्छा चुना फिर भी मेरी एक शिकायत है . यह पोस्ट पढने में मुझे उतना आनंद नहीं आया जितना भाग -१ पढने में आया था .मुझे लगा भाग -१ आपने जितने श्रम और मन से लिखा था भाग -२ उतने मन से नहीं लिखा .जितनी सधी ,सटीक शब्दावली का प्रयोग आपने पहले भाग में किया इसमें वह सामंजस्य थोडा कम दिखा .हो सकता है किसी व्यस्तता की वजह से ऐसा हुआ हो ,किन्तु प्रथम भाग की तुलना में सिर्फ शैली की दृष्टी से मुझे कमतर लगा .बाकी विषय तो आपने सच में बहुत ही सुन्दर चुना और उसका अच्छा प्रस्तुतिकरण भी दिया .

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  11. @ तरुण भारतीय लोकेन्द्र जी,वेद जी,मनस्विनी मुकुल ,भारतीय नागरिक
    बहुत बहुत आभार ..कथा के अतिरिक्त लव जेहाद से सावधान रहने की आवश्यकता है
    इंदु पूरी जी : समझ में नहीं आया आप की टिपण्णी धन्यवाद्
    मदन जी आप की बात सही है दरिंदगी हर धर्म में है मगर अगर उसे षणयंत्र के रूप में इस्तेमाल किया जाय तो धरम के परिधि के बाहर की बात हो जाती है
    संजय जी : मेरी समझ से आप इस पंक्ति की बात कर रहे हैं ...मैं चिंगारी को कुचलने की जगह चिंगारी को हवा दे कर हर एक उस सामाजिक परिवारिक या व्यक्तिगत व्यवस्था में एक क्रांति लाने का विचारक हूँ जो दोगली विचाधाराओ पर आधारित है ...
    इसका आशय फिलहाल इतना ही कहूँगा की जो भी आक्रोश दोगली व्यवस्था के खिलाफ फूट नहीं पाता है मैं प्रयासरत रहता हूँ की वो चिंगारी मलयानिल का रूप ले ..और परिवेर्तन हो...ज्यादा विस्तार से क्या बताऊ??
    @मनस्विनी मुकुल जी : आप ने बिलकुल सत्य कहा प्रथम चरण की कथा में मैंने पुरे ५-६ दिन की मेहनत की थी मगर इस चरण में १५-२० दिनों से अतिव्यस्तता थी और कई मित्रों के फ़ोन एवं ईमेल आ रहे थे अगले चरण को जल्दी से जल्दी पोस्ट करने के लिए इसलिए मैं इस कथा पर ४-५ घंटे ही दे पाया तो हो सकता है जल्दीबाजी में साहित्यिक शब्द चयन की कमी रह गयी हो....ये बात मुझे भी महसूस हो रही थी .. आभार आप का विश्लेषण के लिए..

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  12. सही .कहा लोकेन्द्र ने ..अंकुर फूटने से पहले ही नष्ट कर देना चाहिए....

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  13. आशुतोष,
    इसी पंक्ति की तरफ़ मेरा इशारा था। ताजा पोस्ट के परिपेक्ष्य में जब प्रोफ़ाईल की यह लाईन पढ़ रहा था तो यही खटक रहा था। ऐसे मामलों में भी चिंगारी के लपट बनने का ही इंतजार नहीं कर रहा हमारा समाज?
    और विस्तार की जरूरत नहीं, बात स्पष्ट हो गई, बहुत है।

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  14. बहुत ही दर्दनाक अंत....मगर दरिंदगी की भी कोई इंतेहा होती है....

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  15. शांति नहीं क्रांति

    jai baba banaras........

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  16. जानदार अन्त अच्छा रहा, ऐसा पहले ही हो जाना था

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  17. स्तब्ध
    स्तब्ध
    स्तब्ध
    स्तब्ध

    आशु कहानी सदा समाज से ही जन्म लेती है.... और कहीं का कहीं समाज में ये सब घट रहा है ..

    समय है की आधुनिकता की चादर ओदे आज की नवयुवतिया इस कहानी से सबक लें ..

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  18. आज के बदलाव को दर्शाती कहानी. सोचने को विवश करती हुई

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  19. लव जेहाद का यही अंत है.
    कुछ समय पहले मेरे दोस्तों ने ऐसी ही एक लड़की जो आत्महत्या करना चाहती थी बचाया था .
    http://jayatuhindurastra.blogspot.com/2010/09/blog-post.html

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  20. Ek samasya hai ki hum sab is baare mein jaante hain, parantu iska koi samadhan nahi khoj paaye hain ab tak.

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  21. आदरणीय श्रीआशुतोषजी,

    बहुत संवेदनशील कहानी और वास्तविक चित्रण।

    आप से और रचनाएँ,साहित्य पढ़ने का मन करता है..!!

