सोमवार, 27 जून 2011

प्रणव वार रूम लीक- कांग्रेस में होता शक्ति विकेंद्रीकरण ???

कुछ दिनों से मीडिया में दबी जबान से वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के दफ्तर में की गयी जासूसी प्रकरण चर्चा में है...राजनैतिक गलियारों और सरकार के लिए भी ये घटना गले की हड्डी बनता प्रतीत हो रहा है... खबर ये हैं की च्युइंगम जैसी कोई  चीज वित्त मंत्री के कार्यालय में कई जगहों पर चिपकी पाई गयी..प्रणव दा ने इसकी शिकायत कुछ माह पूर्व प्रधानमंत्री से की और अपुष्ट ख़बरों के अनुसार उन्होंने  इशारों इशारों में माननीय गृहमंत्री चिदम्बरम जी को निशाने पर ले लिया इस जासूसी कांड के लिए..ये वही चिदम्बरम हैं जिन्हें दिग्विजय सिंह "घमंडी" होने तक का विशेषण दे चुके हैं..

अगर इसका राजनैतिक परिदृश्य में विश्लेषण करें तो ये जासूसी कांड से ऊपर १० जनपथ की सरकार पर ढीली पड़ती पकड़ की और भी इशारा करता है..अगर कांग्रेस का इतिहास देखें तो मुख्यतः यह एक परिवार केन्द्रित दल ही रहा है..जब जब किसी ने इस शक्ति के केन्द्रीकरण को तोड़ने की कोशिश की वो पार्टी विभाजन या उस व्यक्ति विशेष के प्राणाहुति के चरम तक भी पहुच गया...

उदाहरण में शरद पवार और पी ए संगमा है जिन्होंने गाँधी नेहरु परिवार का विरोध किया और परिणाम कांग्रेस विभाजन तक जा पहुंचा..इंदिरा जी के समय घूस लेकर आयत लाइसेंस के मुद्दे पर जब तत्कालीन इंदिरा सरकार के मंत्री ललितनारायण झा के इंदिरा जी के खिलाफ मुह खोलने का शक हुआ तो समस्तीपुर (बिहार) में उनको मंच समेत ही बम से उड़ा दिया गया...यह एक राजनैतिक हत्या थी मगर हर मामले की तरह इसे भी दबा दिया गया और शायद अब सामान्य ब्यक्ति को ये संज्ञान भी न हो.....

बात कांग्रेस में  सत्ता के विकेंद्रीकरण की हो  तो हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव जी ने इसमें सफल रूप से ५ सालो तक निर्बाध अभियान चलाया और पार्टी में अपनी जगह और अपनी जान दोनों बचाने में कामयाब हुए..हलाकि नरसिम्हाराव जी सोनिया की ही पसंद थे मगर सत्ता की बागडोर हाथ में आते ही उन्होंने सर्वप्रथम १० जनपथ के पर कतरने शुरू किये और यदा कदा राजीव जी के समय हुए घोटालों का डर दिखाकर १० जनपथ के रिमोट  कंट्रोल की बैटरी को मृत करने में विशेष योगदान दिया..हाँ विपक्ष के हो हल्ले के बाद भी राजीव गाँधी फाउन्डेसन को ८-१० करोण रूपये नरसिम्हाराव जी १० जनपथ के खर्चे के लिए दे दिया करते थे...

कालांतर में नरसिम्हाराव सरकार  के कारनामों के कारण गेंद एक बार फिर १० जनपथ के पाले में आई और २००४ में सोनिया गाँधी एक बड़ी राजनैतिक शक्ति के रूप में उभरी और वाम मोर्चे के सहयोग से सरकार बनाने और प्रधानमंत्री पद तक पहुचने का रास्ता खुल गया..उस समय सोनिया गाँधी ने बिदेशी मूल के उठते मुद्दे को शांत करने के लिए मनमोहन सिंह का चुनाव कर लिया..

खुद दौड़ से हट कर उन्होंने विपक्ष और खुद की पार्टी में मुखरित होते बिदेशी मूल के मुद्दे की हवा निकल दी ,त्याग का सन्देश भी जनता में गया और सबसे महत्त्वपूर्ण युवराज(राहुल गाँधी) की भविष्य में  महाराज(प्रधानमंत्री) बनने की दावेदारी का रास्ता साफ करा लिया...

चूकी नरसिम्हाराव जैसे राजनैतिक व्यक्ति को चुनकर एक बार सोनिया ने अपने हाथ जला लिए थे अतः उस गलती से सबक लेते हुए उन्होंने प्रणव मुखर्जी ,चिदंबरम और कई वरिष्ठ जनाधार वाले  कांग्रेसियों को ठिकाने लगते हुए लोकसभा का चुनाव भी न जीत पाने वाले अपेक्षाकृत गैर राजनैतिक व्यक्ति मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया..इससे मूल सत्ता पर गाँधी परिवार  का नियंत्रण बना रहा और सिखों को भी एक मानसिक संतुष्टि देने का प्रयास किया जो सिख दंगो के कांग्रेसी जख्म आज तक ले के घूम रहें हैं..

