सोमवार, 6 मार्च 2017

मीडिया के कुचक्र में फसता राष्ट्रीय संघ सेवक -डॉक्टर कुंदन चंद्रावत की बर्खास्तगी

● राष्ट्रीय संघ सेवक के नेता डॉक्टर कुंदन चंद्रावत ने केरल में संघ के कार्यकर्ताओं की रोज रोज हो रही हत्याओं से व्यथित होकर भावावेश में ये बयान दे दिया कि, केरल के मुख्यमंत्री का जो सर काट कर लाएगा उसको वो अपनी जीवन भर की पूंजी वो मकान दे देंगे जिसकी कीमत एक करोड तो होगी ही..अब यह एक उत्तेजना में दिया गया बयान था मगर बयान तो दिया गया था, बाद में उन्होंने संघ के कहने पर, इस पर माफ़ी भी मांगी मगर संघ ने, जिसपर फासीवादी होने का आरोप लगता है उसने उन्हें बर्खास्त कर दिया..
● पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का एक मुस्लिम नेता इमरान मसूद मोदी की बोटी बोटी काटने की धमकी देता है।कांग्रेस न उसकी निंदा करती है ना उस पर कोई कार्यवाही करती है । उसने कभी अपने इस बयान के लिए माफी भी नहीं मांगी और इस विधानसभा चुनाव में वह राहुल गांधी के चहेतों में शामिल था..
● पिछले कई दशकों से केरल में वामपंथियों द्वारा हिंदुओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्थकों की थोक में हत्याएं की गई मगर ना तो वामपंथियों ने इस पर कोई अफसोस जताया ना ही कोई कार्यवाही की।।।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बुद्धिजीवियों से भरा हुआ वैचारिक रूप से बहुत ही उच्च सोच वाला संगठन है। मगर मेरी अल्प बुद्धि में जो बात समझ में आ रही है कि हम वही गलतियां कर रहे हैं,जो कभी मुगलों के साथ युद्ध में हमारे हिन्दू राजाओं ने की। मुगल हमेशा हमारे बच्चों और महिलाओं को टारगेट करते रहे और हम आदर्शवाद के उच्चतम स्तर का लबादा ओढ़े हुए युद्ध करते थे.मुग़ल सैनिक युद्ध के समय अपने परिवार महिला बच्चों की चिंता से मुक्त रहते थे क्योंकि अगर हिन्दू उन्हें पाएंगे तो सम्मान से घर भेज देंगे जबकि हिन्दू योद्धा इसी चिंता में रहते हुए युद्ध लड़ते थे की अगर उनका परिवार महिलाएं बेटियां मुगलो के हाथ लग गई यो तो चौराहे पर नंगी घुमाई जाएँगी इसलिए एक ओर सैनिक युद्ध के लिए प्रस्थान करता दूरी और जौहर के लिए चिताएं सजा दी जाती थी की हिन्दू स्त्रियों की इज्जत बच जाए जान भले ही जाये...
इस प्रकार नैतिक उच्चता के मानदंड स्थापित करके आप मारे ही जायेंगे, जैसा केरल में खा रहे हैं और ज्यादा से ज्यादा एक दो राज्यों में अंतिम समय में सरकार बना लें.. यहाँ हलाहल को हलाहल से धोने की जरूरत है..सर काटने वालों के सामने सहिष्णुता और चरखा कातने की विचारधारा ने लाखों की हत्या करवाई और भारत का विभाजन कराया.मेरे समझ से भले ही आरएसएस कुंदन जी का समर्थन न करती मगर मिडिया के दबाव में आ कर उनको संघ के दायित्यों से मुक्त करना,समर्पित कार्यकर्ताओं में निराशा का भाव ले आएगा...
आशुतोष की कलम से

