सोमवार, 17 अप्रैल 2017

गंगा अरबी तहजीब की सहिष्णुता और बिजनौर का शिव मंदिर (Dispute in Bijnor over loudspeaker)

मुसलमान,हिन्दू,सेकुलर या गंगा अरबी तहजीब की भाईचारा गैंग के लोग भी पढ़े.आज सोनू निगम ने अजान से नींद खराब होने का एक बयान दिया, इस बयान का विरोध करूँ या समर्थन ये सोच ही रहा था कि इस खबर पर नजर पड़ी..
उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बाहुल्य गांव जोगिरामपुरी बिजनौर में , एक प्राचीन शिव मंदिर पर मुसलमानों ने लाउडस्पीकर लगाने का विरोध किया, और इस पर विवाद बढ़ता गया..हिंदुओं को गांव छोड़ने का नोटिस दे दिया गया.कई लोग मकान बेचकर जाने की तैयारी में लग गए.
■■ पहला प्रश्न ये है कि यदि मस्जिद पर लाउडस्पीकर लग सकता है तो मंदिर पर क्यों नहीं??कहाँ गई सहिष्णुता?? या ये केवल हिंदुओं की ठेकेदारी है.
खैर समझौता हुआ अब जब समझौता हुआ तो मुस्लिम समाज की शर्ते देखिये..

● मुस्लिम समाज ने कहा कि मंदिर पर लाउडस्पीकर लगाने की अनुमति दी जाती है.मुस्लिम बहुल क्षेत्र में देश की कोर्ट,सरकार या व्यवस्था नहीं बल्कि स्थानीय मुसलमान निर्णय देंगे...
सोचिये अगर किसी मस्जिद के लाउडस्पीकर का विरोध, हिंदू समाज कर देता तो मीडिया और सेकुलर बिरादरी छाती कूट कूट कर मर जाती है।
● मुस्लिम बहुल गांव मे मंदिर पर लाउडस्पीकर लगाने के समझौते की दूसरी शर्त यह है कि लाउडस्पीकर का उपयोग ,हिन्दू सिर्फ त्योहारों में ही कर सकेंगे ।
इस हिसाब से अगर हिंदू बहुल एरिया में हिंदू ये मांग करने लगे कि मस्जिद के लाउडस्पीकर का प्रयोग सिर्फ मुस्लिम त्योहारों में किया जाएगा तो इसे धार्मिक रीति रिवाजों पर हमला बोलकर मीडिया के दलाल और सेकुलर विधवा विलाप शुरू कर देंगे..
● तीसरी शर्त ये है कि लाउडस्पीकर का प्रयोग सिर्फ आरती के लिए किया जाएगा,मतलब यदि हमें वहां कीर्तन करना हो तो हम लाउडस्पीकर का प्रयोग नहीं कर सकते हैं। 
यदि ऐसा ही हिन्दू बहुल क्षेत्र में , मुसलमानों के केस में कह दिया जाए की मस्जिद के लाउडस्पीकर का प्रयोग सीमित और निर्धारित कार्यों के लिए किया जाएगा तो इस देश में असहिष्णुता की सुनामी आ जाएगी...
●मुस्लिम बहुल गांव में मंदिर पर लाऊडस्पीकर लगाने की एक और शर्त लगाई गई, ईद के दौरान और नमाज के समय मंदिर उस लाउड स्पीकर का प्रयोग आरती के लिए भी नहीं कर सकता है। 
(अब अगर यही बात दूसरा पक्ष हिंदू बहुल एरिया में लागू करें और यह कहे कि मस्जिद के लाउडस्पीकर का प्रयोग नवरात्रि एवं आरती के समय नहीं किया जाएगा तो इसे अल्पसंख्यकों की स्वतंत्रता पर हमला करार दे दिया जाएगा)

इस पोस्ट पर कई लोग कह सकते हैं कि भाई मेरे यहां तो मुसलमान ऐसा नहीं करते हैं तो भरोसा रखिए आप वहां पर बहुसंख्यक होंगे....यह कोई पहला उदाहरण नहीं है. कश्मीर से आपकी पूजा ही नहीं बंद कराई गई बल्कि सन 1989 में साढ़े चार लाख कश्मीरी हिंदुओं को हत्या बलात्कार लूट जैसे कुख्यात तरीकों का उपयोग करके अपने ही घर कश्मीर घाटी से बाहर कर दिया गया और आज वह साढ़े चार लाख कश्मीरी हिन्दू, दिल्ली और जम्मू के फुटपाथ और कैंपों में ही अपने देश में शरणार्थी बने बने हुए हैं..उनकी इज्जत,घरपरिवार रिश्ते सब गंगा- अरबी तहजीब की भेंट चढ़ गए..कश्मीर ही क्यों जनाब, इस गंगा-अरबी तहजीब ने तो पश्चिम बंगाल में आपसे दुर्गा पूजा और सरस्वती पूजा करने का अधिकार भी छीन लिया है और कई जिलों में दुर्गा पूजा प्रतिबंधित है.. और अब बारी उत्तर प्रदेश की। शायद योगी सरकार इसे कुछ सालों के लिए टाल दे मगर बात प्रदेश की नहीं बात स्वीकार्यता की है .. आप जब संख्या में ज्यादा होंगे तो हमारे पास "पलायन,मॄत्यु या धर्मांतरण" किसी एक को चुनना पड़ता है...ऐसा क्यों सोचियेगा...
मेरी समस्या आपके अजान से कभी नहीं है लेकिन आपको हमेशा मेरी आरती,मेरा हवन,मेरा यज्ञ "काफिराना कुफ्र" लगता है और इस बात का इतिहास गवाह है कि जिस जगह पर आप बहुसंख्यक होते हैं, वहां पहले हमारी धार्मिक स्वतंत्रता,पूजा पाठ करने का अधिकार छीन लिया जाता है और फिर हमारे घर बार और इसके बाद भी अगर हमनेे वहाँ से पलायन नहीं किया तो बलात्कार और हत्या...विश्व केे नहीं ये सब भारत के ही उदाहरण हैं।

