रविवार, 24 अप्रैल 2011

मैकाले की प्रासंगिकता और भारत की वर्तमान शिक्षा एवं समाज व्यवस्था में मैकाले प्रभाव :

मैकाले नाम हम अक्सर सुनते है मगर ये कौन था? इसके उद्देश्य और विचार क्या थे कुछ बिन्दुओं की विवेचना का प्रयास हैं करते.
मैकाले: मैकाले का पूरा नाम था थोमस बैबिंगटन मैकाले .. अगर ब्रिटेन के नजरियें से देखें तो अंग्रेजों का ये एक अमूल्य रत्न था .. एक उम्दा इतिहासकार, लेखक प्रबंधक, विचारक और देशभक्त ..इसलिए इसे लार्ड की उपाधि मिली थी और इसे लार्ड मैकाले कहा जाने लगा..अब इसके महिमामंडन को छोड़ मैं इसके एक ब्रिटिश संसद को दिए गए प्रारूप का वर्णन करना उचित समझूंगा जो इसने भारत पर कब्ज़ा बनाये रखने के लिए दिया था...

२ फ़रवरी १८३५ को ब्रिटेन की संसद में मैकाले की भारत के प्रति विचार और योजना मैकाले के शब्दों में..

" मैं भारत के कोने कोने में घुमा हूँ..मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया, जो भिखारी हो ,जो चोर हो, इस देश में मैंने इतनी धन दौलत देखी है,इतने ऊँचे चारित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं,की मैं नहीं समझता की हम कभी भी इस देश को जीत पाएँगे,जब तक इसकी रीढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते जो इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत है.
और इसलिए मैं ये प्रस्ताव रखता हूँ की हम इसकी पुराणी और पुरातन शिक्षा व्यवस्था,उसकी संस्कृति को बदल डालें,क्युकी अगर भारतीय सोचने लग गए की जो भी बिदेशी और अंग्रेजी है वह अच्छा है,और उनकी अपनी चीजों से बेहतर है ,तो वे अपने आत्मगौरव और अपनी ही संस्कृति को भुलाने लगेंगे और वैसे बनजाएंगे जैसा हम चाहते हैं.एक पूर्णरूप से गुलाम भारत
"


कई सेकुलर बंधू इस भाषण की पंक्तियों को कपोल कल्पित कल्पना मानते है.. अगर ये कपोल कल्पित पंक्तिया है, तो इन काल्पनिक पंक्तियों का कार्यान्वयन कैसे हुआ??? सेकुलर मैकाले की गद्दार औलादे इस प्रश्न पर बगले झाकती दिखती है..और कार्यान्वयन कुछ इस तरह हुआ की आज भी मैकाले व्योस्था की औलादे छद्म सेकुलर भेष में यत्र तत्र बिखरी पड़ी हैं..

अरे भाई मैकाले ने क्या नया कह दिया भारत के लिए??,भारत इतना संपन्न था की पहले सोने चांदी के सिक्के चलते थे कागज की नोट नहीं..धन दौलत की कमी होती तो इस्लामिक आतातायी श्वान और अंग्रेजी दलाल यहाँ क्यों आते..लाखों करोड़ रूपये के हीरे जवाहरात ब्रिटेन भेजे गए जिसके प्रमाण आज भी हैं मगर ये मैकाले का प्रबंधन ही है की आज भी हम लोग दुम हिलाते हैं अंग्रेजी और अंग्रेजी संस्कृति के सामने..हिन्दुस्थान के बारे में बोलने वाला संकृति का ठेकेदार कहा जाता है और घृणा का पात्र होता है इस सभ्य समाज का..

शिक्षा व्यवस्था में मैकाले प्रभाव : ये तो हम सभी मानते है की हमारी शिक्षा व्यवस्था हमारे समाज की दिशा एवं दशा तय करती है..बात १८२५ के लगभग की है..जब ईस्ट इंडिया कंपनी वितीय रूप से संक्रमण काल से गुजर रही थी और ये संकट उसे दिवालियेपन की कगार पर पहुंचा सकता था..कम्पनी का काम करने के लिए ब्रिटेन के स्नातक और कर्मचारी अब उसे महंगे पड़ने लगे थे..
१८२८ में गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक भारत आया जिसने लागत घटने के उद्देश्य से अब प्रसाशन में भारतीय लोगों के प्रवेश के लिए चार्टर एक्ट में एक प्रावधान जुड़वाया की सरकारी नौकरी में धर्म जाती या मूल का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा..
यहाँ से मैकाले का भारत में आने का रास्ता खुला..अब अंग्रेजों के सामने चुनौती थी की कैसे भारतियों को उस भाषा में पारंगत करें जिससे की ये अंग्रेजों के पढ़े लिखे हिंदुस्थानी गुलाम की तरह कार्य कर सकें..इस कार्य को आगे बढाया जनरल कमेटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन के अध्यक्ष थोमस बैबिंगटन मैकाले ने ....मैकाले की सोच स्पष्ट थी...जो की उसने ब्रिटेन की संसद में बताया जैसा ऊपर वर्णन है..
उसने पूरी तरह से भारतीय शिक्षा व्यवस्था को ख़तम करने और अंग्रेजी(जिसे हम मैकाले शिक्षा व्यवस्था भी कहते है) शिक्षा व्यवस्था को लागु करने का प्रारूप तैयार किया..
मैकाले के शब्दों में:
"हमें एक हिन्दुस्थानियों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना है जो हम अंग्रेज शासकों एवं उन करोड़ों भारतीयों के बीच दुभाषिये का काम कर सके, जिन पर हम शासन करते हैं। हमें हिन्दुस्थानियों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना है, जिनका रंग और रक्त भले ही भारतीय हों लेकिन वह अपनी अभिरूचि, विचार, नैतिकता और बौद्धिकता में अंग्रेज हों"
और देखिये आज कितने ऐसे मैकाले व्योस्था की नाजायज श्वान रुपी संताने हमें मिल जाएंगी..जिनकी मात्रभाषा अंग्रेजी है और धर्मपिता मैकाले..
इस पद्दति को मैकाले ने सुन्दर प्रबंधन के साथ लागु किया..अब अंग्रेजी के गुलामों की संख्या बढने लगी और जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते थे वो अपने आप को हीन भावना से देखने लगे क्यूकी सरकारी नौकरियों के ठाट उन्हें दीखते थे अपने भाइयों के जिन्होंने अंग्रेजी की गुलामी स्वीकार कर ली..और ऐसे गुलामों को ही सरकारी नौकरी की रेवड़ी बटती थी....
कालांतर में वे ही गुलाम अंग्रेजों की चापलूसी करते करते उन्नत होते गए और अंग्रेजी की गुलामी न स्वीकारने वालों को अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया..विडम्बना ये हुए की आजादी मिलते मिलते एक बड़ा वर्ग इन गुलामों का बन गया जो की अब स्वतंत्रता संघर्ष भी कर रहा था..यहाँ भी मैकाले शिक्षा व्यवस्था चाल कामयाब हुई अंग्रेजों ने जब ये देखा की भारत में रहना असंभव है तो कुछ मैकाले और अंग्रेजी के गुलामों को सत्ता हस्तांतरण कर के ब्रिटेन चले गए..मकसद पूरा हो चुका था.... अंग्रेज गए मगर उनकी नीतियों की गुलामी अब आने वाली पीढ़ियों को करनी थी...और उसका कार्यान्वयन करने के
लिए थे कुछ हिन्दुस्तानी भेष में बौधिक और वैचारिक रूप से अंग्रेज नेता और देश के रखवाले ..(नाम नहीं लूँगा क्युकी एडविना की आत्मा को कष्ट होगा)
कालांतर में ये ही पद्धति विकसित करते रहे हमारे सत्ता के महानुभाव..इस प्रक्रिया में हमारी भारतीय भाषाएँ गौड़ होती गयी और हिन्दुस्थान में हिंदी विरोध का स्वर उठने लगा..ब्रिटेन की बौधिक गुलामी के लिए आज का भारतीय समाज आन्दोलन करने लगा..फिर आया उपभोगतावाद का दौर और मिशिनरी स्कूलों का दौर..चूँकि २०० साल हमने अंग्रेजी को विशेष और भारतीयता को गौण मानना शुरू कर दिया था तो अंग्रेजी का मतलब सभ्य होना,उन्नत होना माना जाने लगा..