गुरुवार, 2 मार्च 2017

कन्हैया और उमर खालिद की मां की चू......डी

कन्हैया और उमर खालिद की मां की
चू......डी।
अगर ऊपर की लाइन आपको और अभद्र, असंसदीय और अश्लील लगी तो इस पोस्ट को पूरा पढ़िए और समझिए।ऐसा लिखने का उद्देश्य कहीं से भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से किसी का अपमान करना या किसी को अपशब्द करना कहना नहीं था, परंतु परिस्थितियों को समझाने के लिए इस प्रकार का शब्द प्रयोग करना पड़ा....
अगर आप मेरी पोस्ट की पहली लाइन को देखें और जरा भी समझदार हैं, तो मुझे अभद्र भाषा बोलने वाला कह सकते हैं, परंतु क्या आप यह बात कोर्ट ने साबित कर सकते हैं??? नहीं, क्योंकि कोर्ट में जब दलील दी जाएगी तो मैं कहूंगा की इसमें "चू......ड़ी" शब्द का प्रयोग किया गया है, जोकि कहीं से भी अभद्र नहीं है.. और सभी यह जानते रहेंगे कि मैं क्या कहना चाहता हूं परंतु फिर भी बरी हो जाऊंगा...
कन्हैया,उमर खालिद,अनिर्वान या जो भी देशद्रोही वामपंथी विचारधारा के लोग हैं, भारतीय न्यायपालिका में इसी "चू...डी" के कारण बच जाते हैं, वो पूरे 1 घंटे नारे लगाएंगे हम ले के रहेंगे आजादी,कश्मीर मांगे आजादी, मणिपुर मांगे आजादी,बंगाल मांगे आजादी,बस्तर मांगे आजादी,हम लेकर रहेंगे आजादी और अंत के 1 मिनट में यह बोलेंगे गरीबी और सामंतवाद से आजादी और यही एक मिनट उन्हें कोर्ट से बऱ़ी करा देगा...और इसी कारण आज सब पूछते हैं कि अगर देशद्रोही हैं तो साबित करके दिखाओ...
ठीक वैसे ही जैसे जैसे शराब का विज्ञापन बंद होने के बाद बैगपाइपर , नाम की शराब बनाने वाली कंपनी पूरे विज्ञापन को बैगपाइपर सोडा के नाम पर चलाती है, मगर हम सब समझ जाते हैं कि यह सोडा नहीं शराब का विज्ञापन है.ठीक उसी प्रकार जैसे सिगरेम्स कंपनी 100 पाइपर नाम की दारू का प्रचार 100 पाइपर कैसेट्स और सीडीज के नाम पर करती है,मगर सभी जानते हैं कि वो दारु परोस रही है...मगर ये सभी शराब कम्पनियाँ कोर्ट में बच जाएँगी, क्योंकि वह कहेगी कि हम तो सोडा कैसेट और सीडी बेच रहे थे...
इसी प्रकार की आजादी बेचने वाली दूकान वामपंथी कम्युनिष्टों ने खोली है.. दरअसल वो कश्मीर और बस्तर की आजादी के नारे लगाकर पाकिस्तान चीन का समर्थन और भारत का विरोध ही करते हैं, मगर भारत की न्यायपालिका द्वारा लात ना खाना पड़े इसलिए अंत में एक पंक्ति गरीबी और सामंतवाद से आजादी जोड़कर अपने आप को बचा लेते हैं..
भारत के कानून के अनुसार ना तो दारु का विज्ञापन बंद हुआ, ना तो कन्हैया और खालिद की माँ की चू....ड़ी पर कोई समस्या होगी और ना ही कश्मीर बस्तर और मणिपुर की आजादी के नारे पर किसी को सजा मिलेगी...भारत के कानून में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है...
एक और बात, जब नगर निगम की सरकारी दवाओं के छिड़काव से भी कुछ मच्छर बच जाते हैं,तो उसे मारने की जिम्मेदारी नागरिकों की होती है, चाहे हाथ से मारे या कोई और स्प्रे से...भारत को भी इन लाल मच्छरों से आजादी चाहिए..
आशुतोष को कलम से