मैं अब सोच रहा हूँ की आज तक "अजान से मेरी नींद खराब नहीं हुई" ??क्या मैं सेकुलर हूँ??? क्या दिल्ली या गोरखपुर के किसी फुटपाथ पर बना शरणार्थी कैम्प अगले 30-40 साल बाद मेरा पता होगा???

आशुतोष की कलम से

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

कश्मीरी पत्थरबाज जेहादी के सेना की जीप में बांधे जाने वाले वीडियों का सच


भारतीय सेना का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें सेना की एक जीप के सामने एक कश्मीरी पत्थरबाज को सेना जीप के बोनट पर बांध के घुमा रही है. देखकर अद्भुत शांति मिली और सबने समर्थन भी किया..इससे पहले जम्मू और कश्मीर में चुनाव के समय सेना पर के जवानों पर हमले की,पत्थरबाजी की,थप्पड़ मारने की और लात से मारने के वीडियो सामने आ चुके थे.. कश्मीरी पत्थरबाज को जीप के बोनट पर बांध के घुमाने वाले वीडियो का सबसे पहले विरोध करने वालों में  जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला थे अब इस घटनाक्रम की पूरी और सत्य जानकारी जान लीजिए जिसका सन्दर्भ लेखिका सूचि सिंह कालरा द्वारा स्थानीय जवानों व्यक्तियों से अनौपचारिक बातचीत है.
यह वीडियो जम्मू और कश्मीर के बड़गांव का है जो कि 9 अप्रैल 2017 को रिकॉर्ड किया गया है.
9 अप्रैल को जम्मू और कश्मीर में उपचुनाव हो रहे थे और एक बूथ पर पत्थरबाज जेहादियों की भीड़ ने हमला कर दिया. इस बूथ की सुरक्षा ITBP के जवान और जम्मू कश्मीर के पुलिस लोग कर रहे थे।पोलिंग खत्म होने के समय लगभग 900 पत्थरबाज जेहादियों  ने पोलिंग बूथ की सुरक्षा में लगे जवानों पर हमला कर दिया..  प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उनके हाथ में बड़े बड़े पत्थर थे,और वह उसे ITBP और जम्मू कश्मीर के पुलिस के जवानों के ऊपर फेंक रहे थे..अब 900 जेहादियों  की भीड़ और उन से लोहा लेने के लिए आईटीबीपी और जम्मू कश्मीर के सिर्फ नौ जवान..आईटीबीपी के जवानों ने यह जान लिया कि अगर वह कुछ नहीं करते हैं,तो वह जिंदा नहीं बचेंगे..पत्थरबाज किस प्रकार भारतीय सेना का अपमान करते हैं या उन पर हमला करते हैं या आप पूर्व के वीडियो में देख चुके हैं कि किस प्रकार पत्थरबाज भारतीय सेना के सशस्त्र जवानों को थप्पड़ मार रहे हैं और उन पर लात चला रहे हैं ..
जवानों ने इस स्थिति को बिगड़ता देख, नजदीकी आर्मी स्टेशन के कमांडर को एक SOS  मैसेज भेजा,,आर्मी कमांडर ने तुरंत ही एक 17 जवानो की क्विक रिस्पांस टीम(QRT) को एक जीप और एक बस के साथ भेजा... 900 जेहादियों की भीड़ पोलिंग बूथ के बाहर खड़ी थी जो उन और ITBP और जम्मू कश्मीर के जवानों को मार डालना चाहती थी... जब क्यूआरटी की टीम उन नौ जवानों के सहयोग के लिए वहां पहुंची तो उन्हें भी यह समझ में आ गया कि 17 लोगों की क्यूआरटी टीम 900 लोगों की भीड़ से नहीं निपट सकती,जो हाथों में पत्थर और हथियार लेकर खड़े हैं...
कमांडर ने यह सोचा कि यदि इस भीड़ पर फायरिंग की जाती है तो,कई लोग मारे जाएंगे परिस्थितियां और बिगड़ेगी. क्यूआरटी टीम के कमांडर के सामने अपने 17 क्यूआरटी टीम के जवानों के साथ-साथ बूथ के अंदर फंसे नौ आईटीबीपी और जम्मू और कश्मीर पुलिस के जवानों को बचाने की भी जिम्मेदारी थी..मांडर ने एक स्मार्ट डिसीजन लेते हुए उन पत्थरबाजों में से एक पत्थर बाज को पकड़ा और जीप के बोनट पर बांध दिया.. कमांडर का यह तरीका कामयाब हुआ क्योंकि आर्मी की जीप  पर जेहादियों का एक साथी बंधा  हुआ था ,अतः 900 लोगों में से किसी ने भी उस जीप पर पत्थरबाजी नहीं की और QRT टीम के 17 सदस्य, आईटीबीपी और जम्मू और कश्मीर पुलिस के 9 सदस्य जीवित अपने नजदीकी सेना के बेस पर पहुंच गए...कमांडर की सूझबूझ से फायरिंग का आदेश नहीं देना पड़ा जिससे कि कई पत्थरबाज जेहादियों की भी जान बच गई...

