शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

लोकपाल,लोकतंत्र और भष्टाचार विरोधी आन्दोलन का असमय अवसान..

पिछले कई दिनों से संसद में धुमाचौकड़ी मची हुई थी लोकपाल पर ..सत्र शुरू होते ही अन्ना के प्रबंधक सक्रीय हो उठे थे और कांग्रेस सरकार पर भी लोकपाल बिल को पारित कराने का नैतिक और राजनैतिक दोनों दबाव बढ़ता जा रहा था...विपक्ष ने भी मौका देखकर सरकार की मिट्टी पलीद करने में कोई कसर नहीं छोड़ रक्खी थी.. मगर जैसे ही कलेंडर ने ३० तारीख की और इशारा किया अन्ना हजारे और लाखों लोगो का सारा का सारा आन्दोलन पानी के बुलबुले की भांति फूट कर खत्म हो गया..अब जब एक आन्दोलन का असमय देहावसान हो गया तो ये हम सभी के आत्मविश्लेषण का समय है की आखिर इस सारी जद्दोजहद से आम हिंदुस्थानी ने क्या पाया?

हालाकि तुलना गलत होगी मगर इस आन्दोलन की असफलता मेरे मानस पटल पर  कभी कभी भारतीय स्वाधीनता संग्राम की १८५७ की असफल क्रांति  का काल्पनिक रेखाचित्र खिंच कर जाती है,जिसमें अनेक अग्निवेश जैसे दलाल पुरे आन्दोलन में इधर उधर मुंह मारते रहे और आन्दोलन के दो मुख्य स्तम्भ बाबा रामदेव और अन्ना हजारे एक दुसरे को लंगड़ी मारने में व्यस्त रहे और कांग्रेस रूपी ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने दमनचक्र चला कर सबको साध लिया.. 
दरअसल अप्रैल से अन्ना आन्दोलन के बाद ने ही कांग्रेस सरकार ने अपनी साम दाम दंड भेद अपनाकर अन्ना टीम की विश्वसनीयता लोगो के बीच खत्म करने का एक कुत्सित प्रयास शुरू कर दिया था...हालाँकि अन्ना के तथाकथित सेकुलर प्रबंधको का अति आत्मविश्वास भी उन्हें ले डूबा...ये वही अन्ना टीम है जिसका जनता से परिचय बाबा रामदेव ने कराया और उसके बाद इनलोगों ने लोकपाल आन्दोलन में बाबा को शामिल करने के लिए ढेर सारी शर्तों  का एक सेकुलर पिटारा खोल दिया.. खैर बाबा को जैसे तैसे भ्रष्टाचार विरोधी जनान्दोलन का श्रेय लेने से बहुत सफाई से किनारे कर दिया,ज्ञात रहें की ये वही बाबा रामदेव हैं जिन्होंने सालो से भ्रष्टाचार और कालेधन के विरोध में अभियान छेड़ रखा है..
कांग्रेस सरकार ने भी अग्निवेश जैसे दलाल अन्ना टीम में सक्रीय कर दिये जिन्होंने अन्ना टीम को रातो रात भारत के गाँधी और नेहरु बनाने का दिवास्वपन दिखा दिया..
४ जून को बाबा के आन्दोलन को निर्ममता से कुचल दिया गया और इस निर्ममता का जनाक्रोश अन्ना को दुसरे अनशन  में जनसमर्थन के रूप में मिला.जिसे अन्ना प्रबंधको ने अपने नेतृत्व क्षमता विजय के रूप में देखा..बाबा रामदेव के आन्दोलन को निर्ममता से कांग्रेस सरकार द्वारा कुचलने के बाद अन्ना जैसे भी थे एक उम्मीद की किरण के रूप में परिलक्षित होने लगे.मैं व्यक्तिगत रूप से(या मेरे जैसे लाखो हिंदुस्थानी) यही सोचते रहे की अन्ना दुसरे अनशन में अपार जनसमर्थन के बूते पर सरकार से कुछ न कुछ हासिल कर लेंगे इसी उम्मीद में सुबह से शाम अनशन स्थल पर पड़े रहे मगर परिणाम वही ढ़ाक के तीन पात..अन्ना टीम को गाँधी बनने का ऐसा चस्का लगा था की हर बार एक नए समझौते और भारत रत्न की आस लिए जूस पीते और जनता सर पिटते हुए फिर अपने घर..इसके बाद अन्ना टीम के उल जलूल निर्णय जैसे पहले नेताओं को मंच पर न फटकने देना फिर उनके घर घर जा के कटोरा फैलाना..कभी कश्मीर को हिन्दुस्थान से बाहर कर देना तो कभी कुमार विश्वास का हिन्दू देवी देवताओं का अपमान करना.. हिन्दुस्थान जैसे देश में कांग्रेस जैसी कुटिल देशद्रोही  सरकार को ९ महीने का समय देना एक आन्दोलन का पिंडदान करने के लिए पर्याप्त था और वही हुआ कांग्रेस से सुनियोजित तरीके लोकपाल बिल की हत्या कर दी और बाकी विपक्षी दलों ने भी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष कांग्रेस का समर्थन किया,क्यूकी पूरी राजनैतिक जमात जनता के गुस्से से घबरायी हुई थी और ये सब उस संसद और लोकतंत्र की गरिमा के नाम पर हुआ जिसमें अपराधियों,देशद्रोहियों और भारत का ८०% कालाधन रखने वालो की उपस्थिति पंजिका रक्खी जाती है..
अन्ना ने फिर अनशन किया मगर अबकी बार जनता फिर किसी मुगालते में नहीं आने वाली थी शायद अंदेशा था इस बार भी अन्ना टीम एक कांग्रेसी सेकुलर प्रेमपत्र दिखाकर उसपर अमल न किये जाने की सूरत में अगले अनशन की तारीख का शुभ महूर्त निकलवाकर सब हिन्दुस्थानियों को निमंत्रण भेजती..
मुंबई जो की अन्ना का गृहराज्य था वह इतनी भी भीड़ नहीं जुटी की अन्ना अपना अनसन ३ दिन तक भी रख पायें इसका कारण कांग्रेस के प्रति सहानुभूति न होकर अन्ना टीम से मोहभंग होना था..शायद जनता ने अपनी लूट को नियति मानकर, नयी अनशन की तारीख लेने की बजाय कुछ दिन और इस लूट को स्वीकार कर लेने का विकल्प चुना था 
अंततः इस आन्दोलन की विफलता से कांग्रेस को देश को लूटने की तात्कालिक आजादी और अन्ना टीम के प्रबंधको के लिए एक अच्छी खासी उर्वरा राजनैतिक जमीन बनाने का मौका तो मिला ही है..
मीडिया के कैमरों से दूर बाबा रामदेव,सुब्रमण्यम स्वामी ने अभी तक राष्टवाद और भष्टाचार मुक्त भारत का झंडा उठा रखा है,मगर सावन के सेकुलर अंधों को हरे से ज्यादा प्यार नजर आता है..एक सामान्य नागरिक की तरह यही उम्मीद है की शायद कांग्रेसी शासन के मकडजाल से कोई मुक्ति दिलाये और भारत में सच्चा लोकतंत्र स्थापित हो.....


मित्रों बधाइयों का दौर चलने वाला है कल से ,सेकुलर नहीं हूँ और अंग्रेज भी नहीं इसलिए ,मेरी तरफ से हिन्दू नव वर्ष(२३ मार्च २०१२ ) की अग्रिम बधाइयाँ..