यूपीऐ-१ तक सब ठीक ठाक रहा...ये भी बात दीगर है की आज तक के हुए भारत के प्रधानमंत्रियों में अमेरिका के सबसे बड़े चहेते के रूप में माननीय मनमोहन सिंह जी उभरे हैं..यहाँ तक की अमेरिका के शरणागत होते हुए परमाणु संधि मुद्दे पर अपनी सरकार की भी बलि देने को तैयार हो गए...अब यूपीऐ-२ में कई समूह बन गए हैं एक अमेरिकापरस्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ,कपिल सिब्बल,चिदंबरम का ग्रुप दूसरा प्रणव दा का धडा जिसमें यदा कदा दिग्विजय सिंह चिदम्बरम जैसों को ठिकाने लगाने के लिए साथ हो लेते हैं..तो एक तरफ १० जनपथ है जो इस विवाद में सत्ता पर ढीली होती पकड़ से चिंतित है..उन्हें प्रणव में तारणहार भी दीखता है और उनका बढ़ता कद युवराज की ताजपोशी के आड़े भी आ रहा है तो दूसरी और प्रणव दा के दफ्तर की जासूसी को हरी झंडी दे दी जाती है...साथ ही साथ दिग्विजय जैसे स्वामिभक्त युवराज को प्रधानमंत्री बनाने का राग अलाप कर मनमोहन -चिदंबरम को ठिकाने लगा रहें हैं..इसी क्रम में उनका चिदंबरम को "घमंडी" बताने का वक्तव्य भी शामिल हो जाता है...

अब इस भेडचाल में सब अपने अपने रस्ते और निष्ठाओं के अनुसार मलाई खाने और स्वयं की सुविधा के अनुसार निर्णय लेने में लगे हैं...कभी ४ मंत्री मुह उठाये बाबा से मिन्नतें करने जातें जाते हैं..तो कोई होटल बुलाता है....तभी उनको ठिकाने लगाने के लिए दूसरा धडा उसी दिन निर्दोष लोगों पर लाठियां और गोली चलाने को हरी झंडी दे देता है..इन सबके बिच १० जनपथ अपने ही मंत्रियों के कुकर्मों से बचते हुए ये कहकर छुट्टियां मानाने चला जाता है की उसे इस घटना की जानकारी नहीं हुई..  आने के बाद सारी संगठनात्मक  मशीनरी युवराज को प्रधानमंत्री के रूप में लांच करने में झोंक दी जाती है की चुनाव के समय आदर्श से लेकर 2G , लोकपाल से रामदेव, कलमाड़ी से राजा या विभिन्न कुकर्मों का ठीकरा मनमोहन जी के सर पर फोड़कर सजास्वरुप नए प्रधानमत्री युवराज राहुल गाँधी के नाम का एलान कर देना...फिर वही पुनरावृत्ति की कोशिश सत्ता भी हाथ में, गाँधी परिवार विरोधी ठिकाने और जनता को नए युवराज से उम्मीद का झुनझुना....

इन सबके बिच अगर समय मिला तो जासूसी करा लेते हैं अपने मंत्रियों का ..ये एक सोचने का विषय है की अब वित्त मंत्रालय जैसे विभाग जासूसों की पहुच में हैं..क्या इसका कोई सम्बन्ध कालेधन से है??? क्या प्रणव मुखर्जी की इमानदार कोशिश पर कालेधन के पहरेदारों ने पहरा लगाया ?? या सरकार को कितने लाख करोण का चूना भ्रष्ट मंत्रियों ने लगाया इसकी जासूसी की जा रही थी...

यहाँ एक संभावना ये भी बनती है की ये जासूस बिक जाएँ और वो कागजात आई एस आई या  सी  आई ऐ के हत्थे लग जाये...कौन करा रहा है ये जासूसी ये यक्ष प्रश्न है??क्या कोई बिदेशी एजेंसी ,कोई बड़ा  कार्पोरेट , चिदम्बरम या स्वयं १० जनपथ....हिन्दुस्थान की जनता जबाब चाहती है....
बाबा का कालाधन खोजने वाली सरकार,तथाकथित बुद्धिजीवी , मीडिया सब खामोश है ,क्या प्रणव मुखर्जी के दफ्तर से मिलने वाली च्युइंगम पचा लिया सबने ..... क्या १० जनपथ की हरी झंडी मिलने का इंतजार हम तब तक करेंगे जब तक देश बिक न जाये???


रविवार, 19 जून 2011

जूही-इरफ़ान प्रेमकथा : ना जन्म का हो बंधन-2



मित्रों  जूही-इरफ़ान प्रेमकथा : ना जन्म का हो बंधन-१ में आप सभी ने पढ़ा की किस तरह  कुरान की पवित्र शिक्षा लेने आया हुआ एक युवक अपने प्रेमजाल में एक युवती जूही को फंसा कर उसका शारीरिक और मानसिक शोषण करता है....प्रस्तुत है आगे की कथा..

अचानक जूही की नींद खुली तो ८ बज चके थे उसके बगल में असलम सोया हुआ था..स्तब्ध जूही ने अपने फर्श पर बिखरे कपड़ों में अपना तार तार होते चरित्र और व्यक्तित्व  की परिकल्पना कर ली और बिस्तर पर  फैला खून आंसुओं की शक्ल में अब आने वाले जीवन की एक भयावह कहानी लिखने वाला था....