अब उमर अब्दुल्ला और प्रॉस्टिट्यूट मीडिया की गैंग इस वीडियो पर जो स्यापा कर रही है उस चित्र के पीछे की असली कहानी तो अब हमारे सामने है नमन है भारतीय सेना को,जो ऐसे विषम परिस्थितियों में भी अपने सैनिकों के साथ-साथ कश्मीर में भारत के टुकड़े पर ही पल  रहे भारतविरोधी जेहादियों के जीवन की भी चिंता करती है।
आप सभी से अनुरोध है कि कृपया भारतीय सेना के शौर्य और सुझबूझ कि  ये गाथा सबसे शेयर करें जिससे कि अफवाह बाज गिरोहों को भारतीय सेना को बदनाम करने का कोई मौका ना मिले ... जय हिंद

आशुतोष की कलम से

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

जय भीम (दलित उद्धार के तथाकथित ठेकेदारों के लिए विशेष JAI BHIM

हिंदुओं के घर में एक कहावत है कि,हिंदुओं के बच्चे और बूढें का व्यक्तित्व, इच्छा एक जैसी हो जाती है.. कई आर उनके निर्णयों में अपरिपक्वता झलकती है और ऐसे अपरिपक्व निर्णयों और बातों का परिवार के सदस्य
"बच्चे और बुजुर्ग को एक श्रेणी में" मानते हुए इस बात का कभी भी बुरा नहीं मानते क्योंकि बुजुर्ग के दुनिया से विदाई का समय आ रहा होता है यही संस्कार भी है.
बाबा साहेब की अध्यक्षता में 7 लोगो द्वारा लिखे गए भारत के संविधान में बेकार पड़े कानूनों को खत्म करके Narendra Modi जी बाबा साहेब का "BHIM" ऐप चला रहे हैं..कांग्रेस ने संविधान की किताब में सुविधा से चीरा लगा के इसे "कांस्टीट्यूशनल अमेंडमेंट्स" का नाम दे दिया । अभी GST ने 101वां चीरा लगाके पैबंद जोड़ी है..लेकिन जब संविधान की समीक्षा कर किताब ओर नया जिल्द लगाने की बात आएगी तो BHIM ऐप हैंग होने लगता है.अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे, कानूनों का कामा फुलस्टाफ 70 साल में नहीं बदला पाये हमारे लोकतंत्र के डॉक्टर.
अब जिक्र बाबा साहेब का है तो उनके विचारों का जिक्र ना हो तो बात अधूरी रह जाएगी बाबा साहब का भारत पर सबसे बड़ा एहसान ये रहा कि उन्होंने जिन्ना की तरह देश के टुकड़े करने का ख्वाब नहीं देखा। मुसलमानों के बारे में बाबा साहब की स्पष्ट राय थी कि हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते हिंदुओं को पाकिस्तान से भारत आ जाना चाहिए और मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए। यदि स्वाभाविक रूप से हिंदू राष्ट्र हिंदुस्तान में, मुसलमान रहे तो वह जेहाद करेंगे और यह भविष्य में गृह युद्ध का कारण बनेगा। अब बाबा साहब सही थी या गलत इसका निर्णय मैं नहीं कर सकता।
बाबा साहब ने हिंदू धर्म में रहकर आजीवन छुआछूत का विरोध किया और दलितों को उनका सम्मान दिलाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई मगर जब हिंदू परिवार के इस बुजुर्ग वटवृक्ष के दुनिया से विदाई का समय आया तो अपनी मृत्यु से 57 दिन पूर्व इस हिंदू परिवार के बुजुर्ग ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और साथ ही साथ ब्रह्मा विष्णु महेश अवतार एवं ब्राह्मणों द्वारा प्रतिपादित की जाने वाली हर किसी कर्मकांड का निषेध कर दिया। मुझे नहीं मालूम इस निषेध में उनके ब्राह्मण उपनाम आंबेडकर एवं सारस्वत ब्राम्हण पत्नी शारदा कबीर उर्फ सविता अंबेडकर का बहिष्कार शामिल था या नहीं। मृत्यु के 57 दिन पूर्व किए गए इस निषेध को जानकर हिंदुओं की वही कहावत याद आती है जो कि मैंने इस लेख के प्रारंभ में कहा था..
बाबा साहब इस दुनिया से चले गए लेकिन उनके अनुयायियों ने निषेध जारी रखा मगर आज "जय भीम" करके बाबा साहब के नाम पर हो हल्ला करने वाले लोगों के विचारों में कई बार दोहरा चरित्र परिलक्षित होता है।
● ये स्वयंभू मूलनिवासी "जयभीम और जय मीम" का नारा लगाते हैं क्या तब अंबेडकर के विचारों का अपमान नहीं होता जो उन्होंने मुसलमानों के बारे में व्यक्त किया था?? यहाँ "जय भीम" के नाम पर कुछ लोग अपना दोहरा चरित्र दिखा देते हैं.
● वह बाबा साहेब के ब्राम्हण गुरु कृष्णा महादेव आंबेडकर और बाबा साहब की ब्राह्मण पत्नी शारदा कबीर उर्फ सविता आंबेडकर का निषेध कर देते हैं क्योंकि वह एक सारस्वत ब्राह्मण थी ,मगर मगर बाबा साहब के ब्राह्मण अध्यापक द्वारा दिए गए ब्राह्मण उपनाम आंबेडकर का निषेध नहीं कर पाते..
● वो लोग रमाबाई अंबेडकर के नाम से संस्थान योजनाएं और पार्क बनवाते हैं जिन्हें आंबेडकर की धर्मपत्नी के रूप में उनके परिवार ने चुना (विवाह के समय आंबेडकर जी 14 के साल थे अतः वो परिपक्व नहीं थे) मगर जिस शारदा कबीर को परिपक्व आंबेडकर ने रमाबाई की मृत्यु के बाद पत्नी के रूप में चुना और उसने अंतिम समय तक उनकी सेवा की उस महिला को शायद कोई नहीं जानता, उसके अध्याय को ही मिटा दिया गया..क्या ये बाबा साहेब अंबेडकर के चुनाव का विरोध न माना जाये???
● कुछ अंति उत्साही "जयभीम" वाले मूल निवासी दो कदम आगे बढ़कर अम्बेडकर की दूसरी पत्नी "शारदा कबीर" को चरित्रहीन तक बता देते हैं,बस इसलिए क्योंकि वो सारस्वत ब्राम्हण थी. तो क्या वो अंबेडकर के चुनाव के चरित्र पर प्रश्न उठाकर अंबेडकर का अपमान नहीं करते?? और इनसे इतर वो क्या कहना चाहते हैं कि जो व्यक्ति एक चरित्रहीन स्त्री के जाल में फस गया उसने इतना बड़ा संविधान सही सही कैसे लिखा होगा? या फिर मीठा मीठा गप्प और कड़वा कड़वा थू थू....
● जय भीम बोलकर वो, ब्रह्मा विष्णु महेश राम सीता कृष्ण को गाली देंगे।ब्राम्हणों को पाखंडी बताएंगे मगर बच्चे के अन्नप्राशन से लेकर मुंडन या विवाह हिन्दू कर्मकांड पद्धति से कराएंगे और जब भगवान को कोसते कोसते एक दिन दुनिया से जाने का समय हो जायेगा तो अन्तिम संस्कार भी हिन्दू पद्धति से ही होगा..
आंबेडकर जी के जन्मदिवस पर ये बाते आवश्यक थी क्योंकि दुनिया में कोई पूर्ण नहीं होता कुछ कमियां रहती है, चाहे आंबेडकर हो सावरकर हो या गांधी.अच्छी बातों को ग्रहण न करके, उनके नकारत्मकता को स्वीकारने की जल्दी हो गई है आजकल।। आज समाज में "जय भीम" का नाम लेकर ही सबसे ज्यादा "भीम" की शिक्षाओं का अपमान उनके विचारधारा के तथाकथित ठेकेदार करते आ रहे हैं..और इसके पीछे कुत्सित मकसद है राजनैतिक स्वार्थ और एक ख़ास वर्ग का विरोध जो तमाम बेड़िया डालने के बाद भी आज खुद की जगह प्रमाणिकता से समाज में बनाये हुए है....
बाबा साहेब के जन्मदिवस की शुभकामनायें.
जय भीम....
आशुतोष की कलम से.

बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर के जन्मदिवस पर विशेष



चित्र: संविधान लिखने वाले कमेटी क सभीे सदस्य (बाबा साहेब प्रथमपंक्ति में मध्य में) 
भारत के पहले कानून मंत्री एवं भारत के संविधान के ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के जन्मदिवस् की शुभकामनायें...
संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी एवं बाबा साहेब के जीवन से सम्बंधित कुछ अन्य तथ्य ...
डाक्टर आंबेडकर के अलावा संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी में 6 सदस्य और एक कांस्टिट्यशनल एडवाइजर थे जिनके नाम
● गोविन्द बल्लभ पन्त (उत्तरप्रदेश के प्रथम।मुख्यमंत्री)
● कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी(केएम मुंशी (पूर्व गृह मंत्री बॉम्बे)
● अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर(पूर्व-एडवोकेट जनरल,मद्रास स्टेट)
●एन गोपालस्वामी अयंगर (पूर्व प्रधानमंत्री जम्मू और कश्मीर
● बीएल मित्तर( पूर्व एडवोकेट जनरल-भारत) बाद में जिन्हीने इस्तीफा दिया और माधव राव (वडोदरा के राजा के क़ानूनी सलाहकार) ने इनकी जगह ली
●मोहम्मद सदुल्लाह (असम के पूर्व मुख्यमंत्री)
●डीपी खेतान (खेतान बिजनेस परिवार से और एक बड़े वकील ) उनक़ी मृत्यु के बाद टीटी कृष्णामाचारी ने उनकी जगह ली..
● कांस्टिट्यशनल एडवाइजर सर बेनेगल नरसिंह राव थे जो बाद में इंटरनेशनल कोर्ट आफ जस्टिस में प्रथम भारतीय जज बने)