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  22. आदरणीय आतुतोष जी आपने बहुत ही संवेदनाशील और मर्मस्पर्शी कहानी के माध्यम से लव जेहादी दरिंदों के कुत्सित मिशन का वास्तविक चित्रण किया है । हमें इस कहानी से प्रेरणा प्राप्त कर अपनी नारी शक्ति को जेहादी दरिंदों के मिशन के प्रति सावधान करना होगा , हमें इन दुष्ट जेहादी विषधरों का फन उठने से पहले ही कुचलना होगा ।
    सत्य का बोध कराने वाली सुन्दर , सार्थक कहानी ...... आभार ।
    www.vishwajeetsingh1008.blogspot.com

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  23. ये सिर्फ कहानी ही है ऐसा नहीं है ... इस लव जिहाद को कई जगह देखा जा सकता है ...

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  24. उत्तर
    1. एक आदमी के रूप में आतंकवादी बैठा हो तो उसे कुछ भी नही होता दिखाई देता है ? कुत्ते सूअर के औलाद !!

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    2. मादरचोद साले तुम सब अपनी मान को चोद कर पैसा हुए हो तो कहाँ से होता दिखाई देगा ? साले कमीने सलीम तुम स्लीपर आतंकवादी हो ! मई जानत हू तुम्हे !

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  25. ये झूट है..


    कहानी का सच मैं आपको बताता हु...

    इरफ़ान/असलम ने आगे कई शादियाँ की और कई लड़कियों का मजहब इस्लाम में बदला और ये लगातार जरी है क्योकि इस्लाम में बहुविवाह की आज़ादी इस लिए ही दी गयी है..


    आगरा में जब एक शर्मा जी जो की RSS की खिलाफत करते थे,के यहाँ जब ऐसा हुआ तो वो भागे भागे RSS के पास गए RSS के लोगो ने सहायता की और मुसलमानी मोहल्ले से जान पर खेल कर उनकी बेटी उनको ला कर दी, पर उसकी शादी की रात उसकी छोटी बहिन ने उसको प्रेम के वास्ते भगा दिया, आज वोह लड़की दुखी और लाचार, गुलामो की जिंदगी जी रही है... वोह घर वापस आना चाहती है पर अब संभव नहीं...

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  26. hindu ladkiyo ko bahut samajh se kam lena hoga.......aur in kathmullo ke chakkar me padne se bachna hoga...........

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  27. पहली बार आपके ब्लॉग पर आया और "लव जिहाद" की विषय-वस्तु वाले दोनों भागों को बिना रूके एक ही बार में पढ़ गया। आपने कथात्मक आलेख के माध्यम से लव जिहाद की अवधारणा और उसके संवाहकों की पोल-पट्टी खोल के रख दिया है। काश कि अत्यधिक उदारमना और प्रगतिशील हिंदू परिवार इन बातों को समझ पाते...

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  28. आशुतोष भाई आपकी यह कहानी सच्चाई के बहुत समीप है| ऐसा हमारे समाज में होता है| और आजकल तो सो कॉल्ड आधुनिक लोग ऐसा करना अपनी शान और धर्मनिरपेक्षता समझते हैं| मैंने अपने आस पास कई लोगों को अपनी बेटियाँ मुस्लिम लड़कों को ख़ुशी ख़ुशी सौंपते देखा है| कहते हैं कि प्रेम में धर्म नहीं देखा जाता|
    अरे इन हिन्दू लड़कियों को कोई हिन्दू लड़के नहीं मिलते क्या?
    लोकेन्द्र भाई से सहमत हूँ कि जूही को ऐसा बहुत पहले ही कर देना चाहिए था, जो उसने अंत में किया|

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  29. यह सिर्फ एक कहानी नहीं है जिसमे भाषा और वाक्यों का प्रयोग देखना आवश्यक है | यह एक कटु सत्य है और जो लोग यह कहते हैं के यह नहीं हो रहा तो एकदम गलत कहते हैं | सच्चाई सामने आ चुकी है
    मैं कहूँगा के क्यों अगर एक मुस्लिम लड़की अगर किसी हिन्दू लड़के से प्रेम करने लगे और उससे विवाह कर ले तो उनको मार दिया जाता है? मतलब तो साफ़ है लव जिहाद और यही इन सबकी चाल है | आँखें खोलो और हकीकत को स्वीकार करो | उठो जागो और उखाड़ फेंको इस कुटिल षड़यंत्र के पीछे छुपे हुए लोगों को | और उन लोगों को भी जो सेकुलरिस्म के नाम पर इनका बचाव करते रहते हैं| अंत में इतना ही कहूँगा के अगर हमने अभी कुछ न किया तो वो दिन दूर नहीं जब हम अपने ही देश में बेइज्जत और घ्रणित जीवन जी रहे होंगे...

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  30. aapne likha vo saty he par hmare hindu bhai
    nhi mante he jish din sabhi is batko shmjleing
    us bin love jehad bhi khhtm hojaega or mshzido me shocaly honge jay sree ram

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