अपने अस्तव्यस्त कपड़ों को समेटते हुए जूही बेसुध कर्तव्यविमूढ  सी एकटक छत की और देखे जा रही थी...आहट से असलम भी उठ गया..
जूही मुझे माफ़ कर दो अल्लाह की कसम मैंने ऐसा जानबूझ कर नहीं किया,पता नहीं कैसे मैं अपनी भावनाओं पर काबू नहीं कर पाया और ये सब हो गया..." इरफ़ान ने जूही के कंधे पर अपना हाथ रखते हुए कहा"
मुझे मत छुओ तुम्हारी हवस पूरी हो चुकी है,इसको भावनाओं का नाम दे कर मुझे झांसे में मत रखो...तुमने मुझे कही  मुह दिखाने लायक नहीं छोड़ा, इस जिन्दगी से अच्छा मैं अभी अपनी जान दे दूंगी ...मुझे जीना नहीं है....."ये कहते हुए जूही फफक फफक कर रो पड़ी"..
इससे पहले असलम अपनी अगली चाल चलता जूही अपने घर की और जा चुकी थी..जैसे जैसे जूही घर की और पहुच रही थी उसकी अंतरात्मा और मस्तिष्क में द्वन्द चाल रहा था की घर तक जाऊ या यही कहीं अपनी जान दे दूँ ...फिर उसका खुद से सवाल ..मेरे मरने के बाद माँ का क्या??कितनी बदनामी होगी??छोटी बहन बीमार है उसकी शादी नहीं होगी इतनी बदनामी के बाद.इसी उधेड़बुन में कब घर आ गया उसे पता नहीं चला..
कहाँ इतनी देर लगा दी बेटी घर में सब परेशान हैं.." हरप्रीत  आंटी की आवाज से जूही थोडा संयत हुई".

कही नहीं मम्मी पार्लर में मेरी सहेली मिल गयी थी निशा उसके साथ बाज़ार चली गयी थी....." जूही ने अपनी माँ से बिना नजरे मिलाये उत्तर देते हुए अपने कमरे का रुख किया"
रात में नींद जूही की आँखों से कोसो दूर थी..बार बार उसे अपने मुर्खता पर पछतावा हो रहा था की वो असलम के घर क्यों गयी??  जैसे तैसे जूही ने खुद को समझा लिया की वो इस बात को जीवन का एक बुरा अध्याय मान कर भूल  जाएगी.. धीरे धीरे लगभग १ माह बीतने को आये..धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो रहा था मगर  असलम बिच बिच में एस एम एस द्वारा जूही से मिन्नतें और माफ़ी मांगता रहता था अपने कुकृत्य के लिए...
आज सुबह अचानक भोर में जूही की तबियत ख़राब हो गयी..उल्टियाँ आता देख हरप्रीत   आंटी उसे रेगुलर चेक अप के लिए पास के आर्मी अस्पताल में ले गयी....शाम को रिपोर्ट देखते ही घर में कोहराम मच गया ...जूही पेट से है...
बता बेटी अब में इस समाज में खुद तुम्हे या तेरी छोटी बहन को कहाँ ले कर जाऊ..कौन रिश्ता करेगा तुझसे तेरी बहन से ..आखिर हमारी परवरिश में क्या कमी रह गयी थी जो तुने ऐसा किया...आदि आदि उलाहने  देते हुए हरप्रीत    आंटी दिवार पर सर पटक कर रोये जा रही थीं ...
आखिर कर जूही के सब्र का बांध भी टूट गया ..बिलखते हुए उस दिन की ब्यथा कथा और इरफ़ान के किये गए कुकर्मों को उसने हरप्रीत  आंटी से बताया...
खैर अब बारी थी इस विपत्ति से बाहर आने की तो हरप्रीत आंटी ने सादिक मियां के घर जा के चर्चा करने का प्रयास किया...सादिक मियां एक समाधान और साथ में शर्त रख दी की..असलम और जूही का निकाह करा देते हैं मगर उससे पहले आप सभी को इश्लाम धर्म स्वीकार करना होगा...अब हरप्रीत आंटी असमंजस में ,,
हाथ जोड़ते हुए उन्होंने असलम से कहा बेटा अब हमारी इज्ज़त तुम्हारे निर्णय पर है..इश्लाम स्वीकार कर  के मैं अपनी छोटी बेटी का भविष्य अंधकार में नहीं डाल सकती..तुम्ही कुछ बोलो..    
असलम ने नजरे जमीन में गडाए हुए कहा .." में सादिक भाई जैसा कह रहे हैं वैसा ही करूँगा बाकि आप खुद फैसला कर लें की आप को क्या करना है..."

हरप्रीत  आंटी अश्रुपूरित नैनो के साथ सादिक मियां के घर से वापस आ गयी...घर आ कर उन्होंने जूही के गर्भपात का एक कठिन फैसला लिया..इसके लिए उन्होंने जूही को पास के शहर में रहने वाली अपनी एक विश्वस्त सहेली के यहाँ भेज दिया... 
हॉस्पिटल पहुच कर जूही जब बेड पर लेटी तो उसे  उसे सामने दीवार पर लगा एक पोस्टर दिखा जिसमें लिखा था "माँ मेरा कसूर क्या है जो तुम मुझे मार रही हो".......


शायद इन पंक्तियों ने जूही की मातृत्व को जागृत कर दिया और उसने भ्रूण हत्या न करने का निर्णय किया  और वो चुपचाप हॉस्पिटल से बाहर आ गयी.....
बाहर आ के उसने असलम को फ़ोन किया " असलम ,मुझे मेरे अपने जीवन से कोई लगाव नहीं मगर  मैं अपने गर्भ में पल रहे इस बच्चे को नहीं मर सकती..तुम्ही कोई रास्ता बताओ"
असलम ने फिर सादिक भाई का पुरे परिवार का इश्लाम स्वीकार करने का टेप जूही को सुना दिया...फिर थोड़ी न नुकुर के बाद असलम ने एक सुझाव दिया..