बाबा साहेब के जीवन के कुछ अन्य तथ्य

◆डाक्टर आंबेडकर ने सामाजिक भेद भाव के विरुद्ध अभियान चलाया। दलितों, श्रमिकों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया।
◆डाक्टर भीमराव आंबेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत थे और उनके पिता, भारतीय सेना की महू छावनी में सेवा में सूबेदार के पद पर कार्यरत थे। महू छावनी में ही भीमराव का जन्म हुआ..
◆ बाबा साहेब का नाम पहले भीमराव था..उनके एक ब्राह्मण शिक्षक कृष्णा महादेव आंबेडकर जो उनसे विशेष स्नेह रखते थे, ने उनके नाम में अपना उपनाम ‘आंबेडकर’ जोड़ दिया। तो कृष्णा महादेव ने भीमराव को "भीमराव आंबेडकर" बनाया और आज भी बाबा साहेब को "आंबेडकर" उपनाम से दुनिया जानती है।
◆महाराज बड़ौदा सयाजीराव गायकवाड़ ने छात्र भीमराव अंबेडकर को फेलोशिप देकर बिदेश पढ़ने के लिए भेजा और डॉक्टर अंबेडकर ने वहां अपनी उच्च शिक्षा पूरी की।
◆ 1906 में इनका विवाह हुआ और डाक्टर आंबेडकर की पत्नी का नाम रमाबाई था। सन 1935 में रमाबाई का देहांत हो गया।
◆ "शारदा कबीर नाम की सारस्वत ब्राह्मण से डॉक्टर अंबेडकर ने दूसरा विवाह किया और अपना नया नाम सविता अंबेडकर रख लिया.शारदा कबीर ने अंतिम समय तक बाबा साहेब की सेवा किया.
◆डाक्टर अंबेडकर ने कहा कि हिन्दू मुस्लिम एकता एक अंसभव कार्य हैं भारत से समस्त मुसलमानों को पाकिस्तान भेजना और हिन्दुओं को वहां से बुलाना ही
एक हल है । मुस्लिम कानूनों के अनुसार भारत हिन्दुओं
और मुसलमानों की समान मातृभूमि नहीं हो सकती । वे भारत जैसे गैर मुस्लिम देश को इस्लामिक देश बनाने में जिहाद आतंकवाद का संकोच नहीं करते । (प्रमाण सार डा अंबेडकर सम्पूर्ण वाग्मय , खण्ड १५१)
◆अपनी मृत्यु से लगभग 52 दिन पूर्व डॉक्टर आंबेडकर ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और ब्रम्हा विष्णु महेश और अवतारों के अस्तित्व को नकारते हुए कहा कि मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में कोई आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा...
◆ब्राम्हण उपनाम एवं पत्नी को व्यक्तिगत जीवन में स्वीकार किये डाक्टर आंबेडकर ने अपनी से 52 दिन पूर्व किये धर्म परिवर्तन के समय कहा कि "मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूँगा"।।
आशुतोष की कलम से

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

ट्रिपल तलाक: मौलवियों की कुंठित काम पिपासा को शांत करने का एक साधन

सनातन धर्म में सती प्रथा की परंपरा थी। सती प्रथा एक ऐसी प्रथा थी जिसमें, किसी महिला का पति मर जाता था तो महिला पति के साथ ही उसी चिता में जल जाती थी.संभवतः सतयुग,द्वापर,त्रेता तक, योग दैनिक जीवन का एक हिस्सा था और महिला स्वेच्छा से योग के द्वारा चिता में बैठे-बैठे अपने प्राण त्याग देती थी..ऐसे योग का वर्णन आज भी उपलब्ध है.. मैं स्वेच्छा से चिता में बैठने वाली प्रथा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जब कलयुग में भी रानी पद्मनी ने हजारों महिलाओं के साथ जौहर किया था,तो न तो समाज ने, ना ही सनातन धर्म ने उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य किया था...युग बदले और कालांतर में स्वेच्छा से चिता में बैठने वाली इस प्रथा ने बहुत ही विभत्स रूप ले लिया। बाल विवाह की व्यवस्था भी कुरीति का रूप ले चुकी थी। एक 8 साल की बच्ची का पति यदि मर जाता था तो उसे सती प्रथा के अनुसार चिता में जलकर मरना होता था, और प्रथा का स्वरूप इतना विकृत हुआ कि यदि महिला की सहमति नहीं हुई तो भी उसे जबरिया जिंदा चिता में डालकर जला दिया जाने लगा। धीरे-धीरे इस प्रथा का विरोध हुआ कानून बनाए गए और यह प्रथा आज खत्म हो गई । क्या इससे हिंदू धर्म समाप्त हो गया या सनातन धर्म पर कोई खतरा आ गया?? ऐसा नहीं हुआ क्योंकि भगवान श्री कृष्ण ने गीता में स्वयं ही कहा है कि "परिवर्तन ही संसार का नियम है। काल समय परिस्थिति के अनुसार हमारी मान्यताएं विचारधाराएं कानून और यहां तक की पूजा पद्धति भी बदलती रही है परंतु इससे परमात्मा के होने की मूल भावना नहीं बदल जाती है...