हमारी पीढियां मैकाले के प्रबंधन के अनुसार तैयार हो रही थी और हम भारत के शिशु मंदिरों को सांप्रदायिक कहने लगे क्युकी भारतीयता और वन्दे मातरम वहां सिखाया जाता था...जब से बहुराष्ट्रीय कंपनिया आयीं उन्होंने अंग्रेजो का इतिहास दोहराना शुरू किया और हम सभी सभ्य बनने में उन्नत बनने में लगे रहे मैकाले की पद्धति के अनुसार..
अब आज वर्तमान में हमें नौकरी देने वाली हैं अंग्रेजी कंपनिया जैसे इस्ट इंडिया थी..अब ये ही कंपनिया शिक्षा व्यवस्था भी निर्धारित करने लगी और फिर बात वही आयी कम लागत वाली, तो उसी तरह का अवैज्ञानिक व्योस्था बनाओं जिससे कम लागत में हिन्दुस्थानियों के श्रम एवं बुद्धि का दोहन हो सके..
एक उदहारण देता हूँ कुकुरमुत्ते की तरह हैं इंजीनियरिंग और प्रबंधन संस्थान..मगर शिक्षा पद्धति ऐसी है की १००० इलेक्ट्रोनिक्स इंजीनियरिंग स्नातकों में से शायद १० या १५ स्नातक ही रेडियो या किसी उपकरण की मरम्मत कर पायें नयी शोध तो दूर की कौड़ी है..
अब ये स्नातक इन्ही अंग्रेजी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के पास जातें है, और जीवन भर की प्रतिभा ५ हजार रूपए प्रति महीने पर गिरवी रख गुलामों सा कार्य करते है...फिर भी अंग्रेजी की ही गाथा सुनाते है..
अब जापान की बात करें १०वीं में पढने वाला छात्र भी प्रयोगात्मक ज्ञान रखता है...किसी मैकाले का अनुसरण नहीं करता..
अगर कोई संस्थान अच्छा है जहाँ भारतीय प्रतिभाओं का समुचित विकास करने का परिवेश है तो उसके छात्रों को ये कंपनिया किसी भी कीमत पर नासा और इंग्लैंड में बुला लेती है और हम मैकाले के गुलाम खुशिया मनाते है की हमारा फला अमेरिका में नौकरी करता है..
इस प्रकार मैकाले की एक सोच ने हमारी आने वाली शिक्षा व्यवस्था को इस तरह पंगु बना दिया की न चाहते हुए भी हम उसकी गुलामी में फसते जा रहें है..

समाज व्यवस्था में मैकाले प्रभाव : अब समाज व्योस्था की बात करें तो शिक्षा से समाज का निर्माण होता है.. शिक्षा अंग्रेजी में हुए तो समाज खुद ही गुलामी करेगा..वर्तमान परिवेश में MY HINDI IS A LITTLE BIT WEAK बोलना स्टेटस सिम्बल बन रहा है जैसा मैकाले चाहता था की हम अपनी संस्कृति को हीन समझे ...
मैं अगर कहीं यात्रा में हिंदी बोल दू,मेरे साथ का सहयात्री सोचता है की ये पिछड़ा है..लोग सोचते है त्रुटी हिंदी में हो जाए चलेगा मगर अंग्रेजी में नहीं होनी चाहिए..और अब हिंगलिश भी आ गयी है बाज़ार में..क्या ऐसा नहीं लगता की इस व्योस्था का हिंदुस्थानी धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का होता जा रहा है....अंग्रेजी जीवन में पूर्ण रूप से नहीं सिख पाया क्यूकी बिदेशी भाषा है...और हिंदी वो सीखना नहीं चाहता क्यूकी बेइज्जती होती है...
हमें अपने बच्चे की पढाई अंग्रेजी विद्यालय में करानी है क्यूकी दौड़ में पीछे रह जाएगा..माता पिता भी क्या करें बच्चे को क्रांति के लिए भेजेंगे क्या??? क्यूकी आज अंग्रेजी न जानने वाला बेरोजगार है..स्वरोजगार के संसाधन ये बहुराष्ट्रीय कंपनिया ख़तम कर देंगी फिर गुलामी तो करनी ही होगी..तो क्या हम स्वीकार कर लें ये सब?? या हिंदी पढ़कर समाज में उपेक्षा के पात्र बने????
शायद इसका एक ही उत्तर है हमे वर्तमान परिवेश में हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित उच्च आदर्शों को स्थापित करना होगा..हमें विवेकानंद का "स्व" और क्रांतिकारियों का देश दोनों को जोड़ कर स्वदेशी की कल्पना को मूर्त रूप देने का प्रयास करना होगा..चाहे भाषा हो या खान पान या रहन सहन पोशाक...
अगर मैकाले की व्योस्था को तोड़ने के लिए मैकाले की व्योस्था में जाना पड़े तो जाएँ ....जैसे मैं अंग्रेजी गूगल का इस्तेमाल करके हिंदी लिख रहा हूँ..
क्यूकी कीचड़ साफ करने के लिए हाथ गंदे करने होंगे..हर कोई छद्म सेकुलर बनकर सफ़ेद पोशाक पहन कर मैकाले के सुर में गायेगा तो आने वाली पीढियां हिन्दुस्थान को ही मैकाले का भारत बना देंगी.. उन्हें किसी ईस्ट इंडिया की जरुरत ही नहीं पड़ेगी गुलाम बनने के लिए..और शायद हमारे आदर्शो राम और कृष्ण को एक कार्टून मनोरंजन का पात्र....