रविवार, 18 दिसंबर 2011

पाकिस्तानी हिन्दुओं की हिन्दुस्थान में दुर्दशा -हिन्दू होने का अपराध


अमेरिका और पोप शासित इण्डिया में  जहाँ ११० करोड़ हिन्दू जनसँख्या है,हिन्दुओं का दमन और उन पर अत्याचार कभी सुर्खियाँ नहीं बन सकता, मगर बात अभी पाकिस्तान से आये १५० हिन्दुओं की है जो हिन्दुस्थान में दर दर भटक रहें हैंपिछले माह पाकिस्तान से १५० हिन्दू तीर्थयात्रा पर आये थे मगर अब ये हिन्दू हिन्दुस्थान से वापस जाने के लिए तैयार नहीं हैऔर यहाँ स्थायी रूप से शरण मांग रहें हैंइसके पीछे पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं पर होने वाला बर्बर अत्याचार हैआये हुए हिन्दुओं के अनुसार पाकिस्तान में उन्हें कभी जजिया कर तो कभी मुश्लिम बनने का दबाव,हत्या ,लूट और फिरौती का दंश झेलना पड़ता था हिन्दू लड़कियों के बलात्कार और बलात मुश्लिम बनाने की घटनाएँ अब आम हो गयी हैये बात पाकिस्तान की सरकार, संसद और मानवाधिकार संघठन भी स्वीकार करने हैंइसके पक्ष का आकड़ा एक ये भी है की विभाजन के समय पाकिस्तान में २५% हिन्दू थे जो अब १.५% के आस पास रह गए हैंखैर ये बात तो पाकिस्तान में होने वाले अत्याचार की हुई जहाँ पाकिस्तानी का मतलब मुसलमान और हिन्दू विरोधी  होना ही होता है,और ये उनके देश का आन्तरिक मामला है उसपर हम एक सीमा से ज्यादा हस्तक्षेप नहीं कर सकते
हिन्दुस्थान (जिसे खान्ग्रेस सरकार ने पोप पोषित इंडिया बना रखा है) में आये हुए पाकिस्तानी हिन्दुओं के साथ होने वाला व्यवहार भी उन्हें अपने यहाँ चलने वाले तालिबानी शासन की ही याद दिलाता हैये १५० हिन्दू जिनमें बच्चे बुजुर्ग महिलाये भी शामिल है इन्होने दिल्ली में शरण ली हैकुछ छोटे स्वयंसेवी संघठनो और इक्का दुक्का समाज सेवको के अलावा कोई भी उनकी सुध लेने वाला नहीं हैखान्ग्रेस अपनी हिंदुविरोधी नीतियों और तुष्टिकरण के कारण इन हिन्दुओं को वापस पाकिस्तान भेजने के लिए अपना पूरा जोर लगा रही हैइन हिन्दुओं की हिन्दुस्थान में शरण पाने की याचिका भी सरकार ने जानबूझकर विचाराधीन रखा हैइसी बिच एक हिन्दू संघटन ने इन्हें उत्तर प्रदेश में शरण दिलाने की कवायद  की तो यू पी पुलिस ने उन्हें रात मे ही मार पिट कर दिल्ली भगा दियाखैर कांग्रेस से हिन्दू विरोध की ही उम्मीद की जा सकती है क्यूकी इस पार्टी का इतिहास ही है तुष्टिकरण का हैसबसे कष्टप्रद बात ये है की इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संघठन को लकवा मार गया है और भरतीय जनता पार्टी जैसी राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का झंडा उठाने वाली पार्टी ने इस मुद्दे पर कोई पहल करने की जरुरत नहीं समझीहिन्दू  हृदय सम्राट की पदवी पाए हुए माननीय नरेन्द्र मोदी जी भी चुप हैइसका कारण क्या है??
आगामी चुनावों को देखते हुए मुश्लिम वोट बैंक की खातिर राजनितिक पार्टियाँ इन हिन्दुओं को जबरिया पाकिस्तान भेजने से भी गुरेज न करेहाँ अगर ये लोग मुश्लिम होते तो खान्ग्रेस से लेकर भाजपा सब पार्टियों में ईनको हिन्दुस्थान में शरण दिलाने की होड़ लग जाती शायद भारत सरकार को शरणार्थी नीति पर भी एक स्पष्ट रुख अख्तियार करना चाहिएकितना शर्मनाक है की हिन्दुस्थान में ६ करोड़ जेहादी बांग्लादेशियों को बसाने में खान्ग्रेस सरकार को सोचने में जरा भी समय नहीं लगता और सिर्फ १५० हिन्दुओं पर अत्याचार हो रहा हैअसम का उदाहरण ले तो रातो रात ट्रक में बैठकर बंगलादेशी आते है और अगले दिन तक जंगल के जंगल गांव में तब्दील। न कोई शरण देने का झंझट न कोई निरीक्षण..इसका कारण है की वो मुश्लिम है..वो एक वोट बैंक है
इस परिस्थिति में हिन्दुओं को भी आत्म मंथन करने की जरुरत क्या हिन्दुस्थान का हिन्दू इतना निरीह हो गया है की ११० करोण हिन्दू मिलकर १५० भाई बहनों को शरण न दे सके? शायद हम हिन्दुओं की आंतरिक फूट ,तथाकथित सेकुलर होने की होड़ और खान्ग्रेसियों के तलवे चाटने वालों की हिमायत करने की प्रवृत्ति इस का कारण हैकल्पना करे अफजल गुरु के लिए होने वाले विरोध प्रदर्शनों का,देशद्रोही होने के बाद भी एक बड़ा तबका उसे आदर्श मानता हैवैश्विक स्तर पर मुश्लिम लादेन के प्रबल समर्थक भी है मगर अब दूसरी और हिन्दुस्थान में हिन्दू ही कर्नल पुरोहित और प्रज्ञा ठाकुर को आतंकी बता कर अपनी बौधिक चेतना के दिवालियेपन और हिन्दुओं की नपुंसकता का परिचय देते रहते है
अगर अब भी हिन्दुओं ने नपुंसकता नहीं छोड़ी तो आज १५० पाकिस्तानी हिन्दू दर दर  भटक रहें है कल ११० करोड़ हिन्दुस्थान के हिन्दू आतंकी घोषित कर दिए जायेंगे और बाबर और मीर जाफर की औलादे इस देश पर शासन करेंगीऔर हम अपनी संस्कृति और धर्म के मुगालते में रहते हुए "गर्व से कहो हम हिन्दू है" की छद्म गाथा गाते रहेंगे
आप सभी से अनुरोध है आप जहा कहीं भी हो संवैधानिक मर्यादा में रहते हुए एक पत्र माननीय प्रधानमंत्री जी,राष्ट्रपति जी,अपने जनप्रतिनिधिया जिलाधिकारी किसी को भी किसी माध्यम से,इन हिन्दुओं की सहायता के लिए, लिखें और उन हिन्दुओं की सहायता के लिए प्रयास करते हुए समाज और हिंदुत्व के लिए अपना कर्तव्य पूरा करने की कड़ी में एक छोटा सा प्रयास करें

बुधवार, 30 नवंबर 2011

तेरा वैभव अमर रहे माँ हम दिन चार रहें न रहें.... राजीव भाई को श्रधांजलि


                                                                                          
                                                                                       
भाई राजीव दीक्षित जी के नाम स्वदेशी और आजादी बचाओ आन्दोलन  से हम सभी परिचित  हैं.. एक
अमर हुतात्मा, जिसने अपना पूरा जीवन मातृभाषा मातृभूमि को समर्पित कर दिया..आज उनका जन्मदिवस और पहली पुण्यतिथि भी है..आज ही के दिन ये अमर देशभक्त हमारे बिच आया था और पिछले साल हमारे बिच से आज ही के दिन राजीव भाई चले गए..अगर राजीव भाई के प्रारम्भिक जीवन में झांके तो जैसा की हम सब जानते हैं ,राजीव भाई एक मेधावी छात्र एवं  वैज्ञानिक भी थे..आज के इस भौतिकतावादी दौर में जब इस देश के युवा तात्क्षणिक हितों एवं भौतिकवादी साधनों के पीछे भाग रहा है, राजीव भाई ने राष्ट्र स्वाभिमान एवं स्वदेशी की परिकल्पना की नीव रखने के लिए अपने सम्पूर्ण जीवन को राष्ट्र के लिए समर्पित कर त्याग एवं राष्ट्रप्रेम का एक अनुकरणीय उदहारण प्रस्तुत किया..सार्वजनिक जीवन में आजादी  बचाओ आन्दोलन से सक्रीय हुए राजीव भाई ने स्वदेशी की अवधारणा एवं इसकी वैज्ञानिक  प्रमाणिकता को को आन्दोलन का आधार बनाया.. 
स्वदेशी शब्द हिंदी के " स्व" और "देशी" से मिलकर बना  है."स्व" का अर्थ है अपना और "देशी" का अर्थ है जो देश का हो.. मतलब स्वदेशी वो है "जो अपने देश का हो अपने देश के लिए हो" इसी मूलमंत्र को आगे बढ़ाते हुए राजीव भाई ने लगभग २० वर्षों तक अपने विचारो,प्रयोगों एवं व्याख्यानों से एक बौद्धिक जनजागरण एवं जनमत बनाने का सफल प्रयास किया, जिसके फलस्वरूप हिन्दुस्थान एवं यहाँ के लोगो ने अपने खुद की संस्कृति की उत्कृष्ठता एवं वैज्ञानिक प्रमाणिकता को समझा और वर्षों से चली आ रही संकुचित गुलाम मानसिकता को छोड़ अपने विचारों एवं स्वदेशी पर आधारित तार्किक एवं वैज्ञानिक व्यवस्था को अपनाने का प्रयास किया..
वैश्वीकरण एवं उदारीकरण के प्रबल विरोधी राजीव भाई ने अंग्रेजो के ज़माने से चली आ रही क्रूर कानून व्यवस्था से लेकर टैक्स पद्धति में बदलाव के लिए गंभीर प्रयास किये..अगर एक ऐसा क्षेत्र  लें जो लाल बहादुर शास्त्री जी के के बाद सर्वदा हिन्दुस्थान में उपेक्षित रहा तो वो है "गाय,गांव और कृषि " इस विषय पर राजीव भाई के ढेरो शोध और प्रायोगिक अनुसन्धान सर्वदा प्रासंगिक रहे हैं..वैश्वीकरण एवं उदारीकरण की आड़ में पेप्सी कोला जैसी हजारों बहुराष्ट्रीय कंपनियों को, खुली लूट की छूट देने वाले लाल किले दलालों के खिलाफ राजीव भाई की निर्भीक,ओजस्वी वाणी इस औद्योगिक सामाजिक मानसिक एवं आर्थिक रूप से गुलाम भारत को इन बेड़ियों से बाहर निकलने का मार्ग प्रशस्त करती थी..मगर सत्ता और व्यवस्था परिवर्तन की राह और अंतिम अभीष्ट  सर्वदा विरोधों और दमन  के झंझावातों से हो कर ही मिलता है..व्यवस्था परिवर्तन की क्रांति को आगे बढ़ाने में राजीव भाई को सत्ता पक्ष से लेकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कई बार टकराव झेलना पड़ना और इसी क्रम में यूरोप और पश्चिम पोषित कई राजनीतिक दल और कंपनिया उनकी कट्टर विरोधी हो गयी..
 अगर हम भारत के स्वर्णिम इतिहास के महापुरुषों की और नजर डाले तो राजीव भाई और विवेकानंद को काफी पास पाएंगे..जिस प्रकार विवेकनन्द जी ने गुलाम भारत में रहते हुए यहाँ की संस्कृति धर्म और परम्पराओं का लोहा पुरे विश्व के सामने उस समय मनवाया जब भारत के इतिहास या उससे सम्बंधित किसी भी परम्परा को गौण करके देखा जाता था, उसी प्रकार राजीव भाई ने अपने तर्कों एवं व्याख्यानों से भारतीय एवं स्वदेशी संस्कृति ,धर्म , कृषि या शिक्षा पद्धति  हर क्षेत्र में स्वदेशी और भारतीयता की महत्ता और प्रभुत्व  को पुनर्स्थापित करने का कार्य उस समय करने का संकल्प लिया जब भारत में भारतीयता के विचार को ख़तम करने का बिदेशी षड्यंत्र अपने चरम पर चल रहा था..काल चक्र अनवरत चलने के साथ साथ कभी कभी धैर्य परीक्षा की पराकाष्ठा करते हुए हमारे प्रति क्रूर हो जाता है..कुछ ऐसा ही हुआ और इसे देशद्रोही विरोधियों का षड्यंत्र कहें या नियति का विधान राजीव भाई हमारे बिच से चले गए..मगर स्वामी विवेकानंद जी की तरह अल्पायु होने के बाद भी राजीव भाई ने व्यक्तिगत एवं  सामाजिक जीवन के उन उच्च आदर्शों को स्थापित किया जिनपर चलकर मानवता धर्म देशभक्ति एवं समाज के पुनर्निर्माण की नीव रक्खी जानी है..
अब यक्ष प्रश्न यही है की राजीव भाई के बाद हम सब कैसे आन्दोलन को आगे ले जा सकते हैं. जैसा की राजीव भाई की परिकल्पना थी की एक संवृद्ध  भारत के लिए यहाँ के गांवों का संवृद्ध होना आवश्यक है..जब तक वो व्यक्ति जो १३० करोण के हिन्दुस्थान के आधारभूत आवश्यकता भोजन का प्रबंध करता वो खुद २ समय के भोजन से वंचित है,तब तक हिन्दुस्थान का विकास नहीं हो सकता..हम चाहें जितने भी आंकड़ों की बाजीगरी कर के विकास दर का दिवास्वप्न देख ले मगर यथार्थ के धरातल पर गरीब और गरीब होता जा रहा है और अमीर और अमीर..इसी व्यवस्था के खिलाफ शंखनाद के लिए मूल में ग्रामोत्थान  के तहत कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना होगा ,कृषि के क्षेत्र में पारम्परिक कृषि को प्रोत्साहन देकर स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता के अवसर बढ़ाने होंगे..शायद इस क्षेत्र में हजारों के तादात में स्वयंसेवक संगठन  और बहुद्देशीय योजनायें चलायी जा रही हैं,मगर अपेक्षित परिणाम न देने का कारण शायद सामान्य जनमानस में इस विचारधारा के प्रति उदासीनता और बहुरष्ट्रीय कंपिनयों के मकडजाल में उलझ कर रह जाना..
इस व्यवस्था के परिवर्तन के लिए हमे खुद के व्यक्तित्व में स्वदेशी के "स्व" की भावना का मनन करना होगा उसकी महत्ता को समझना होगा.."स्व" जो मेरा है और स्वदेशी "जो मेरे देश का है,मेरे देश के लिए है"..हमें अपने अन्दर की हीन भावना और उस गुलाम मानसिकता को ख़तम करना होगा, जो ये कहता है की अमेरिका यूरोप और पाश्चात्य देशों की हर चीज आधुनिक और वैज्ञानिक है और वहां की हर विधा हमारे समाज में प्रासंगिक है, चाहे वो नारी को एक ऐसे देश में ,नग्न भोग विलासिता के एक उत्पाद के रूप में अवस्थित करना हो ,जिस देश में नारी पूज्य,शील और शक्ति का समानार्थी मानी जाती रही है..हिन्दुस्थान शायद विश्व का एकमात्र देश होगा जहाँ आज तक गुलामी की भाषा अंग्रेजी बोलना, तार्किक और आधुनिक माना जाता है और मातृभाषा हिंदी,जिसका एक एक शब्द वैज्ञानिक दृष्टि से अविष्कृत है ,बोलना पिछड़ेपन की निशानी माना जाता है..ऐसी  गुलाम मानसिकता विश्व के शायद ही किसी देश में देखने को मिले..इसी गुलाम मानसिकता को तोड़ने का प्रयास राजीव भाई के आन्दोलन का मूल है...यदि देश,व्यवस्था या व्यक्ति की विचारधारा को पंगु होने से बचाना है तो हमे सम्पूर्ण स्वदेशी के विचारों पर चल कर ही सफलता मिल सकती है.. विश्व का  इतिहास गवाह है की किसी भी देश का उत्थान उसकी परम्परा और संस्कृति से इतर जा कर नहीं हुआ है..
व्यवस्था परिवर्तन की राह हमेशा कठिन होती है और बार बार धैर्य परीक्षा लेती है ..सफ़र शायद बहुत लम्बा हो सकता है कठिन हो सकता है मगर अंतत लक्ष्य  प्राप्ति की ख़ुशी,उल्लास और संतुष्टि उससे भी मनोरम और आत्म सम्मान से परिपूर्ण ..राजीव भाई ने एक राह हम सभी को दिखाई और उस पवित्र कार्य  लिए अपना जीवन तक होम कर दिया..आज उनके जन्मदिवस  और पुण्य तिथि के अवसर पर आइये हम सभी आन्दोलन में अपना योगदान निर्धारित करे और एक स्वावलंबी एवं स्वदेशी भारत की नीव रखके उसे विश्वगुरु के पड़ पर प्रतिस्थापित करने में अपना योगदान दे .....शायद हम सभी की तरफ से ये एक सच्ची श्रधांजली होगी राजीव भाई और उनकी अनवरत जीवनपर्यंत साधना को...