कुरान में कहीं भी तीन तलाक का जिक्र नहीं..ये तीन तलाक और फिर कुछ केसेज में हलाला प्रथा, सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के शरीर को भोगने की मौलवियों की कुत्सित मानसिकता एवं कुंठित काम पिपासा को शांत करने का एक साधन मात्र है । आज जब पूरे भारत की मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक और हलाला के खिलाफ खड़ी हो गई हैं, तो मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड नाम के एक इश्लामिक ठेकेदारी वाले एनजीओ को, मुसलमान बिरादरी में पिछले 40 से ज्यादा सालों से चली आ रही बादशाहत खत्म होने का खतरा मंडराने लगा है। ज्यादा संभावना है कि कोर्ट या सरकार , मुस्लिम महिलाओं के ऊपर तीन तलाक के माध्यम से किए जा रहे अत्याचार को कानून बनाकर खत्म कर दें । विरोध बढ़ता देख मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड नाम के NGO के उपाध्यक्ष ने यह कहा है कि वह डेढ़ साल में ट्रिपल तलाक को खत्म कर देंगे । जब ट्रिपल तलाक कुरान में लिखा ही नहीं है तो यह डेढ़ साल का वक्त किस लिए?? विश्व की सबसे ज्यादा मुस्लिम जनसंख्या वाला देश इंडोनेशिया या मध्य पूर्व के अनेको मुस्लिम देशों में तीन तलाक की प्रथा को खत्म किया कर दिया गया है, और उन देशों के सामने भारत के मौलाना नाक रगड़ते रखते हैं तो क्या वह सभी देश "कुफ्र" कर रहे हैं ??? यह एक विचारणीय प्रश्न है।
एक छोटे से घरेलू विवाद में किसी महिला का शौहर अमेरिका या सऊदी अरब से बैठे-बैठे WhatsApp पर उसको तलाक तलाक तलाक लिख कर भेज देता है और वह कानूनन मान्य हो जाता है । इसके बाद शौहर का गुस्सा शांत होता है और उसे अफसोस होता है कि यह मैंने क्या कर दिया?? लेकिन ट्रिपल तलाक कानून के अनुसार अब उस लड़की को किसी मौलवी (ज्यादातर केस में ) या किसी अन्य पुरुष के साथ निकाह करना पड़ेगा। यह सांकेतिक नहीं होगा ,वह पुरुष या मौलवी उस स्त्री के साथ संभोग करेगा थोड़ा और स्पष्ट समझा दूँ तो उसके साथ सेक्स करेगा और इस बात का ध्यान रखा जाएगा कि महिला दूसरे पुरुष से गर्भवती ना हो जाए इसके बाद एक निश्चित समयावधि (इद्दत) के बाद वह पुरुष उस महिला को फिर तलाक दे देगा और पुनः वह महिला अपने पहले पति के साथ रह सकेगी..
इतना वीभत्स, इतना घिनौना व्यवहार क्या कोई भी मुसलमान अपनी बेटी या बहन, जिसे उसने बहुत ही नाजो से पाल पोस कर बड़ा किया है उसके साथ होना पसंद करेगा ??? यदि आप का उत्तर हाँ है तो बेशक आप तीन तलाक का समर्थन कीजिए और अपनी बहनों का बेटियों का हलाला कराइए और यदि आप अपनी बहन-बेटियों की इज्जत और जीवन को सुरक्षित और खुशहाल रखना चाहते हैं तो, सामने आकर इस कुप्रथा का विरोध कीजिए और सती प्रथा की तरह ट्रिपल तलाक की भी अमानवीय प्रथा को खत्म करने की पहल कीजिए.
आशुतोष की कलम से