आइये एक बार गुनगुनाये भारतेंदु जी को...
बोलो भईया दे दे तान..
हिंदी हिन्दू हिन्दुस्थान........


जय हिंद...

रविवार, 17 अप्रैल 2011

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

मित्रों इस पवित्र लेख की शुरुवात मोहम्मद अल्लामा इक़बाल के एक शेर से करना चाहूँगा..

यूनानो-मिस्रो-रोमाँ सब मिट गए जहाँ से
अब तक मगर है बाक़ी, नामो-निशाँ हमारा
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन, दौरे-ज़माँ हमारा


हिन्दू आस्था,हिंदुत्व और हिन्दुस्थान दृढ़ता का प्रतीक सोमनाथ मंदिर: मित्रों आप में से ज्यादातर लोग इस मंदिर के के बारे में जानते होंगे.. प्रयास कर रहां हूँ थोड़ी विस्तृत जानकारी दूँ हमारे दृढ़ता के इस हिमालयी स्तम्भ के लिए..
सोमनाथ की भौगोलिक अवस्थिति : हिन्दुस्थान के राज्य गुजरात में स्थित सोमनाथ मंदिर मात्र एक मंदिर न होकर हिंदुस्थानी अस्मिता का प्रतीक भी है..महादेव का ये मंदिर १२ ज्योतिर्लिंगों में एक माना जाता है..इस मंदिर का भगवान महादेव के बारह ज्योतिर्लिंगों में एक प्रमुख स्थान है और प्राचीन काल से ये स्थल पर्यटन और श्रधा का एक केंद्र रहा है..गुजरात में सौराष्ट्र के बेरावल से 10 किलोमीटर दूर ये पावन स्थल स्थित है..
सोमनाथ का प्राचीन इतिहास :सोमनाथ के मंदिर का इतिहास अत्यंत प्राचीन है..यह हिन्दुस्थान के प्राचीनतम तीर्थों में एक है.ऋग्वेद जैसे प्राचीन ग्रंथों में इसका वर्णन मिलता है..शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से इसे प्रथम माना जाता है..ऋग्वेद के अनुसार इसका निर्माण स्वयं चंद्रदेव सोमराज ने कराया था..सोमनाथ दो शब्दों से मिल कर बना है सोम मतलब चन्द्र और नाथ का मतलब स्वामी.इस प्रकार सोमनाथ का मतलब चंद्रमा का स्वामी होता है...
दुसरे युग में इसका निर्माण रावण ने चांदी से कराया.. ऐतिहासिक कथाओं के अनुसार श्रीकृष्ण ने अपना शारीर त्याग इस स्थान पर किया था जब एक बहेलिये ने उनके चमकते हुए तलवे को हिरन की आँख समझकर शर संधान किया था..इस कारण इस स्थल का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्त्व और भी बढ़ जाता है..सातवी सताब्दी में बल्लभ राजाओं ने इस मंदिर को बृहद रूप से सृजित कराया..
मंदिर का खंडन और बार बार पुनर्निर्माण:
इस मंदिर को तोड़ने और लुटने की परम्परा आतताइयों द्वारा लम्बी चली ..मगर हर बार हिन्दुओं ने ये बता दिया की "कुछ बात की हस्ती मिटती नहीं हमारी"आठवीं सदी में सिंध गवर्नर जुनायद ने इसे नष्ट करने का प्रयास किया तो ८१७ इसवी में नागभट्ट जो प्रतिहारी राजा था उसने इसका पुनर्निर्माण कराया..इसके बाद ये मंदिर विश्वप्रसिद्द हो गया ..अल बरुनी नमक एक यात्री ने जब इस मंदिर की ख्याति और धन का विवरण लिखा तो अरब देशों में कुछ मुस्लिम शासकों की लूट की स्वाभाविक वृत्ति जाग उठी...उनमें से एक पापी नीच था मुहम्मद गजनवी उसने १०२४-२५ में आक्रमण कर इसके धन को लूटा मंदिर को खंडित किया और शिवलिंग को खंडित किया और इस इस्लामिक लुटेरे ने ४५००० हिन्दुओं का क़त्ल कर दिया..फिर क्या था हिन्दू शासक मंदिर का बार बार निर्माण करते रहे और इस्लामिक लुटेरे इसे लूटते रहे..गजनवी की लूट बाद हिन्दू राजा भील और मालवा ने इसका पुनर्निर्माण कराया..मगर १३७४ में अफजल खान ने अपना लुटेरा गुण दिखया और लूट मचाने चला आया ये इस्लामिक लुटेरा..अब तो १३७४ से आखिरी बाबरी औलाद औरन्जेब ने इसे लूटा और तोड़ फोड़ की...हिन्दू अपनी सामर्थ्य के अनुसार निर्माण करते,कुछ सालों बाद बाबर की औलादे लूट करती...कुल मिलकर ऐसे २१ प्रयास हुए इसे तोड़ने के लुटने के और उसके बाद हिन्दू राजाओं और प्रजा द्वारा पुनर्निर्मित करने के..इस मंदिर के देवद्वार तोड़ कर आगरा के किले में रखे गएँ है .
जैसा की ज्यादातर हिन्दू पूजा स्थलों के साथ हुआ सोमनाथ को भी १७०६ में तोड़कर बाबर के वंशज आतातायी औरन्जेब ने मस्जिद निर्माण करा दिया.

