बुधवार, 20 जुलाई 2016

सिकंदर(Alexander‬ ‪)- विश्वविजेता या एक पराजित लुटेरा शासक ? Part-2

सिकंदर के भारत में विजय और पोरस को पराजित करने की जो झूठ गाथा कांग्रेस पोषित कम्युनिष्ट इतिहासकारों ने लिखी थी उसको सिकंदर के समसामयिक ग्रीक और रोमन इतिहासकारों ने ही झुठला दिया..इसी सन्दर्भ में सिकंदर की पराजय पोस्ट की पहली कड़ी ,मैंने कुछ दिन पहले पोस्ट की थी उसे आप इस लिंक पर http://goo.gl/UO8hkG पढ़ सकते हैं..अब आगे बढ़ते हैं,
तक्षशिला नरेश आम्भी से सिकन्दर की पुरानी मित्रता और पोरस से शत्रुता का झूठ : तक्षशिला नरेश आम्भी का चित्रण वामपंथी कम्युनिष्ट इतिहासकारों ने इस प्रकार किया है की उसका पोरस से बैर था और इसी कारण सिकंदर के साथ वह जा मिला. और सिन्धु नदी आसानी से पार कर गया, अब यूनानी लेखक कर्टियस(curtius Quintus) के अनुसार तक्षशिला नरेश आम्भी और सिकंदर की पहली वार्ता इस प्रकार थी
●●“what occasion is there for wars between you and me ,if you are not come to take from us our
water and other necessaries of life; the only thing reasonable men will take up arms for? As to gold and silver and other possessions, if I am richer than you, I am willing to oblige you with part; If I am poor, I had no objection to sharing in your booty.’’ (Plutarch, Page no 20)●●

मतलब आम्भी ने कहा की यदि तुम हमारा अन्न जल छिनने के लिए नहीं आये हो,जिसके लिए युद्ध हुआ करते हैं तो हम क्यू लड़ें??और यदि तुम्हे सोना,चांदी या धन की इच्छा से आये हो और मानते हो की मैं तुमसे ज्यादा धनी हूँ तो मैं इसका एक हिस्सा देकर तुम पर एहसान करना चाहूँगा और यदि तुम्हे ऐसा लगता है की तुम धनी हो तो, तो तुम्हारे लूटे हुए धन में से लेने में मुझे संकोच नहीं है.

इतना सुनने के बाद कोई नहीं कह सकता की इनमे मित्रता रही होगी और कोई स्वाभिमानी विजेता रहता तो तक्षशिला नरेश आम्भी का सर काट देता या स्वयं डूब मरता मगर ऐसा नहीं हुआ और किसी स्वार्थवश इन दोनों को मित्रता यहाँ हो गयी. मित्रता क्यू हुई इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है न तो रोमन न ही यूनानी न ही भारतीय इतिहास में इसका विवरण उपलब्ध है. परन्तु यहाँ उस एक झूठ से पर्दा अवश्य उठ जाता है जो कांग्रेस पोषित कम्युनिष्ट इतिहासकारों ने फैलाया है की तक्षशिला नरेश आम्भी से सिकन्दर की पुरानी मित्रता और पोरस से शत्रुता थी..
सिकंदर ने विभिन्न राजाओं के पास अपनी अधीनता स्वीकार करने हेतु दूत भेजे..पोरस ने सिकंदर के दूत से कहवा भेजा कि, सिकंदर से अब मुलाकात युद्ध के मैदान में ही होगी.और उसने झेलम किनारे अपनी सेना को तैयार रहने को कहा ..पोरस का पडोसी अभिसार नरेश था जिससे पोरस की मित्रता थी और इन दोनों ने साथ मिलकर कई राज्यों को जीता था. अभिसार नरेश की रिश्तेदारी उन अश्वको से भी थी जिन्होंने सर्वप्रथम सिकंदर की सेना को 9 माह रोके रक्खा था .उन्होंने “ओनस(Aornus)” दुर्ग पर सिकंदर के अधिकार के बाद कई अश्वाकों को अपने राज्य में शरण भी दी थी. अतः अभिसार नरेश अनिर्णय में थे की सिकंदर का साथ दें या पुराने मित्र पोरस का...अतः उन्होंने सिकंदर के भेजे गए दूत को बंदी बना लिया जिससे की सिकंदर को सही स्थिति पता न चले और वो स्वयं पोरस से मिलने की तैयारी में लग गए . सिकंदर को अभिसार नरेश की इस चाल का आभास हो गया और वो अपने नए नए बने मित्र तक्षशिला नरेश आम्भी के साथ दोनों सेनाओ को लेकर झेलम किनारे पोरस से युद्ध करने चले आये और इस युद्ध में पोरस अकेला रह गया था .पोरस की सेना झेलम किनारे कडीग्राम के पास थी और वहां शत्रु की हलचल देख रही थी.झेलम में बाढ़ थी नदी की विकराल बाढ़ को देखकर नदी पार करना असंभव था .
इस पस्थिति में सिकन्दर की मनोदशा का वर्णन निम्न दो वक्तव्यों से हो जाता है.