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था

अत्यन्त साधारण सी तस्वीर और अत्यन्त साधारण सा नाम "मोहनलाल भास्कर" शायद हममे से बहुत कम इनके बारे में जानते हों.. सन 1971 में विवाह के एक वर्ष के ही भीतर इन्हें पाकिस्तान में लाहौर से भारत के लिए जासूसी करने के अपराध में पाकिस्तानी सेना ने गिरफ्तार किया इसमें कोई शक नहीं कि मोहनलाल भास्कर रा के एक एजेंट थे और पाकिस्तान में रहकर पाकिस्तान के न्यूक्लियर प्रोग्राम की खुफिया जानकारियां एकत्रित करके भारत को भेज रहे थे। भारत की एक अन्य एजेंट की गद्दारी के कारण मोहनलाल भास्कर पकड़े गए और उसके बाद इनके ऊपर मुकदमा चलाया गया। मुकदमों के साथ यातनाओं और दरिंदगी का वह लंबा दौर मोहनलाल भास्कर ने लाहौर ,कोट लखपत,मियांवाली, मुल्तान और पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में झेला जिसका वर्णन करते करते उन्होंने एक पूरी किताब ही लिख डाली और उसी किताब के कुछ से निकली भारत सरकार के प्रति एक मूल भावना को मैं उद्धत कर रहा हूं।
मोहनलाल भास्कर कहते हैं कि अगर मुझे अपने लिए किसी पेशे का चुनाव करना पड़े तो जासूसी मेरे लिए आखिरी विकल्प होगा.. ...जैसा कि हर जासूस के केस में होता है कोई भी देश उसे अपना जासूस स्वीकार नहीं करता और उसे एक सामान्य नागरिक बताया जाता है।इस मामले में सरकारें ज्यादा कुछ कर भी नहीं कर सकती क्योंकि औपचारिक रुप से वह यह स्वीकार नहीं कर सकती कि उन्होंने अपना जासूस किसी और देश में सूचना एकत्रित करने के लिए भेजा है। यह बात जासूस भी जानते हैं कि पकड़े जाने की स्थिति में सरकार उन्हें अपना नहीं मानेगी।
मोहनलाल भास्कर के पकड़े जाने के बाद भी यही हुआ भारत सरकार ने उन्हें भारत का नागरिक तो बताया मगर यह मानने से इनकार कर दिया कि वह भारत के जासूस हैं। पाकिस्तान में उन पर मुकदमा चला और किसी प्रकार से वह मौत की सजा से बच गए और 14 साल की उम्र कैद हुई, दूसरी ओर भारत सरकार ने मोहनलाल भास्कर के घर लिखे गए पत्र में मोहनलाल भास्कर को एक सामान्य भारतीय बताया और यह कहा कि अन्य भारतीयों के साथ उनकी भी रिहाई के प्रयास जारी हैं।भारत में पाकिस्तान की भी कुछ जासूसों को पकड़ रखा था और लगभग 7 वर्ष बाद जासूसों के अदला-बदली के प्रोग्राम में पाकिस्तानी जासूस के बदले में उन्हें भारत भेजा गया मगर वह 7 वर्ष मोहनलाल भास्कर के लिए कुछ इस प्रकार भी थे कि सामान्य व्यक्ति उस प्रताड़ना और दरिंदगी से या तो मर जायेगा या पागल हो जाएगा..
खैर कितने दिनों में मोहनलाल भास्कर ने पाकिस्तानी सरकार की सारी दरिंदगी झेलते हुए भी भारत की कोई भी खुफिया जानकारी लीक नहीं की। मोहनलाल भास्कर की रिहाई में डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन का भी एक प्रमुख योगदान रहा जिन्होंने भारत सरकार से मोहनलाल भास्कर की पैरवी की थी।जब मोहनलाल भास्कर भा वापस भारत आ गए तो कुछ दिनों तक तो उनके या सरकारी तामझाम और आने वालों की भीड़ लगी रही मगर धीरे-धीरे भीड़ छटने लगी और मोहनलाल भास्कर को 2 जून की रोटी का भी प्रबंध करना मुश्किल हो गया।
मगर दुश्मन देश के साथ-साथ अपने देश की भी सरकारें जासूसों के प्रति कितनी क्रूर होती हैं इसका अनुभव मोहनलाल को पूर्व में अपने व्यक्तिगत मित्र और उस समय भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से भेंट करने के बाद हुआ। मोहनलाल भास्कर ने मोरारजी से कहा कि जो भारतीय एजेंट या जासूस पाकिस्तान में पकड़े जाने जाते हैं और पाकिस्तानी जेलों में कई कई वर्षों तक भयानक यातनाएं सहते हैं, उनको तथा उनके परिवार को भारतीय सरकार को पेंशन या उचित पुरस्कार देना चाहिए, जिससे कि उनके रोजी रोटी का प्रबंध हो सके ।। 
मोहनलाल भास्कर कहते हैं कि मेरे इस निवेदन पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का जो उत्तर था उसको सुनने के बाद उनका खून खौल उठा और अगर उनके पास पिस्तौल होती तो वह तब तक गोलियां बरसाते जब तक कि पूरी गोलियां खत्म नहीं हो जाती। मोरारजी देसाई का जवाब था कि हम पाकिस्तान के किये की सजा क्यों भुगतें ??क्या तुम्हारा मतलब है कि अगर पाकिस्तानी सरकार तुम्हे 20 साल तक कैद में रखती तो हम तुम्हें 20 साल का मुआवजा देते???
ध्यान दीजिए क्या वह व्यक्ति बोल रहा था जिसने इमरजेंसी में सिर्फ 19 महीने की कैद काटी और कैद में सहे तथाकथित अत्याचारों के नाम की दुहाई देकर प्रधानमंत्री की गद्दी हासिल कर ली थी और उन्होंने महीने अपनी पार्टी से संबंध जो भी लोग कैद में थे उनके लिए मोटी मोटी पेंशन भी तय कर दी थी.. अगर पाकिस्तानी जेल में प्रताड़ना से मोहनलाल भास्कर पाकिस्तान में ही मर जाते तो भारत सरकार उनके परिवार के साथ क्या व्यवहार करती इसका अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं।
मोहनलाल भास्कर तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के व्यवहार से इतना दुखी थे कि उन्होंने कहा कि मैं अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करके आज यह कहना चाहता हूं कि देशभक्ति के नाम का सहारा लेकर इस देश में सैकड़ों नौजवानों की जिंदगी से खिलवाड़ किया जाता है। कुछ लोग तो बेकारी का शिकार होकर इस धरने में फंसते हैं लेकिन उन्हें मिलता कुछ नहीं है बस बॉर्डर क्रॉस करते हुए दुश्मन की गोली, दुश्मन की जेल और अनगिनत अत्याचार.... यह सोच कर हैरान होती है कि भारत के तत्कालीन पाखंडी मूत्रपान करने वाले प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के पास स्मगलरों और गुंडों को अपने घर बुलाकर तीन-तीन दिन तक उनकी मेहमाननवाजी करने और उनकी समस्या सुलझाने का समय था तो था मगर जिन्होंने इस देश के लिए जान की बाजी लगाकर दुश्मन की फांसी की कोठरियों में अपना जीवन बिता दिया उनके लिए संवेदना के दो शब्द भी सरकार के पास नहीं थे..
हांलाकि अपनी पुस्तक के अंतिम भाग में मोहनलाल भास्कर ने यह माना है कि उन्होंने जो किया वह देश पर एहसान नहीं बल्कि देश के लिए अपना फर्ज निभाया मगर मोरारजी देसाई सरकार से उनकी घृणा इस स्तर की थी की पुस्तक के अंत में उन्होंने लिखा कि मोरारजी देसाई को छोड़कर जिस किसी की भी भावना मेरे लेखन से आहत हुई है उनसे मैं माफी मांगता हूँ....
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इतना लंबा
लेख लेख लिखने का मतलब यही था की आप और हम समझ सके कि सैनिकों के अलावा भी एक गुमनाम लोगो की दुनिया होती है जो प्रचार से दूर होती है..उसमें सेना के अफसर से लेकर बेरोजगार नौजवान होते हैं। कइयों की लाश नहीं मिलती.. कइयों को अपने देश में ही संदेहास्पद परिस्थिति में मरना पड़ता है और कइयों को इस देशभक्ति का इनाम ये मिलता है कि उन्हें और उनके परिवार को आजीवन न्याय नहीं मिलता और विडंबना ये की सरकार की मर्जी के बिना वो कुछ बोल भी नहीं सकते..ऐसे सभी बलिदानियों एवं उनके परिवार वालों को नमन ।।
आशुतोष की कलम से