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आशुतोष नाथ तिवारी 

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

एयरलाइंस क्षेत्र में सरकारी साजिश ,किंगफिशर बेल आउट के दौर में दम तोड़ता किसान ..


पिछले दिनों किंगफिशर एयरलाइंस को तेल कंपनियों ने बकाया राशी के भुगतान न करने के कारण, तेल देना बंद कर दिया और कंपनी को कई उड़ाने रद्द करनी पड़ी..हालत यह है की आज कंपनी पर लगभग ७००० करोड़ रूपये का कर्ज है या दूसरे शब्दों में कहे तो किंगफिशर एयरलाइंस  दिवालिया होने के कगार पर पहुच गयी है..लगभग ७० उड़ाने रोज रद्द हो रही है और कई कम आवाजाही के मार्गों पर कम्पनी ने अपना सञ्चालन स्थगित कर दिया है..अब प्रश्न ये है की, क्या कंपनी रातो रात दिवालिया होने के कगार पर पहुच गयी या प्रबंध तंत्र को पहले से इसकी जानकारी थी और जानबूझ कर कंपनी ने आने वाली परिस्थितियों के लिए जरुरी कदम नहीं उठाये..आखिर घाटे में एयरलाइंस को चलाकर दीवालिया बनाने की करार तक आने देने के पीछे क्या कारण रहे?
क्यूकी व्यापार की दुनिया के बादशाहों में एक विजय माल्या बिना किसी फायदे के ये एयरलाइंस के घाटे का सौदा मोल लेंगे आसानी से गले नहीं उतरता..
अब हम इस दीवालिया कंपनी के मालिक विजय माल्या के बारे में देखें तो अपनी रंगीन मिजाजी और आलिशान पार्टियों पर पानी की तरह पैसा बहाने वाला ये उद्योगपति हर साल खुबसूरत माडलों  के नंगे कैलेंडर बनवाने में करोडो रूपये उडाता है..इसके अलावा व्यापार जगत की ये हस्ती यूनाइटेड ब्रिवरीज नामक कंपनी का मालिक है और भारत में बिकने वाली हर दूसरी बियर इनकी फैक्ट्री से निकलती है..
कई स्टड फार्मो के मालिक विजय माल्या, आई.पी.एल में टीम का मालिकाना हक़ भी रखते हैं और भारत  और विश्व के सर्वाधिक धनी व्यक्तियों में एक गिने जाते हैं..
अभी हाल फ़िलहाल में इनका नया नवअन्वेषण था भारत में फार्मूला वन रेस .इस रेस टीम में इनका मालिकाना हक़ है.. प्रश्न भी यही से उठता है की एयरलाइंस के डूबने का सिलसिला पिछले साल से ही शुरू हो गया था मगर उड़ाने रद्द होने का सिलसिला,तेल कंपनियों का सप्लाई रोकने का फैसला फार्मूला १ के बाद ही क्यों आया..कहीं ऐसा तो नहीं की फार्मूला वन के आयोजन पर माल्या की एयरलाइंस के डूबने से संकट आ सकता था..शायद तकनीकी रूप से रेस हो भी जाती तो माल्या के ऊपर नैतिक दबाव होता..
अब माल्या की कंपनी को कर्जे से उबारने के लिए बेल आउट पैकेज की बात मीडिया और सत्ता के गलियारों में बहुत जोर शोर से उठाई जा रही है..मंत्रियों और बैंको की बैठको का दौर शुरू हो गया, की कैसे अरबो खरबों के मालिक माल्या की आर्थिक सहायता की जाये..थोड़े ही समय में इसके परिणाम भी आने शुरू हो गए, कंपनियों ने बिना बकाया वसूले तेल की सप्लाई शुरू कर दी..किंगफिशर के शेयरों में तेजी आनी शुरू हो गयी और परदे के पीछे मनमोहन जी के सिपहसालारों ने माल्या को मालामाल करने की तरकीबे भिड़ानी शुरू कर दी..शायद माल्या को प्रत्यक्ष रूप से १०-१५ हजार करोड़ की आर्थिक सहायता दे दी जाती मगर आने वाले चुनावों को देखते हुए, शायद कांग्रेस सरकार ने इस फैसले को टाल दिया है क्यूकी अब जनता के हिसाब मांगने की बारी है की सैकड़ो कंपनियों के खरबपति मालिक पर ये मेहरबानी क्यों????
अगर हम इस समस्या के  मूल में जा के देखें तो काफी हद तक ये बातें पूर्वनिर्धारित लग रही है..एक किंगफिशर एयरलाइंस के बंद हो जाने से विजय माल्या की आर्थिक सेहत पर ज्यादा से ज्यादा  उतना ही प्रभाव पड़ेगा जितना साल के अंत में एक बार आय कर कटने से एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति पर पड़ता  है..अगर इन परिस्थितियों को व्यापक स्तर पर देखें तो आज इंडियन एयरलाइंस और एयर इंडिया विलय होने के बाद भी  दिवालिया होने के कगार पर है बाकी एयरलाइंस में भी इक्का दुक्का छोड़ दे तो सबकी हालत खस्ता है..एयरलाइंस के किरायों पर कोई विनियमन नहीं है..और सभी जानते हैं की ये सारी परिस्थितियां सरकार द्वारा प्रायोजित गलत नीतियों के कारण उत्पन्न हुई है..यहाँ ध्यान देने योग्य बात ये है  एयरलाइंस  सेक्टर में विदेशी कंपनियों की पैठ अभी तक नहीं बनी है..
ये वही मनमोहन सिंह जी है जिनकी १९९१ में शुरू की गयी नीतियों के कारण आज हमारे घर के तेल,साबुन,टीवी से लेकर कार,पंखा या दैनिक प्रयोग की हर बस्तु बिदेशी हो गयी यहाँ तक की अब सब्जियों को भी बिदेशी हाथो में दिया जा रहा है बेचारा किसान सल्फास खा कर मर रहा रहा है..खैर हिन्दुस्थान में मरता किसान ही है, कोई इटली का  युवराज नहीं इसलिए ये बड़ी बात नहीं हमारे प्रधानमन्त्री  जी के लिए..
जो बात बड़ी है वो ये की तेल से लेकर कार  बेचने वाली बिदेशी कम्पनियाँ अब तक एयरलाइंस  सेक्टर में कब्ज़ा क्यों नहीं कर पाई??यही माननीय मनमोहन जी और सोनिया जी की चिंता का विषय है..विशेषकर यूरोप की कम्पनियाँ हिन्दुस्थान के इस सेक्टर पर नजर गडाए बैठी है.. अब मनमोहन मंडली से अच्छा राजनैतिक सहयोग कही मिलेगा नहीं तो सारी एयरलाइंस को घाटे में दिखा कर बिदेशी एयरलाइंस  को भारत में आने का मौका दिया जाये और इस बाजार पर भी बिदेशी कब्ज़ा..बेशक इन सब के लिए कुछ मेहनताना हर बार की तरह कांग्रेस नेताओं के स्विस अकाउंट में भेज दिया जायेगा..इस संशय को इंडियन एयरलाइंस  के लगातार घाटे और मनमोहन के मंत्रियों की तिहाड़ यात्रा से और भी बल मिलता है..
इन सब के बिच एक सामान्य मध्यमवर्गीय आदमी मनमोहन और सोनिया जी की सरकार के लिए एक स्वयं ही एक उत्पाद बन कर रह गया है जिसका इस्तेमाल फायदे और मूल्य संवर्धन के लिए आवश्यकता अनुसार कर लिया जाता है...नोयडा में किसानो से जमीन ली जाती है औद्योगीकरण और रोजगार के नाम पर पर  वहां विजय माल्या की कारे दौडाई जाती है और राबर्ट वढेरा जैसे खरबपति उस पर दांव लगाते हैं..सिर्फ कुछ गिने चुने खरबपतियों की ऐयाशी  के लिए किसानो से जमीन ले कर रेसिंग ट्रैक बनाया जाता है और किसान भूख के मारे आत्महत्या करता है...अगर अपना हक मांगने लायक जान बची रहती है तो विश्व बैंक और यूरोप की पालतू सरकार गोलियां चलवाकर उनका मुंह बंद कर देती है...हिन्दुस्थान में अगर गरीब किसान या एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति  दिवालिया होता है तो उसके सामने आत्महत्या का ही रास्ता होता है मगर विजय माल्या जैसा खरबपति दिवालिया हुआ तो अरबो खरबों ले कर हमारे प्रधनमंत्री जी उसके चौखट पर पहुच जाते हैं.अगर ये बेल आउट हमारे प्रधानमंत्री जी आत्महत्या करते किसानो पर खर्च करते तो मैं यकीन से कह सकता हूँ की हिन्दुस्थान में कोई भी किसान आत्महत्या नहीं करता..शायद ये बेल आउट उस मध्यमवर्गीय रोजगार करने वाले व्यक्ति का भी कुछ भला कर सकता है जिसे रोज महंगाई और पेट्रोल की बढ़ी  कीमतों से जूझना पड़ता है...मगर सामान्य जनता पर महंगाई के  बढे बोझ को सही ठहराने  के लिए मंत्रियों की फ़ौज खड़ी हो जाती है और वही फ़ौज माल्या जैसे उद्योगपतियों के लिए हमारे टैक्स का पैसा पानी की तरह बहाने में एक बार भी विचार नहीं करती..इससे इस आशंका को समर्थन मिलता है वर्तमान सरकार निजी हितों के कुछ गिने चुने भ्रष्ट उद्योगपतियों के साथ गठबंधन कर के खुली लूट कर रही है...

