बुधवार, 21 मार्च 2012

हिन्दू नव वर्ष की शुभकामनायें .

आज कल लिखना लिखाना कम हो गया है नौकरी से तो फुर्सत निकाल लेता हूँ मगर अब विचारधारा के लिए धरातल पर काम कर रहा हूँ अतः समय  से जंग चलती रहती है ..कभी कभी लगता है की एक जीवन कम है जितने काम हमे करने हैं..कल नव वर्ष है तो सोचा बधाइयाँ देता चलूँ..शायद आज के वर्तमान परिवेश में इस त्यौहार को लोग भूलते जा रहे हैं इसपर पिछले साल एक पोस्ट लिखी थी कुछ थोड़े बहुत संपादन के बाद उसे ही लिख रहा हूँ.. 

हमारी वर्तमान मान्यताएं और आज का भारतीय : वर्तमान परिवेश में पश्चिम का अन्धानुकरण करते हुए हम ३१ दिसम्बर की रात को कडकडाती हुए ठण्ड में नव वर्ष काँप काँप कर मानतें है..पटाके फोड़ते है,मिठाइयाँ बाटते हैं और शुभकामना सन्देश भेजते है..कहीं कहीं मास मदिरा तामसी भोजन का प्रावधान भी होता है..अश्लील नृत्य इत्यादि इत्यादि फिर भी हमें ये युक्तिसंगत लगता है..
विश्व में हजारों सभ्यताएं हुई हैं और हजारों पद्धतियाँ है सबकी अपनी अपनी.. शायद ३१ दिसम्बर की रात या १ जनवरी को नव वर्ष मनाने का कोई वैज्ञानिक आधार हो, मगर मैंने आज तक नहीं देखा... फिर भी ये उनकी अपनी पद्धति है, मगर हमारी दुम हिलाने की आदत गयी नहीं आज तक, शुरू कर देते है पटाके फोड़ना..विडंबना ये है की क्या कभी आप ने किसी अमेरिकी को हिन्दू नव वर्ष मानते देखा है..मैं ये कहना जरुरी समझता हूँ की १ जनवरी को कुछ भी वैज्ञानिक दृष्टि से नवीन नहीं होता मगर फिर भी नव वर्ष होता है..

हिन्दू नव वर्ष कब मनाया जाता है : हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल प्रतिपदा के प्रथम दिन हिन्दू नव वर्ष मनाया जाता है..ऐसी मान्यता है की सतयुग का प्रथम दिन भी इसी दिन शुरू हुआ था..एक अन्य मान्यता के अनुसार ब्रम्हा ने इसी दिन सृष्टि का सृजन शुरू किया था..भारत के कई हिस्सों में गुडी पड़वा या युगादी  पर्व मनाया जाता है.इस दिन घरों को हरे पत्तों से सजाया जाता है और हरियाली चारो और दृष्टीगोचर होती है.
इस वर्ष पश्चिमी कलेंडर के अनुसार ये वर्ष २३ मार्च २०११ को शुरू होगा..चलिए ये तो रही मान्यताएं और इतिहास की बातें अब कुछ वैज्ञानिक तथ्यों को भी जान लें..

हिन्दू नव वर्ष के वैज्ञानिक तथ्य:

१ चैत्र माह मतलब हिन्दू नव वर्ष के शुरू होते ही रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते है..
२ पेड़ों पर नवीन पत्तियों और कोपलों का आगमन होता है..पतझड़ ख़तम होता है और बसंत की शुरुवात होती है..
३ प्रकृति में हर जगह हरियाली छाई होती है प्रकृति का नवश्रृंगार होता है..
४ धर्म को मानने वाले लोग पूजा पाठ करते है मंदिर जातें है नदी स्नान करतें है..
५ भास्कराचार्य ने इसी दिन को आधार रखते हुए गड़ना कर पंचांग की रचना की.
५ हमारे हिन्दुस्थान में सभी वित्तीय संस्थानों का नव वर्ष अप्रैल से प्रारम्भ होता है .

आप ही सोचे क्या जनवरी के माह में ये नवीनता होती है नहीं तो फिर नव वर्ष कैसा..शायद किसी और देश में जनवरी में बसंत आता हो तो वो जनवरी में नव वर्ष हम क्यूँ मनाये???

वर्तमान में एक कुप्रथा चली है  मुर्ख दिवस मानाने की वो भी हिन्दू नव वर्ष के शुरुवात में और बौधिक गुलाम लोग  सबको अप्रैल फूल बनाते हैं.अर्थात अंग्रेजो और पश्चिम ने ये सुनिश्चित कर दिया है तुम मुर्ख हो और खुद के भाई बहनों को नव वर्ष में शुभकामना सन्देश भेजने की बजाय मुर्ख कहो और मुर्ख बनाओ और मुर्ख रहो..इसी का परिणाम है की आजादी के वर्षों बाद भी हमारी बौधिक गुलामी नहीं गयी जिस नव वर्ष को हमे पूजा पाठ और खुशहाली से मनाना चाहिए उस दिन हम एक दुसरे की मुर्खता का उपहास करते हैं...


चलिए आप सभी को नव वर्ष की ढेरों शुभकामनायें आशा करूँगा की ये नव वर्ष आप सभी के जीवन में अपार हर्ष और खुशहाली ले कर आये..  हिन्दू पंचांग महीनो के नाम और पश्चिम में कैलेंडर में उस माह का अनुवाद
चैत्र--- मार्च-अप्रैल
वैशाख--- अप्रैल-मई
ज्येष्ठ---- मई-जून
आषाढ--- जून-जुलाई
श्रावण--- जुलाई - अगस्त
भाद्रपद--- अगस्त -सितम्बर
अश्विन्--- सितम्बर-अक्टूबर
कार्तिक--- अक्टूबर-नवम्बर
मार्गशीर्ष-- नवम्बर-दिसम्बर
पौष----- दिसम्बर -जनवरी
माघ---- जनवरी -फ़रवरी
फाल्गुन-- फ़रवरी-मार्च

अब क्रिकेट की कुछ क्रिकेट के दीवानों लिए: भारतीय टीम के दो सदस्यों के नामआश्विन एवं कार्तिक भी  हिंदी महीनो के नाम पर है,किसी क्रिकेटर का नाम है क्या भारतीय क्रिकेट टीम में अगस्त सितम्बर या जुलाई ??

नव वर्ष मंगल मय हो...






बोलो भैया दे दे तान
हिंदी हिन्दू हिन्दुस्थान.......