●विसेंट स्मिथ के शब्दों में “ सिकंदर भारतीय सेना का संगठन देखकर वहीं ढीला पड गया.”
●सिकन्दर पर लिखने वाले यूनानी इतिहासकार एरियन के शब्दों में “सिकंदर ने वहां से चोरी छिपे हटने का निर्णय किया"

●●It was clear to Alexander that he could not effect the crossing at the point where Porus held the opposite bank, for his troops would be attacked as they tried to gain the shore, by a powerful and efficient army, well equipped and supported by a large number of elephants, moreover, he thought it likely that his horse, in face of an immediate attack by elephants, would be too much scared by the appearance of these beasts and their unfamiliar trumpetings to be induced to land-indeed, they would probably refuse to stay on the floats, and at the mere sight of the elephant in the distance would go mad with terror and plunge into the water long before they reached the further side.

अब यूनानी इतिहासकार एरियन को पढ़कर स्पष्ट है की सिकंदर पोरस की सेना और हाथियों को देखकर भयभीत हो गया था और उसे डर था की ये हाथी उसके घोड़ो और पैदल सैनिको को नदी में ही डूबा डूबा कर मार डालेंगे.ये देखकर सिकंदर ने ये प्रचार करवा दिया की वो कम से कम 6 माह तक झेलम किनारे रुकेगा और इस बात को सत्य सिद्ध करने के लिए कई सैनिको को घोड़ो का चारा लाने को भेज दिया. इस बीच उसने नदी का कई जगहों से मुआयना करने के बाद लगभग 6-7 सप्ताह में नदी पार करने लायक एक किनारा खोज निकाला जो की 16 मील उत्तर की ओर नदी के जंगलो से घिरे एक टापू के समीप था . अब उसने क्रेटस नाम के अधिकारी को तक्षशिला की 5000 सेना देकर वर्तमान कैम्प की निगरानी करने को कहा और छिपकर नदी पार करने वाली जगह पर सैनिको को तैनात करके स्वयं नदी पार करने को निकला सेना को आदेश था की जैसे ही सिकंदर नदी पार कर जाये नदी पार करने वाली जगह के सैनिक पीछे से पोरस के सैनिको पर हमला करे और पहले कैम्प की सेना मुख्य आक्रमण के समय उसका साथ दे. उस रात भीषण वर्षा और तूफ़ान के कारण सिकंदर के नदी पार करने की गतिविधि का ज्ञान पोरस की सेना को नहीं हो पाया और सिकंदर नदी पार कर गया.. सिकंदर का दुर्भाग्य ये था की नदी पार करके वो सही जगह न पहुच कर एक टापू पर पहुच गया और सवेरा होते ही पोरस के सैनिको को उसकी चाल का पता लगा गया और जब सिकंदर कड़ी के मैदान में पंहुचा तो सामने पोरस के सैनिको से सामना हुआ .

अगले भाग में महाराजा पोरस के पुत्र के साथ हुआ कडी के मैदान का युद्ध जिसमें सिकंदर की सेना की पोरस के सेना के हाथियों ने धज्जियाँ उड़ा दी और सिकंदर का घोडा मार गया और सिकन्दर बुरी तरह घायल हो गया..