सोमवार, 6 मार्च 2017

मीडिया के कुचक्र में फसता राष्ट्रीय संघ सेवक -डॉक्टर कुंदन चंद्रावत की बर्खास्तगी

● राष्ट्रीय संघ सेवक के नेता डॉक्टर कुंदन चंद्रावत ने केरल में संघ के कार्यकर्ताओं की रोज रोज हो रही हत्याओं से व्यथित होकर भावावेश में ये बयान दे दिया कि, केरल के मुख्यमंत्री का जो सर काट कर लाएगा उसको वो अपनी जीवन भर की पूंजी वो मकान दे देंगे जिसकी कीमत एक करोड तो होगी ही..अब यह एक उत्तेजना में दिया गया बयान था मगर बयान तो दिया गया था, बाद में उन्होंने संघ के कहने पर, इस पर माफ़ी भी मांगी मगर संघ ने, जिसपर फासीवादी होने का आरोप लगता है उसने उन्हें बर्खास्त कर दिया..
● पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का एक मुस्लिम नेता इमरान मसूद मोदी की बोटी बोटी काटने की धमकी देता है।कांग्रेस न उसकी निंदा करती है ना उस पर कोई कार्यवाही करती है । उसने कभी अपने इस बयान के लिए माफी भी नहीं मांगी और इस विधानसभा चुनाव में वह राहुल गांधी के चहेतों में शामिल था..
● पिछले कई दशकों से केरल में वामपंथियों द्वारा हिंदुओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्थकों की थोक में हत्याएं की गई मगर ना तो वामपंथियों ने इस पर कोई अफसोस जताया ना ही कोई कार्यवाही की।।।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बुद्धिजीवियों से भरा हुआ वैचारिक रूप से बहुत ही उच्च सोच वाला संगठन है। मगर मेरी अल्प बुद्धि में जो बात समझ में आ रही है कि हम वही गलतियां कर रहे हैं,जो कभी मुगलों के साथ युद्ध में हमारे हिन्दू राजाओं ने की। मुगल हमेशा हमारे बच्चों और महिलाओं को टारगेट करते रहे और हम आदर्शवाद के उच्चतम स्तर का लबादा ओढ़े हुए युद्ध करते थे.मुग़ल सैनिक युद्ध के समय अपने परिवार महिला बच्चों की चिंता से मुक्त रहते थे क्योंकि अगर हिन्दू उन्हें पाएंगे तो सम्मान से घर भेज देंगे जबकि हिन्दू योद्धा इसी चिंता में रहते हुए युद्ध लड़ते थे की अगर उनका परिवार महिलाएं बेटियां मुगलो के हाथ लग गई यो तो चौराहे पर नंगी घुमाई जाएँगी इसलिए एक ओर सैनिक युद्ध के लिए प्रस्थान करता दूरी और जौहर के लिए चिताएं सजा दी जाती थी की हिन्दू स्त्रियों की इज्जत बच जाए जान भले ही जाये...
इस प्रकार नैतिक उच्चता के मानदंड स्थापित करके आप मारे ही जायेंगे, जैसा केरल में खा रहे हैं और ज्यादा से ज्यादा एक दो राज्यों में अंतिम समय में सरकार बना लें.. यहाँ हलाहल को हलाहल से धोने की जरूरत है..सर काटने वालों के सामने सहिष्णुता और चरखा कातने की विचारधारा ने लाखों की हत्या करवाई और भारत का विभाजन कराया.मेरे समझ से भले ही आरएसएस कुंदन जी का समर्थन न करती मगर मिडिया के दबाव में आ कर उनको संघ के दायित्यों से मुक्त करना,समर्पित कार्यकर्ताओं में निराशा का भाव ले आएगा...
आशुतोष की कलम से