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

जेहाद समर्थक-कांग्रेस

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में प्रस्तुत किये गए संविधान के इंडियन पैनल कोड की धारा- 212 में प्रावधान है कि अपराधी को भागने में मदद करने वाले को अपराधी मानते हुए कानूनन मुकदमा चलाया जाएगा और उसे 5 साल तक जेल की सजा हो सकती है। मुझे मालूम नहीं कि भारत के एक अभिन्न हिस्से,जम्मू और कश्मीर में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का संविधान चलता है या नहीं इतना जरूर मालूम है कि पार्टियां बाबा साहब के नाम के खाद पानी से अपने वोट बैंक की फसल लहलहाती रहती है।
ताजा मामला जम्मू कश्मीर का है, जहाँ सेना प्रमुख विपिन रावत के एक बयान पर मोहर्रम का माहौल बना हुआ है। मोहर्रम मनाने वाली प्रमुख पार्टी है कांग्रेस और सेकुलर कीड़े। घटनाक्रम कुछ इस प्रकार का था कि जम्मू कश्मीर में कुछ आतंकवादी छिपे हुए थे और भारतीय सेना और उन जेहादियों के बीच एनकाउंटर हो रहा था । जब तक आतंकवादी भारतीय सेना पर गोलियां चला रहे थे तब तक तो कोई समस्या नहीं थी, लेकिन जैसे ही भारतीय सेना आतंकवादियों के सामने भारी पड़ने लगी और उनको 72 हूरों के दर्शन कराने लगी ठीक उसी समय जम्मू कश्मीर के स्थानीय मुसलमानों ने सेना के ऊपर पत्थर फेंकना शुरु कर दिया और मस्जिदों से सेना के खिलाफ तकरीरें शुरू कर दी जिससे कि आतंकवादियों को भागने का मौका मिल सके।खैर जैसे-तैसे तकरीरों और पत्थरों से बचते हुए भारतीय सेना ने अपना अपरेशन पूरा किया..इससे पहले भी जम्मू कश्मीर में सेना के ऑपरेशन शुरू होते ही मस्जिदों के लाउडस्पीकर से "पाकिस्तान जिंदाबाद" के नारे लगने शुरू हो जाते रहे हैं..इस ऑपरेशन के बाद सेना प्रमुख विपिन रावत का एक बयान आया कि आतंकवादियों की सहायता करने वाला या सेना की कार्यवाही में व्यवधान उत्पन्न करने वाले लोग भी आतंकवादियों के साथ माने जाएंगे।
मेरे समझ से एक भारतीय होने के कारण,किसी को इसमें कोई समस्या या कष्ट नहीं होना चाहिए मगर तुष्टीकरण की राजनीति इस हद तक हावी हो चुकी है तुरंत आनन फानन में कांग्रेस पार्टी ने सेना प्रमुख के इस बयान का विरोध करना शुरु कर दिया।।आखिर कांग्रेस क्या कहना चाहती है?? यदि हमारे भारतीय सेना के जवान आतंकवादियों के खिलाफ युद्ध लड़ रहे हैं और स्थानीय लोग उनके ऊपर ग्रेनेड और पत्थर फेंक रहे हैं तो क्या सेना के जवान उनको सिर्फ इसलिए मिठाई बाटे की उनके ऊपर हमला करने वाले मुसलमान धर्म को मानते हैं और इसके लिए मस्जिदों से निर्देश दिया जा रहा था?? कांग्रेस ने सेना प्रमुख के बयान पर इस प्रकार हो हल्ला मचाया कि अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें सफाई भी देनी पड़ी।
कांग्रेस ने शायद यह बयान उत्तर प्रदेश चुनाव को देखते हुए मुस्लिम वोटों के तुष्टिकरण के परिप्रेक्ष्य में दिया है मगर क्या ऐसा करके कांग्रेस, भारत के सभी मुसलमानों को एक ही श्रेणी में खड़ा करके जेहाद समर्थक नहीं घोषित कर रही है ?? क्या आतंकवादियों के समर्थकों के पक्ष में आवाज उठाकर कांग्रेस यह साबित नहीं कर रही है कि वह एक देशद्रोही गद्दारों आतंकवादियों का समर्थन करने वाली पार्टी बनती जा रही है ?? क्या इस मुद्दे पर चुनाव आयोग संज्ञान लेगा ?? केंद्र की सरकार में आसीन भारतीय जनता पार्टी ने एक प्रेस कांफ्रेंस करके कांग्रेस की इस बयान की निंदा की है । भाजपा के अनुसार सेना को आतंकवादियों और उसके समर्थकों से निपटने की पूरी छूट दी जानी चाहिए।।
मेरा कांग्रेस समेत सभी विपक्ष के मित्रों से अनुरोध है कि समस्या नरेंद्र मोदी से है तो Narendra Modi को जम कर कोसो,आलोचना करो या गाली दो(जैसा की अपशब्द आप लोग कहते ही रहते हैं) मगर मोदी को निचा दिखाने के चक्कर में सेना को मत कोसो , आतंकवादियों का समर्थन करके खुद को पाकिस्तान की श्रेणी में न लाओ और तो और मोदी के आलोचना के चक्कर में भारतीय संविधान का अपमान करके बाबा साहेब भीमराव का अपमान न करें....
आशुतोष की कलम से

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

"जेहादन आयशा" का हनीट्रैप,आईएसआई का जाल और ध्रुव सक्सेना(PAK ISI SPY Aisha)

मध्य प्रदेश की तथाकथित साम्प्रदायिक भाजपा सरकार की पुलिस ने 11 आईएसआई के संदिग्ध एजेंटों को पकड़ा है जिसमें एक भी मुसलमान नहीं है..दिग्विजय सिंह से लेकर अन्य सभी शेखुलर नेताओं में यह बताने की होड़ लग गई है कि पकड़े गए 11 ISI के सहयोग करने वाले लोगो में कोई भी मुसलमान नहीं है.हालांकि ये सूचना पूरी  सत्य नहीं है 