आशुतोष की कलम से

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

सिकंदर(Alexander‬ ‪)- विश्वविजेता या एक पराजित लुटेरा शासक ? Part-1

बचपन में आप सब ने पढ़ा होगा की जब सिकंदर और राजा पोरस का युद्ध हुआ तो पोरस हार गया और सिकंदर के सामने पकड़ के लाया गया .जब सिकंदर ने पूछा की पोरस तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया जाये तो पोरस ने कहा जैसा की एक राजा को एक राज के साथ करना चाहिए और सिकंदर ने पोरस को मुक्त कर दिया.. 
क्या आप ने कभी सोचा है की सिकंदर जैसे राजा से ये उम्मीद रखना की वो बंदी बना के लाये गए राजा पोरस को,जिसने कभी उसके सामने आत्मसमर्पण नहीं किया, को इतनी आसानी से छोड़ देगा या पोरस जैसा वीर खुद लड़ते लड़ते बलिदान होने के स्थान पर खुद को बंदी बनाने के लिए प्रस्तुत करेगा ? दरअसल इन प्रश्नों पर कभी हमने विचार करने की आवश्यकता नहीं समझी क्यूकी भारतीय संस्कृति के विरोधी वामपंथी इतिहासकार अंग्रेजो के समय से नेहरूकाल हर समय पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से हमे अप्रमाणिक भारतीय संस्कृति विरोधी घुट्टी किताबो,पाठ्यक्रम एवं पूर्वनिर्धारित शोधों के माध्यम से पिलाते रहे और तार्किक साहित्य एवं इतिहास के आभाव में हम आजदी के बाद भी कुटिल वामपंथी भारतीय संस्कृति विरोधी इतिहास को पढ़ते रहे और आने वाले पीढ़ियों को स्थानांतरित करते गए. यथार्थ ये है की सिकंदर एक बर्बर राजा था जिसके विश्व विजय का स्वप्न भारत में आ के पोरस से युद्ध के बाद ख़त्म हो गया और सिकंदर उस युद्ध में बुरी तरह पराजित हुआ. यूनानी इतिहासकारों ने झूठ फैलाया की सिकंदर पोरस से जीता और यूरोप के अविकसित लोग जिनके सामने भारत की तुलना में अर्धविकसित यूनानी सभ्यता(तब तक ये लोग भारतीय सभ्यता से अनजान थे) सबसे महान थी,उन्होंने इसे आंख मूंद कर स्वीकार कर लिया फिर अंग्रेजो से ये झूठ भारत में मैकाले पद्धति से आया फिर उसी इतिहास को पाश्चात्य नेहरूवादी सोच और भारतीय संस्कृति विरोधी वामपंथियों ने हमारे सामने परोस दिया. इससे पहले विषय पर लौटूं आप सब से ये साझा करना चाहता हूँ इस लेख को लिखने की प्रेरणा मुझे इतिहास कर गंगाराम सम्राट की पुस्तक सिकंदर की पराजय को पढने के बाद मिली जिसमे तथ्यों को बहुत ही तार्किक ढंग से रखा गया है और उन्ही सन्दर्भों को अपेक्षाकृत सरल भाषा में आप के सामने रखने का प्रयास कर रहा हूँ.
इससे पहले भारत युद्ध के बारे में जाने सिकंदर एवं उसके राज्य का संक्षेप में इतिहास जान लेना होगा. ईसा पूर्व छठी शताब्दी से ईसा पूर्व चौथी शताब्दी तक ईरान के विभिन्न शासकों ने आक्रमण कर के यूरोप के विभिन्न हिस्सों तथा मिस्र पर अधिकार कर लिया था. कालांतर में इनकी आने वाली पीढ़ियों ने यूनान (greece) पर भी अधिकार का प्रयास किया एथेंस को कब्जे में ले लिया मगर कुछ समय बात जब इनकी शक्ति घटी तो ये यूनान एवं यूरोप के विभिन्न हिस्सों में अप्रभावी होते चले गए. ईरान से मुक्त हुए यूरोप के ये हिस्से आपस में ही उलझने लगे और ईरान बाहर से धन भेजकर इनमे युद्ध करवाता रहा. इन्ही में से एक क्षेत्र था “मेसीडोन्या” . ईसा से चार शताब्दी पूर्व यहाँ का शासक “फिलिप” बना और इसने थोड़े ही समय में “मेसीडोन्या” को शक्तिशाली बना दिया और यूरोप के अन्य छोटे छोटे राज्य इसके नेतृत्त्व में आ गए. अभी वह ईरान पर कब्जे को सोच ही रहा था की अचानक “फिलिप” की मृत्यु हो गयी . उसके मृत्यु के सन्दर्भ में आगे तथ्य देखें जायेंगे संभवतः वह अपनी स्त्री की कृपा के कारण धोखे से मारा गया .