सोमवार, 20 फरवरी 2012

रासायनिक एवं आयुर्वेदिक साबुन : गुणवत्ता एवं उपयोग

हमारे दैनिक उपयोग में आने वाला एक महत्वपूर्ण उत्पाद है साबुनI साबुन रासायनिक और आयुर्वेदिक/हर्बल दो प्रकार के होते हैंIसामन्यता हम टेलीविजन पर आने वाले विज्ञापनों को देख कर दैनिक उपयोग में आने वाले साबुन का चुनाव करते हैंI
आइये एक दृष्टि डाले साबुन के बनाने की प्रक्रिया और साबुन के महत्त्वपूर्ण घटकों पर I साबुन बनाने की प्रक्रिया में ३ महत्त्वपूर्ण घटक वसीय अम्ल ,कास्टिक सोडा और पानी होते हैंI

वसीय अम्ल या (FATTY ACID ) : वसीय अम्ल  का मुख्य स्रोत नारियल जैतून या ताड़ के पेड़ होते हैं, इसे जानवरों की चर्बी से भी निकाला जाता है,जिसे टालो(TALLOW ) कहते हैं जो की बूचड़खाने से मिलता हैIटालो से निकले जाना वसीय अम्ल अपेक्षाकृत सस्ता होता हैIइस वसीय अम्ल(FATTY ACID ) से सोडियम लौरेल सल्फेट(SLS ) का निर्माण होता है जो झाग बनाने में प्रयुक्त होता हैI
यदि आप शाकाहारी हैं तो अपने साबुन के रैपर पर ध्यान से देखें की कही छोटे अक्षरों में (TALLOW ) तो नहीं लिखा हैIसाबुन के वर्गीकरण से पहले हमे एक महत्त्वपूर्ण शब्द TFM  के बारे में जान ले जो सामन्यतया हर साबुन के पैकेट के पीछे लिखा मिल जायेगा.."TFM " का मतलब TOTAL FATTY MATRIAL होता है जो की साबुन का वर्गीकरण और गुणवत्ता का निर्धारण करता है.. जितना ज्यादा  TFM  का प्रतिशत होगा साबुन की गुणवत्ता उतनी ही अच्छी होगीI 
इस आधार पर हम सामान्यतया रासायनिक साबुन साबुन को ३ भागो में वर्गीकृत कर सकते हैं:कार्बोलिक साबुन, ट्वायलेट साबुन,और नहाने का साबुन या बाथिंग बारI

१ कार्बोलिक साबुन (CARBOLIC SOAP ) :GRADE 3 SOAP :  इस साबुन में TFM का प्रतिशत ५०% से ६०% तक होता है.और यह साबुन सबसे घटिया दर्जे का साबुन होता हैIइसमें फिनायल की कुछ मात्रा होती है जो सामन्यतया फर्श या जानवरों के शारीर में लगे कीड़े मारने के लिए प्रयुक्त किया जाता हैIयूरोपीय देशों में इसे एनिमल सोप या जानवरों के नहाने का साबुन भी कहते हैंIभारत में इस श्रेणी का साबुन लाइफबॉय हैI

२ ट्वायलेट साबुन :GRADE 2 SOAP : यह गुणवत्ता के आधार पर दूसरे दर्जे का साबुन होता हैIट्वायलेट सोप का उपयोग सामन्यतया शौच इत्यादि के बाद हाथ धोने के लिए होता हैIइसमें ६५  से ७८% TFM होता है.,इससे इस्तेमाल से त्वचा पर  होने वाली हानि कार्बोलिक साबुन की अपेक्षा  कम होती हैIभारत में इस श्रेणी का साबुन लक्स,लिरिल डिटोल और हिंदुस्तान लीवर लिमिटेड के अन्य कई उत्पाद हैI

३ नहाने का साबुन या बाथिंग बार.: GRADE 1 SOAP : गुणवत्ता के आधार पर सर्वोत्तम साबुन है तथा इसका उपयोग स्नान के लिए किया जाता हैIइस साबुन में TFM की मात्रा ७६% से अधिक होती हैI
इस साबुन के रसायनों  से त्वचा पर होने वाली हानि न्यूनतम होती है. निरमा साबुन या कुछ कंपनिया ही कम मात्रा में ये उत्पाद बनाती हैI

साबुन में झाग के लिए इस्तेमाल होने वाले रसायन सोडियम लारेल सल्फेट से त्वचा की कोशिकाएं शुष्क हो जाती हैं और कोशिकाओं के मृत होने की संभावना रहती है.यह आँखों के लए अत्यंत हानिकारक है नहाते समय साबुन यदि आँखों में चला जाये तो इसी रसायन के असर से हमे तीव्र जलन का अनुभव  होता है,त्वचा पर खुजली और दाद की संभावना होती है.


ये सारे प्रकार हुए रासायनिक साबुन के अतः कोई भी रासायनिक साबुन त्वचा के लिए लाभदायक नहीं है कम हानि के लिए साबुन के रैपर पर TFM की मात्रा ७६% से अधिक देखकर लेIये साबुन  नहाने का साबुन या बाथिंग बार की श्रेणी में आते हैं बाकी के सभी साबुन या तो जानवरों के नहालने के लिए प्रयोग होने वाले हैं या शौचालय से आने के बाद हाथ धोने के लिएI

हर्बल और आयुर्वेदिक साबुन: ये एक अन्य प्रकार साबुन है जो लगभग पूर्ण रूप से रसायनों से रहित(CHEMICAL FREE )  होता हैIइसको बनाने में मुख्य रूप से भारत में पैदा होने वाले तथा घरों में इस्तेमाल होने वाले सौन्दर्य प्रसाधन होते हैं जो की निम्नलिखित हैI

१ हल्दी : बैक्टीरिया से बचाव ,दाद पैदा करने वाले फफूंद (FUNGAL) से बचाव,त्वचा के दानो से बचाव I
२ नीम : बैक्टीरिया से बचाव ,दाद पैदा करने वाले फफूंद (FUNGAL ) से बचाव ,त्वचा के दानो से बचाव I
३ तुलसी : त्वचा एवं चेहरे में प्राकृतिक चमक लेन के लिए उपयोगीI
३ घृतकुमारी :इसे त्वचा पर लगाने पर त्वचा स्वस्थ रहती है व झुर्रियां नहीं पड़ती I
४ आंवला : अनेको औषधीय गुण.त्वचा को तैलीय बनाये रखता है I
५ गिलोय :त्वचा के विकारो को ख़त्म करता है I
६ चन्दन : moisturizer त्वचा की शुष्कता को ख़तम करता है और त्वचा नम रहती हैI  
७ नारियल का तेल- moisturizer त्वचा की शुष्कता को ख़तम करता है और त्वचा नम रहती है I 
८ बादाम: त्वचा को प्रोटीन देता है I
इन सब के अलावा कुछ एक और औषधियां उत्पादक की गुणवत्ता नीति के अनुसार मिलायी जाती हैIविको,कान्ति,ओजस आदि कई आयुर्वेदिक साबुन बाज़ार में उपलब्ध हैंI
हिन्दुस्थान में इन पदार्थों का उपयोग हजारो वर्षों से त्वचा और शरीर को स्वस्थ रखने के लिए किया जा रहा हैIयूरोप और पश्चिमी देशों में जलवायु के कारण हल्दी,नीम,तुलसी,चन्दन,बादाम,नारियल की उपलब्धता नहीं के बराबर है इसलिए उन जगहों पर रासायनिक साबुन(CHEMICAL SOAP) का इस्तेमाल शुरू हुआIधीरे धीरे रासायनिक साबुन में भी अतिहनिकारक grade -२ और grade -३ के साबुन हमारे दैनिक जीवन में आ गए और हम हमेशा की तरह गुलाम मानसिकता को दिखाते हुए उनके यहाँ कुत्तों के नहलाने वाले साबुन से नहा कर गीत गाते हैं की "लाइफब्वाय है जहाँ तंदुरुस्ती है वहां"Iआज हम आजाद हैं ,मगर हमने खुद को शिक्षित कहने वाले लोगों ने खुद को आजादी के बाद भी यूरोपियन कुत्तों के के इस्तेमाल के लिए बने उत्पादों का खुद पर प्रयोग करके खुद को उन्नत मानते हैंIउपरोक्त वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर हर्बल और आयुर्वेदिक साबुन  इस्तेमाल करना शरीर और त्वचा के लिए हर प्रकार से लाभदायक और बिना किसीपार्श्व प्रभाव(SIDE EFFECT ) के हैIयदि इन वैज्ञानिक तथ्यों को जानने के बाद भी कोई रासायनिक साबुन का इस्तेमाल सिर्फ इसलिए करना चाहता है की वो किसी सुन्दर अभिनेत्री के अर्धनग्न शरीर को टेलीविजन पर प्रसारित कर बेचा जा रहा है तो कृपया TFM का प्रतिशत रैपर के पीछे देखकर ये निश्चित कर ले की कही विज्ञापनों को देख कर आप कही ट्वायलेट में इस्तेमाल होने वाले साबुन से स्नान तो नहीं कर रहे??या आपका साबुन आप के नहाने के लिए है या कुत्तों के नहाने के लिए ???