एयरलाइंस  सेक्टर की ये उठापठक भी इसी लूट का हिस्सा है..कोई आश्चर्य नहीं की जैसे इटली के कई बैंको को हिन्दुस्थान में अकस्मात प्रवेश दे दिया गया आने वाले दिनों में सरकारी एयरलाइंस बेच दी जाये , इटली और यूरोप की विमानन कंपनिया भारतीय आकाश पर कब्ज़ा किये बैठी हों और हमारे प्रधनमंत्री जी उदारीकरण से होने वाले फायदे का दिवास्वप्न दिखा रहे हों....

रविवार, 6 नवंबर 2011

भाई राजीव जी के स्वदेशी आन्दोलन की अगली कड़ी - स्वदेशी पीठम ...

मित्रों..
आजादी बचाओ आन्दोलन के संस्थापक भाई राजीव दीक्षित  जी के नाम से हम सभी परिचित  हैं..
सत्य अर्थों में कहें तो एक अमर हुतात्मा जिसके अन्दर राष्ट्रभक्ति एवं राष्ट्र स्वाभिमान की भावना कोटि कोटि विद्यमान थी..काल चक्र अनवरत चलने के साथ साथ कभी कभी धैर्य परीक्षा की पराकाष्ठा करते हुए हमारे प्रति  क्रूर हो जाता है..कुछ ऐसा ही हुआ और इसे देशद्रोही विरोधियों का षड्यंत्र कहें या नियति का विधान राजीव भाई पिछले साल हमारे बिच से चले गए ..समयचक्र चलता रहा और कब एक साल निकल गया पता ही नहीं चला मानो प्रतीत होता है , कल की ही बात है जब राजीव भाई अपने व्याख्यानों एवं प्रयोगों से हमारा मार्गदर्शन और उत्साहवर्धन कर रहें है..पिछले  एक वर्ष  में कई बार ऐसा प्रतीत हुआ की राजीव भाई के जाने के बाद स्वदेशी और आजादी बचाओ आन्दोलन अपने असामयिक अंत की ओर न बढ़ जाये.. मगर शायद राजीव जी और विवेकानंद जैसे महापुरुषों को इश्वर मनुष्यता के एक प्रेरणाश्रोत के रूप में हमारे बीच अल्पावधि के लिए भेजता है जिनके स्थापित उच्च आदर्शो और विचारों पर चलकर मानवता,धर्म ,देशभक्ति एवं समाज के पुनर्निर्माण की नीव रक्खी जानी है...राजीव भाई के स्वप्न एवं जनजागरण के अभियान को आगे बढ़ाने के लिए उनके अनुज भाई प्रदीप दीक्षित  ने बाबा रामदेव जी के आशीर्वाद से स्वदेशी भारत पीठम ट्रस्ट के माध्यम से पुनः आन्दोलन को आगे बढ़ाने का कार्य प्रारंभ किया है.. इसी कड़ी में राजीव भाई की कर्मस्थली वर्धा में, उनके जन्मदिवस और प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर  "स्वदेशी दिवस" समारोह  का आयोजन किया जा रहा है जिसमें देश के विभिन्न भागों से लगभग ४ से ५ हजार लोग उपस्थित होंगे..इसी सन्दर्भ में  प्रदीप दीक्षित जीका व्याख्यान ६ नवम्बर(रविवार) को नई दिल्ली में जनकपुरी स्थित आर्य समाज मंदिर में भाई अरुण अग्रवालजी के देखरेख एवं प्रबंधन  में संपन्न हुआ..
औपचारिक रूप से स्वदेशी भारत पीठम की ये पहली कार्यकारिणी बैठक भी थी जिसमें दिल्ली और पास के राज्यों से कुछ समर्पित कार्यकर्त्ता उपस्थित हुए एवं सेवाग्राम में होने वाले स्वदेशी मेले के आयोजन के सन्दर्भ में परिचर्चा की गयी...
आप सभी बंधुओं,माताओ एवं बहनों से अनुरोध है की "स्वदेशी दिवस" समारोह में वर्धा सेवाग्राम में उपस्थित  होकर अपने विचारो से अवगत कराएँ एवं राजीव भाई के स्वदेशी,स्वावलंबी भारत के कार्यक्रम में सहयोग करके राष्ट्रनिर्माण के पावन कार्य में सहयोग दे....
अधिक जानकारी के लिए आप  राजीव भाई की वेबसाइट  पर जा सकते हैं..



जय श्री राम....
हिंदी हिन्दू हिन्दुस्थान 



सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

अमेरिकी फंदे में दम तोड़ता पेट्रो राष्ट्रवाद और इश्लामिक स्तम्भ :



विगत दिनों एक खबर मीडिया में जोर शोर से आई की कर्नल मुअम्मर गद्दाफी  की उसी के देश के 
बिद्रोहियों ने निर्मम हत्या कर दी.दरअसल कर्नल मुअम्मर गद्दाफी की हत्या अमेरिकी और पश्चिमी देशो के आर्थिक अतिक्रमण की एक अगली कड़ी है.. जिसमे अमीरीकी कंपनियों का तेल का खेल अभीष्ट है..
अमरीका और उसके मित्र देशों  के इतिहास पर नजर डाले तो अपने आर्थिक साम्राज्यवाद एवं मंदी को दूर करने के लिए हर समय सुविधा के अनुसार सत्ताएं बनायीं और फिर उनसे समय समय पर युद्ध करके  अपना आधिपत्य साबित किया .. अगर विश्लेषण करे तो प्रथम एवं द्वितीय दोनों विश्व युद्ध का कारण आर्थिक था जो यूरोप और अमेरिका की आर्थिक मंदी को दूर करने के लिए किया गया...
सोवियत रूस के विघटन के बाद अमरीका की गिद्ध  दृष्टि भारत और तेल उत्पादक देशों पर लगी हुए है..इसी उद्देश्यपूर्ति के लिए उसने लादेन जैसा भस्मासुर पैदा किया..हुस्नी की मुबारक की सत्ता को समर्थन दिया..तो कभी सद्दाम हुसैन के साथ भी गलबहियां डाली...अब धीरे धीरे पेट्रो राष्ट्रवाद और इश्लामिक जेहाद की आँच अमेरिका के आर्थिक,सामरिक और सामाजिक हित झुलसने लगे तो अमेरिका ने अपनी पुरानी मक्कारी दिखाई .