“फिलिप” की मृत्यु के बाद 326 ईसा पूर्व में उसका पुत्र अलेक्जेंडर(सिकंदर) “मेसीडोन्या का शासक बना. उसे उत्तराधिकार में एक शक्तिशाली राज्य शक्तिशाली सेना प्राप्त हुई . कुछ समय पश्चात अलेक्जेंडर(सिकंदर) ने अपने पिता के राह पर चलते हुए इरान पर हमला किया और इरान के अपेक्षाकृत कमजोर हो चुके शासक दारा को हरा कर कुछ वर्षों में इरान पर कब्ज़ा कर लिया. इरान के बाद विश्वविजय अभियान का स्वपन देखने वाले अलेक्जेंडर (सिकंदर) ने भारत की ओर अपना रुख किया.
खैर अब विषय पर वापस लौटते हैं की सिकंदर की विजय हुई या पराजय या क्या पोरस सिकंदर से हारा था ? इसके लिए कई आधुनिक भारतीय राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने तथ्य दिए हैं मगर मैकाले के मानस पुत्र इसे ये कह के नकार देंगे की राष्ट्रवाद की भावना से लिखे इतिहास में पोरस की जीत जबरिया सिद्ध की जा रही है. अतः मैंने प्रयास किया है सिकंदर के बारे में लिखने वाले यूनानी और रोमन इतिहासकारों के ही लिखे तथाकथित ग्रंथों से तथ्य ले के ये साबित किया जाए की पोरस,सिकंदर से हारा नहीं था. खैर इस लेख का उद्देश्य ये नहीं की हम ये साबित कर दें की सिकंदर को हमने हरा दिया,प्रमुख उद्देश्य ये है की जो पोरस के हार का झूठ फैलाया गया है उसका तार्किक खंडन हो जाये . सिकंदर जीता या हारा इस पर इस लेख को केन्द्रित करने के स्थान पर मैंने इस लेख में प्रयास किया है ये सिद्ध करने का की “पोरस सिकंदर से नहीं हारा था ”
एक विचित्र तथ्य ये भी है की यदि भारत के परिप्रेक्ष्य में ये युद्ध इतना महत्त्वपूर्ण और बड़ा था तो इसका कोई भारतीय उल्लेख नहीं मिलता है. यूरोपियन लोगो ने भी इन्ही इतिहासकारों के कथन के आधार पर सिकंदर को विजेता घोषित कर दिया. ये तथाकथित इतिहासकार/कहानी लेखक हैं ,
●एरियन(Arrian),
●जस्टिन (justin),
●कर्टियस(curtius Quintus),
●डायोडोरस(Diodorus),
●प्लूटार्क(plutrach).
इनमे से कर्टियस(curtius Quintus) रोमन है बाकी सब यूनानी हैं. एक तथ्य ये भी है की इनमे से कोई भी लेखक सिकंदर का समकालीन लेखक नहीं था.
सिकन्दर के आक्रमण का पहला चरण अश्वको से युद्ध : सिकन्दर ने जब भारत पर आक्रमण किया तो उसका पहला सामना “अश्वक” नामक क्षत्रियों से हुआ जो हिन्दुकुश तथा सिन्धु नदी के मध्य वाले प्रदेश में रहते थे. सिकंदर की गाथा गाने वाले यूनानी इतिहासकारों ने इसे ‘अस्पोई’ (ASSACNI) कहा है. ये लोग पोरस जैसे राजाओं की अपेक्षा कमजोर थे फिर भी इन्होने सिकंदर की सेनाओं को वीरता पूर्वक रोक दिया और लगभग 9 माह तक यहाँ युद्ध रुक रुक कर चलता रहा. सिकंदर ने यहाँ ये खुबसूरत गांवों को तहस नहस कर डाला और नागरिको स्त्रियों बच्चों की हत्याएं की.. नागरिको पर अमानुषिक बर्बर अत्याचार के कारण सिकन्दर के प्रति लोगो की भावना, विद्रोही बन गयी. सिकंदर का अश्वाकों से अंतिम मुकाबला सिन्धु के समीप “ओनस(Aornus)” के दुर्ग में हुआ. सिकंदर की सेना दुर्ग के साथ साथ गांवों में घुसकर भी मारकाट कर रही थी और अश्वक इससे निपटने में असमर्थ थे अतः उन्होंने दुर्ग छोड़ दिया और पहाड़ो में चले गए और सिकंदर ने दुर्ग पर विजय प्राप्त कर ली.
रोमन लेखक कर्टियस के शब्दों में “सिकंदर ने दुर्ग पर विजय प्राप्त की शत्रु पर नहीं”
ओनस(Aornus)के दुर्ग को सिकंदर ने अपने विश्वासपात्र शाशिगुप्त को सौंप दिया जो अफगान राजवंश का था और सिकंदर-पारसी युद्ध में बक्ट्रिया(bactria) में सिकंदर के खिलाफ लड़ा था और सिकंदर की विजय होता देख उससे जा मिला.
लेख के अगले(दूसरे) भाग में तक्षशिला नरेश आम्भी से सिकन्दर की पुरानी मित्रता और पोरस से शत्रुता का झूठ और सिकंदर पोरस युद्ध की सत्यता का विश्लेषण..