शनिवार, 11 फरवरी 2012

वैलेंटाइन डे(valentine day): प्रेम का पर्व या संस्कारों का अवमूल्यन :


वर्तमान महानगरीय परिवेश में पश्चिम का अन्धानुकरण करने की जो यात्रा शुरू हुई है उसका एक पड़ाव फ़रवरी महीने की १४ तारीख है,हालाँकि प्रेम की अभिव्यक्ति किसी भी प्रकार की हो सकती हैमाँ-बाप,बेटा,भाई,बहन किसी के लिए मगर ये त्यौहार वर्तमान परिवेश में प्रेमी प्रेमिकाओं के त्यौहार के रूप में स्थापित किया गया हैआज कल के युवा या यूँ कह ले आज कल कूल ड्यूड्स बड़े जोर शोर से इस त्यौहार को मना कर आजादी के बाद भीअपनी बौधिक और मानसिक गुलामी का परिचय देते मिल जायेंगे Iपिछले १५-२० वर्षों में इस त्यौहार ने भारतीय परिवेश में अपनी जड़े जमाना प्रारम्भ किया और अब इस त्यौहार के विष बेल की आड़ में हमारी युवा पीढ़ी में बचे खुचे हुए भारतीय संस्कारो का अवमूल्यन किया जा रहा हैइस त्यौहार के सम्बन्ध में कई किवदंतियां प्रचलित है में उनका जिक्र करके उनका विरोध या महिमामंडन कुछ भी नहीं करना चाहूँगा क्यूकी भारतीय परिवेश में ये पूर्णतः निरर्थक विषय हैI

मेरे मन में एक बड़ा सामान्य सा प्रश्न उठता है की प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए हम एक खास दिन ही क्यों चुने??जहाँ तक प्रेम के प्रदर्शन की बात है हमारे धर्म में प्रेम की अभिव्यक्ति और समर्पण की पराकाष्ठा है मीरा और राधा का कृष्ण के प्रति प्रेम I मगर महिमामंडन वैलेंटाइन डे का?कई बुद्धिजीवी(या यूँ कह ले अंग्रेजों के बौधिक गुलाम) अक्सर ये कुतर्क करते दिखते हैं की इसे आप प्रेमी प्रेमिका के त्यौहार तक सीमित न करेमेरी बेटी मुझे वैलेंटाइन की शुभकामनायें देती है,और पश्चिम में फादर डे,मदर डे भी मनाया जाता है I मेरा ऐसे बौधिक गुलाम लोगो से प्रश्न है की,अगर पश्चिम में मानसिक और बौधिक रूप से इतना प्रेम भरा पड़ा है कीवहां से प्रेम का त्यौहारहमे उस धरती पर आयात करना पड़ रहा है जहाँ निष्काम प्रेम में सर्वस्व समर्पण की प्रतिमूर्ति मीराबाई पैदा हुईतो पश्चिम में ओल्ड एज होम सबसे ज्यादा क्यों हैं?? क्यों पश्चिम  का निष्कपट प्रेम वहां होने वाले विवाह के रिश्तों को कुछ सालो से ज्यादा आगे नहीं चला पाता.उस प्रेम की मर्यादा और शक्ति तब कहा होती  है ,जब तक बच्चा अपना होश संभालता है ,तब तक उसके माता पिता कई बार बदल चुके होते हैं और जवानी से पहले ही वो प्रेम से परे एकाकी जीवन व्यतीत करता है I ये कुछ विचारणीय प्रश्न है उन लोगो के लिए जो पाश्चात्य सभ्यता की गुलामी में अपनी सर्वोच्चता का अनुभव करते हैं I
ये कैसी प्रेम की अनुभूति है जब पिता पुत्र  से कहता है की तुम्हारा कार्ड मिला थैंक्यू सो मच..और फिर वो एक दूसरे से सालो तक मिलने की जरुरत नहीं समझते I ये कौन से प्रेम की अभिव्यक्ति है जब प्रेमी प्रेमिका विवाह के समय अपने तलाक की तारीख भी निश्चित कर लेते हैं,और यही विचारधारा हम वैलेंटाइन डे:फादर डे मदर डे के रूप में आयात करके अपने कर्णधारो को दे रहे हैंI
मैं किसी धर्म या स्थान विशेष की मान्यताओं के खिलाफ नहीं कह रहा मगर  मान्यताएं वही होती है जो सामाजिक परिवेश में संयोज्य हो I आप इस वैलेंटाइन वाले प्रेम की अभिव्यक्ति सायंकाल किसी भी महानगर के पार्क में एकांत की जगहों पर देख सकते हैंI
क्या ये वासनामुक्त निश्चल प्रेम की अभिव्यक्ति है?? या ये वासना की अभिव्यक्ति हमारे परिवेश में संयोज्य हैशायद नहीं,तो इस त्यौहार का इतना महिमामंडन क्यों?? मेरे विचार से भारतीय परिवेश में प्रेम की प्रथम सीढ़ी वासना को बनाने में इस त्यौहार का भी एक योगदान होता जा रहा है I आंकड़े बताते हैं की वैलेंटाइन डे के दिन परिवार नियोजन के साधनों की बिक्री बढ़ जाती हैक्या इसी वीभत्स कामुक नग्न प्रदर्शन को आप वैलेंटाइन मनाने वाले बुद्धिजीवी प्रेम कहते हैं
इस अभिव्यक्ति में बाजारीकरण का भी बहुत हद तक योगदान है कुछ वर्षो तक १-२ दिन पहले शुरू होने वाली भेडचाल वैलेंटाइन वीक से होते हुए वैलेंटाइन मंथ तक पहुच गयी है. मतलब साफ़ है इस नग्न नाच के नाम पर उल जलूल  उत्पादों को भारतीय बाज़ार में भेजनाIटेड्डी बियरग्रीटिंग कार्ड से होते हुए,भारत में वैलेंटाइन का पवित्र प्यार कहाँ तक पहुच गया है नीचे एक विज्ञापन से आप समझ सकते हैं?? 