आजादी के बाद का इतिहास : गुलामी के इस चिन्ह को हटाने के लिए में नमन करना चाहूँगा बल्लभ भाई पटेल और सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री उच्छंगराय नवल शंकर ढेबर का जिन्होंने हिन्दुस्थान में एक अपवाद दिखाते हुए कम से कम एक हिन्दू स्थल को उसके पुराने रूप में लेन का भागीरथ प्रयत्न किया और अपने अभीष्ट में वे सफल रहे...बल्लभ भाई पटेल इस स्थल का उत्खनन कराया तो उत्खनन करते समय करीब १०-15 फुट की खुदाई में नीचे की नींव से मैत्री काल से लेकर सोलंकी युग तक के शिल्प स्थापत्य के उत्कृष्ट अवशेश पाए गए..।यहाँ उत्खनन द्वारा प्राप्त ब्रह्मशिला पर शिव का ज्योतिर्लिग स्थापित किया गया..यहाँ ये बात आप से साझा करा चलूँ की नेहरु मंत्रिमंडल ने इसके पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पास किया और मुस्लिम मंत्री मौलाना आजाद ने इसका अनुमोदन किया था...भारत के प्रथम राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने ११ मई १९५१ को मंदिर में ज्योतिर्लिंग की प्राण प्रतिष्ठा की...
कुछ गद्दार औरन्जेब की औलादों ने इसका विरोध किया..मगर उस समय लौहपुरुष बल्लभ भाई, सच्चे भारतीय मुस्लिम मौलाना आजाद और डाक्टर राजेंद्र प्रसाद के सामने इनकी एक न चली...१२१ तोपों की सलामी के साथ हिन्दुस्थान और हिन्दुओं ने अपनी खोई हुए पहचान वापस पा ली और दिखा दिया पाकिस्तानी दलालों को की "कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी"..
डाक्टर राजेंद्र प्रसाद के शब्दों में. ‘‘सोमनाथ हिन्दुस्थानियों का श्रद्धा स्थान है। श्रद्धा के प्रतीक का किसी ने विध्वंस किया तो भी श्रद्धा का स्फूर्तिस्रोत नष्ट नहीं हो सकता। इस मंदिर के पुनर्निर्माण का हमारा सपना साकार हुआ। उसका आनन्द अवर्णनीय है।’
वर्तमान में सोमनाथ मंदिर की व्यवस्था और संचालन का कार्य सोमनाथ ट्रस्ट करता है..

मार्ग:
गुजरात के बेरवाल से १० किलोमीटर, अहमदाबाद से ४१५ किलोमीटर गांधीनगर से ४४५ किलोमीटर तथा जूनागढ़ से लगभग ८५ किलोमीटर..
इन सभी स्थलों से बस की सुविधा उपलब्ध है सोमनाथ के लिए..
सोमनाथ से १९५ किलोमीटर की दूरी पर द्वारिका नगरी है जो की एक अन्य प्रमुख तीर्थ स्थल है..
कुछ अन्य बिन्दु हैं---
--यहां चन्द्रमा ने दक्ष के श्राप से मुक्ति के लिये तप किया था..व शिव की क्रपा से उसे क्षय से मुक्ति मिली
व उसकी प्रभा पुनः लौटी व पुनः प्रतिदिन उदय व अस्त होने लगा इसलिये इसे प्रभास क्षेत्र कहा जाता है...और मन्दिर को सोम के नाथ ..शिव का मन्दिर..व विश्व में प्रथम ज्योतिर्लिन्ग...
---यहीं पर यमराज ने शिव की तपस्या से रोग-मुक्ति पाई एवं रति ने शिवजी द्वारा भस्म कामदेव को पुनः अनन्ग रूप मे पाया ..
---मन्दिर के समीप एक स्तम्भ् पर एक तीर का निशान दक्षिण की ओर बना है जिसका अर्थ है..इस स्थान से दक्षिण ध्रुव के मध्य कोई भूभाग नहीं है...
--समीप ही अहल्या बाई द्वारा १७८३ में बन्वाया सोमनाथ मन्दिर है जिसे पुराना सोमनाथ मन्दिर कहा जाता है.


आज सोमनाथ मंदिर हमारे देश और बिदेशों में बसे हिन्दुओं के लिए एक प्रमुख श्रधा का केंद्र है..इससे भी कही ज्यादा वो हर एक हिंदुस्थानी,चाहे वो सिख मुसलमान इसाई या हिन्दू हो उसे स्वाभिमान और गर्व का कारण देता एक पवित्र स्थल..इतने बार खंडित किये जाने के बाद भी इस मंदिर का उस मंदिर का पुनर्निर्माण हिन्दुस्थान के सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की पूरे विश्व में एक अनूठी मिसाल है...



जह हिंद ...ॐ नमः शिवाय

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

क्या वर्ण व्योस्था प्रासंगिक है ?? क्या हम आज भी उसे अनुसरित कर रहें हैं??

ये है हमारे बंधू सत्य गौतम जी के विचार..कृपया पढ़े..ये मेरी कृति भारतीय ब्लॉग लेखक मंच: भारतीय मुसलमान,इस्लाम और आतंकवाद.. के लिए हैं..

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सत्य गौतम ने कहा आशुतोष जी ! अब आप एक लेख एक दलित बनकर भी लिखिए। किसी गांव में जाइये और देखिए कि दलितों की बेटियों के साथ तथाकथित ऊंची जातियों के लोग बलात्कार कैसे करते आए हैं हजारों साल से ?
कैसे ईश्वर, धर्मग्रंथ और मानवाधिकारों को हजारों साल से कुचला है आपके पूर्वजों ने और आज भी कैसे कुचल रहे हैं ?
आपकी नई पोस्ट पढ़ने की हार्दिक इच्छा है।
ऐसा ही तो ऐतराज़ करने वाला योगेन्द्र और ऐसे ही प्रतिउत्तर देने वाले आप। दोनों एक ही थैली के चटटे बटटे। पोस्ट पढ़ने का सलीका नहीं और आर्डर जारी कर दिया।
कौन है यह पढ़ा लिखा आदमी ?
बाबा साहेब की जीवनी पढ़ो तब आपको अपनी सूरत सही सही नजर आएगी।
तुम्हारे बड़े जब हमारे बड़ों को अपने जुल्म की चक्की में पीस रहे थे और हम हा हा कार करके ऊपर वाले से प्रार्थना कर रहे थे तब हमारी इस देश में सुनने वाला कोई नहीं था। सब ओर ब्राह्मणशाही और ठकुरैत चल रही थी। जब इस देस में कोई मानव न मिला तब ऊपर वाले ने तुम्हारे जुल्म के खात्मे के लिए, तुम्हारे बड़ों के वध के लिए गजनी और अन्य हमलावरों को भेजा और उन्होंने आकर हर जालिम राजा की गर्दन या तो काट दी या झुका दी। उन हमलावरों को बुलाने वाले भी हिन्दू रजवाड़े ही थे। वे थोड़े से मुस्लिम हमलावर हिन्दुओं की लड़कियां लेकर जाने में सफल तब हो पाए जब हिन्दू राजाओं ने उनकी सहायता की। इतिहास यह सब भी तो बताता है। इसे आपने क्यों छोड़ दिया ?इसे आप बताएंगे या फिर मैं लिखूं इस पर पोस्ट ?
अगर उन हमलावरों ने उन लोगों न मारा होता तो वे भी जनसंख्या ही बढ़ाते। जिन लड़कियों को अरब भेज दिया गया। वे ऐश कर रही हैं और उनके पेट से होने वाली संतानें भी ऐश कर रही हैं। यहां रहतीं तो उन्हें देवदासी बना दिया जाता या फिर विधवा होते ही उन्हें जला दिया जाता। बच गई उनकी जान। धन्यवाद दो हमलावरों का और उन गददारों का जिन्होंने उन्हें बुलाया और उनका साथ दिया । उनके साथ के कारण ही वे 800 वर्ष शासन कर पाए और तुम्हारी नाक में ऐसी नकेल पहना गए कि अब तुम्हारी धौंस कहीं चलती नहीं। इसके बावजूद अपने कुल गोत्र की श्रेष्ठता के फरेब से निकलने के लिए तुम आज भी तैयार नहीं हो। सत्य को दिखाता है सत्य गौतम।
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में जल्दी में कोई पोस्ट नहीं लिखना चाहता था मगर आज अवकाश लेकर लिख रहा हूँ क्यूकी सत्य गौतम जी के सत्य विचारों पर मेरा लेख जरुरी था क्यूकी उन्होंने पूछा था मुझसे..