आतंक का मजहब (Religion_of_Terror‬)

आशा है की इस पोस्ट से तर्क और सत्य स्वीकारने वाले राष्ट्रवादी मुस्लिम बंधुओं की भावना आहत नहीं होगी..मैं बहुत स्पष्टता से कहना चाहता हूँ की आतंक का स्थापित मजहब इस्लाम है और पूरा विश्व इसे सदियों से देख रहा है। जो मुसलमान भाई आतंकवादी गतिविधियों से दूर है उन्हें इस सच से कष्ट नहीं होना चाहिए।

पड़ोस के बांग्लादेश में आतंकवादियों ने हमला किया और कुछ लोगों को बंधक बना लिया। यहाँ तक इसे मैं धर्म से दूर रख सकता था मगर बंधकों की हत्या का क्राइटिरिया क्या बनाया इन्होंने??
"हाथ में अरबी में लिखी कुरान दे दी और जिसने कुरान की आयते पढ़ लीं उन्हें जाने दिया जो कुरान की आयते नहीं पढ़ पाये उन्हें रमजान के पाक माह में,अल्ला हो अकबर के नारे के साथ उनके गले को चाक़ू से रेतकर मार डाला गया ....."
कुरान न पढ़ पाने वालों की हत्या करते ही आतंक का मजहब स्थापित हो गया..न तो कुरान न पढ़ पाने वालों की हत्या करने का ये पहला मामला है,न ही ये आखिरी होगा..पुरे विश्व में ये हो रहा है और पूरा विश्व आँखों पर सेकुलर चश्मा लगाये हुए बैठा है..
क्या आप को याद आ रहा है की पूरे विश्व में कितनी घटनाएं हुई हैं जब "वेद" "गीता" "रामचरितमानस","ओल्ड या न्यू टेस्टामेंट","गुरु ग्रन्थ साहिब","जींद अवेस्ता" न पढ़ पाने वाले की आतंकवादियों ने हत्या की हो..शायद नहीं या कोई खोद कर ले आये तो 50-100 सालों में एक बार.मगर कुरान के नाम पर रोज हत्या,अल्लाह के नाम पर रोज बम विस्फोट...ये कौन सा मजहब है ये कौन सा धर्म है???
भारत में स्थिति में सबसे दुखद वर्तमान मुसलमान बिरादरी का भ्रम है की वो औरंगजेब और बाबर की औलाद हैं। 99% मुसलमान ये सत्यता जानते हैं और मन ही मन मानते भी हैं की उनके पुरखे हिन्दू थे और इसी प्रकार गला रेतकर,बलात्कार,जजिया के दम पर कलमा पढ़वाया गया उनसे..मगर आज हो क्या रहा है ISIS के 5 संदिग्ध आतंकवादी पकडे जाते हैं तो ओवैसी उनके लिए करोडो के वकील ले कर खड़े हैं।अब्दुल कलाम के जनाजे में भले ही मुट्ठी भर लोग रहे मगर "आतंकवादी याकूब मेमन" का जनाजा धूमधाम से निकलेगा..लादेन के लिए जयपुर के मस्जिद में नमाज होगी और कश्मीर में भारत मुर्दाबाद होगा..
बात सिर्फ हिन्दू मुसलमान की नहीं है बात है दुनिया के दो धड़ों की , नमाजी और काफ़िर..अभी बांग्लादेश में या भारत में नमाजी काफ़िर को मार रहा है "काफ़िर" वही जो कुरान नहीं पढ़ पाये..इससे भी आगे बढे तो असली कहानी है खूनखराबे के मूल से उदभव की..
पाकिस्तान,अफगानिस्तान,सीरिया,कुवैत,लेबनान लीबिया,सूडान...... यहाँ जितने गैरमुस्लिम काफ़िर थे उन्हें या तो मार डाला गया या वो भारत के वर्तमान मुसलमानो की तरह नमाजी बन गए..मगर फिर भी रोज वहां हत्याएं हो रही है.वहां नमाजी में भी 3 टाइम वाला या 5 टाइम वाला देखकर गला रेता जा रहा है.मतलब खूनखराबे का कोई न कोई रास्ता निकाल लिया जायेगा. जैसे केजरीवाल हर बात पर मोदी की माला जपता है इस्लामिक बुद्धिजीवी हर बात में अमरीका के हाथ की माला जपते हैं जबकि लादेन,अल जवाहिरी,आईएसआईएस, जैसे आतंकवाद के स्थापित और अमिट हस्ताक्षर मस्जिदों में तकरीर करके ही आगे बढे हैं..
सभी मुस्लिम भाइयों से अनुरोध है की सत्य स्वीकारिये और इनका प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन बंद करें क्योंकि जब कोई "काफिर" नहीं रहेगा तो ये आग आप के घर में भी लगेगी. आज वही देश ज्यादा सुरक्षित हैं जहाँ काफिरों की संख्या ज्यादा है.. भारत के सभी काफिरों(गैरमुश्लिम) और सूवरों(छद्मसेकुलर) को सन्देश ये है की इस भुलावे में न रहे की आप बचे हैं अलकायदा का भारतीय चीफ संभल उत्तर प्रदेश का है और ISIS के समर्थन में मुकदमा लड़ने वाले ओवैसी बंधू भारत के ही हैं. अरीब मजीद ISIS का जेहादी  महाराष्ट्र का है तो यूपी वाले सीरिया में शहादत दे आये हैं.. तो आप या तो प्रतिउत्तर के लिए तैयार रहें या मरने के लिए....
एक रास्ता और भी है "कुरान की कुछ आयते याद कर लें,शायद अगली बार आपका गला कटने से बच जाये"...