वस्तुतः ये वैलेंटाइन डे प्रेम की अभिव्यक्ति का दिन न होकर हमारे परिवेश में बाजारीकरण और अतृप्त लैंगिक इच्छाओं की पाशविक पूर्ति का एक त्यौहार बन गया है,जिसे महिमामंडित करके गांवों के स्वाभिमानी भारत को पश्चिम के  गुलामो  का इंडिया बनाने का कुत्षित प्रयास चल रहा हैIउमीद है की युवा पीढ़ी वैलेंटाइन डे के इतिहास में उलझने की बजाय गुलाम भारत के आजाद भारतीय विवेकानंद के इतिहास को देखेगी,जिन्होंने पश्चिम के आधिपत्य के दिनों में भी अपनी संस्कृति और धर्म का ध्वजारोहण शिकागो में कियाI


"वन्दे मातरम"


सोमवार, 30 जनवरी 2012

हिन्दू मंदिरों में पूजा के अधिकार पर प्रतिबन्ध??


बंधुओं बचपन में जिस क़स्बे में पला-बढा वहां पास में एक मस्जिद है सुबह सुबह " अल्लाह हो अकबर "  की गूंज सुनाई देती थी I कभी कभी किस के इंतकाल की खबर भी लाउडस्पीकर के माध्यम से सुनता था Iकुछ भी समझ में नहीं आता था मगर ये मानते हुए की किसी धर्म विशेष की आस्था का विषय है मन ही मन नमन कर लेता था उस परमपिता को Iवैसे भी सहिष्णु हिन्दू धर्म में हर धर्मस्थल पर शीश नवाना कोई नयी बात नहीं हैI
एक और बचपन की घटना साझा करना चाहूँगा, एक बार पास के गांव में खेतों के बीचो बिच कुछ सफ़ेद रंग की चबूतरे जैसे आकृतियाँ बनी हुई थी कुछ लोग दूसरी और अपने काम में व्यस्त थे,गलती से मै एक चबूतरे पर चढ़ गया मेरे साथ के एक मित्र ने तुरंत मुझे टोका की " अबे किस पर चढ़ा है ये कब्र किसी की " इस प्रकार कब्र से मेरा पहला परिचय हुआ I जैसा की हिन्दू धर्म का स्वाभाविक गुण है मैं तुरंत वहां से नीचे उतर कर अपनी गलती सुधारते हुए कब्र पर दोनों हाथ जोड़ते हुए सर झुकाने लगा,तभी खेत से एक चचाजान का मिट्टी से सने हाथो के साथ आना हुआ और उन्होंने हमे झिडकते हुए कुछ १-२ अपशब्द कह कर भगा दिया I
हमारे बालमन में ये बात चल रही थी आखिर हमे झिडकी और गालियाँ उस कब्र पर चढ़ने की पड़ी या एक बच्चे के पश्च्याताप स्वरुप सर झुकाकर कब्र की पूजा करने की I  ये घटना मेरे स्मृति पटल पर स्थायी रूप से चिन्हित हो गयी हो गयी और बाद में कभी वहां से गुजरा तो किसी अन्य चचाजान के खौफ से  मन ही मन नमन करके वहां  से निकल पड़ता I समय व्यतीत होने के साथ साथ उन अपशब्दों कावैश्विक कारण भी पता चल गया जिससे आप और हम सभी परिचित हैं(जिक्र करना उचित नहीं है यहाँ) I
अभी कुछ दिन पहले एक घटना हुए मेरे एक मित्र ने शुक्रवार की सुबह  को फोन करके कहा हैदराबाद चलना है तुमको आज ही..मैंने पूछा क्यों भई " जबाब मिला घंटी बजाने"
मैंने अपनी व्यक्तिगत बाध्यताएं और प्रतिबद्धताओं का हवाला देते हुए उन्हें मना किया और पूछ लिया भाई घंटी यही बजा लो, हैदराबाद ही क्यों??, 
बंधू ने इतना कहते हुए फोन काट दिया की आ के खुशखबरी दूंगा ..
आने के उनके विवरण को सुनकर एक विषाद-युक्त ख़ुशी का अनुभव हुआ I  घटना कुछ यूँ थी की  हैदराबाद की चारमिनार मस्जिद के पास हिन्दुओं की श्रधा का केंद्र ऐतिहासिक केंद्र भाग्यलक्ष्मी मंदिर है..
वहां के मुश्लिम बंधुओं ने ये तर्क दिया की घंटी इश्लाम के खिलाफ है और मुस्लिम के कानो में उसकी आवाज पड़ना भी हराम है..इसलिए उन्होंने ये बात अपने स्थानीय विधायक अकबुरुद्दीन( नाम से ही इनकी महानता का पता चलता है  ) को बताई और उन्होंने अपनी महानता का सबूत  देते हुए   घंटी बजाने पर प्रतिबन्ध लगाने की वकालत की..
इसके साथ साथ सभी हिन्दू त्योहारों पर रोक लगाने की वकालत कर दी..उनकी ये मांग माननीय जवाहर लाल गाजी नेहरु उर्फ़ जवारुद्दीन के ईसाई वंशजो(??) रौल उर्फ़ (बबलू युवराज जिसे हम राहुल के छद्म नाम से जानते हैं ) और उनकी माँ एवं  भारतीय मीडिया की एकमात्र इन्डियन बहू श्रीमती अन्तानियो अल्बीना माइनों उर्फ़(सोनिया गाँधी छद्म नाम) के पास पहुची I 
कांग्रेसी सरकार के पास इस मांग के आते ही हिन्दुओं को अपने देश में अपने जूतों तले कुचलने का एक और मौका मिला और इसे बिलकुल ही न गवाते हुए उन्होंने आज तक के हिंदुस्थानी  इतिहास का सबसे बड़ा हिंदुविरोधी( या तथाकथित सेक़ुलर) फैसला लेते हुए उस मंदिर में घंटी  बजाने पर रोक लगा दी और दो महिला कांस्टेबल भी तैनात कर दिए जो घंटी के आस पास किसी को फटकने नहीं देंगी..तश्वीरें इस बात की प्रमाण है I


हालाँकि ,ये रही विषाद की बात, मगर ख़ुशी उसी शाम एक वीडियो को देखकर मिली जब हजारो के संख्या में हिन्दुओं ने पुरे देश के कोने कोने से पहुच कर इटली की वेट्रेस के तालिबानी गठजोड़ के फरमान को घंटा दिखाते हुए मंदिर घंटी पुरे प्रशासन के सामने बजायी Iहिन्दुविरोधियों और सेक़ुलर श्वानो को ये बात समझ में आ गयी होगी की अब हिन्दू प्रतिरोध की भाषा समझ गया है और जिसे जो भाषा समझ में आती है उस तरह से प्रतिक्रिया दी जाएगी Iऔर कहा भी गया है 
अतिशय रगड़ करे जो कोई 
अनल प्रकट चन्दन से होई.... 