" जूही चलो हम भाग के निकाह कर लेते हैं ,मेरा एक खास दोस्त है लाहौर में वो सब व्यवस्था  कर देगा नेपाल के रस्ते हम पाकिस्तान जा के अपनी एक अलग दुनिया बसा लेंगे...और तुम्हारी माँ और बहन को भी धर्म परिवर्तन नहीं करना पड़ेगा..सादिक भाई भी बिच में नहीं आयेंगे तब….
जैसे व्यक्ति एक बार दलदल में फस जाये तो जितना ही हाथ पैर मारता है उतना ही दलदल में फसता चला जाता है कही जूही उसी राह पर तो नहीं थी??..हलाकि एक ऐसे व्यक्ति के विश्वास पर, अपना आने वाला जीवन समर्पित कर देना, जिसने धोखे से अपनी वासना तृप्ति के भावनाओं का सहारा लिया हो ,बहुत मुश्किल था मगर जूही के पास इस मुसीबत से बचने और परिवार को बचाने का सिर्फ यही एकमात्र रास्ता नजर आया.और उसने असलम को इस बात के लिए दुखी मन से हाँ कर दिया..
अगले दिन जूही और असलम का एक-एक पत्र मिला अपने अपने घरों में और जूही असलम निकल पड़े नेपाल के लिए .नेपाल पहुच कर जूही असलम ने निकाह रचाया और अब जूही बन चुकी थी जमीला बेगम. 
लगभग १० दिनों बाद असलम और जमीला (जूही) के नाम का पासपोर्ट आ चूका था और लाहौर  के पास एक छोटे से कस्बे में चले गए....वहां पर पहले से ही सारी व्यवस्था देख कर जमीला (जूही) ने असलम से पूछा की 
क्या ये सब तुम्हारे  दोस्त का है ?? 
असलम ने बताया की उसे यहीं  एक सिक्यूरिटी कम्पनी में नौकरी मिल गयी है और ये मकान भी कंपनी में दिया है...हलाकि वो इस प्रश्न को टाल गया की पाकिस्तान आते आते ही उसे नौकरी और मकान कैसे मिल गया"
समय बीतता गया जमीला (जूही) को जुड़वाँ बच्चे पैदा हुए दोनों बेटे नाम अनिश और अब्दुल ...समय बीतते बीतते असलम के जमीला (जूही) के प्रति व्यवहार में परिवर्तन आने लगा...हद एक दिन तब हो गयी जब स्थानीय बम विस्फोट में असलम का नाम आया और पुलिस उसे पूछते  हुए आई..जब जमीला (जूही) ने असलम से ज्यादा जानने की कोशिश  की तो असलम ने हर बार की तरह जमीला (जूही) की पिटाई कर दी..किनारे पड़े बच्चे जमीला (जूही) के साथ रोये जा रहे थे और असलम पाकिस्तान से बाहर जाने का प्रबंध करने लगा..अब तक ये बात साफ हो चुकी थी की असलम एक कट्टर स्थानीय इस्लामिक ग्रुप के लिए कम करता था जिसका काम आतंक की फसल तैयार करना था..
जैसे तैसे असलम जमीला (जूही) को लेकर नेपाल के रस्ते पुनः भारत आया और ४ साल बाद पुनः सादिक मियां के के घर के सामने ...सादिक मियां जो अब तक असलम की कारस्तानियों के बारे में जान चुके थे उन्होंने पहले ही असलम को अपने घर में शरण देने से मना कर दिया..थक हार कर असलम मिया को हरप्रीत   आंटी की याद आई और असलम मिया जमीला (जूही),और अपने दो बच्चों के ले कर हरप्रीत  आंटी के घर पर..

कांपते हाथो से जमीला (जूही) ने घंटी बजायी....दरवाजा खुलते ही अपनी माँ  और छोटी बहन जसलीन को ४ साल बाद देख  जमीला (जूही) उनसे लिपट कर फूट फूट कर रो पड़ी.. हरप्रीत आंटी आखिर थी तो उसकी माँ ..पूरी राम कहानी सुनने के बाद उन्होंने अपनी बेटी दामाद को अपने घर में रहने की इजाजत दे दी कम से कम बेटी आँख के सामने तो रहेगी....असलम को भी जसलीन आंटी ने समझाया की तुम्हारा भारत में कोई आपराधिक रिकार्ड तो है नहीं तो यही कहीं कोई काम शुरू कर लो.. असलम मियां ने भी एक दुकान खोल ली पास में ही और समयचक्र चलता रहा...अब हरप्रीत  आंटी के घर से पूजा की घंटियों की जगह अजान एवं नमाज के सुर आने लगे..नियति का लिखा मान कर हरप्रीत आंटी ने इसे स्वीकार कर लिया था....