तो सत्य गौतम जी मैं आप की आखिरी पंक्तियों से सहमत नहीं हूँ की जो मर गए वो जनसँख्या बढ़ाते :मरने वालों में दलित सवर्ण सब शामिल थे..दूसरा जिन नारियों का अरब ले जाकर बलात्कार किया गया उनके बारें में आप के विचार पर मैं टिप्पड़ी क्या करूँ??? जब आप ने बलात्कार को सही ठहरा दिया..फिर तो आप को किसी के साथ किये गए बलात्कार पर बोलने का अधिकार नहीं है..हमलावरों और गद्दारों को धन्यवाद देने वाली आप के देशभक्ति समाजभक्ति पर नमन .जिस बाबा साहब का आप जिक्र कर रहें है उनकी आत्मा आप के विचार सुनकर खुश तो नहीं ही हो रही होगी...

बलात्कार हिन्दू मुस्लिम दलित सवर्ण या किसी अन्य जिस का भी हो जिसने किया हो वो एक जघन्य कृत्य है.

और दूसरा प्रश्न आप का की मैंने जिक्र नहीं किया हिन्दू गद्दारों का तो सुनिये मैंने लिखा है की "खेद प्रकट कर के जयचंद नहीं बनना चाहता".मैं स्वीकार करता हूँ की गद्दार थे हाँ अब वो सवर्ण थे या दलित मैं इसमें नहीं जाना चाहता.हा आप ने ये जरुर कह दिया की इन गद्दारों का आप समर्थन करतें है और धन्यवाद् देते है..
सत्य जी मैंने आप की प्रोफाइल नहीं देखी शायद देखता तो आप का चित्रण कर के लिखता,तो हो सकता था अगर आप स्थापित लेखक होते तो मेरे जैसे अनुभवहीन का डर सामने आ जाता ..आप ने कुछ विषय उठाये..चुकी प्रश्न आप ने व्यक्तिगत किया इसलिए विचार भी पूर्णतया मेरे ही है...

वर्ण व्योस्था: प्राचीन काल से जब जाति प्रथा नही थी तब एक समाज था जिसमें न तो कोई शूद्र था न ही कोई ब्राम्हण..
सब लोग अपनी पसंद और योग्यता के अनुसार कार्य करते थे..इसी कार्य के अनुसार हिन्दू समाज में चार वर्ण निर्धारित किये गए...

१ क्षत्रिय: समाज का वो समूह जो देश को चलता था युद्ध करता था और जरुरत पड़ने पर अपना बलिदान करता था अपनी प्रजा के लिए..यह समूह तेज तर्रार व्यक्तियों एवं कुशल योधाओं का होता था..अब इस समूह में वीर भावना थी तो इसके लिए उसकी पीढ़ियों को लानत तो नहीं दिया जा सकता..

2 ब्राम्हण : उन लोगों का समूह जो पूजा पाठ, धर्म, कर्म, कर्मकांडों, यज्ञ आदि को प्रतिपादित करता था..एक समाज के तबके को उनके पूजा पथ और धर्म में रूचि को देखते हुए ब्राम्हण नाम दिया गया..अब इसमें उस तबके की क्या गलती जो उसे पूजा करना पसंद था..उसे मन्त्रों में रूचि थी..उसके अन्दर शायद युद्ध करने की इच्छा और शक्ति नहीं थी इसलिए वो क्षत्रिय नहीं कहा गया..

३ वैश्य: व्यापर में पारंगत व्यक्तियों का समूह वैश्य कहलाया.. ये लोग दुकानदारी व्यापर लेनदेन इत्यादि कार्य करते थे..इनकी कुशलता व्यापर में थी इसलिए इन्हें इस समूह में रखा गया..जैसे की अर्थशास्त्र पढ़ा व्यक्ति अच्छा अर्थशास्त्री हो सकता है मगर शायद राजा बनाकर उसकी प्रतिभा के साथ न्याय न हो..

४ शूद्र: ये तबका कृषि करने सफाई करने बर्तन बनाने का कार्य करता था अतः इसे शूद्र नाम दिया गया..अगर उस समय इस तबके को क्षत्रिय नाम भी दे दिया जाता तो कार्य में महारत तो इसे मिल नहीं जाती अतः इस कारण इस तबके को इनके कार्य के अनुसार नाम दिया गया..

इनकी उत्त्पत्ति की और भी धार्मिक कहानिया हैं मगर वैज्ञानिक दृष्टि से ये ही समझाई जा सकती है इसलिए मैंने इसे लिखा..

अब धीरे धीरे ये एक सामाजिक व्योस्था बन गयी जिसका स्वतः ही पालन इन चारों वर्णों की आने वाली पीढ़ियों ने किया.और एक सामाजिक सहिष्णुता और सौहार्द बना रहता था..
कुछ शासक सत्ता के मद में चूर हो कर निरंकुश हो गए अतः उसी प्रकार उनका विनाश हो गया..अगर इस शासकों को वर्ण व्योस्था से जोड़ के देखा जाए तो ये हमारे मानसिक दिवालियेपन का परिचायक होगा.और ये व्योस्था तो युगों से है कालांतर में इसमें कुछ कमियां आती गयी और कलयुग में ज्यादा कमियां थी जिसका हमारे कई भाई उल्लेख कर रहें है.

सतीप्रथा: प्राचीन काल में स्त्रियाँ पति की मृत्यु के बाद स्वतः की इच्छा से पति की चिता के साथ अपने प्राण त्याग देती थी इसे सती प्रथा कहते थे..जिस प्रकार योगी अपना शरीर अपनी इच्छा से छोड़ देते हैं..धीरे धीरे उन महिलाओं को जबरन जलाया जाने लगा इसका विरोध सबने किया और ये प्रथा बंद हो गयी..