जरा सोचें इन तस्वीरों को देखेने और इस इटली की भूतपूर्व वेट्रेस के तालिबानी फैसले के बाद एक सामान्य हिन्दू की प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए...
१ या तो आप  सहिष्णुता का लबादा ओढ़ कर नपुन्सको की तरह बैठ जाएँ और हिन्दुस्थान में हिन्दू होने का अपराध करने की सजा भुगते 
२ आप प्रतिरोध करें...
मेरे मन में दूसरा विचार आया क्यूकी पहले विचार पर चलने का परिणाम आज हमारे सामने है.मगर ये ध्यान रखें की प्रतिरोध में सब जायज होता है ..प्रतिरोध में गोधरा भी होता है और विवादित बाबरी ढांचा गिरता है प्रतिरोध में कर्नल पुरोहित और प्रज्ञा ठाकुर पैदा होते हैं और यही प्रतिरोध है जिसने भगत,सुभाष,सावरकर,
बिस्मिल,चन्द्रशेखर आजाद पैदा किये
तो  क्या अब यही एक रास्ता बचा है Iकश्मीर एक मात्र मुश्लिम बहुल राज्य है और वहां हिन्दुओं को तो पहले ही भगाया जा चूका है अब हिंदुस्थानी सेना और हिन्दुस्थान से ही अलग होने का प्रयास हो रहा हैI तो क्या पहले कश्मीर और अब मुश्लिम बहुल हैदराबाद .....अगर ये क्रम चलता रहा तो कल अलीगढ,बरेली,लक्षद्वीप,नागपाडा से लेकर हिदुस्थान के हर हिस्से में इश्लामिक द्वीपों का निर्माण हो जायेगा और आप को दाढ़ी रखनी  पड़े और आप की बहन को बुरका पहनना पड़े I अगर ऐसा नहीं तो आप की ४ साल की बच्ची का बलात्कार हो और आप का घर जला दिया जाये(सन्दर्भ: १९८९ के बाद  घाटी  एवं कश्मीर की स्थितियां) I
मेरे कई मुश्लिम मित्र है और बड़ी बड़ी बाते भी करते हैं वो मगर इन कटु सत्यों से कैसे मुह चुरा सकते हैं I अगर किसी ने इन प्रश्नों का जबाब दिया भी तो उत्तर के रूप में प्रश्न आता है गोधरा कांड का Iशायद  वो भूल जाते हैं की गोधरा कांड की शुरुवात भी कुछ मुश्लिम बंधुओं ने की थी फिर प्रतिक्रिया और प्रतिरोध में सब जायज होता हैI
मैं कोई विष वमन नहीं करना चाहता किसी धर्म विशेष पर मगर कुछ सेक़ुलर श्वान (जो की हिन्दू धर्म का कैंसर हैं)अब भी आँख मूंद कर वैचारिक हस्तमैथुन में व्यस्त है I
आप कब तक भागेंगे आँख मूंदने से शत्रु पक्ष की गोली अपना रुख नहीं बदलती अगर जीवित रहना है आप को आँखे मिलाकर प्रतिकार करना होगा चाहें वो शत्रु हो या स्वयं महाकाल I
अन्यथा तैयार 
रहिये मंदिरों में पूजा बंद करने के लिए शायद  इससे भी आगे एक हिंदुस्थानी हिन्दू काफ़िर की हिन्दुस्थान में कुत्ते की मौत के लिए Iमैं किसी धर्म का विरोधी नहीं हूँ इसलिए कभी अजान से मेरी नींद में खलल नहीं पड़ा न ही ताजिये के जलूस से मेरा रास्ता रुकाI
 जाते जाते कश्मीर में कैसे मनाया हमारे भाइयों ने गणतंत्र दिवस उसकी एक झलकी देखें I 


चुनाव हो रहे हैं कई राज्यों वोट देना आप का अधिकार है मैं सिर्फ हिन्दुस्थान के दुसरे जलियावाला बाग़ कांड की कुछ झलकियों के साथ छोड़ जाता हूँ जिसकी साजिश इटली की वेट्रेस और अमरीकी दलाल ने रची थी I  जलियावाला बाग़ तो फिर भी जागते हुए लोगो के साथ किया गया था मगर यहाँ सोते हुए लोगो पर लाठी गोली चली I 


वन्दे मातरम..

शुक्रवार, 30 दिसम्बर 2011

लोकपाल,लोकतंत्र और भष्टाचार विरोधी आन्दोलन का असमय अवसान..

पिछले कई दिनों से संसद में धुमाचौकड़ी मची हुई थी लोकपाल पर ..सत्र शुरू होते ही अन्ना के प्रबंधक सक्रीय हो उठे थे और कांग्रेस सरकार पर भी लोकपाल बिल को पारित कराने का नैतिक और राजनैतिक दोनों दबाव बढ़ता जा रहा था...विपक्ष ने भी मौका देखकर सरकार की मिट्टी पलीद करने में कोई कसर नहीं छोड़ रक्खी थी.. मगर जैसे ही कलेंडर ने ३० तारीख की और इशारा किया अन्ना हजारे और लाखों लोगो का सारा का सारा आन्दोलन पानी के बुलबुले की भांति फूट कर खत्म हो गया..अब जब एक आन्दोलन का असमय देहावसान हो गया तो ये हम सभी के आत्मविश्लेषण का समय है की आखिर इस सारी जद्दोजहद से आम हिंदुस्थानी ने क्या पाया?