तथ्य ये है कि "
आयशा उर्फ़ आशिया  नाम की महिला ने अपने हुश्न के जाल में फसाकर "राशनकार्ड" बनवा बनवा कर इन लोगो से ये काम कराया और हनीट्रैप में फसाने वाली "जेहदान आयशा" भी इन 11 लोगों के साथ गिरफ्तार की गई है मगर मिडिया को "आयशा" दिखती कहाँ है???"जेहादन आयशा उर्फ़ आशिया"  ने बड़ी ही शातिराना तरीके से कई लड़कों की तरह "ध्रुव सक्सेना" नाम के लड़के को अपने प्रेमजाल में फास रखा था और उससे वो हवाला कारोबार कराती थी. बाद में ध्रुव ने भाजपा ज्वाइन कर ली और बाद में जब ATS  ने ध्रुव और आयश समेत 11 लोगों को गिरफ्तार किया तो पता चला की ये हवाला कारोबार ISI  के इशारे पर हो रहा था और देवबंदी छाप आतंक के पैरोकारों ने इसे भाजपा बजरंगदल और पता नहीं किस किस से जोड़ दिया..
ध्रुव सक्सेना को अपने प्रेमजाल में फासने के साथ साथ "जेहादन आयशा उर्फ़ आशिया " ध्रुव के साथ भोपाल के न्यू मिनाल रेजीडेंसी  में एक ही फ्लैट में रहती थी और ध्रुव ने आयशा उर्फ़ आशिया से निकाह करने के लिए धर्म परिवर्तन की योजना बनाई थी  तब तक हवाला रैकेट पकड़ा गया और पता चला की हवाला का रैकेट "जेहादन आयशा उर्फ़ आशिया " के माध्यम से ISI  चला रही है। मतलब इसमें मालिक आयशा उर्फ़ आशिया थी और बाकी उसके कर्मचारी जिसमें कुछ को वो पैसे तो कुछ को अपना जिस्म फ़ीस के रूप में देती थी। 
मगर मेरा मुद्दा वो 11 है जो "आयशा" की जमात से नहीं है.. कोई भी मुसलमान नहीं है,कोई भी मुसलमान नहीं है यह बात बार-बार दोहरा कर दिग्विजय सिंह और उनके जैसे शेखुलर नेताजी लोग स्वयं यह साबित और स्वीकार कर रहे हैं कि ज्यादातर मामलों में ISI के एजेंट मुस्लिम समुदाय से ही होते हैं। अगर आज तक आई एस आई के पकड़े गए एजेंटों की गिरफ्तारियों को देखा जाए तो लगभग 99% गिरफ्तारियां एक समुदाय विशेष के लोगों की हुई है।और ईमाम बुखारी जी ने एक बार यहाँ तक कहा था कि "हाँ मैं ISI का एजेंट हूँ किसी की हिम्मत हो तो गिरफ्तार करके दिखाये"।।
खैर अब इससे जो बड़ी बात है, कि इन पकड़े गए 11 लोगों में से एक भारतीय जनता पार्टी के मीडिया सेल से जुड़ा रहा है। अगर आई एस आई का एजेंट TMC, SP, BSP, INC या किसी देवबंदी छाप पार्टी से पकड़ा जाता है तुझे कोई आश्चर्य की बात नहीं होती क्योंकि पहले भी ऐसा होता रहा है....मगर यदि आईएसआई के एजेंटों ने भारतीय जनता पार्टी के मीडिया सेल पर घुसपैठ कर ली है तो सचमुच एक गंभीर मामला है और भारतीय जनता पार्टी को इस बात पर विचार करना होगा कि, किस आधार पर अपने विभिन्न कार्यालयों में लोगों का प्रवेश कराया जा रहा है। अन्यथा विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जायेगा..
अक्सर जब कोई "मुस्लिम समुदाय" का ISI एजेंट पकड़ा जाता है तो एजेंट के अलावा सम्बंधित धर्मगुरु और नेता जी लोग उसको निर्दोष होने का सर्टिफिकेट दे देते हैं और कई केस में वो "जेहादी प्रोफ़ेसर जिलानी" की तरह बरी हो जाते हैं(बाइज्जत बरी नही होते कम सबूतों के कारण और वोटबैंक के दबाव के कारण होते हैं)।ठीक इसी प्रकार उत्तरप्रदेश की सरकार ने संकटमोचन मंदिर में बम फोड़कर दर्जनों को चीथड़े कर देने वालों से "समुदाय विशेष" का होने के कारण मुकद्दमा वापस ले लिया था तब कोर्ट ने कहा था
"आज आतंकियों पर से मुकद्दमा वापस ले रहे हो कल भारत रत्न दे देना"।।
मगर मेरा मानना है ऐसा तुष्टिकरण इन 11 के केस में नहीं होगा और होना भी नहीं चाहिए ...सरकार को एक और बाद ध्यान रखना होगा की इन 11 लोगो का पूरा जीवन जेल में ही बीते और तबाह हो जाये ताकि दोबारा कोई हिन्दू ISI की अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष सहायता करने की जुर्रत न करे..मुझे पूरा भरोसा है कि अभी तक "देवबंद के फतवे" की तरह किसी हिन्दू "मठ, अखाड़े या मंदिर" ने ये नहीं कहा कि ये बेचारे निर्दोष भटके हुए हिन्दू नौजवान है, न ही कोई भाजपा का कोई नेता इनकेे पक्ष में आया है क्योंकि भारत में बम फोड़कर फांसी पा कर भी निर्दोष और शहीद होने की इम्युनिटी और तमगा केवल "याकूब" "अफजल" और "जिलानी" को मिल सकता है किसी "ध्रुव सक्सेना" को नहीं...