सती प्रथा का वर्तमान परिवेश में कोई महत्त्व नहीं था इसलिए खुद ही ख़तम हो गयी..मगर पहले इस प्रथा के क्या कारण थे इस पर लम्बी चर्चा हो सकती है...हाँ हमारी हिन्दू महिलाएं इतनी आत्मशक्ति रखती थी की अगर संभव हो सके तो जौहर करके प्राण दे देती थी मगर आताताइयों के हाथ अपवित्र नहीं होती थी..

देवदासी:इन स्त्रियों का विवाह मंदिरों से कर दिया जाता था ये नृत्य सिखाती थी और मंदिरों की देखभाल करती थी..परम्परा की बात करें तो वो अपनी इच्छा से पर पुरुष से सम्भोग कर सकती थी मगर कालांतर में उसे विकृत कर के आवश्यक बनाने की कोशिश की गयी.. ये प्रथा वर्तमान परिवेश में निंदनीय है...

अब एक ज्वलंत सवाल आप सब से: क्या हम अब भी वर्ण व्योस्था को मानते है?? क्या ये आज भी प्रासंगिक है??:क्या हम वर्ण व्योस्था को आज भी दुसरे रूप में अनुसरण कर रहें है?: ज्यादातर लोग कहेंगे नहीं??
तो अब कुछ २१वीं सदी की बात करता हूँ.चलिए माना किसी ने व्यक्तिगत फायदे के लिए ये सड़ी गली वर्ण व्योस्था बनायीं थी..तो ख़तम क्यूँ नहीं होती...

शायद सेकुलर लोग एक शब्द बोलते हैं class(क्लास)...ये क्या है बंधू..जरा भारत के लोगों के क्लास को देखे..

१ अपर क्लास: राजनेता, बड़े व्यापारी,कुछ भ्रष्ट लोग

२ हायर मिडल क्लास: उच्चाधिकारी, छोटे नेता,छोटे व्यापारी

३ मिडल क्लास: सरकारी और निजी संस्था में कम करने वाले व्यक्ति..

४ लोअर क्लास: किसान,मजदूर,इमानदार व्यक्ति..

क्या आज हम इस वर्ण व्योस्था को फालो नहीं कर रहें है..और इसमें कोई ब्राम्हण शूद्र क्षत्रिय वैश्य की बात नहीं है..सुखराम मायावती कलमाड़ी जूदेव कोड़ा दिग्विजय सिंह(अगर कोई ब्राह्मन छुट गया हो तो उसे भी मान लें) सब अलग अलग जाति के है मगर आज की वर्ण व्योस्था में अपर क्लास है..इसी प्रकार कोई ब्राम्हण शूद्र क्षत्रिय वैश्य शायद इन सारे बाकी क्लास में मिल जाएगा..

हम भी तो आज सोचते है की आज डिनर पंचसितारा में करते तो कैसा होता ..लेकिन भाई मुझे वहां के तरीके नहीं आते इसलिए जाने से डरता हूँ..और कभी चला गया तो वहां का सबसे बड़ा महादलित मैं होता हूँ..फरारी के सामने अल्टो कैसी लगेगी..अमीर लोग ऐसे देखेंगे की ये कहा से आ गया उन अमीरों में....हिन्दू मुस्लिम ब्राम्हण या दलित कोई भी हो सकता है उन लोगों में ..
शशि थरूर की जात क्या है, मैं नहीं जानता मगर मैं कभी जहाज में इकोनोमी क्लास में बैठता हूँ तो मेरी जात उन्होंने बता दी " "कैटल क्लास"..अब वो दलित सफ़र कर रहा हो या मुस्लिम मेरे साथ,आज की व्योस्था का कैटल क्लास" है वो..

और अगर प्रतिभा के अनुसार वर्गीकरण खराब है तो क्यों न चपरासी को निदेशक बना दिया जाए..वहां भी तो वर्गीकरण है..क्यों न निदेशक को २००० रूपये तनखाह दी जाए और मजदूर को २ लाख ...क्यों न सारे ५ सितारा ढहा कर एक सामान्य लाज बना दिया जाए..क्यों न ट्रेन से वातानुकूलित डब्बे हटा दिए जाएँ..ये सब भी तो सामाजिक वर्गीकरण ही करते है.

मित्रों..वर्ण व्योस्था हमारे जीवन का अभिन्न अंग है जो समयानुसार अलग अलग नाम लेती है .हा इसका कार्यान्वयन सही होना चाहिए .आज कल भी तो हम उसे अनुसरित ही कर रहें है हा शायद सेकुलर बनने के चक्कर में स्वीकार नहीं करते..समाजं को उसकी योग्यता के अनुसार चलने के लिए वर्ण व्योस्था किसी न किसी रूप में हमारे साथ रहेगी..

मेरे व्यक्तिगत जबाब श्रीमान सत्य गौतम को:मैंने व्यक्तिगत रूप से कितने दलितों के जीवन में परिवर्तन लाया है इस सार्वजानिक मंच पर मिया मिट्ठू नहीं बनना चाहता..अगर सत्यापन करना हो तो व्यक्तिगत रूप से उन बंधुओं का संपर्क सूत्र ले लें मुझसे...
श्रीमान मनुष्य जन्म से नहीं कर्म से ब्राम्हण होता है..शयद जन्म से उसे स्वाभाविक वृत्ति मिलती है मगर अपने कर्मों में ब्राम्हण का गुण लाना जरुरी होता है वरना उस ब्राम्हण का विनाश हो जाता है" मुझे गर्व है की मैं ब्राम्हण हूँ मुझे गर्व है अपने गोत्र पर गर्व है अपने कुल पर...मगर उन सबसे पहले हिंदुस्थानी हूँ जो वन्दे मातरम कहने में नहीं संकोच करता है...

जय हिंद वन्दे मातरम....

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

भारतीय मुसलमान,इस्लाम और आतंकवाद..

कुछ आगे लिखने से पहले बोल दू की मेरी ये रचना तथाकथित सेकुलर लोगों को अच्छी नहीं लगेगी..मगर हाँ एक हिन्दुस्तानी के नजरिये से आप देखें तो शायद सत्यता प्रतीत हो..कृपया सिर्फ शुरु की पंक्तिया पढ़कर किसी नतीजे पर न आयें..