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

JNU छाप बुद्धिजीवी वर्ग में पाँव पसारती #Congiunism की विचारधारा


भारत में एक नयी विचारधारा का जन्म हो रहा है..कांग्रेस और कम्युनिज्म के देशद्रोही गठबंधन की जिसमें इस्लामिक जेहाद और हिन्दू विरोध का स्वाभाविक सा तड़का लगा हुआ है..इसे मैंने #Congiunism का नाम दिया है..
जानिये इस #Congiunism के मूल तत्व क्या हैं..
ये कांग्रेस और कम्युनिष्ट की सम्मिलित विचारधारा है..
ये भारत को जोड़ने में नहीं बल्कि तोड़ने में विश्वास रखती है 
ये कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानते.
ये लोग दुर्गा माता को वेश्या कहते हैं..
ये लोग भारतीय सेना के जवानो की मौत का जश्न मनाते हैं.
ये भारतीय सेना के लीगों को बलात्कारी कहते हैं.
इनके आदर्श अफजलगुरू हैं.
ये जेएनयू दिल्ली में ज्यादा मिलते हैं।
इनके प्रमुख सहयोगी राहुल गांधी,अरविन्द केजरीवाल,ABP News,NDTV और आज तक हैं..
आशुतोष की कलम से 

ट्विट@ashu2aug
कृपया इस विचारधारा के महान विचार सबसे शेयर करें...

भारतीय सेना बलात्कारी है: कांग्रेसी सपोला कामरेड कन्हैया

कांग्रेस,कम्युनिष्ट और केजरीवाल का पाला हुआ एक सपोला अपनी जेएनयू की बिल से बोल रहा है की भारतीय सेना बलात्कारी है..
मेरा प्रश्न उस सपोले से नहीं उसे दूध पिलाने वाले कांग्रेसी,वामपंथी और केजरीवाल की टोपी गैंग से है।
बाढ़ से लेकर पुल बनाने तक सेना चाहिए। जब आतंकवादियों से तुम्हारी पैंट गीली पीली हो तो भी सेना चाहिए जब भूकंप में तुम्हारा घर तबाह हो तो सेना चाहिए और जब सीमा पर गोली चले तब तो सेना चाहिए ही..कई कांग्रेस,वामपंथी,केजरीवाल जैसे नेताओं ने अपने घरों की महिलाओं की सुरक्षा में सेना को तैनात कर रखा है तो अगर सेना बलात्कारी है तो तुम सबकी बहनो,बेटियों और पत्नियों का बलात्कार हुआ होगा जिन्होंने सैनिको की सुरक्षा या सेवा ली है..
सबसे पहल प्रश्न तो जेएनयू के गद्दारों के साथ खड़े राहुल गांधी के वंशावली पर हो जायेगा क्योंकि उनके नाना,दादी,दीदी, मम्मी सबने भारतीय सेना की सेवाएं ली हैं और ले रही हैं.केजरीवाल जी आप की बिटिया और पत्नी भी यदा कदा सुरक्षा लेती हैं..वामपंथियों का क्या कहना सेना के जवान के मरने का जश्न भी मनाते हैं और सुरक्षा में सेना का जवान भी चाहिए..
यदि सेना बलात्कारी है तो 24 घंटे सेना के भरोसे साँस लेने वालों तुम सब अपने पिता की संतति कैसे हो गए??तुम सबकी बाप हुई #भारतीय_सेना..
कांग्रेसियों,कम्युनिष्ट और केजरीवाल के गुंडों Narendra Modi को गाली देना स्वीकार है मगर देश को या भारतीय सेना को गाली देकर तुम ये साबित कर दे रहे हो की तुम्हारे जन्म से 9 माह पहले तुम्हारी अम्मीजान जरूर लाहौर के "हीरामंडी" का पर्यटन करके आई होंगी...

 आशुतोष की कलम से
 टवीट:  @ashu2aug

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

सेकुलरिज्म या हिन्दुविरोध की दोगलापंथी (‎Dual_Standerd)