सबका यही मत है कि ये 11 गद्दार है और गद्दारों के लिए कोई संवेदना नहीं, कोई फतवा नहीं..बाकी "आयशा" तो निर्दोष हो ही जायगी क्योंकि वो "वोट बैंक की फसल आयशा" जो ठहरी ...कानूनन जो अधिकतम सजा है इनके अपराध के लिए वो इन्हें दी जाये.हिन्दू समाज से इनके समर्थन में कोई आवाज नही है और न ही आएगी और यही बात हमें औरों से अलग बनाती है...
भारत माता की जय...
आशुतोष की कलम से

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

प्रेम का व्यवसायीकरण (Happy Rose Day)

प्रेम अब वयस्क और समझदार हो चूका है..रोज डे, प्रपोज डे मनाने वाली जनरेशन उस भाव को नहीं समझती, जब चार लाइन लिखने में पूरा लेटरपैड खत्म हो जाता था, और कमरे में गोला बना के फेके गए आधे लिखे पत्रों का छोटा मोटा हिमालय खड़ा हो जाता था.. कई रातें किताबो के अंदर छुपाये उस पेपर पर चार लाइने लिखने में बीत जाती थी और फिर भी लगता था कुछ कमी है। और इन सब के लिए किसी #रोजड़े #प्रपोजडे की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती थी..क्योंकि निश्च्छल संवेदनाएं प्रतीक्षा क्यों करें?? उनके लिए वर्ष का कोई भी समय पवित्र है.वो सब आग्रह, अपरिपक्व आकर्षण ही सही मगर प्रेम का पुट लिए हुए था ।
आज रोजड़े प्रपोज डे की प्रतीक्षा होती है..क्योंकि सब कुछ बाजार ने नियंत्रित कर लिया है, आप की भावनाएं भी और "प्रेम का अंतिम अभीष्ट" भी बाज़ार ही निर्धारित करता है, आप को प्रेम नहीं भी होता है तो बाज़ार द्वारा करवाया जाता है बेशक
उसे आप दो महीने बाद त्याग दें.आज लिखने लिखाने के लिए स्मार्टफोन है,पहले से लिखी लाईने हैं जिसमें सिर्फ "To" और "From" बदल बदल कर "Send To Many" कर दिया जाता है। आज कल कई केस में सिर्फ "TO" बदला जाता है क्योंकि प्रेम भी बेहतर विकल्पों की तलाश में है..आज का प्रेम खुद को परिशोधित करता रहता है.रिसर्च करता रहता है और "प्रोडक्ट" में बदलाव का ऑप्शन सदैव खुला रखता है.
आज कल प्रेम में आवाज, व्यक्तित्व और आत्मा को गौड होती जा रही है और बेबी का बेस और होठ प्रधान होता जा रहा हैं...आत्मा से शुरू हुआ आख्यान देह की गोलाइयों में "कभी मेरे साथ एक रात गुजार" को अभीष्ट मान बैठा है.. पहले सिर्फ "प्रेमिका" या "प्रेमी" हुआ करते थे अब "We are just Good friends" वाला रिश्ता आ गया है..इस रिश्ते में सहूलियत है किसी भी सीमा पर जा के वापस लौट आने और फिर से "Just Good friends" बन जाने की.
प्रेम का प्रदर्शन और बाज़ारीकरण ने उसकी राधा,मीरा और सीता रूपी समर्पण की महत्ता को छीनकर "अनारकली डिस्को चली" वाले क्लब में ला के खड़ा कर दिया है.."प्रेम अब समर्पित नहीं होता,प्रेम की बोली लगती है..मॉल्स में,थियेटर में और महंगे महंगे शॉपिंग काम्प्लेक्सेज में...."और जब आप ने "बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होई??" यूरोप की अच्छाइयां तो हम स्वीकार नहीं करेंगे क्योंकि वैसा करने में हमे श्रम और उद्यम करना पड़ेगा..मगर यूरोप बुराइयाँ जरूर ले आएंगे..वो हमें शॉर्टकट में ओवरनाईट मॉडर्न बनाती है..और हमारी समाज और शिक्षा की पद्धति ऐसी ही है कि ये सब अनजाने में हम आने वाली पीढ़ी को ट्रान्सफर भी करते जा रहे हैं. राजीव भाई के व्याख्यान की दो लाइने यहाँ प्रासंगिक लगती है..
पहली ये की "यूरोप में एक समय ऐसा भी था कि प्राथमिक स्कूलों से ज्यादा गर्भपात केंद्रों या अवार्शन सेंटर्स की संख्या थी।'"
दूसरा यह कि यूरोप में "ब्रोथल्स" के सामने एक बोर्ड लगा होता था "सावधान जिसके साथ आप सेक्स करने जा रहे हैं, वो आप की बिटिया हो सकती है।".....
हैप्पी रोज डे, चॉकलेटडे, किश डे, मिस डे.....एंड सो आन टू बी कान्टीन्यूड।
आशुतोष की कलम से