हालाकि तुलना गलत होगी मगर इस आन्दोलन की असफलता मेरे मानस पटल पर  कभी कभी भारतीय स्वाधीनता संग्राम की १८५७ की असफल क्रांति  का काल्पनिक रेखाचित्र खिंच कर जाती है,जिसमें अनेक अग्निवेश जैसे दलाल पुरे आन्दोलन में इधर उधर मुंह मारते रहे और आन्दोलन के दो मुख्य स्तम्भ बाबा रामदेव और अन्ना हजारे एक दुसरे को लंगड़ी मारने में व्यस्त रहे और कांग्रेस रूपी ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने दमनचक्र चला कर सबको साध लिया.. 
दरअसल अप्रैल से अन्ना आन्दोलन के बाद ने ही कांग्रेस सरकार ने अपनी साम दाम दंड भेद अपनाकर अन्ना टीम की विश्वसनीयता लोगो के बीच खत्म करने का एक कुत्सित प्रयास शुरू कर दिया था...हालाँकि अन्ना के तथाकथित सेकुलर प्रबंधको का अति आत्मविश्वास भी उन्हें ले डूबा...ये वही अन्ना टीम है जिसका जनता से परिचय बाबा रामदेव ने कराया और उसके बाद इनलोगों ने लोकपाल आन्दोलन में बाबा को शामिल करने के लिए ढेर सारी शर्तों  का एक सेकुलर पिटारा खोल दिया.. खैर बाबा को जैसे तैसे भ्रष्टाचार विरोधी जनान्दोलन का श्रेय लेने से बहुत सफाई से किनारे कर दिया,ज्ञात रहें की ये वही बाबा रामदेव हैं जिन्होंने सालो से भ्रष्टाचार और कालेधन के विरोध में अभियान छेड़ रखा है..
कांग्रेस सरकार ने भी अग्निवेश जैसे दलाल अन्ना टीम में सक्रीय कर दिये जिन्होंने अन्ना टीम को रातो रात भारत के गाँधी और नेहरु बनाने का दिवास्वपन दिखा दिया..
४ जून को बाबा के आन्दोलन को निर्ममता से कुचल दिया गया और इस निर्ममता का जनाक्रोश अन्ना को दुसरे अनशन  में जनसमर्थन के रूप में मिला.जिसे अन्ना प्रबंधको ने अपने नेतृत्व क्षमता विजय के रूप में देखा..बाबा रामदेव के आन्दोलन को निर्ममता से कांग्रेस सरकार द्वारा कुचलने के बाद अन्ना जैसे भी थे एक उम्मीद की किरण के रूप में परिलक्षित होने लगे.मैं व्यक्तिगत रूप से(या मेरे जैसे लाखो हिंदुस्थानी) यही सोचते रहे की अन्ना दुसरे अनशन में अपार जनसमर्थन के बूते पर सरकार से कुछ न कुछ हासिल कर लेंगे इसी उम्मीद में सुबह से शाम अनशन स्थल पर पड़े रहे मगर परिणाम वही ढ़ाक के तीन पात..अन्ना टीम को गाँधी बनने का ऐसा चस्का लगा था की हर बार एक नए समझौते और भारत रत्न की आस लिए जूस पीते और जनता सर पिटते हुए फिर अपने घर..इसके बाद अन्ना टीम के उल जलूल निर्णय जैसे पहले नेताओं को मंच पर न फटकने देना फिर उनके घर घर जा के कटोरा फैलाना..कभी कश्मीर को हिन्दुस्थान से बाहर कर देना तो कभी कुमार विश्वास का हिन्दू देवी देवताओं का अपमान करना.. हिन्दुस्थान जैसे देश में कांग्रेस जैसी कुटिल देशद्रोही  सरकार को ९ महीने का समय देना एक आन्दोलन का पिंडदान करने के लिए पर्याप्त था और वही हुआ कांग्रेस से सुनियोजित तरीके लोकपाल बिल की हत्या कर दी और बाकी विपक्षी दलों ने भी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष कांग्रेस का समर्थन किया,क्यूकी पूरी राजनैतिक जमात जनता के गुस्से से घबरायी हुई थी और ये सब उस संसद और लोकतंत्र की गरिमा के नाम पर हुआ जिसमें अपराधियों,देशद्रोहियों और भारत का ८०% कालाधन रखने वालो की उपस्थिति पंजिका रक्खी जाती है..
अन्ना ने फिर अनशन किया मगर अबकी बार जनता फिर किसी मुगालते में नहीं आने वाली थी शायद अंदेशा था इस बार भी अन्ना टीम एक कांग्रेसी सेकुलर प्रेमपत्र दिखाकर उसपर अमल न किये जाने की सूरत में अगले अनशन की तारीख का शुभ महूर्त निकलवाकर सब हिन्दुस्थानियों को निमंत्रण भेजती..
मुंबई जो की अन्ना का गृहराज्य था वह इतनी भी भीड़ नहीं जुटी की अन्ना अपना अनसन ३ दिन तक भी रख पायें इसका कारण कांग्रेस के प्रति सहानुभूति न होकर अन्ना टीम से मोहभंग होना था..शायद जनता ने अपनी लूट को नियति मानकर, नयी अनशन की तारीख लेने की बजाय कुछ दिन और इस लूट को स्वीकार कर लेने का विकल्प चुना था 
अंततः इस आन्दोलन की विफलता से कांग्रेस को देश को लूटने की तात्कालिक आजादी और अन्ना टीम के प्रबंधको के लिए एक अच्छी खासी उर्वरा राजनैतिक जमीन बनाने का मौका तो मिला ही है..
मीडिया के कैमरों से दूर बाबा रामदेव,सुब्रमण्यम स्वामी ने अभी तक राष्टवाद और भष्टाचार मुक्त भारत का झंडा उठा रखा है,मगर सावन के सेकुलर अंधों को हरे से ज्यादा प्यार नजर आता है..एक सामान्य नागरिक की तरह यही उम्मीद है की शायद कांग्रेसी शासन के मकडजाल से कोई मुक्ति दिलाये और भारत में सच्चा लोकतंत्र स्थापित हो.....


मित्रों बधाइयों का दौर चलने वाला है कल से ,सेकुलर नहीं हूँ और अंग्रेज भी नहीं इसलिए ,मेरी तरफ से हिन्दू नव वर्ष(२३ मार्च २०१२ ) की अग्रिम बधाइयाँ..