जैसा की पहले हमने पढ़ा था जसलीन को एक बीमारी थी जिसे डाक्टर "मार्टिन बेल सिंड्रोम" कहते है..मतलब शारीरिक आयु से मानसिक आयु का कम होना..अब जसलीन १९ की हो चुकी थी मगर उसका व्यवहार १३ साल की बच्ची जैसा था ...असलम मिया कभी कभी जसलीन हो हास्पिटल ले कर जाते उसके इलाज के लिए .साथ साथ घर में रहने कारण धीरे धीरे असलम ,जमीला (जूही)  एवं उसके दो बच्चों के साथ जसलीन घुल मिल गयी थी..मगर कुछ दिनों से जमीला (जूही)  को असलम के व्यवहार में परिवर्तन लगने लगा वो अब जमीला (जूही) को ज्यादा समय देने लगा था, कुछ तोहफे भी ला कर देता था साथ ही साथ जसलीन को उसके मनपसंद खिलौने क्यूकी जसलीन की उम्र भले ही १९ साल थी मानसिक रूप से उसकी उम्र खिलौने लायक ही थी.. 
एक दिन असलम दुकान से जल्दी आ गया हरप्रीत आंटी और जमीला (जूही) बाज़ार के लिए जा रही थी जाते जाते दोनों बच्चों और जसलीन का ख्याल रखने के लिए असलम मियां को बोल गयी...शायद फिर अनहोनी दस्तक दे रही थी जमीला (जूही) के जीवन में ...जसलीन को घर में अकेली देख असलम के अन्दर का छुपा हुआ वासना का शैतान  फिर जग गया और जसलीन की बीमारी ने असलम का काम और आसान कर दिया और असलम की हवस का शिकार एक मानसिक रूप से कमजोर बच्ची जसलीन बन गयी....असलम ने साक्ष्य मिटने की भरपूर कोशिश भी की मगर चुकी जसलीन मानसिक रूप से बच्ची ही थी उसने घर आते ही सारी बात अपनी बहन जमीला (जूही)  से बता दिया.. जमीला (जूही)  स्तब्ध हो कर जसलीन के अस्तित्व को चीथड़े चीथड़े होने की कहानी उसके ही बालमन से सुने जा रही थी मगर उसने संयत होते हुए इसका जिक्र किसी से न करने की हिदायत देते हुए अपने कमरे में बच्चों के साथ चली गयी....रात को खाना खाते समय असलम के हाव  भाव देख कर किसी को भी ऐसा नहीं लग रहा था असलम मियां ने इतने निकृष्ट कोटि का कृत्य किया होगा. रात को सोते समय अचानक ही असलम ,जमीला (जूही)  को  बहुविवाह की खूबियाँ बताते बताते सो गया...मगर जमीला (जूही)  ने ये जाहिर नहीं होने दिया की उसे असलम के इस कुकृत्य की खबर है...
रात को अचानक जमीला (जूही)  के कमरे से बच्चों के रोने एवं चीखने की जोर जोर से आवाजें आने लगी...हरप्रीत आंटी भागी भागी  कमरे की और दौड़ी......बड़ा ही वीभत्स दृश्य ...

असलम  के पुरे शारीर पर पेट्रोल डाल कर जमीला (जूही)  ने उसे जिन्दा जला दिया था, वो एक तरफ तड़फ रहा था..जमीला (जूही)  ने अपनी नस काट कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली थी, दोनों बच्चे जमीला के  पास उसके खून में सने हुए चिल्ला रहे थे.. हरप्रीत आंटी बेहोश पड़ी थी और जसलीन का बालमन अब भी इस घटना को समझने की कोशिश कर रहा था .....

लव  जेहाद का बम फट चुका था.. लव जेहादी की शहादत ब्यर्थ नहीं गयी एक पूरा परिवार लव जेहाद का शिकार हो चुका था ....  