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

जीसस गायत्री मन्त्र ईसाईयों द्वारा धर्मांतरण का नया तरीका (Conversion)

मैंने काफी पहले भाई राजीव दीक्षित भाई के गुरूजी प्रोफेसर धर्मपाल की एक पुस्तक पढ़ी थी "Despoliation and Defaming of India" पुस्तक में ब्रिटेन की संसद,जिसे हाउस ऑफ कामंस के नाम से जाना जाता है, उसकी प्रोसीडिंग्स लिखी थी।मैकाले से लेकर अन्य कई वरिष्ठ ब्रिटेन के सांसदों ने अपने विचार उसमें दिए थे।हाउस ऑफ कामंस ने उस डिबेट का टॉपिक ही था "द ब्रिटिश डिबेट ऑन क्रिश्चिनाइजेशन ऑफ इंडिया"। इस डिबेट में ब्रिटेन की संसद में सांसदों ने अपने अपने विचार रखें 22 जून 1813 को विलियम बिलबर फोर्स जो कि ब्रिटेन के हाउस ऑफ कामंस का सदस्य था, उसने उसने एक "क्रिश्चनाइज्ड इंडिया" को ब्रिटेन की ड्यूटी बताते हुए भारत को किस प्रकार ईसाईकरण किया जाए या भारत का इसाईकरण क्यों आवश्यक है इस पर अपने विचार रखे. 1 जुलाई 1813 को ब्रिटेन हाउस ऑफ कॉमंस में पुनः विलियम बिलबर फोर्स की दूसरी स्पीच हुई मुद्दा वही था भारत का इसाईकरण। इसके बाद जेम्स मिल और टीबी मैकाले की स्पीच हुई जिसमें ये योजना बनाई गई थी कि आने वाले समय में किस प्रकार भारत को एक ईसाई राज्य बनाना है.
आजादी के बाद सत्ता का स्थानांतरण नेहरू जी जैसे व्यक्तियों के हाथ में किया गया इसके पीछे भी टी बी मैकाले की वही नीति थी कि भारत में हमें मानसिक रूप से अंग्रेजों की एक पीढ़ी तैयार करनी है जो देखने में भारतीय हो। नेहरू जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अंग्रेजों की भारत को क्रिश्चनाइज करने की रणनीति को उर्वरा भूमि मिल गई इसी क्रम में अंग्रेजों ने भारत सरकार पर अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए विभिन्न क्रिश्चियन मिशीनरीयों को भारत भेजा और बड़े पैमाने पर भारत में धर्मांतरण का खेल हुआ जिसका परिणाम ये है कि आज पूरा नार्थ ईस्ट ईसाई है. अब चूकि हमारे शासक बौद्धिक रूप से अंग्रेज वर्ग से संबंधित थे और नेहरु जी ने तो स्वयं भी स्वीकार किया है कि वह बाई चांस हिंदू है अगर नेहरू के शब्दों में कहें "आई एम अ हिंदू बाई चांस" इस कारण धर्मान्तरण और आसान हो गया।
जब ईसाई मशीनरी यहां आए तो वह इस बात को अच्छी तरीके से जानते थे कि भारत की जनता को सीधे-सीधे उनके धर्म को गाली देकर, नीचा दिखा कर बड़े पैमाने पर धर्मांतरित नहीं किया जा सकता है। तब उन्होंने एक नया खेल खेला जो की अनवरत आज भी जारी है वह हमारे प्रतीक चिन्हों को स्वीकार करने लगे अगरबत्ती दिखाना,हवन करना,गेरुआ वस्त्र पहनना,यहां तक कि कमंडल खड़ाऊं और चंदन लगाना यह सब करके वह भोले-भाले हिंदुओं की जीवन में प्रवेश करते थे और धीरे-धीरे कृष्ण और राम की तस्वीर के जगह पर ईसा मसीह की तस्वीर रखकर पूजा प्रारंभ कर आते थे और इसी क्रम में उस व्यक्ति की आने वाली पीढ़ी पूर्णतया ईसाई होती थी.. ये कार्यक्रम सन 1813 से आज तक जारी है...
नीचे एक वीडियो आप लोगों से शेयर कर रहा हूं वही रणनीति हिंदुओं को धर्मांतरित करने के लिए हिंदुओं की ही प्रतीक चिन्हों का उपयोग करो अब तक हम सभी गायत्री मंत्र सुनते आए थे अब "जीसस मंत्र" बन गया और यह बनाने वाले भी कोई अंग्रेज नहीं चंद टुकड़ों की खातिर परिवर्तित हुए मैकाले के मानसपुत्र हैं. सरकार और समाज को बहुत गंभीरता से "एंटी कन्वर्जन ला" पर विचार करना होगा अन्यथा इश्लामिक जेहादियों से इतर समाज का एक स्लो प्वाइजन, ये क्रास लटका कर मन्त्र पढ़ने वाले मैकाले विचारों के दलाल भी दे रहे हैं..
आशुतोष की कलम से