  गाय काट के खाने के खिलाफ बोलना या प्रदर्शन करना अपराध और गुंडागर्दी माना जाता है.गाय खाना मौलिक अधिकार बन जाता है, मगर बैल को काबू करने का खेल जलीकट्टू "बैलों" पर अत्याचार माना जाएगा..
मस्जिद में महिला नमाज नहीं पढ सकती ये धार्मिक स्वतंत्रता है मगर किसी विशेष शनि मंदिर में तेल चढाने से रोकते ही महिलाओं का उत्पीड़न शुरू हो जाता है.
मूर्तियों और मूर्तिपूजा को हराम मानने वाला "नमाजी नौशाद अहमद खान" सबरीमाला मंदिर में इतनी श्रद्धा दिखाता है की बिना हिन्दू परम्परा को जाने समझे "मासिक धर्म की आयु वर्ग वाली स्त्री का मंदिर में प्रवेश वर्जित" करने की परम्परा के खिलाफ कोर्ट में चला जाता है यही "नमाजी नौशाद अहमद खान" शरिया के अनुसार बाप द्वारा बेटी का बलात्कार कर देने पर उस बेटी को अपने बाप की बीबी बनाने के फैसले के खिलाफ अपनी बेगम के बुरके में घुस जाता है..
ईद के पावन अवसर पर लाखो ऊँटो,गाय,बकरो,
बैलो,को काट कर खाना जानवरो पर अत्याचार नहीं माना जाता मगर हिन्दू त्यौहार जल्लीकट्टू में बैलों की लड़ाई और बैलगाड़ी दौड़ को जानवरो पर महाअत्याचार माना जाता है और इस पर रोक लगा दी जाती है...
होली खेलना पानी की बर्बादी और ईद पर लाखो करोडो लीटर पानी मांस धुलने और साफ़ सफाई में खर्च करना धार्मिक स्वतंत्रता..
दीपावली पर पटाखे जलाना वायु प्रदूषण और ईसाई नव वर्ष 1 जनवरी पर पटाखे जलाना नव वर्ष सेलिब्रेशन..
हिन्दू स्त्री को पति तलाक दे तो उसे जीवन भर गुजारा भत्ता का अधिकार है जो की होना भी चाहिए मगर जब कोई मुसलमान अपनी बेगम को तलाक दे तो आजीवन गुजारा भत्ता देने का कोई प्रावधान नहीं है.और अगर कोर्ट ने चपड़ चूं की तो कांग्रेस "शाहबानो केस" जैसे कानून को बदल देगी..
मकबूल फ़िदा हुसैन जैसा मुसलमान दुर्गामाँ,
भारतमाँ,लक्ष्मीमाता,सरस्वतीमाँ की नंगी तस्वीरें बनाये तो वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसे पुरस्कार दिया जाता है दूसरी ओर अगर कमलेश तिवारी जैसा कोई हिन्दू मुहम्मद साहब को नंगा लिख दे तो उस पर रासुका लग जाता है और गला काटने के लिए पुरे देश में आतंकी जिहाद शुरू हो जाता है.
................
ये विचारणीय प्रश्न है की सारे अत्याचार हिंदुओं पर ही क्यों होते हैं??Narendra Modi हो या Pravin Togadia जब तक सुविधा छोड़कर हिन्दू सड़को पर आ के अधिकार हेतु संघर्ष नहीं करेगा अत्याचार ऐसे ही सहना पड़ेगा...


आशुतोष की कलम से

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

आर्यभट्ट एवं शून्य के आविष्कार से सम्बंधित भ्रान्ति (Zero in india)