बुधवार, 1 जून 2011

जूही-इरफ़ान प्रेमकथा : ना जन्म का हो बंधन-1

जुलाई का महिना ,अरुणोदय की बेला में सूर्यदेव अपनी प्रखर रश्मियों को धीरे धीरे फैला रहे थे...हरप्रीत आंटी ने बालकनी में झाड़ू लगते हुए  जूही को आवाज दी..जूही बेटा जरा देख तो इतनी सुबह सुबह कौन कालबेल बजा रहा है...."शायद दूधवाला होगा" कहते हुए उनींदी सी जूही,जिसके अभी यौवन में कदम ही रखा था,अपने अस्त व्यस्त कपड़ों और अधखुले  केशों को ठीक करती दरवाजे की और बढ़ी..
दरवाजा खोलते ही अचानक एक २५-२७ वर्षीय नौजवान को अपने सामने देखकर अचकचाते हुए उसका ध्यान अपने दुपट्टे पर गया जो शायद जल्दबाजी में बिस्तर में ही रह गया था..
"किससे मिलना है आप को??" दरवाजे के पीछे जा कर दुपट्टे की कमी को पूरा करते हुए जूही ने पूछा...मानो ऐसा प्रतीत हुआ की वो युवक  जूही के निश्चल सौन्दर्य के वशीभूत  हो कर बिना कुछ सुने उसे एकटक निहार रहा है...उसकी इस अवस्था पर जूही को झुंझलाहट हुई मगर उम्र की इस अवस्था में ऐसे घटनाओं से दो-चार होने पर नारी सुलभ बृत्ति के कारण अंतर्मन में एक हलकी सी ख़ुशी की अनुभूति हर नवयौवना को होती है.
" कौन है बेटा" हरप्रीत आंटी की आवाज ने शायद तन्द्रा को तोडा ..इससे पहले की जूही कुछ जबाब देती..हरप्रीत आंटी दरवाजे तक आ चुकी थी..."क्या बात है बेटा ,किससे मिलना है??" हरप्रीत आंटी ने पूछा..
ज जी ,जी मेरा नाम असलम है ,मुझे सादिक भाई से मिलना है ..फोकल प्वाईंट,23 /69  ,लुधियाना ...यही पता है न...." नवयुवक ने थोडा हकलाते हुए कहा"
ये मुए कालोनी के मुंडे जब देखो तब बोर्ड उल्टा कर देते हैं...बेटा वही सादिक  न जो पिछले महीने मेरठ से यहाँ शिफ्ट हुए हैं...." हरप्रीत आंटी  ने प्रश्नवाचक दृष्टी से  पूछा...
"हाँ वही" ..असलम का संछिप्त सा जबाब,इन सबके बिच रह रह कर वो जूही को कनखियों से देखने का अपना स्वाभाविक पुरुषोचित गुण या लोभ पर नियंत्रण नहीं रख पा रहा था..
बड़े भले आदमी हैं ..बेटा सामने हमारे ठीक सामने वाली सफ़ेद मकान में चले जाओ..वही सादिक  रहते हैं.. "हरप्रीत आंटी ने कहा"
जी शुक्रिया " सादिक  ने अपना ध्यान न चाहते हुए जूही से हटाकर हरप्रीत आंटी की ओर करते हुए कहा,और सफ़ेद मकान की और रुख किया.....
चलो जूही, तेरी दीदी आने वाली हैं ,छोटी बहन को भी हस्पताल ले जाना है..जल्दी नहा कर तैयार हो जाओ...बहुत काम  बाकी है.." हरप्रीत आंटी ने किचन की और जाते हुए कहा...
" हरप्रीत आंटी..यही नाम था आस पड़ोस में उनका..वात्सल्य एवं ममता से भरपूर..कहीं किसी जानवर को भी पीड़ा में देखा तो घर ले आती..सेवा सुश्रुना करती ...इनके पति सेना में उच्चाधिकारी थे..कश्मीर की पोस्टिंग के समय एक मस्जिद में बम रखे होने की खबर सुनकर,कार्यवाही में गए, सभी नमाजी भाइयों को बाहर निकालकर, बम को निष्क्रिय कर के बड़ा अनिष्ट टाल दिया,मगर वहां के कुछ स्थानीय कट्टर लोगों को ये मस्जिद का अपमान लगा की काफ़िर ने स्थल को अपवित्र किया और अगले दिन उनके सुरक्षा में लगे एक सिपाही ने भरी बंदूक की सारी गोलिया,सोते समय उनके शरीर में उतार दी और हरप्रीत आंटी इस दुनिया में अपनी ३ जवान बेटियों के साथ अकेले  रह गयीं ...."