भारत में इस्लाम: भारत में इस्लाम का इतिहास लगभग सातवी शताब्दी से है जो १८ वीं शताब्दी तक रहा..कटु सत्य ये है की ये १००० साल भारत के लिए बहुत ही बर्बर और सामूहिक नरसंहारों से भरे रहे..भारत में बड़ी संख्या में बलात धर्मांतरण ,बलात्कार , अमानवीय अत्याचार किये गए..ये बातें में नहीं कह रहा हूँ इस्लामिक इतिहास में कई जगह ये उल्लेख मिलता है..भारत में इस्लाम के आगमन की योजना ६ वीं शताब्दी में बनायीं गयी...
अरबी इतिहासकार मुजामलुत तवारीखी को सत्य माने तो सन ६३५-६३८ के बिच दमिस्क के खलीफा नए भारत पर आक्रमण की योजना बनायीं और आक्रमण शुरु हो गया उम्मीद से अधिक संगठित हिन्दू विरोध के कारण उसके सैनिक भाग गए..
सन ६६० में पहले इस्लामिक गिरोह ने सफलता पाई भारत के कुछ हिस्सों में कब्ज़ा करने की और उसके बाद हजारो हिन्दुओ के नरमुंड सड़कों पर..कामुकता के मारे हुए इन शासकों ने हिन्दू स्त्रियों का बलात्कार किया और कुछ को कैद किया तो कुछ को दमिस्क में अपने खलीफाओं की भूख मिटने के लिए भेज दिया गया..मंदिर और प्रासाद तोड़े गए..फिर अगले ४ साल तक ये कत्ले आम चलता रहा..
एक अन्य इस्लामिक इतिहासकार अल बिलादुरी के अनुसार" सिनान नमक एक मुस्लिम आक्रमणकारी जो खलीफा के निर्वाचन में यहाँ आया था बहुत ही देवतुल्य व्यक्ति था..उसने अपने सभी सैनिको को पत्नियों से तलक दिला दिया जिससे की
युद्ध के समय पकड़ी गयी हिन्दू स्त्रियों से अपनी काम वासना ये इस्लामी सैनिक बुझा सके..."
मतलब इनका भारत में आना ही लूट मचाने बलात्कार करने और क्रूरता के लिए था..मैं फिर कह रहा हूँ की ये इस्लामिक इतिहासकार ही कह रहें है,..एक अन्य इतिहासकार के अनुसार पकड़ी गयी ५ औरतों में १ को हिन्दुस्थान में रखा जाता था ४ को अरब भेज दिया जाता था खलीफा और उसके गुर्गों के काम वासना तृप्त करने के लिए..
इसी क्रम में अनेक क्रूर कमी मुस्लिम शासकों की लम्बी फेरहिस्त है जिसमें मुहमद गजनवी,कासिम,गोरी,बख्तियार,बलबन,खिज्र बहलोल लोदी,गियासुदीन और ऐसे अनेको आक्रमणकारियों ने भारत के लोगों को लूटा और स्त्रियों का बलात्कार किया..

ये क्रम १००० सालों तक चलता रहा जब तक लुटरों की दूसरी अंग्रेजी पीढ़ी नहीं आ गयी..
अफ़सोस ये है की हम आज भी इन आतताइयों के विरोध में बोलने वालो को सांप्रदायिक बोलतें है. और इतिहास में मुग़ल कल को सबसे उन्नत काल मन जाता है जिस काल में सर्वाधिक बलात्कार,हत्या और धर्मान्तरण हुआ..इन १००० सालों के रक्त रंजित इतिहास को आप और हम या सेकुलर लोग भी झुठला नहीं सकते..
बिच बिच में कुछ हिन्दू शासकों ने प्रबल विरोध किया मगर संगठित न होने के कारण पूरे हिन्दुस्थान को इन इस्लामिक आताताइयों के कब्जे से नहीं वापस ले सके..

आज का हिंदुस्थानी मुस्लिम: अगर आज के वर्तमान समाज के मुस्लिमों को देखा जाए तो 98% मुस्लिमों के पूर्वज हिन्दू रहे थे और उन्हें सीमा से ज्यादा यातना और अत्याचार कर के इस्लाम स्वीकार कराया गया..जिनकी आगे की पीढियां आज की हिंदुस्थानी मुस्लिम के रूप में है...अतः में नहीं समझता कोई मुसलमान भाई इन आताताइयों के समर्थन में होगा ..क्यूकी इन इस्लामी आक्रमणकारियों के शिकार आज के मुस्लिम भाइयों की माँ बहन और परिवार सैकड़ो साल पहले हो चुके थे..
मैं यहाँ किसी पूजा पद्धति या धर्म को बदलने की बात नहीं कह रहा हूँ में सिर्फ हिंदुस्थानी मुस्लिमों को उनका इतिहास और उनकी पीढ़ियों के साथ की गयी बर्बरता को सामने रख रहा हूँ..

आज इस्लाम क्या है:
आज के समय इस्लाम में दो धाराएँ है एक तो अल कायदा के इस्लाम को मानता है एक जो अलकायदा के इस्लाम को नहीं मानता..और दोनों ही धड़े एक दुसरे को गलत कहतें है..
भारत का मुस्लिम क्या अलकायदा समर्थक इस्लाम को मान रहा है: नहीं ,मैं इस तथ्य से बिलकुल सहमत नहीं हूँ..
दुनिया में सबसे ज्यादा मुस्लिम इंडोनेसिया में रहते है..क्या आप को मालूम है की दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा देश, मुस्लिम जनसँख्या के आधार पर भारत है.. यानि अफगानिस्तान ,पाकिस्तान और अरब कही से ज्यादा मुस्लिम भारत में है..फिर भी यहाँ तालिबान जैसे हमले तो नहीं हो रहें है..न ही यहाँ पाकिस्तान जैसे ब्लास्ट हो रहें है..न ही यहाँ पर ९/११ हो रहा है..अगर सभी मुस्लिम अलकायदा की विचारधारा को मानते तो भारत आज पाकिस्तान की तरह गृहयुद्ध में फसा होता..यहाँ के मुस्लिम की एक अलग सोच बन रही है जो एक नए धर्म "भारतीय मुसलमान" को दर्शाती है..जो अलकायदा का विरोध करता है और भारत को अपना देश मानता है..
मगर शायद कुछ १-२% मुस्लिम ऐसे है जो SIMI को समर्थन देते है ..मंदिरों में बम फोड़ते है..ये संख्या १-२% ही है मगर एक सड़ी मछली पूरे तालाब को गन्दा कर देती है..उसी तरह कुछ मुसलमान आने कुकृत्यों के कारण पूरे भारतीय मुसलमानों को बदनाम कर रहें है..यहाँ एक बात और है की शायद इन १-२% मुसलमानों के पूर्वज वो ही आततायी रहे होंगे जो आक्रमणकारी के रूप में आये थे..बाकि के ९८% मुसलमानों के जींस तो हिन्दू ही है सिर्फ उन्होंने पूजा पद्धति बदल ली है..तो स्वाभाविक हिन्दू सहअस्तित्व का गुण तो होगा ही इनमें..
हाँ शायद भारत के मुसलमान की कुछ और समस्याए हो जैसे सामाजिक स्वीकार्यता,वोट बैंक की तरह इस्तेमाल ,साम्प्रदायिक दंगे..इत्यादि इत्यादि..मगर ये सब हिन्दुओं के साथ भी है अतः इसे एक राष्ट्रीय समस्या के रूप में देखा जाना चाहिए..
मुसलमानों को भी अपना विवेक इस्तेमाल करते हुए उदारता दिखानी चाहिए वरना ये बात भी उठती है की भारत का एकमात्र एक मुस्लिम बहुल राज्य है कश्मीर जहा हिन्दुओं को उनके घर से ही भगा दिया गया..चाहे गुजरात में कितने भी गोधरा हुए हों मगर आज का मुस्लिम वहा रह सका है व्यापार कर सकता है ..मगर ऐसा कश्मीर में हिन्दुओं के लिए क्यों नहीं दोबारा हो सकता क्यूकी १-२% कासिम और बाबर की औलादें अभी भी है भारत में और उनको इस देश से निकलने का काम हमारे मुस्लिम भाइयों का है क्यूकी इन बाबर की औलादों के किये का खामियाजा सामान्य मुस्लिम को चुकाना पड़ता है,देशद्रोही का तमगा सर पर लगाकर..