अगर पिछले ३-४ उदाहरण  ले तो इश्लामिक जेहाद का चेहरा बन चुका ओसामा बिन लादेन इसी अमरीकी दिमाग की उपज था और जब अमेरिका की रूस को साधने के लिए बनायीं गयी इस जेहादी मिसाइल ने अपना रुख अमरीका की ओर ही कर लिया तो अमरीका ने अफगानिस्तान से युद्ध छेड़ दिया..ये भी एक इत्तफाक ही कहा जायेगा की इन सारे घटनाक्रम के बिच में यूरोप और अमेरिका में मंदी के बदल छाने लगे थे ..ओसामा बिन लादेन को मारने या ९/११ के जिम्मेदार लोगो के सफाए  लिए सीआईए और नाटो का एक सिमित ख़ुफ़िया आपरेशन ही काफी था मगर  अफगानिस्तान को युद्ध को १० साल से ज्यादा खिंचा गया..
और शायद इसमें कोई संशय नहीं की कुछ सालो बाद किसी विकिलीक्स के खुलासे में ये तथ्य सामने आये की कही पर्ल हार्बर की तरह अमरीका पर किया गया ९/११ का हमला भी अमरीका के सहयोग से ही जेहादियों ने रचा हो....
अगर हम देखें तो अमरीका के पिछलग्गू "NATORIOUS NATO" गठबंधन में अमरीका सबसे ज्यादा हथियार आपूर्ति करता है..और अमरीका की हथियार उद्योग से लगभग १०० से ज्यादा  छोटे बड़े उद्योग जुड़े हुए है..कहीं न कहीं इन युद्धों का लम्बा खीचना कम से कम अमरीका के लिए दोहरे फायदे का सौदा है तेल के खेल एवं वैश्विक राजनीती  में दादागिरी और घरेलू मोर्चे पर मंदी के असर को कम करने का फायदा..
ठीक इसी प्रकार सद्दाम हुसैन की हत्या करने के लिए इराक को तबाह करने या मासूम जनता पर बम गिराने की जरुरत नहीं थी मगर अमरीका ने अपने अजेंडे पर चले हुए ये किया..ध्यान रहे, ये वही सद्दाम हुसैन है जो कभी रोनाल्ड रीगन के लाडले हुआ करते थे,उस समय न ही संयुक्त राष्ट्र संघ और न ही दोगले चरित्र वाले अमरीका को इराक के जनसंहार या मानवाधिकार की सुध थी..अमरीका के सहयोग से इसी सद्दाम ने इरान पर भी हमला बोल दिया ..मगर जब से सद्दाम ने इराक में और  कुवैत के मामले में में अमरीकी हितो की अनदेखी करनी शुरू की इस इस्लामिक तानाशाह की उलटी गिनती शुरू हो गयी जो इराक में उनकी फाँसी पर ख़तम हुआ..
इसी प्रकार वो हुस्नी  मुबारक हो या मुअम्मर गद्दाफी इस्लाम के एक एक स्तंभों को अमरीका अपने व्यापारिक हितो के लिए ख़तम करता जा रहा है..या जो थोड़े बहुत बचे हैं उन्होंने सउदी अरब जैसा अमरीका का आधिपत्य स्वीकार कर लिया..अब शायद अमरीका के अगले निशाने पर इरान होगा जो की एकमात्र देश बचा है जो अमरीका का प्रतिरोध कर रहा है...
हालाँकि अमरीका ने जिन इश्लामिक तानाशाहों या जेहादियों को ठिकाने लगाया है चाहे वो सद्दाम हो या लादेन या गद्दाफी उनके नरसंहार और अत्यचारों की एक लम्बी फेरहिस्त है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता मगर इन अत्याचारों की सुध आज सालो बाद दुनिया में पेट्रोल के ख़तम होते भण्डारो के साथ ही अमरीका को आ रही है और विशेषतः उन देशों की जहाँ पेट्रोल की प्रचुरता है ये अमरीका की दोगली मानसिकता का परिचायक है..शायद गद्दाफी से क्रूर तानाशाह और भी मिल जायेंगे विश्व के कई देशों में मगर वहां का मानवाधिकार UN या अमरीका को नहीं दिखता क्यूकी वहां तेल के कुँए नहीं हैं...
हिन्दुस्थान के परिपेक्ष्य में देखें तो इन इश्लामिक दुर्गो का गिरना फिलहाल राहत देने वाला ही है चाहे लादेन हो या मुअम्मर गद्दाफी कोई भी भारत का मित्र नहीं रहा ...मुअम्मर गद्दाफी की कश्मीर पर नीति सर्वविदित थी..
अमरीका यदा कदा पाकिस्तान को कश्मीर में शह दे कर अपनी हथियार उद्योग को जीवित रखा है...वैसे भी हिन्दुस्थान में अमरीका को खुली लूट  की छूट अमरीकी  बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दे कर भारत सरकार ने  फिलहाल अपना गला अमरीकी फंदे से बचा रखा है..मगर इसमें कोई संशय नहीं की तेल का खेल ख़तम होने और सारे इश्लामिक स्तंभों  के सफाए के बाद अमरीका की दृष्टि भारत की और लगे..इसमें कोई आश्चर्य नहीं  यदि हिन्दुस्थान को कांग्रेसी लूट से छूट मिले और कोई राष्ट्रवादी नायक आगे आये तो अमरीका को कश्मीर और मणिपुर में मानवाधिकार हनन के दौरे आने लगे और हिन्दुस्थान को अरब नायको की तरह अमरीका जैसे कुटिल देश से दोस्ती की कीमत अफगानिस्तान या पाकिस्तान की तरह चुकानी पड़े....

रविवार, 7 अगस्त 2011

हिना रब्बानी खार का भारत दौरा या भारतीय बिदेशनीति का निकृष्ट आत्मसमर्पण..

पिछले दिनों पाकिस्तान की बिदेश मंत्री हिना रब्बानी खार की बिदेश यात्रा का बहुत धूम धड़का रहा भारतीय सत्ता के गलियारों  से लेकर मीडिया तक..हिना रब्बानी खार ये नाम पाकिस्तान की राजनीती में तब सुर्ख़ियों में आया जब इन्हें १९ जुलाई को पाकिस्तान का विदेश मंत्री बनाया गया..हिना पाकिस्तान की सबसे कम उम्र की बिदेश मंत्री बनने का गौरव प्राप्त है..अमेरिका से होटल मैनेजमेंट की पढाई करने वाली हिना पाकिस्तान के पंजाब के पूर्व गवर्नर गुलाम मुस्तफा खार की भतीजी है...हिना को अचानक जब पाकिस्तान में बिदेश मंत्री बनाया गया तो पाकिस्तान स्थानीय राजनीति में भी इसका विरोध हुआ की एक अनुभवहीन महिला को इतनी महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी कैसे दी जा सकती है...मगर उनके परिवार के राजनैतिक अनुभव का हवाला देकर हिना की ताजपोशी की गयी...ये भी अजीब संयोग है की बिदेशमंत्री बनने के तुरंत बाद हिना की हिन्दुस्थान यात्रा घोषित हो गयी..वर्तमान हालात में पाकिस्तान की राजनीति की बात करें तो महिलाएं राजनीति में अपने दमखम से कम ही आती हैं अपितु उनका वहां की सेना और सत्ता के प्रतिष्ठान अपनी सुविधा अनुसार मनोनयन करते हैं..शाह महमूद कुरैशी से फरवरी 2011 में विदेश मंत्रालय वापस लिए जाने के बाद पाकिस्तानी सेना को एक ऐसे चेहरे  की तलाश थी जो रिमोट कंट्रोल से पाकिस्तानी सेना द्वारा निर्धारित नीतियों को राजनयिक चोला ओढ़कर पड़ोस एवं बाकी दुनिया में फैलाये..खैर भारत में भी परिस्थितयां इतर नहीं है आज कल बस स्वरुप बदला है वहां की  बिदेशमंत्री सेना के मनोनयन पर मनोनीत हुई  थी तो हिन्दुस्थान का प्रधानमंत्री समेत समूचा मंत्रिमंडल एक बिदेशी  महिला के मनोनयन पर उसकी मर्जी के अनुसार कार्य कर रहा है.... 
अब जरा बात करें हिना के हिन्दुस्थान दौरे की तो भारत के इतिहास में विदेशनीति का इससे बड़ा मजाक आज तक नहीं हुआ होगा..पहले हमारे प्रधानमंत्री समेत समस्त नेतागण हर बम बिस्फोट के बाद ये कहते नजर आते हैं की पाकिस्तान से तब तक बातचीत नहीं होगी जब तक वो आतंवाद को बढ़ावा देना बंद नहीं करेगा...फिर जैसे ही अमेरिका मैडम के कान उमेठता है तो हमारे प्रधनमंत्री जी को भारत मिलाप की याद आने लगती है...
मैंने अपने एक पूर्व के लेख में लिखा था की पाकिस्तान में ये आम धारणा  है की भारत में मार काट मचाओ कुछ दिन बाद भारत खुद बी खुद बातचीत के लिए आगे आएगा..क्युकी अफगान पाक सीमा पर अमेरिका की दुखती राग पाकिस्तानी सेना के हाथ में है..
अब अगर दौरे की बात करें तो हिना के दौरे में भारत सरकार की ओर से सिर्फ ये कहा गया की अगर हो सके तो अलगाववादियों से न मिले..और हिना ने भारत में पांव रखते ही जैसे भारत सरकार  के मुहं पर तमाचा मारते हुए सारे कश्मीरी आतंकवादियों को भारत की सरकार से उच्च स्थान देते हुए नई दिल्ली में मुलाकात की...आखिर एक राजनयिक दौरे में आतंकवादियों से मिलने का क्या अर्थ  निकाला जा सकता है..शायद पहले ही दिन हिना ने अपने तेवर से बता दिया की उसका हिन्दुस्थान दौरे का मकसद कश्मीर के अलगाववादियों को समानांतर सरकार के बराबर मान्यता देना है जो की पाकिस्तानी सेना ओर आई  एस आई का खुला अजेंडा है पिछले ६० सालो से.. यासीन मालिक तो पाकिस्तान में मिल आया था मोहतरमा से अब बचे मीरवाइज उमर फारुख और सैयद अली गिलानी उन्होंने भारत में भारत विरोधी अजेंडे को मनमोहन सरकार की नाक  के निचे आगे बढाया..भारत की अमेरिकापरस्त सरकार की छीछालेदर देखिये की वो भारत में ही पाकिस्तान जैसे पिद्दे देश के कठपुतली अनुभवहीन बिदेशमंत्री की एक आतंकवादियों से मुलाकात तक नहीं रुकवा  पाई..ये देखकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का शर्म अल शेख में नाक कटवाने  वाली गलती याद आ गयी जब उन्होंने पाकिस्तान की मक्कारी और अमेरिका के दबाव में आ कर बलूचिस्तान में भारतीय हस्तक्षेप की बात मान ली थी..उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए पाक सेना की कठपुतली ने हिन्दुस्थान की रही सही बिदेशनीति का पिंडदान कर डाला...
हिना ने इसके बाद एक रटा रटाया वक्तव्य दिया की पुरानी बातों को भूलना होगा...और शायद नए हमलों के लिए तैयार रहना होगा...बातचीत में कहीं भी आतंवाद पर ठोस सहमती और आतंकी कैम्पों को पाक से हटाने के बारे में कोई सहमती नहीं बनी...और हिना ने जो थोड़ी बहत बातचीत की भी वो भी पाकिस्तान में ओसमा के मारे जाने के बाद बनते हुए पाक विरोधी माहौल पर पानी डालने का प्रयास मात्र है..
जब हमारे देश के हिजड़े  नेता और शासक हिना रब्बानी जैसे कॉल गर्ल के आवभगत में लगे थे और ये भांड मीडिया उसके पर्स और सेक्स सिम्बल की बात कर रही थी ठीक उसी समय  आतंकवादियों ने 20 कुमाऊं रेजिमेंट के दो जवानों की हत्या करके उनके सिर काट कर  अपने साथ पाकिस्तान ले गए ताकि अपनी क्रूरता एवं भारत सरकार की नपुंसकता पर जघन्य अट्टहास कर सके ...
सरकारी मशीनरी अगर अफजल और कसब को बिरयानी परोसते तो वो दिन दूर नहीं जब पाकिस्तानी हिन्दुस्थानियों का सर लाल किले पर लगायेंगे और प्रधानमंत्री मेडम मेडम गायेंगे...
 क्या विडंबना है की पाकिस्तान दौरे पर जाते समय हमारे अडवाणी जी जैसे राष्ट्रवादी जिन्ना के गुणगान गाते है मगर हिना रब्बानी जैसी कठपुतली यहाँ आ कर आजाद कश्मीर की हिमायत कर भारत को खंडित करने की बात करती है और नपुंसक सरकार आवभगत में लगी हुई  होती है..
मीडिया की बात करना निरर्थक  और हास्यास्पद है क्यूकी बिदेशी हाथो में बिकी हुए मीडिया से आप इतनी ही उम्मीद कर सकते हैं की वो हिना रब्बानी को बतौर माडल और सेक्स सिम्बल पेश करे और उनके कपड़ों से लेकर पर्स तक के मूल्य का विश्लेषण करे..हाँ अगर इन सबसे समय मिल जाये तो बाबा रामदेव की संपत्ति का गुणाभाग कर ले ...
पाकिस्तान की बिदेशनीति या यूँ कह ले राजनीति का निर्धारण वहाँ की सेना करती आई है ये सर्वविदित है..मगर विगत १० बर्षों की बात करें तो हिन्दुस्थान ने अपनी पूरी बिदेशनीति अमेरिका के यहाँ गिरवी रख दी है और अमेरिका की शह पर पाक आये दिनों बम फोड़कर हिन्दुस्थान की नपुंसक होती जा रही सरकार को उसके घर में घुसकर ललकारते हैं ..मगर शायद हमारी सरकर को कश्मीर और पाकिस्तानी आतंकवादियों पर कार्यवाही करने के तुलना में रामलीला मैदान में बेगुनाहों पर अत्याचार करना ज्यादा सहूलियत भरा कदम लगता है...शायद ये भी भारत की अमेरिका द्वारा संचालित नीति का एक हिस्सा हो जो इटली की माफिया के हाथों पूर्ण कराया जा रहा हो..