बड़ी बेटी का नाम "ख़ुशी" उसका विवाह  पिछले साल हरप्रीत आंटी ने एक स्थानीय अध्यापक से कर दिया...बिच वाली "जूही" जो अभी १८ साल की थी और उससे छोटी "जसलीन".......जसलीन को एक बीमारी थी जिसे डाक्टर "मार्टिन बेल सिंड्रोम" कहते है..मतलब शारीरिक आयु से मानसिक आयु का कम होना...अब जसलीन की उम्र १६ साल और ब्यवहार १० साल के बच्ची जैसा.." खैर जैसे तैसे हरप्रीत आंटी इन सारे दुखों को समेटे हुए जीवनपथ पर आगे बढ़ रही थी ..यद्यपि कर्नल साहब की कमी हर वक़्त खटकती थी मगर इन बच्चियों में उनका अंश देख  कर खुद को हर बार मजबूत रखने में सक्षम पाती थी..
आज सुबह से हरप्रीत आंटी के घर में चहल पहल थी बड़े दामाद और बेटी आई हुए थी.."जूही" भी आज बहनों के साथ ऐसे अठखेलिया कर रही थी जैसे उनके बचपन का समय वापस आ गया है जब कर्नल साहब आतंकवाद की भेट नहीं चढ़े थे..और हर शाम वो आर्मी आफिसर्स कालोनी के पार्क में लुक्का  छिपी खेला करती थी...
तभी टेलीफ़ोन घनघनाया.."ट्रिन ट्रिन ट्रिन ट्रिन" ..हेल्लो हरप्रीत आंटी ने टेलीफ़ोन उठाते हुए कहा....हेल्लो हेल्लो दूसरी तरफ से एक असपष्ट सी आवाज सुनाई दी... कल रात की आंधी से लाइन  में बहुत खर्र खर्र का शोर हो रहा है...आप जरा ९८११८७****(जूही का मोबाइल नंबर) पर काल करें.....ये कहकर हरप्रीत आंटी किचन की में उबलते चाय की ओर बढ़ी..
थोड़े देर बाद जूही के नंबर पर ९८६१******(असलम का नंबर) से कॉल आई.."हेल्लो" जूही ने मोबाइल की कॉल का जबाब  देते हुए कहा...
"सलाम वालेकुम आंटी मैं  असलम बोल रहा हूँ सादिक  भाई जान के घर से ..अगले हफ्ते ईद पर एक छोटा सा प्रोग्राम है सोचा सभी मोहल्ले वालों को बुला लूँ ,सबसे दुआ सलाम,जान पहचान  भी हो जाएगी....आप भी तशरीफ़ लाये सभी लोगों के साथ.."
मैं "जूही" बोल रही हूँ आंटी नहीं..."जूही ने बिना को चेहरे पर भाव लाये कहा"...
अच्छा "जूही जी" आप वो "खुबसूरत मोहतरमा" जिनसे पहले दिन मुलाकात हुई  थी..... " असलम की आवाज दूसरी तरफ से आई'
जैसा की हम सब जानते हैं ५ साल से ८५ साल की औरत की कमजोरी है उसके सौंदर्य की प्रसंशा....."खुबसूरत मोहतरमा " विश्लेषण जूही को मन ही मन अच्छा लगा ..मगर नारी सुलभ संस्कार के कारण उसने बात का रुख मोड़ते हुए कहा की, "ठीक है मम्मी को बता दूंगी वो आ जाएँगी..."
तुम भी आना " असलम ने बिना कोई मौका देते हुए कहा".... "जूही जी" से "तुम" शब्द तक आने में असलम को सिर्फ १५ सेकेण्ड लगे थे..." जूही ने बिना किसी उत्तर के फ़ोन काट दिया.......
किसका फ़ोन था ..हरप्रीत आंटी ने किचन से आवाज  दिया...ज जी सादिक जी के यहाँ से किसी असलम का वो ईद की दावत पर बुला रहें हैं सबको..." जूही ने असलम नाम से अनजान  बनते हुए कहा..."
अरे ये वही लड़का होगा जो पहले दिन रास्ता भटककर हमारे घर आ गया था....ठीक है एक कम करो शर्मा जी और चावला जी के साथ साथ  आज "ख़ुशी" की विवाह की सालगिरह के पार्टी में सादिक  भाई और उस  लड़के को भी बुला लो....
जूही ने अपने मोबाईल से कॉल लगाया..अब तक ९८६१****** (असलम का नंबर) मोबाईल नंबर ASLAM @sadik नाम से सेव हो चूका था जूही के मोबाईल में....
असलम ने फ़ोन उठाते हुए कहा हा जूही बोलो मैं अभी तुम्हारे ही बारे में सोच रहा था...जूही ने पुनः बात बदलते हुए शाम का आमंत्रण दे कर असलम की उम्मीदों पर तुषारापात कर दिया...
शाम को इत्र और अन्य सौंदर्य प्रसाधनो का लेपन कर असलम सादिक  भाई के पीछे पीछे पहुचे हरप्रीत आंटी के घर... माशा अल्ला असलम मिया थे भी, गबरू जवान ,जिन के मोह में कोई भी कुवारी कन्या फिसल जाए फिर जूही के यौवन ने तो अभी अंगडाईयां लेना शुरू किया था..सादिक भाई पांच टाइम  के नमाजी उन्हें क्या पता की कुरान पवित्र  की शिक्षा लेने आया ये बालक किस मकसद से यहाँ है...शाम को खाने में असलम मियां की पसंद थी कबाब और साथ में खिलाने वाली "जूही" ...
खैर पार्टी ख़तम हुए और असलम जूही की बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ.....जल्दी ही ASLAM @SADIKसे सिर्फ असलम हो गया ..और कुछ दिनों बाद असलम मिया ने जूही को मिलने बुलाया ....घंटाघर के पास वाले रेस्तरां में ...जूही ने थोडा ना नुकुर की तो अपनी जुम्मा जुम्मा ३ महीने पुरानी दोस्ती की कसमें देकर असलम  ने मना ही लिया ...
सिर्फ १५ मिनट के लिए आई हूँ घर से झूठ बोलकर बोलो क्या बात है??? "रेस्तरां में असलम से जूही ने कहा...
आज पहली बार किसी अनजान(हालाकि असलम अब अनजान नहीं था) लड़के ने जूही का हाथ पकड़ा था..स्त्रियों के अन्दर की छठी इन्द्री होती है जो, इन्सान उसे किस भाव से छु रहा है या देख रहा है, वो भांप  लेती हैं..शायद इसलिए असलम  को दूर हटाते हुए जूही ने कहा तुम्हे क्या कहना है, जल्दी बताओ, नहीं तो मैं जा रही हूँ...
जूही मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ ....कल शाम  को मेरे घर आ जाना बाकि बातें वही बता दूंगा..जूही मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता...
जूही ने रेस्त्रा से निकलते हुए बोला बिलकुल नहीं आउंगी जो सोच रहे हो वो संभव भी नहीं है....ये ख्याल भूल जाओ असलम ...