आज कल हिन्दू संस्कृति विरोधीयों ने एक जोक फैलाया है की जब आर्यभट्ट ने शून्य की खोज 500 ईसवीं के लगभग की तो 100 कौरवों और रावण के 10 सर की गिनती किसने की???
◆◆आर्यभट्ट ने शून्य की खोज अपने द्वारा अविष्कृत अक्षरांक पद्धति में किया है न की सभी पद्धतियों में।ठीक उसी प्रकार जैसे किताब को अंग्रेज बुक लिखते हैं इसलिए बुक की खोज करने वाले अंग्रेज हुए मगर उसी को किताब के रूप में किसी और ने खोजा ...
◆◆आविष्कार और शोध में अंतर है । शोध निरंतर चलने वाली एक प्रक्रिया है जबकि आविष्कार नितांत नवीन और अभूतपूर्व होता है । यूँ मेटाफ़िज़िक्स की दृष्टि से देखें तो अभूतपूर्व भी कुछ नहीं होता । सब कुछ रिपीट होता है, बस केवल हमारे सामने जो पहली बार प्रकट होता है हम उसे आविष्कार मान लेते हैं । अग्नि बाण पहले भी थे ... आज भी हैं । बीच के काल में नहीं थे । सभ्यताओं के उदय और अस्त के साथ इन सब चीजों का भी उदय-अस्त होता रहता है । उदय-अस्त का अर्थ केवल एपियरेंस एण्ड डिसएपियरेंस भर है । सूर्य अस्त होने के बाद भी समाप्त नहीं हो जाता । शून्य के अस्तित्व के बिना स्थापत्य कला, विज्ञान, दर्शन आदि के विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती । यह सबसे बड़ा प्रमाण है कि शून्य का अस्तित्व वैदिक काल से भी पूर्व का है ।
◆◆आर्यभट्ट (जन्म 476 ई.) को शून्य का आविष्कारक नहीं माना जा सकता। आर्यभट्ट ने एक नई अक्षरांक पद्धति को जन्म दिया था। उन्होंने अपने ग्रंथ आर्यभटीय में भी उसी पद्धति में कार्य किया है। आर्यभट्ट को लोग शून्य का जनक इसलिए मानते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने ग्रंथ आर्यभटीय (498 ई.) केगणितपाद 2 में एक से अरब तक की संख्याएं बताकर लिखाहै 'स्थानात् स्थानं दशगुणं स्यात' मतलब प्रत्येक अगली संख्या पिछली संख्या से दस गुना है। उनके ऐसे कहने से यह सिद्ध होता है कि निश्चित रूप से शून्य का आविष्कार आर्यभट्ट के काल से प्राचीन है।
◆◆पिंगलाचार्य भारत में लगभग 200 से 500ईसा पूर्व के बीच छंद शास्त्र के प्रणेता पिंगलाचार्य हुए हैं (चाणक्य के बाद) जिन्हें द्विअंकीय गणित का भी प्रणेता माना जाता है। इसी काल में पाणिनी हुए हैं जिनको संस्कृत का व्याकरण लिखने का श्रेय जाता है। अधिकतर विद्वान पिंगलाचार्य कोशून्यका आविष्कारकमानते हैं।पिंगलाचार्य के छंदों के नियमों को यदि गणितीय दृष्टि से देखें तो एक तरह से वे द्विअंकीय (बाइनरी) गणित का कार्य करते हैं और दूसरी दृष्टि से उनमें दो अंकों के घन समीकरण तथा चतुर्घाती समीकरण के हल दिखते हैं। गणित की इतनी ऊंची समझ के पहले अवश्य ही किसी ने उसकी प्राथमिक अवधारणा को भीसमझा होगा। अत: भारत में शून्य की खोज ईसा से 200 वर्ष से भी पुरानी हो सकती है।
◆◆ बख्शाली पाण्डुलिपि :गणित के एक बहुमूल्य ग्रंथ बख्शाली पाण्डुलिपि के कुछ (70) पन्ने सन् 1881 में खैबर क्षेत्र में बख्शाली गांव के निकट बहुत हीजीर्ण अवस्था में मिले थे। ये भोजपत्र पर लिखे गए हैं। इनकी भाषा के आधार पर अधिकांश विद्वान इन्हें 200 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी का मानते हैं। यह ग्रंथ इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह शुल्व सूत्री (वैदिक) गणित के ईसा पूर्व 800 से लेकर ईसा पूर्व 500 के काल के बाद के गणितीय रूप को दर्शाता है। इस पाण्डुलिपि में शून्य का जिक्र है।भारत में उपलब्ध गणितीय ग्रंथों में 300 ईस्वी पूर्व का भगवती सूत्र है जिसमें संयोजन पर कार्य हैतथा 200 ईस्वी पूर्व का स्थनंग सूत्र है जिसमें अंक सिद्धांत, रेखागणित, भिन्न, सरल समीकरण, घन समीकरण, चतुर्घाती समीकरण तथा मचय (पर्मुटेशंस) आदिपर कार्य हैं। सन् 200 ईस्वी तक समुच्चय सिद्धांत के उपयोग का उल्लेख मिलता है और अनंत संख्या पर भी बहुत कार्य मिलता है।
◆◆ ईशावास्योपनिषद् के शांति मंत्र में कहा गया है-ॐपूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते।पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।यह मंत्र मात्र आध्यात्मिक वर्णन नहीं है, अपितु इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण गणितीय संकेत छिपा है, जो समग्र गणित शास्त्र का आधार बना। मंत्र कहता है, यह भीपूर्ण है, वह भी पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति होती है, तो भी वह पूर्ण है और अंत में पूर्ण में लीन होने पर भी अवशिष्ट पूर्ण ही रहता है। जो वैशिष्ट्य पूर्ण के वर्णन में है वही वैशिष्ट्य शून्य व अनंत में है। शून्य में शून्य जोड़ने या घटाने पर शून्य ही रहता है। यही बात अनन्त की भी है।हमारे यहां जगत के संदर्भ में विचार करते समय दो प्रकार के चिंतक हुए। एक इति और दूसरा नेति। इति यानी पूर्णता के बारे में कहने वाले। नेति यानी शून्यता केबारे में कहने वाले। यह शून्य का आविष्कार गणना की दृष्टि से, गणित के विकास की दृष्टि से अप्रतिम रहा है।भारत गणित शास्त्र का जन्मदाता रहा है, यह दुनिया भी मानने लगी है।
◆◆यूरोप की सबसे पुरानी गणित की पुस्तक"कोडेक्स विजिलेन्स" है। यह पुस्तक स्पेन की राजधानी मेड्रिड के संग्राहलय में रखी है। इसमें लिखा है-"गणना के चिन्हों से (अंकों से) हमें यह अनुभव होता है कि प्राचीन हिन्दुआें की बुद्धि बड़ी पैनी थी तथा अन्यदेश गणना व ज्यामिति तथा अन्य विज्ञानों में उनसे बहुत पीछे थे। यह उनके नौ अंकों से प्रमाणित हो जाता है, जिनकी सहायता से कोई भी संख्या लिखी जा सकती है।"नौ अंक और शून्य के संयोग से अनंत गणनाएं करने की सामर्थ्य और उसकी दुनिया के वैज्ञानिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका की वर्तमान युग के विज्ञानी लाप्लास तथा अल्बर्ट आईंस्टीन ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की है।
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स्रोत: गूगल ब्लॉग,कौशलेन्द्रम मिश्र अतिदलित जी,आशुतोष की कलम से....
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