शनिवार, 9 जुलाई 2011

ट्रैफिक सिग्नल पर भीख मांगते २१वी सदी के भारत के कर्णधार

शिक्षा लेने की उम्र में भीख मांगने की मजबूरी



रोज घर से कार्यालय जाते समय दिल्ली के नारायण फ्लाईओवर के पास ५-७ मिनट का ट्रैफिक जाम सामान्य सी बात है..मगर एक और घटना रोज घटती है जिसे हमने रोज लगते ट्रैफिक   जाम की तरह स्वीकार कर लिया है..वो है,इन्ही सिगनलों पर भीख मांगते कुछ अवयस्क बच्चे..मेरी भी दिनचर्या में कुछ ऐसा ही था,एक आँखों ही आँखों में अनकहा सा रिश्ता बन गया था इन बच्चो से,रोज मेरी कार वहां रूकती, कुछ जाने पहचाने चेहरों में से एक चेहरा मेरी ओर आता और मैं वहां के कई लोगो की तरह पहले से ही निकाल के रक्खे गए कुछ सिक्कों में से १ या २ उन्हें देकर दानवीर बनने की छद्म आत्मसंतुष्टि लिए आगे बढ़ जाता..

व्यस्तता के कारण कई दिन बाद कार्यालय जाना हुआ ..मगर आज एक नए चेहरे ने उसी जगह आ के हाथ फैला दिया रोज की तरह मैंने गाड़ी शीशे निचे करते हुए १ रूपये का एक सिक्का उसकी और बढ़ा दिया मगर नए चेहरे को देखकर अनायास ही निकाल पड़ा "नया आया है क्या?"बच्चा मेरी और देखता हुआ बिना कोई जबाब दिए सिक्का लेकर आगे बढ़ गया...

सोमवार, 27 जून 2011

प्रणव वार रूम लीक- कांग्रेस में होता शक्ति विकेंद्रीकरण ???

कुछ दिनों से मीडिया में दबी जबान से वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के दफ्तर में की गयी जासूसी प्रकरण चर्चा में है...राजनैतिक गलियारों और सरकार के लिए भी ये घटना गले की हड्डी बनता प्रतीत हो रहा है... खबर ये हैं की च्युइंगम जैसी कोई  चीज वित्त मंत्री के कार्यालय में कई जगहों पर चिपकी पाई गयी..प्रणव दा ने इसकी शिकायत कुछ माह पूर्व प्रधानमंत्री से की और अपुष्ट ख़बरों के अनुसार उन्होंने  इशारों इशारों में माननीय गृहमंत्री चिदम्बरम जी को निशाने पर ले लिया इस जासूसी कांड के लिए..ये वही चिदम्बरम हैं जिन्हें दिग्विजय सिंह "घमंडी" होने तक का विशेषण दे चुके हैं..

अगर इसका राजनैतिक परिदृश्य में विश्लेषण करें तो ये जासूसी कांड से ऊपर १० जनपथ की सरकार पर ढीली पड़ती पकड़ की और भी इशारा करता है..अगर कांग्रेस का इतिहास देखें तो मुख्यतः यह एक परिवार केन्द्रित दल ही रहा है..जब जब किसी ने इस शक्ति के केन्द्रीकरण को तोड़ने की कोशिश की वो पार्टी विभाजन या उस व्यक्ति विशेष के प्राणाहुति के चरम तक भी पहुच गया...

उदाहरण में शरद पवार और पी ए संगमा है जिन्होंने गाँधी नेहरु परिवार का विरोध किया और परिणाम कांग्रेस विभाजन तक जा पहुंचा..इंदिरा जी के समय घूस लेकर आयत लाइसेंस के मुद्दे पर जब तत्कालीन इंदिरा सरकार के मंत्री ललितनारायण झा के इंदिरा जी के खिलाफ मुह खोलने का शक हुआ तो समस्तीपुर (बिहार) में उनको मंच समेत ही बम से उड़ा दिया गया...यह एक राजनैतिक हत्या थी मगर हर मामले की तरह इसे भी दबा दिया गया और शायद अब सामान्य ब्यक्ति को ये संज्ञान भी न हो.....

बात कांग्रेस में  सत्ता के विकेंद्रीकरण की हो  तो हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव जी ने इसमें सफल रूप से ५ सालो तक निर्बाध अभियान चलाया और पार्टी में अपनी जगह और अपनी जान दोनों बचाने में कामयाब हुए..हलाकि नरसिम्हाराव जी सोनिया की ही पसंद थे मगर सत्ता की बागडोर हाथ में आते ही उन्होंने सर्वप्रथम १० जनपथ के पर कतरने शुरू किये और यदा कदा राजीव जी के समय हुए घोटालों का डर दिखाकर १० जनपथ के रिमोट  कंट्रोल की बैटरी को मृत करने में विशेष योगदान दिया..हाँ विपक्ष के हो हल्ले के बाद भी राजीव गाँधी फाउन्डेसन को ८-१० करोण रूपये नरसिम्हाराव जी १० जनपथ के खर्चे के लिए दे दिया करते थे...

कालांतर में नरसिम्हाराव सरकार  के कारनामों के कारण गेंद एक बार फिर १० जनपथ के पाले में आई और २००४ में सोनिया गाँधी एक बड़ी राजनैतिक शक्ति के रूप में उभरी और वाम मोर्चे के सहयोग से सरकार बनाने और प्रधानमंत्री पद तक पहुचने का रास्ता खुल गया..उस समय सोनिया गाँधी ने बिदेशी मूल के उठते मुद्दे को शांत करने के लिए मनमोहन सिंह का चुनाव कर लिया..

खुद दौड़ से हट कर उन्होंने विपक्ष और खुद की पार्टी में मुखरित होते बिदेशी मूल के मुद्दे की हवा निकल दी ,त्याग का सन्देश भी जनता में गया और सबसे महत्त्वपूर्ण युवराज(राहुल गाँधी) की भविष्य में  महाराज(प्रधानमंत्री) बनने की दावेदारी का रास्ता साफ करा लिया...