अगर तुम नहीं आई तो तुम्हारा नाम अपने खून से लिख कर ख़ुदकुशी कर लूँगा जूही...इसे धमकी नहीं मत समझना ये एक सच्चे आशिक की आशिकी है.....कहते हुए असलम अपनी आँखों में आंसुओं की कुछ बूंदों को समेटने का असफल प्रयास करते हुए चला गया....
रात को जूही को असलम  का आंसुओं से भरा चेहरा बार बार याद आता .....मोबाइल भी बंद है उसका...किसी अनहोनी की आशंका का कारण बनने की परिकल्पना से ही,जूही की अंतरात्मा कांप उठी...जैसे तैसे सुबह हुई.. मगर उसका ध्यान सामने वाले सादिक भाई   के सफ़ेद घर से आती हुए आहट  और आवाजों पर लगा था..दोपहर में सादिक भाई की आवाज आई.. असलम क्या कर रहे हो??जरा तोते का पिंजरा बाहर ले आओ...असलम को बाहर लान में देख जूही की जान में जान आई..मगर ये क्या ..जूही आज असलम के लिए रात भर सोयी नहीं...कहीं उस नौयौवना के ह्रदय में असलम  के प्रेम का बिज अंकुरित तो नहीं हो रहा............नहीं नहीं ऐसा नहीं है मन ही मन खुद को जूही ने समझाया..
तभी असलम का एस. एम. एस. आता है की शाम को ५ बजे घर आ जाओ नहीं तो मैं अपनी कसम पूरी कर के दिखा दूंगा...फिर मोबाईल आफ..अब जूही के सामने फिर वही रात वाली परिस्थिति खड़ी हो गयी..इसी उधेड़बुन में ४ बज गए ओर उसने देखा की सादिक भाई अपनी जीप ले कर कही निकल रहे हैं जाते जाते असलम से चिल्लाते हुए कहे जा रहें की रात को काउन्सिल के मीटिंग में  थोडा देर हो जाएगी..
आखिर कर जूही ने एक बार असलम को घर पे जा के समझाने का निर्णय लिया...चूकी असलम का मोबाइल आफ था तो बात करने की कोई गूंजाइस ही नहीं  थी...
जैसे ही घर के दरवाजे तक जूही  गयी ...."कहा जा रही हो जूही"  हरप्रीत आंटी की आवाज ने उसका ध्यान अपनी और खिंचा..."कहा जाता है ना की, हर मुसीबत  से पहले भगवान किसी न किसी रूप में आप को रोकते हैं...शायद  हरप्रीत आंटी की आवाज इश्वर के वाहक के रूप में आई थी........मगर " विनाशकाले विपरीतबुद्धि " जूही ने कहा पार्लर जा के आती हूँ मम्मी ...." हरप्रीत आंटी ने ज्यादा टोका टाकी नहीं की ओर कहा ठीक है जल्दी आना..."
अब जूही धडकते दिल और आने वाली परिस्थितियों की उधेड़बुन में चलती हुए सादिक  भाई के घर तक पहुची,काल बेल बजाते ही असलम ने तुरंत दरवाजा खोला मानो वो उसका इंतजार ही कर रहा हो दरवाजे पर...
" बोलो ये क्या मजाक है तुमने मुझे अब क्या कहने को बुलाया है..ये मरने वरने की धमकी क्यों दे रहे हो...जो तुम सोच रहे हो वो संभव नहीं है..मेरी माँ के ऊपर बहुत जिम्मेदारियां हैं "....जूही ने एक साँस में सारी भड़ास उड़ेल दी...
असलम जो अब तक ख़ुदकुशी की धमकियाँ दे रहा था ,शांतचित्त, मुस्कराते हुए बोला ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी..मगर मैं  इश्क  तुमसे ही करता रहूँगा ताउम्र.....अब आ ही गयी हो तो आखिरी बार मेरे हाथों का बना कुछ खा के जाओ मैं समझूंगा मेरा इश्क  कुबूल हुआ.. अल्लाह ने तुम्हारी नेमत बस इतने दिनों के लिए ही बख्शी  थी.....शायद आखिरी के शब्द बोलते बोलते असलम की आँखों में आसू आ गए ओर वो बिना जूही की मर्जी जाने कुछ खाने के लिए लाने चला गया...
खाने की मेज पर अब घर की बनायीं हुए नमकीन ओर  कोल्ड ड्रिंक का गिलास था...
असलम तुमने आज तक ये नहीं बताया की तुम यहाँ करने क्या आये हो..."कोल्ड ड्रिंक का गिलास होठो से लगाते हुए जूही ने कहा.."
आया तो था सादिक  भाई से कुरान की शिक्षा लेने मगर इश्क  से बड़ी नेमत क्या है अल्लाह की...मक्का मदीना सब सिख लिया तुमसे मिलने के बाद...." असलम ने कहा'
ओह इतना प्यार करता है मुझे ......मन ही मन जूही ने सोचा....... कोल्ड ड्रिंक का खाली गिलास मेज पर रखते हुए जूही ने कहा..
" मैं चलती हूँ  अब असलम अपना खयाला रखना ...शायद मेरे सर में दर्द हो रहा है और नींद सी आ रही है.." 
अरे ये नमकीन मैंने अपने हाथों से बनाये हैं एक बार खा तो लो कम से कम ये कहते हुए असलम ने जूही का हाथ  पकड़ कर सोफे पर खीचते हुए अपने हाथों में नमकीन का एक टुकड़ा ले कर उसके होठो पर रख दिया...इन सबके  बिच जूही को पता ही नहीं चला की वो कब असलम के बाँहों में आ चूकी है....
ये क्या कर रहे हो छोड़ो मुझे असलम............मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ.....कहते हुए असलम ने जूही को अपने भुजपाश में जकड लिया....अब तक कोल्डड्रिंक में मिली हुए गोली असर कर चूकी थी.....घर का एकांत वातावरण ...एक जवान लड़की..ओर एक  नौजवान के बाँहों में ...और नशीली दवा का असर ....लाज का एक झीना सा आवरण जो जूही या जूही जैसी किसी भी नवयुवती के  व्यक्तित्व और आचरण की पहरेदारी करता था ...हट चुका था.... शायद असलम को लुधियाना आने का अभीष्ट हासिल हो चुका था.......

अचानक जूही की नींद खुली तो ८ बज चके थे उसके बगल में असलम सोया हुआ था..स्तब्ध जूही ने अपने फर्श पर बिखरे कपड़ों में अपना तार तार होते चरित्र और व्यक्तित्व  की परिकल्पना कर ली और बिस्तर पर  फैला खून आंसुओं की शक्ल में अब आने वाले जीवन की एक भयावह कहानी लिखने वाला था.....