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

कश्मीर की राह पर चलता पश्चिम बंगाल.सरस्वती पूजा प्रतिबंधित (Ban Saraswati pooja in WB)


मित्रों आज यह पोस्ट में बहुत ही व्यथित मन से लिख रहा हूँ। हमारी राजनैतिक प्रतिबद्धताएं कुछ भी हो सकती है कोई भारतीय जनता पार्टी का समर्थक हो सकता है कोई सपा बसपा या कांग्रेस का, मगर इन सब से इधर हम एक मनुष्य है और एक हिंदू है। ऐसा माना जाता है कि हिंदू धर्म के अनुयायी स्वभाव से सहिष्णु एवं सर्वधर्म समभाव को मानने वाले होते हैं इसका प्रत्यक्ष उदाहरण पारसी कौम है जिसका अस्तित्व पूरे विश्व से खत्म हो गया मगर वह अपनी मान्यताओं के साथ हिन्दू बहुल भारत में सुख सुविधा एवं शांति से रह रही है।
खैर बात पारसी कौम कि नहीं मैं आज स्पष्टतया वार्ता रेडिकल इस्लाम के अनुयायियों के संदर्भ में करना चाहूंगा। जहां भी इस विशिष्ट प्रकार के इस्लाम धर्म को मानने वाले अनुयायियों की संख्या कुल जनसंख्या का 30% से अधिक हो जाती है वहां अन्य धर्मावलंबियों की स्वतंत्रता का हनन एवं अतिक्रमण शुरू हो जाता है जैसे यह जनसंख्या 50% से ऊपर होती है,अन्य धर्मावलंबियों के पास सिर्फ यही रास्ता बचता है कि या तो वह लोग इस्लाम धर्म स्वीकार कर लें या उस क्षेत्र को छोड़कर चले जाए। जहां पर इस्लामिक अनुयायियों की जनसंख्या 50% से अधिक हो चुकी है तो एक और काम किया जाता है गैर मुस्लिमों को काफिर घोषित करके उनकी हत्या शुरू कर दी जाती है,उनकी बच्चियों का रेप किया जाता है,उनकी महिलाओं को चौराहे पर नंगा किया जाता है और इन सब अत्याचारों से तंग आकर या तो वह इस्लाम स्वीकार कर लेता है या क्षेत्र से छोड़ कर चला जाता है।
आपको यह बात अतिशयोक्ति लग सकती है मगर स्वतंत्र भारत में जम्मू और कश्मीर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जहां इस्लाम के अनुयायियों की जनसंख्या बढ़ते ही कश्मीर के हिंदुओं को उनके घरों से बेघर कर दिया गया।उनकी बच्चियों का बलात्कार हुआ और आज वह दिल्ली और जम्मू के शरणार्थी कैंप में अपने ही देश में शरणार्थी बने 27 साल से जीवन गुजार रहे हैं। भारत में कई अन्य राज्य हैं जहां हिंदू जनसंख्या बहुसंख्यक है वहां पर मुसलमान या अन्य धर्मावलंबी बहुत ही आसानी से अपना जीवन यापन और व्यापार आजीविका चला रहे हैं मगर यह सहिष्णुता इस्लामिक बहुल क्षेत्रों में हिंदू जनसंख्या के साथ कभी नहीं दिखाई जाती है। ईद के अवसर पर बेगानी शादी में दीवाने हिंदू अब्दुल्लाओं को तो आपने देखा ही होगा वह लोग अपने अन्य हिंदू मित्रों को ईद मुबारक ईद मुबारक का संदेश भेजते रहते हैं । मगर जब बात आती है हिन्दू त्योहारों की तो ये सहिष्णुता किस कब्रिस्तान में दफ़न कर दी जाती है..सरस्वती पूजा और दुर्गापूजा हिंदुओं का नहीं पूरे भारत का त्यौहार है भारत की संस्कृति का द्योतक है.कश्मीर में तो हिंदु त्योहार की आप सोच ही नहीं सकते। माँ दुर्गा और विद्या की देवी सरस्वती की पूजा अब पश्चिम बंगाल में प्रतिबंधित कर दी गई और कारण ये है कि मुसलमान बिरादरी सरस्वती पूजा का विरोध कर रही है क्योंकि इस्लाम में सरस्वती पूजा हराम है और एक प्रमुख वजह ये है कि वहां जनसँख्या 30% से ज्यादा पहुच चूंकि है तो दूसरे धर्म वालों के अधिकार ख़त्म होने चाहिए..