चूकी नरसिम्हाराव जैसे राजनैतिक व्यक्ति को चुनकर एक बार सोनिया ने अपने हाथ जला लिए थे अतः उस गलती से सबक लेते हुए उन्होंने प्रणव मुखर्जी ,चिदंबरम और कई वरिष्ठ जनाधार वाले  कांग्रेसियों को ठिकाने लगते हुए लोकसभा का चुनाव भी न जीत पाने वाले अपेक्षाकृत गैर राजनैतिक व्यक्ति मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया..इससे मूल सत्ता पर गाँधी परिवार  का नियंत्रण बना रहा और सिखों को भी एक मानसिक संतुष्टि देने का प्रयास किया जो सिख दंगो के कांग्रेसी जख्म आज तक ले के घूम रहें हैं..

यूपीऐ-१ तक सब ठीक ठाक रहा...ये भी बात दीगर है की आज तक के हुए भारत के प्रधानमंत्रियों में अमेरिका के सबसे बड़े चहेते के रूप में माननीय मनमोहन सिंह जी उभरे हैं..यहाँ तक की अमेरिका के शरणागत होते हुए परमाणु संधि मुद्दे पर अपनी सरकार की भी बलि देने को तैयार हो गए...अब यूपीऐ-२ में कई समूह बन गए हैं एक अमेरिकापरस्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ,कपिल सिब्बल,चिदंबरम का ग्रुप दूसरा प्रणव दा का धडा जिसमें यदा कदा दिग्विजय सिंह चिदम्बरम जैसों को ठिकाने लगाने के लिए साथ हो लेते हैं..तो एक तरफ १० जनपथ है जो इस विवाद में सत्ता पर ढीली होती पकड़ से चिंतित है..उन्हें प्रणव में तारणहार भी दीखता है और उनका बढ़ता कद युवराज की ताजपोशी के आड़े भी आ रहा है तो दूसरी और प्रणव दा के दफ्तर की जासूसी को हरी झंडी दे दी जाती है...साथ ही साथ दिग्विजय जैसे स्वामिभक्त युवराज को प्रधानमंत्री बनाने का राग अलाप कर मनमोहन -चिदंबरम को ठिकाने लगा रहें हैं..इसी क्रम में उनका चिदंबरम को "घमंडी" बताने का वक्तव्य भी शामिल हो जाता है...

अब इस भेडचाल में सब अपने अपने रस्ते और निष्ठाओं के अनुसार मलाई खाने और स्वयं की सुविधा के अनुसार निर्णय लेने में लगे हैं...कभी ४ मंत्री मुह उठाये बाबा से मिन्नतें करने जातें जाते हैं..तो कोई होटल बुलाता है....तभी उनको ठिकाने लगाने के लिए दूसरा धडा उसी दिन निर्दोष लोगों पर लाठियां और गोली चलाने को हरी झंडी दे देता है..इन सबके बिच १० जनपथ अपने ही मंत्रियों के कुकर्मों से बचते हुए ये कहकर छुट्टियां मानाने चला जाता है की उसे इस घटना की जानकारी नहीं हुई..  आने के बाद सारी संगठनात्मक  मशीनरी युवराज को प्रधानमंत्री के रूप में लांच करने में झोंक दी जाती है की चुनाव के समय आदर्श से लेकर 2G , लोकपाल से रामदेव, कलमाड़ी से राजा या विभिन्न कुकर्मों का ठीकरा मनमोहन जी के सर पर फोड़कर सजास्वरुप नए प्रधानमत्री युवराज राहुल गाँधी के नाम का एलान कर देना...फिर वही पुनरावृत्ति की कोशिश सत्ता भी हाथ में, गाँधी परिवार विरोधी ठिकाने और जनता को नए युवराज से उम्मीद का झुनझुना....

इन सबके बिच अगर समय मिला तो जासूसी करा लेते हैं अपने मंत्रियों का ..ये एक सोचने का विषय है की अब वित्त मंत्रालय जैसे विभाग जासूसों की पहुच में हैं..क्या इसका कोई सम्बन्ध कालेधन से है??? क्या प्रणव मुखर्जी की इमानदार कोशिश पर कालेधन के पहरेदारों ने पहरा लगाया ?? या सरकार को कितने लाख करोण का चूना भ्रष्ट मंत्रियों ने लगाया इसकी जासूसी की जा रही थी...

यहाँ एक संभावना ये भी बनती है की ये जासूस बिक जाएँ और वो कागजात आई एस आई या  सी  आई ऐ के हत्थे लग जाये...कौन करा रहा है ये जासूसी ये यक्ष प्रश्न है??क्या कोई बिदेशी एजेंसी ,कोई बड़ा  कार्पोरेट , चिदम्बरम या स्वयं १० जनपथ....हिन्दुस्थान की जनता जबाब चाहती है....
बाबा का कालाधन खोजने वाली सरकार,तथाकथित बुद्धिजीवी , मीडिया सब खामोश है ,क्या प्रणव मुखर्जी के दफ्तर से मिलने वाली च्युइंगम पचा लिया सबने ..... क्या १० जनपथ की हरी झंडी मिलने का इंतजार हम तब तक करेंगे जब तक देश बिक न जाये???


रविवार, 19 जून 2011

जूही-इरफ़ान प्रेमकथा : ना जन्म का हो बंधन-2



मित्रों  जूही-इरफ़ान प्रेमकथा : ना जन्म का हो बंधन-१ में आप सभी ने पढ़ा की किस तरह  कुरान की पवित्र शिक्षा लेने आया हुआ एक युवक अपने प्रेमजाल में एक युवती जूही को फंसा कर उसका शारीरिक और मानसिक शोषण करता है....प्रस्तुत है आगे की कथा..

अचानक जूही की नींद खुली तो ८ बज चके थे उसके बगल में असलम सोया हुआ था..स्तब्ध जूही ने अपने फर्श पर बिखरे कपड़ों में अपना तार तार होते चरित्र और व्यक्तित्व  की परिकल्पना कर ली और बिस्तर पर  फैला खून आंसुओं की शक्ल में अब आने वाले जीवन की एक भयावह कहानी लिखने वाला था....

अपने अस्तव्यस्त कपड़ों को समेटते हुए जूही बेसुध कर्तव्यविमूढ  सी एकटक छत की और देखे जा रही थी...आहट से असलम भी उठ गया..
जूही मुझे माफ़ कर दो अल्लाह की कसम मैंने ऐसा जानबूझ कर नहीं किया,पता नहीं कैसे मैं अपनी भावनाओं पर काबू नहीं कर पाया और ये सब हो गया..." इरफ़ान ने जूही के कंधे पर अपना हाथ रखते हुए कहा"
मुझे मत छुओ तुम्हारी हवस पूरी हो चुकी है,इसको भावनाओं का नाम दे कर मुझे झांसे में मत रखो...तुमने मुझे कही  मुह दिखाने लायक नहीं छोड़ा, इस जिन्दगी से अच्छा मैं अभी अपनी जान दे दूंगी ...मुझे जीना नहीं है....."ये कहते हुए जूही फफक फफक कर रो पड़ी"..
इससे पहले असलम अपनी अगली चाल चलता जूही अपने घर की और जा चुकी थी..जैसे जैसे जूही घर की और पहुच रही थी उसकी अंतरात्मा और मस्तिष्क में द्वन्द चाल रहा था की घर तक जाऊ या यही कहीं अपनी जान दे दूँ ...फिर उसका खुद से सवाल ..मेरे मरने के बाद माँ का क्या??कितनी बदनामी होगी??छोटी बहन बीमार है उसकी शादी नहीं होगी इतनी बदनामी के बाद.इसी उधेड़बुन में कब घर आ गया उसे पता नहीं चला..
कहाँ इतनी देर लगा दी बेटी घर में सब परेशान हैं.." हरप्रीत  आंटी की आवाज से जूही थोडा संयत हुई".

कही नहीं मम्मी पार्लर में मेरी सहेली मिल गयी थी निशा उसके साथ बाज़ार चली गयी थी....." जूही ने अपनी माँ से बिना नजरे मिलाये उत्तर देते हुए अपने कमरे का रुख किया"
रात में नींद जूही की आँखों से कोसो दूर थी..बार बार उसे अपने मुर्खता पर पछतावा हो रहा था की वो असलम के घर क्यों गयी??  जैसे तैसे जूही ने खुद को समझा लिया की वो इस बात को जीवन का एक बुरा अध्याय मान कर भूल  जाएगी.. धीरे धीरे लगभग १ माह बीतने को आये..धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो रहा था मगर  असलम बिच बिच में एस एम एस द्वारा जूही से मिन्नतें और माफ़ी मांगता रहता था अपने कुकृत्य के लिए...
आज सुबह अचानक भोर में जूही की तबियत ख़राब हो गयी..उल्टियाँ आता देख हरप्रीत   आंटी उसे रेगुलर चेक अप के लिए पास के आर्मी अस्पताल में ले गयी....शाम को रिपोर्ट देखते ही घर में कोहराम मच गया ...जूही पेट से है...
बता बेटी अब में इस समाज में खुद तुम्हे या तेरी छोटी बहन को कहाँ ले कर जाऊ..कौन रिश्ता करेगा तुझसे तेरी बहन से ..आखिर हमारी परवरिश में क्या कमी रह गयी थी जो तुने ऐसा किया...आदि आदि उलाहने  देते हुए हरप्रीत    आंटी दिवार पर सर पटक कर रोये जा रही थीं ...
आखिर कर जूही के सब्र का बांध भी टूट गया ..बिलखते हुए उस दिन की ब्यथा कथा और इरफ़ान के किये गए कुकर्मों को उसने हरप्रीत  आंटी से बताया...
खैर अब बारी थी इस विपत्ति से बाहर आने की तो हरप्रीत आंटी ने सादिक मियां के घर जा के चर्चा करने का प्रयास किया...सादिक मियां एक समाधान और साथ में शर्त रख दी की..असलम और जूही का निकाह करा देते हैं मगर उससे पहले आप सभी को इश्लाम धर्म स्वीकार करना होगा...अब हरप्रीत आंटी असमंजस में ,,
हाथ जोड़ते हुए उन्होंने असलम से कहा बेटा अब हमारी इज्ज़त तुम्हारे निर्णय पर है..इश्लाम स्वीकार कर  के मैं अपनी छोटी बेटी का भविष्य अंधकार में नहीं डाल सकती..तुम्ही कुछ बोलो..    
असलम ने नजरे जमीन में गडाए हुए कहा .." में सादिक भाई जैसा कह रहे हैं वैसा ही करूँगा बाकि आप खुद फैसला कर लें की आप को क्या करना है..."