रविवार, 18 दिसम्बर 2011

पाकिस्तानी हिन्दुओं की हिन्दुस्थान में दुर्दशा -हिन्दू होने का अपराध


अमेरिका और पोप शासित इण्डिया में  जहाँ ११० करोड़ हिन्दू जनसँख्या है,हिन्दुओं का दमन और उन पर अत्याचार कभी सुर्खियाँ नहीं बन सकता, मगर बात अभी पाकिस्तान से आये १५० हिन्दुओं की है जो हिन्दुस्थान में दर दर भटक रहें हैंपिछले माह पाकिस्तान से १५० हिन्दू तीर्थयात्रा पर आये थे मगर अब ये हिन्दू हिन्दुस्थान से वापस जाने के लिए तैयार नहीं हैऔर यहाँ स्थायी रूप से शरण मांग रहें हैंइसके पीछे पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं पर होने वाला बर्बर अत्याचार हैआये हुए हिन्दुओं के अनुसार पाकिस्तान में उन्हें कभी जजिया कर तो कभी मुश्लिम बनने का दबाव,हत्या ,लूट और फिरौती का दंश झेलना पड़ता था हिन्दू लड़कियों के बलात्कार और बलात मुश्लिम बनाने की घटनाएँ अब आम हो गयी हैये बात पाकिस्तान की सरकार, संसद और मानवाधिकार संघठन भी स्वीकार करने हैंइसके पक्ष का आकड़ा एक ये भी है की विभाजन के समय पाकिस्तान में २५% हिन्दू थे जो अब १.५% के आस पास रह गए हैंखैर ये बात तो पाकिस्तान में होने वाले अत्याचार की हुई जहाँ पाकिस्तानी का मतलब मुसलमान और हिन्दू विरोधी  होना ही होता है,और ये उनके देश का आन्तरिक मामला है उसपर हम एक सीमा से ज्यादा हस्तक्षेप नहीं कर सकते
हिन्दुस्थान (जिसे खान्ग्रेस सरकार ने पोप पोषित इंडिया बना रखा है) में आये हुए पाकिस्तानी हिन्दुओं के साथ होने वाला व्यवहार भी उन्हें अपने यहाँ चलने वाले तालिबानी शासन की ही याद दिलाता हैये १५० हिन्दू जिनमें बच्चे बुजुर्ग महिलाये भी शामिल है इन्होने दिल्ली में शरण ली हैकुछ छोटे स्वयंसेवी संघठनो और इक्का दुक्का समाज सेवको के अलावा कोई भी उनकी सुध लेने वाला नहीं हैखान्ग्रेस अपनी हिंदुविरोधी नीतियों और तुष्टिकरण के कारण इन हिन्दुओं को वापस पाकिस्तान भेजने के लिए अपना पूरा जोर लगा रही हैइन हिन्दुओं की हिन्दुस्थान में शरण पाने की याचिका भी सरकार ने जानबूझकर विचाराधीन रखा हैइसी बिच एक हिन्दू संघटन ने इन्हें उत्तर प्रदेश में शरण दिलाने की कवायद  की तो यू पी पुलिस ने उन्हें रात मे ही मार पिट कर दिल्ली भगा दियाखैर कांग्रेस से हिन्दू विरोध की ही उम्मीद की जा सकती है क्यूकी इस पार्टी का इतिहास ही है तुष्टिकरण का हैसबसे कष्टप्रद बात ये है की इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संघठन को लकवा मार गया है और भरतीय जनता पार्टी जैसी राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का झंडा उठाने वाली पार्टी ने इस मुद्दे पर कोई पहल करने की जरुरत नहीं समझीहिन्दू  हृदय सम्राट की पदवी पाए हुए माननीय नरेन्द्र मोदी जी भी चुप हैइसका कारण क्या है??
आगामी चुनावों को देखते हुए मुश्लिम वोट बैंक की खातिर राजनितिक पार्टियाँ इन हिन्दुओं को जबरिया पाकिस्तान भेजने से भी गुरेज न करेहाँ अगर ये लोग मुश्लिम होते तो खान्ग्रेस से लेकर भाजपा सब पार्टियों में ईनको हिन्दुस्थान में शरण दिलाने की होड़ लग जाती शायद भारत सरकार को शरणार्थी नीति पर भी एक स्पष्ट रुख अख्तियार करना चाहिएकितना शर्मनाक है की हिन्दुस्थान में ६ करोड़ जेहादी बांग्लादेशियों को बसाने में खान्ग्रेस सरकार को सोचने में जरा भी समय नहीं लगता और सिर्फ १५० हिन्दुओं पर अत्याचार हो रहा हैअसम का उदाहरण ले तो रातो रात ट्रक में बैठकर बंगलादेशी आते है और अगले दिन तक जंगल के जंगल गांव में तब्दील। न कोई शरण देने का झंझट न कोई निरीक्षण..इसका कारण है की वो मुश्लिम है..वो एक वोट बैंक है
इस परिस्थिति में हिन्दुओं को भी आत्म मंथन करने की जरुरत क्या हिन्दुस्थान का हिन्दू इतना निरीह हो गया है की ११० करोण हिन्दू मिलकर १५० भाई बहनों को शरण न दे सके? शायद हम हिन्दुओं की आंतरिक फूट ,तथाकथित सेकुलर होने की होड़ और खान्ग्रेसियों के तलवे चाटने वालों की हिमायत करने की प्रवृत्ति इस का कारण हैकल्पना करे अफजल गुरु के लिए होने वाले विरोध प्रदर्शनों का,देशद्रोही होने के बाद भी एक बड़ा तबका उसे आदर्श मानता हैवैश्विक स्तर पर मुश्लिम लादेन के प्रबल समर्थक भी है मगर अब दूसरी और हिन्दुस्थान में हिन्दू ही कर्नल पुरोहित और प्रज्ञा ठाकुर को आतंकी बता कर अपनी बौधिक चेतना के दिवालियेपन और हिन्दुओं की नपुंसकता का परिचय देते रहते है
अगर अब भी हिन्दुओं ने नपुंसकता नहीं छोड़ी तो आज १५० पाकिस्तानी हिन्दू दर दर  भटक रहें है कल ११० करोड़ हिन्दुस्थान के हिन्दू आतंकी घोषित कर दिए जायेंगे और बाबर और मीर जाफर की औलादे इस देश पर शासन करेंगीऔर हम अपनी संस्कृति और धर्म के मुगालते में रहते हुए "गर्व से कहो हम हिन्दू है" की छद्म गाथा गाते रहेंगे
आप सभी से अनुरोध है आप जहा कहीं भी हो संवैधानिक मर्यादा में रहते हुए एक पत्र माननीय प्रधानमंत्री जी,राष्ट्रपति जी,अपने जनप्रतिनिधिया जिलाधिकारी किसी को भी किसी माध्यम से,इन हिन्दुओं की सहायता के लिए, लिखें और उन हिन्दुओं की सहायता के लिए प्रयास करते हुए समाज और हिंदुत्व के लिए अपना कर्तव्य पूरा करने की कड़ी में एक छोटा सा प्रयास करें

मंगलवार, 29 नवम्बर 2011

तेरा वैभव अमर रहे माँ हम दिन चार रहें न रहें.... राजीव भाई को श्रधांजलि


                                                                                          
                                                                                       