चलिए एक आह्वान करें ..इन बाबर की औलादों को हिंदुस्तान से बहार करें और हिन्दू बने या मुस्लिम..उन सबसे पहले एक भारतीय बने...

जय हिंद वन्दे मातरम

रविवार, 3 अप्रैल 2011

नव वर्ष की शुभकामनायें..


भारत के विश्व कप जितने पर अनेको लेखों से ब्लॉगजगत पट गया तो सोचा की मैं कुछ लिखकर कोई नयी जानकारी तो साझा नहीं कर सकूँगा इसलिए मैंने आज के परिवेश में महत्वहीन होते हुए एक त्यौहार हिन्दू नव वर्ष के शुभागमन के ऊपर थोडा प्रकाश डालने का प्रयत्न किया है..
हमारी वर्तमान मान्यताएं और आज का भारतीय : वर्तमान परिवेश में पश्चिम का अन्धानुकरण करते हुए हम ३१ दिसम्बर की रात को कडकडाती हुए ठण्ड में नव वर्ष काँप काँप कर मानतें है..पटाके फोड़ते है,मिठाइयाँ बाटते हैं और शुभकामना सन्देश भेजते है..कहीं कहीं मास मदिरा तामसी भोजन का प्रावधान भी होता है..अश्लील नृत्य इत्यादि इत्यादि फिर भी हमें ये युक्तिसंगत लगता है..
विश्व में हजारों सभ्यताएं हुई हैं और हजारों पद्धतियाँ है सबकी अपनी अपनी..... शायद ३१ दिसम्बर की रात या १ जनवरी को नव वर्ष मनाने का कोई वैज्ञानिक आधार हो, मगर मैंने आज तक नहीं देखा... फिर भी ये उनकी अपनी पद्धति है, मगर हमारी दुम हिलाने की आदत गयी नहीं आज तक, शुरू कर देते है पटाके फोड़ना..विडंबना ये है की क्या कभी आप ने किसी अमेरिकी को हिन्दू नव वर्ष मानते देखा है..
मैं ये कहना जरुरी समझता हूँ की १ जनवरी को कुछ भी वैज्ञानिक दृष्टि से नवीन नहीं होता मगर फिर भी नव वर्ष होता है..

हिन्दू नव वर्ष कब मनाया जाता है : हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल प्रतिपदा के प्रथम दिन हिन्दू नव वर्ष मनाया जाता है..ऐसी मान्यता है की सतयुग का प्रथम दिन भी इसी दिन शुरू हुआ था..एक अन्य मान्यता के अनुसार ब्रम्हा ने इसी दिन सृष्टि का सृजन शुरू किया था..भारत के कई हिस्सों में गुडी पड़वा या उगादी पर्व मनाया जाता है.इस दिन घरों को हरे पत्तों से सजाया जाता है और हरियाली चारो और दृष्टीगोचर होती है.


इस वर्ष पश्चिमी कलेंडर के अनुसार ये वर्ष ४ अप्रैल २०११ को शुरू होगा..चलिए ये तो रही मान्यताएं और इतिहास की बातें अब कुछ वैज्ञानिक तथ्यों को भी जान लें..

हिन्दू नव वर्ष के वैज्ञानिक तथ्य:

१ चैत्र माह मतलब हिन्दू नव वर्ष के शुरू होते ही रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते है..
२ पेड़ों पर नवीन पत्तियों और कोपलों का आगमन होता है..पतझड़ ख़तम होता है और बसंत की शुरुवात होती है..
३ प्रकृति में हर जगह हरियाली छाई होती है प्रकृति का नवश्रृंगार होता है..
४ धर्म को मानने वाले लोग पूजा पाठ करते है मंदिर जातें है नदी स्नान करतें है..
५ भास्कराचार्य ने इसी दिन को आधार रखते हुए गड़ना कर पंचांग की रचना की।

आप ही सोचे क्या जनवरी के माह में ये नवीनता होती है नहीं तो फिर नव वर्ष कैसा..शायद किसी और देश में जनवरी में बसंत आता हो तो वो जनवरी में नव वर्ष हम क्यूँ मनाये ....

चलिए आप सभी को नव वर्ष की ढेरों शुभकामनायें आशा करूँगा की ये नव वर्ष आप सभी के जीवन में अपार हर्ष और खुशहाली ले कर आये.. जाते जाते एक जानकारी के साथ छोड़ जाता हूँ हिन्दू पंचांग महीनो के नाम और पश्चिम में कैलेंडर में उस माह का अनुवाद
चैत्र--- मार्च-अप्रैल
वैशाख--- अप्रैल-मई
ज्येष्ठ---- मई-जून
आषाढ--- जून-जुलाई
श्रावण--- जुलाई - अगस्त
भाद्रपद--- अगस्त -सितम्बर
अश्विन्--- सितम्बर-अक्टूबर
कार्तिक--- अक्टूबर-नवम्बर
मार्गशीर्ष-- नवम्बर-दिसम्बर
पौष----- दिसम्बर -जनवरी
माघ---- जनवरी -फ़रवरी
फाल्गुन-- फ़रवरी-मार्च


अब क्रिकेट की कुछ क्रिकेट के दीवानों लिए: भारतीय टीम के दो सदस्यों के नाम, आश्विन एवं कार्तिक भी  हिंदी महीनो के नाम पर है,किसी क्रिकेटर का नाम है क्या भारतीय क्रिकेट टीम में अगस्त सितम्बर या जुलाई ??

नव वर्ष मंगल मय हो...

बोलो भैया दे दे तान
हिंदी हिन्दू हिन्दुस्थान.......
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