हरप्रीत  आंटी अश्रुपूरित नैनो के साथ सादिक मियां के घर से वापस आ गयी...घर आ कर उन्होंने जूही के गर्भपात का एक कठिन फैसला लिया..इसके लिए उन्होंने जूही को पास के शहर में रहने वाली अपनी एक विश्वस्त सहेली के यहाँ भेज दिया... 
हॉस्पिटल पहुच कर जूही जब बेड पर लेटी तो उसे  उसे सामने दीवार पर लगा एक पोस्टर दिखा जिसमें लिखा था "माँ मेरा कसूर क्या है जो तुम मुझे मार रही हो".......


शायद इन पंक्तियों ने जूही की मातृत्व को जागृत कर दिया और उसने भ्रूण हत्या न करने का निर्णय किया  और वो चुपचाप हॉस्पिटल से बाहर आ गयी.....
बाहर आ के उसने असलम को फ़ोन किया " असलम ,मुझे मेरे अपने जीवन से कोई लगाव नहीं मगर  मैं अपने गर्भ में पल रहे इस बच्चे को नहीं मर सकती..तुम्ही कोई रास्ता बताओ"
असलम ने फिर सादिक भाई का पुरे परिवार का इश्लाम स्वीकार करने का टेप जूही को सुना दिया...फिर थोड़ी न नुकुर के बाद असलम ने एक सुझाव दिया..

" जूही चलो हम भाग के निकाह कर लेते हैं ,मेरा एक खास दोस्त है लाहौर में वो सब व्यवस्था  कर देगा नेपाल के रस्ते हम पाकिस्तान जा के अपनी एक अलग दुनिया बसा लेंगे...और तुम्हारी माँ और बहन को भी धर्म परिवर्तन नहीं करना पड़ेगा..सादिक भाई भी बिच में नहीं आयेंगे तब….
जैसे व्यक्ति एक बार दलदल में फस जाये तो जितना ही हाथ पैर मारता है उतना ही दलदल में फसता चला जाता है कही जूही उसी राह पर तो नहीं थी??..हलाकि एक ऐसे व्यक्ति के विश्वास पर, अपना आने वाला जीवन समर्पित कर देना, जिसने धोखे से अपनी वासना तृप्ति के भावनाओं का सहारा लिया हो ,बहुत मुश्किल था मगर जूही के पास इस मुसीबत से बचने और परिवार को बचाने का सिर्फ यही एकमात्र रास्ता नजर आया.और उसने असलम को इस बात के लिए दुखी मन से हाँ कर दिया..
अगले दिन जूही और असलम का एक-एक पत्र मिला अपने अपने घरों में और जूही असलम निकल पड़े नेपाल के लिए .नेपाल पहुच कर जूही असलम ने निकाह रचाया और अब जूही बन चुकी थी जमीला बेगम. 
लगभग १० दिनों बाद असलम और जमीला (जूही) के नाम का पासपोर्ट आ चूका था और लाहौर  के पास एक छोटे से कस्बे में चले गए....वहां पर पहले से ही सारी व्यवस्था देख कर जमीला (जूही) ने असलम से पूछा की 
क्या ये सब तुम्हारे  दोस्त का है ?? 
असलम ने बताया की उसे यहीं  एक सिक्यूरिटी कम्पनी में नौकरी मिल गयी है और ये मकान भी कंपनी में दिया है...हलाकि वो इस प्रश्न को टाल गया की पाकिस्तान आते आते ही उसे नौकरी और मकान कैसे मिल गया"
समय बीतता गया जमीला (जूही) को जुड़वाँ बच्चे पैदा हुए दोनों बेटे नाम अनिश और अब्दुल ...समय बीतते बीतते असलम के जमीला (जूही) के प्रति व्यवहार में परिवर्तन आने लगा...हद एक दिन तब हो गयी जब स्थानीय बम विस्फोट में असलम का नाम आया और पुलिस उसे पूछते  हुए आई..जब जमीला (जूही) ने असलम से ज्यादा जानने की कोशिश  की तो असलम ने हर बार की तरह जमीला (जूही) की पिटाई कर दी..किनारे पड़े बच्चे जमीला (जूही) के साथ रोये जा रहे थे और असलम पाकिस्तान से बाहर जाने का प्रबंध करने लगा..अब तक ये बात साफ हो चुकी थी की असलम एक कट्टर स्थानीय इस्लामिक ग्रुप के लिए कम करता था जिसका काम आतंक की फसल तैयार करना था..
जैसे तैसे असलम जमीला (जूही) को लेकर नेपाल के रस्ते पुनः भारत आया और ४ साल बाद पुनः सादिक मियां के के घर के सामने ...सादिक मियां जो अब तक असलम की कारस्तानियों के बारे में जान चुके थे उन्होंने पहले ही असलम को अपने घर में शरण देने से मना कर दिया..थक हार कर असलम मिया को हरप्रीत   आंटी की याद आई और असलम मिया जमीला (जूही),और अपने दो बच्चों के ले कर हरप्रीत  आंटी के घर पर..

कांपते हाथो से जमीला (जूही) ने घंटी बजायी....दरवाजा खुलते ही अपनी माँ  और छोटी बहन जसलीन को ४ साल बाद देख  जमीला (जूही) उनसे लिपट कर फूट फूट कर रो पड़ी.. हरप्रीत आंटी आखिर थी तो उसकी माँ ..पूरी राम कहानी सुनने के बाद उन्होंने अपनी बेटी दामाद को अपने घर में रहने की इजाजत दे दी कम से कम बेटी आँख के सामने तो रहेगी....असलम को भी जसलीन आंटी ने समझाया की तुम्हारा भारत में कोई आपराधिक रिकार्ड तो है नहीं तो यही कहीं कोई काम शुरू कर लो.. असलम मियां ने भी एक दुकान खोल ली पास में ही और समयचक्र चलता रहा...अब हरप्रीत  आंटी के घर से पूजा की घंटियों की जगह अजान एवं नमाज के सुर आने लगे..नियति का लिखा मान कर हरप्रीत आंटी ने इसे स्वीकार कर लिया था....

जैसा की पहले हमने पढ़ा था जसलीन को एक बीमारी थी जिसे डाक्टर "मार्टिन बेल सिंड्रोम" कहते है..मतलब शारीरिक आयु से मानसिक आयु का कम होना..अब जसलीन १९ की हो चुकी थी मगर उसका व्यवहार १३ साल की बच्ची जैसा था ...असलम मिया कभी कभी जसलीन हो हास्पिटल ले कर जाते उसके इलाज के लिए .साथ साथ घर में रहने कारण धीरे धीरे असलम ,जमीला (जूही)  एवं उसके दो बच्चों के साथ जसलीन घुल मिल गयी थी..मगर कुछ दिनों से जमीला (जूही)  को असलम के व्यवहार में परिवर्तन लगने लगा वो अब जमीला (जूही) को ज्यादा समय देने लगा था, कुछ तोहफे भी ला कर देता था साथ ही साथ जसलीन को उसके मनपसंद खिलौने क्यूकी जसलीन की उम्र भले ही १९ साल थी मानसिक रूप से उसकी उम्र खिलौने लायक ही थी.. 
एक दिन असलम दुकान से जल्दी आ गया हरप्रीत आंटी और जमीला (जूही) बाज़ार के लिए जा रही थी जाते जाते दोनों बच्चों और जसलीन का ख्याल रखने के लिए असलम मियां को बोल गयी...शायद फिर अनहोनी दस्तक दे रही थी जमीला (जूही) के जीवन में ...जसलीन को घर में अकेली देख असलम के अन्दर का छुपा हुआ वासना का शैतान  फिर जग गया और जसलीन की बीमारी ने असलम का काम और आसान कर दिया और असलम की हवस का शिकार एक मानसिक रूप से कमजोर बच्ची जसलीन बन गयी....असलम ने साक्ष्य मिटने की भरपूर कोशिश भी की मगर चुकी जसलीन मानसिक रूप से बच्ची ही थी उसने घर आते ही सारी बात अपनी बहन जमीला (जूही)  से बता दिया.. जमीला (जूही)  स्तब्ध हो कर जसलीन के अस्तित्व को चीथड़े चीथड़े होने की कहानी उसके ही बालमन से सुने जा रही थी मगर उसने संयत होते हुए इसका जिक्र किसी से न करने की हिदायत देते हुए अपने कमरे में बच्चों के साथ चली गयी....रात को खाना खाते समय असलम के हाव  भाव देख कर किसी को भी ऐसा नहीं लग रहा था असलम मियां ने इतने निकृष्ट कोटि का कृत्य किया होगा. रात को सोते समय अचानक ही असलम ,जमीला (जूही)  को  बहुविवाह की खूबियाँ बताते बताते सो गया...मगर जमीला (जूही)  ने ये जाहिर नहीं होने दिया की उसे असलम के इस कुकृत्य की खबर है...
रात को अचानक जमीला (जूही)  के कमरे से बच्चों के रोने एवं चीखने की जोर जोर से आवाजें आने लगी...हरप्रीत आंटी भागी भागी  कमरे की और दौड़ी......बड़ा ही वीभत्स दृश्य ...

असलम  के पुरे शारीर पर पेट्रोल डाल कर जमीला (जूही)  ने उसे जिन्दा जला दिया था, वो एक तरफ तड़फ रहा था..जमीला (जूही)  ने अपनी नस काट कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली थी, दोनों बच्चे जमीला के  पास उसके खून में सने हुए चिल्ला रहे थे.. हरप्रीत आंटी बेहोश पड़ी थी और जसलीन का बालमन अब भी इस घटना को समझने की कोशिश कर रहा था .....

लव  जेहाद का बम फट चुका था.. लव जेहादी की शहादत ब्यर्थ नहीं गयी एक पूरा परिवार लव जेहाद का शिकार हो चुका था ....