भाई राजीव दीक्षित जी के नाम स्वदेशी और आजादी बचाओ आन्दोलन  से हम सभी परिचित  हैं.. एक
अमर हुतात्मा, जिसने अपना पूरा जीवन मातृभाषा मातृभूमि को समर्पित कर दिया..आज उनका जन्मदिवस और पहली पुण्यतिथि भी है..आज ही के दिन ये अमर देशभक्त हमारे बिच आया था और पिछले साल हमारे बिच से आज ही के दिन राजीव भाई चले गए..अगर राजीव भाई के प्रारम्भिक जीवन में झांके तो जैसा की हम सब जानते हैं ,राजीव भाई एक मेधावी छात्र एवं  वैज्ञानिक भी थे..आज के इस भौतिकतावादी दौर में जब इस देश के युवा तात्क्षणिक हितों एवं भौतिकवादी साधनों के पीछे भाग रहा है, राजीव भाई ने राष्ट्र स्वाभिमान एवं स्वदेशी की परिकल्पना की नीव रखने के लिए अपने सम्पूर्ण जीवन को राष्ट्र के लिए समर्पित कर त्याग एवं राष्ट्रप्रेम का एक अनुकरणीय उदहारण प्रस्तुत किया..सार्वजनिक जीवन में आजादी  बचाओ आन्दोलन से सक्रीय हुए राजीव भाई ने स्वदेशी की अवधारणा एवं इसकी वैज्ञानिक  प्रमाणिकता को को आन्दोलन का आधार बनाया.. 
स्वदेशी शब्द हिंदी के " स्व" और "देशी" से मिलकर बना  है."स्व" का अर्थ है अपना और "देशी" का अर्थ है जो देश का हो.. मतलब स्वदेशी वो है "जो अपने देश का हो अपने देश के लिए हो" इसी मूलमंत्र को आगे बढ़ाते हुए राजीव भाई ने लगभग २० वर्षों तक अपने विचारो,प्रयोगों एवं व्याख्यानों से एक बौद्धिक जनजागरण एवं जनमत बनाने का सफल प्रयास किया, जिसके फलस्वरूप हिन्दुस्थान एवं यहाँ के लोगो ने अपने खुद की संस्कृति की उत्कृष्ठता एवं वैज्ञानिक प्रमाणिकता को समझा और वर्षों से चली आ रही संकुचित गुलाम मानसिकता को छोड़ अपने विचारों एवं स्वदेशी पर आधारित तार्किक एवं वैज्ञानिक व्यवस्था को अपनाने का प्रयास किया..
वैश्वीकरण एवं उदारीकरण के प्रबल विरोधी राजीव भाई ने अंग्रेजो के ज़माने से चली आ रही क्रूर कानून व्यवस्था से लेकर टैक्स पद्धति में बदलाव के लिए गंभीर प्रयास किये..अगर एक ऐसा क्षेत्र  लें जो लाल बहादुर शास्त्री जी के के बाद सर्वदा हिन्दुस्थान में उपेक्षित रहा तो वो है "गाय,गांव और कृषि " इस विषय पर राजीव भाई के ढेरो शोध और प्रायोगिक अनुसन्धान सर्वदा प्रासंगिक रहे हैं..वैश्वीकरण एवं उदारीकरण की आड़ में पेप्सी कोला जैसी हजारों बहुराष्ट्रीय कंपनियों को, खुली लूट की छूट देने वाले लाल किले दलालों के खिलाफ राजीव भाई की निर्भीक,ओजस्वी वाणी इस औद्योगिक सामाजिक मानसिक एवं आर्थिक रूप से गुलाम भारत को इन बेड़ियों से बाहर निकलने का मार्ग प्रशस्त करती थी..मगर सत्ता और व्यवस्था परिवर्तन की राह और अंतिम अभीष्ट  सर्वदा विरोधों और दमन  के झंझावातों से हो कर ही मिलता है..व्यवस्था परिवर्तन की क्रांति को आगे बढ़ाने में राजीव भाई को सत्ता पक्ष से लेकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कई बार टकराव झेलना पड़ना और इसी क्रम में यूरोप और पश्चिम पोषित कई राजनीतिक दल और कंपनिया उनकी कट्टर विरोधी हो गयी..
 अगर हम भारत के स्वर्णिम इतिहास के महापुरुषों की और नजर डाले तो राजीव भाई और विवेकानंद को काफी पास पाएंगे..जिस प्रकार विवेकनन्द जी ने गुलाम भारत में रहते हुए यहाँ की संस्कृति धर्म और परम्पराओं का लोहा पुरे विश्व के सामने उस समय मनवाया जब भारत के इतिहास या उससे सम्बंधित किसी भी परम्परा को गौण करके देखा जाता था, उसी प्रकार राजीव भाई ने अपने तर्कों एवं व्याख्यानों से भारतीय एवं स्वदेशी संस्कृति ,धर्म , कृषि या शिक्षा पद्धति  हर क्षेत्र में स्वदेशी और भारतीयता की महत्ता और प्रभुत्व  को पुनर्स्थापित करने का कार्य उस समय करने का संकल्प लिया जब भारत में भारतीयता के विचार को ख़तम करने का बिदेशी षड्यंत्र अपने चरम पर चल रहा था..काल चक्र अनवरत चलने के साथ साथ कभी कभी धैर्य परीक्षा की पराकाष्ठा करते हुए हमारे प्रति क्रूर हो जाता है..कुछ ऐसा ही हुआ और इसे देशद्रोही विरोधियों का षड्यंत्र कहें या नियति का विधान राजीव भाई हमारे बिच से चले गए..मगर स्वामी विवेकानंद जी की तरह अल्पायु होने के बाद भी राजीव भाई ने व्यक्तिगत एवं  सामाजिक जीवन के उन उच्च आदर्शों को स्थापित किया जिनपर चलकर मानवता धर्म देशभक्ति एवं समाज के पुनर्निर्माण की नीव रक्खी जानी है..
अब यक्ष प्रश्न यही है की राजीव भाई के बाद हम सब कैसे आन्दोलन को आगे ले जा सकते हैं. जैसा की राजीव भाई की परिकल्पना थी की एक संवृद्ध  भारत के लिए यहाँ के गांवों का संवृद्ध होना आवश्यक है..जब तक वो व्यक्ति जो १३० करोण के हिन्दुस्थान के आधारभूत आवश्यकता भोजन का प्रबंध करता वो खुद २ समय के भोजन से वंचित है,तब तक हिन्दुस्थान का विकास नहीं हो सकता..हम चाहें जितने भी आंकड़ों की बाजीगरी कर के विकास दर का दिवास्वप्न देख ले मगर यथार्थ के धरातल पर गरीब और गरीब होता जा रहा है और अमीर और अमीर..इसी व्यवस्था के खिलाफ शंखनाद के लिए मूल में ग्रामोत्थान  के तहत कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना होगा ,कृषि के क्षेत्र में पारम्परिक कृषि को प्रोत्साहन देकर स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता के अवसर बढ़ाने होंगे..शायद इस क्षेत्र में हजारों के तादात में स्वयंसेवक संगठन  और बहुद्देशीय योजनायें चलायी जा रही हैं,मगर अपेक्षित परिणाम न देने का कारण शायद सामान्य जनमानस में इस विचारधारा के प्रति उदासीनता और बहुरष्ट्रीय कंपिनयों के मकडजाल में उलझ कर रह जाना..
इस व्यवस्था के परिवर्तन के लिए हमे खुद के व्यक्तित्व में स्वदेशी के "स्व" की भावना का मनन करना होगा उसकी महत्ता को समझना होगा.."स्व" जो मेरा है और स्वदेशी "जो मेरे देश का है,मेरे देश के लिए है"..हमें अपने अन्दर की हीन भावना और उस गुलाम मानसिकता को ख़तम करना होगा, जो ये कहता है की अमेरिका यूरोप और पाश्चात्य देशों की हर चीज आधुनिक और वैज्ञानिक है और वहां की हर विधा हमारे समाज में प्रासंगिक है, चाहे वो नारी को एक ऐसे देश में ,नग्न भोग विलासिता के एक उत्पाद के रूप में अवस्थित करना हो ,जिस देश में नारी पूज्य,शील और शक्ति का समानार्थी मानी जाती रही है..हिन्दुस्थान शायद विश्व का एकमात्र देश होगा जहाँ आज तक गुलामी की भाषा अंग्रेजी बोलना, तार्किक और आधुनिक माना जाता है और मातृभाषा हिंदी,जिसका एक एक शब्द वैज्ञानिक दृष्टि से अविष्कृत है ,बोलना पिछड़ेपन की निशानी माना जाता है..ऐसी  गुलाम मानसिकता विश्व के शायद ही किसी देश में देखने को मिले..इसी गुलाम मानसिकता को तोड़ने का प्रयास राजीव भाई के आन्दोलन का मूल है...यदि देश,व्यवस्था या व्यक्ति की विचारधारा को पंगु होने से बचाना है तो हमे सम्पूर्ण स्वदेशी के विचारों पर चल कर ही सफलता मिल सकती है.. विश्व का  इतिहास गवाह है की किसी भी देश का उत्थान उसकी परम्परा और संस्कृति से इतर जा कर नहीं हुआ है..
व्यवस्था परिवर्तन की राह हमेशा कठिन होती है और बार बार धैर्य परीक्षा लेती है ..सफ़र शायद बहुत लम्बा हो सकता है कठिन हो सकता है मगर अंतत लक्ष्य  प्राप्ति की ख़ुशी,उल्लास और संतुष्टि उससे भी मनोरम और आत्म सम्मान से परिपूर्ण ..राजीव भाई ने एक राह हम सभी को दिखाई और उस पवित्र कार्य  लिए अपना जीवन तक होम कर दिया..आज उनके जन्मदिवस  और पुण्य तिथि के अवसर पर आइये हम सभी आन्दोलन में अपना योगदान निर्धारित करे और एक स्वावलंबी एवं स्वदेशी भारत की नीव रखके उसे विश्वगुरु के पड़ पर प्रतिस्थापित करने में अपना योगदान दे .....शायद हम सभी की तरफ से ये एक सच्ची श्रधांजली होगी राजीव भाई और उनकी अनवरत जीवनपर्यंत साधना को...

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आशुतोष नाथ तिवारी