.ये बच्ची पश्चिम बंगाल से है..ममता बानो की पुलिस ने इसे बर्बरता से पीटा..
अपराध ये है कि ये एक मुस्लिम बाहुल्य इलाके में रहती है और इसने स्कूल में सरस्वती पूजा मनाने का प्रयास किया..वहां के स्थानीय मुसलमानों ने कहा कि चूंकि इस्लाम में मूर्ति पूजा हराम है बंगाल में सरस्वती पूजन नहीं होगा ममता बैनर्जी सरकार ने भी इसका समर्थन कर दिया कि यदि मुसलमान बिरादरी को आपत्ति है तो पश्चिम बंगाल के स्कूलों में विद्या की देवी सरस्वती की पूजा नहीं होनी चाहिए...इस लड़की ने प्रतिरोध किया तो इसका सर फोड़ दिया गया...
अब न तो महिला अधिकार वाले आएंगे, न मानवाधिकार न बड़की बिंदी गैंग न ही मोमबत्ती गैंग..क्योंकि ये लड़की हिन्दू जो ठहरी और हिन्दू तो लात खाने के लिए ही होता है...
वैसे बंगाली हिंदुओं से मुझे जरा भी संवेदना नहीं है क्योंकि ये भविष्य उन्होंने मतदान करके खुद चुना है.जो कुछ लोगो ने इस चुनाव का विरोध किया उनके प्रति संवेदना है क्योंकि गेंहूँ के साथ घुन को पीसना पड़ता है. अब बस उसी दिन की प्रतीक्षा है को कब कश्मीर के हिंदुओं की तरह बंगालियों के घर के बाहर लिखा जाता है कि या तो बंगाल छोड़ दो,या इस्लाम स्वीकार करो या मरने और बलात्कार के लिए तैयार रहो...
अभी कुछ मित्र हल्ला मचाते आएंगे की सभी मुसलमान एक जैसे नहीं होते.तो मैं अपना प्रसंग बता दूं कि मुझे नवरात्रि, जन्माष्टमी, दुर्गापूजा की बधाइयाँ मेरे मुसलमान मित्र फोन से लेकर मेसेज के रूप में भेजते हैं मगर समस्या ये है मैं जहां रहता हूँ वहां प्रतिशत अभी 10 -12 वाला है..पश्चिमीयूपी में यही प्रतिशत 25 से 30 होते ही मंदिरों से लाउडस्पीकर उतरवाने के लिए आंदोलन होने लगते हैं फतवे जारी होने लगते हैं..बंगाल में सरस्वती और दुर्गा की पूजा प्रतिबंधित हो जाती है और कश्मीर में तो हिंदुओं को जीने का अधिकार नहीं है उन्हें गोली मार दी जाती है.और बाद में एक लाइन में समस्या का समाधान की 4 लाख लोगो को बेघर किसी इस्लाम ने नहीं राजनीति ने किया.. हाँ वही राजनीति जो पाकिस्तान सीरिया सूडान लीबिया मिस्र अफगान तुर्की जार्डन और यमन में चल रही है..वही जिसमें सिंजर की पहाड़ियों में अल्पसंख्यक यजिदियों को कुछ साल पहले तडपा तड़पा कर मार डाला गया और उनकी महिलाएं आज भी "जेहादियों" की सेक्स स्लेव या रखैल बनी हुई हैं..
जहां तक मुद्दा बंगाल का है बंगाल की जनता ने अपनी आत्महत्या स्वयं चुनी है क्योंकि ममता बानो की सरकार सिर्फ 30 से 35% रेडिकल इस्लाम को मानने वाले लोग नहीं बना सकते हैं। इसमें एक बहुत बड़ा सहयोगी वर्ग हमारे उन सेकुलर हिंदुओं का है जिनके निजी स्वार्थ के आगे उनका धर्म उनकी पूजा पद्धति उनकी संस्कृति सभी कुछ गौण हैं। "कश्मीरी पंडितों" ने यही गलती की और खामियाजा वो आज दिल्ली के फुटपाथ पर हैं और उनकी महिलाएं जेहादियों के बलात्कार का शिकार.."बंगाली हिंदुओं" ने इतिहास से सीख नहीं ली और अपनी कब्र खुद खोद ली है ममता बानो की सरकार को चुनकर..इस्लाम तो वही कर रहा है जो महमूद गजनवी,बाबर,औरंगजेब ने किया मगर आप क्या चुन रहे हैं? अपनी अक़्तमहत्या और अपने बच्चों की हत्या???? इस पर विचार कीजिये और इतने लंबे लेख के बाद न समझ आया हो तो नीचे वाला वीडियो देख लीजिये विश्वास मानिये सेकुलरिज्म का बुखार कुछ न कुछ जरूर कम होगा...

आशुतोष की कलम से