मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

"जेहादन आयशा" का हनीट्रैप,आईएसआई का जाल और ध्रुव सक्सेना(PAK ISI SPY Aisha)

मध्य प्रदेश की तथाकथित साम्प्रदायिक भाजपा सरकार की पुलिस ने 11 आईएसआई के संदिग्ध एजेंटों को पकड़ा है जिसमें एक भी मुसलमान नहीं है..दिग्विजय सिंह से लेकर अन्य सभी शेखुलर नेताओं में यह बताने की होड़ लग गई है कि पकड़े गए 11 ISI के सहयोग करने वाले लोगो में कोई भी मुसलमान नहीं है.हालांकि ये सूचना पूरी  सत्य नहीं है 

तथ्य ये है कि "
आयशा उर्फ़ आशिया  नाम की महिला ने अपने हुश्न के जाल में फसाकर "राशनकार्ड" बनवा बनवा कर इन लोगो से ये काम कराया और हनीट्रैप में फसाने वाली "जेहदान आयशा" भी इन 11 लोगों के साथ गिरफ्तार की गई है मगर मिडिया को "आयशा" दिखती कहाँ है???"जेहादन आयशा उर्फ़ आशिया"  ने बड़ी ही शातिराना तरीके से कई लड़कों की तरह "ध्रुव सक्सेना" नाम के लड़के को अपने प्रेमजाल में फास रखा था और उससे वो हवाला कारोबार कराती थी. बाद में ध्रुव ने भाजपा ज्वाइन कर ली और बाद में जब ATS  ने ध्रुव और आयश समेत 11 लोगों को गिरफ्तार किया तो पता चला की ये हवाला कारोबार ISI  के इशारे पर हो रहा था और देवबंदी छाप आतंक के पैरोकारों ने इसे भाजपा बजरंगदल और पता नहीं किस किस से जोड़ दिया..
ध्रुव सक्सेना को अपने प्रेमजाल में फासने के साथ साथ "जेहादन आयशा उर्फ़ आशिया " ध्रुव के साथ भोपाल के न्यू मिनाल रेजीडेंसी  में एक ही फ्लैट में रहती थी और ध्रुव ने आयशा उर्फ़ आशिया से निकाह करने के लिए धर्म परिवर्तन की योजना बनाई थी  तब तक हवाला रैकेट पकड़ा गया और पता चला की हवाला का रैकेट "जेहादन आयशा उर्फ़ आशिया " के माध्यम से ISI  चला रही है। मतलब इसमें मालिक आयशा उर्फ़ आशिया थी और बाकी उसके कर्मचारी जिसमें कुछ को वो पैसे तो कुछ को अपना जिस्म फ़ीस के रूप में देती थी। 
मगर मेरा मुद्दा वो 11 है जो "आयशा" की जमात से नहीं है.. कोई भी मुसलमान नहीं है,कोई भी मुसलमान नहीं है यह बात बार-बार दोहरा कर दिग्विजय सिंह और उनके जैसे शेखुलर नेताजी लोग स्वयं यह साबित और स्वीकार कर रहे हैं कि ज्यादातर मामलों में ISI के एजेंट मुस्लिम समुदाय से ही होते हैं। अगर आज तक आई एस आई के पकड़े गए एजेंटों की गिरफ्तारियों को देखा जाए तो लगभग 99% गिरफ्तारियां एक समुदाय विशेष के लोगों की हुई है।और ईमाम बुखारी जी ने एक बार यहाँ तक कहा था कि "हाँ मैं ISI का एजेंट हूँ किसी की हिम्मत हो तो गिरफ्तार करके दिखाये"।।
खैर अब इससे जो बड़ी बात है, कि इन पकड़े गए 11 लोगों में से एक भारतीय जनता पार्टी के मीडिया सेल से जुड़ा रहा है। अगर आई एस आई का एजेंट TMC, SP, BSP, INC या किसी देवबंदी छाप पार्टी से पकड़ा जाता है तुझे कोई आश्चर्य की बात नहीं होती क्योंकि पहले भी ऐसा होता रहा है....मगर यदि आईएसआई के एजेंटों ने भारतीय जनता पार्टी के मीडिया सेल पर घुसपैठ कर ली है तो सचमुच एक गंभीर मामला है और भारतीय जनता पार्टी को इस बात पर विचार करना होगा कि, किस आधार पर अपने विभिन्न कार्यालयों में लोगों का प्रवेश कराया जा रहा है। अन्यथा विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जायेगा..
अक्सर जब कोई "मुस्लिम समुदाय" का ISI एजेंट पकड़ा जाता है तो एजेंट के अलावा सम्बंधित धर्मगुरु और नेता जी लोग उसको निर्दोष होने का सर्टिफिकेट दे देते हैं और कई केस में वो "जेहादी प्रोफ़ेसर जिलानी" की तरह बरी हो जाते हैं(बाइज्जत बरी नही होते कम सबूतों के कारण और वोटबैंक के दबाव के कारण होते हैं)।ठीक इसी प्रकार उत्तरप्रदेश की सरकार ने संकटमोचन मंदिर में बम फोड़कर दर्जनों को चीथड़े कर देने वालों से "समुदाय विशेष" का होने के कारण मुकद्दमा वापस ले लिया था तब कोर्ट ने कहा था
"आज आतंकियों पर से मुकद्दमा वापस ले रहे हो कल भारत रत्न दे देना"।।
मगर मेरा मानना है ऐसा तुष्टिकरण इन 11 के केस में नहीं होगा और होना भी नहीं चाहिए ...सरकार को एक और बाद ध्यान रखना होगा की इन 11 लोगो का पूरा जीवन जेल में ही बीते और तबाह हो जाये ताकि दोबारा कोई हिन्दू ISI की अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष सहायता करने की जुर्रत न करे..मुझे पूरा भरोसा है कि अभी तक "देवबंद के फतवे" की तरह किसी हिन्दू "मठ, अखाड़े या मंदिर" ने ये नहीं कहा कि ये बेचारे निर्दोष भटके हुए हिन्दू नौजवान है, न ही कोई भाजपा का कोई नेता इनकेे पक्ष में आया है क्योंकि भारत में बम फोड़कर फांसी पा कर भी निर्दोष और शहीद होने की इम्युनिटी और तमगा केवल "याकूब" "अफजल" और "जिलानी" को मिल सकता है किसी "ध्रुव सक्सेना" को नहीं...

सबका यही मत है कि ये 11 गद्दार है और गद्दारों के लिए कोई संवेदना नहीं, कोई फतवा नहीं..बाकी "आयशा" तो निर्दोष हो ही जायगी क्योंकि वो "वोट बैंक की फसल आयशा" जो ठहरी ...कानूनन जो अधिकतम सजा है इनके अपराध के लिए वो इन्हें दी जाये.हिन्दू समाज से इनके समर्थन में कोई आवाज नही है और न ही आएगी और यही बात हमें औरों से अलग बनाती है...
भारत माता की जय...
आशुतोष की कलम से

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

प्रेम का व्यवसायीकरण (Happy Rose Day)

प्रेम अब वयस्क और समझदार हो चूका है..रोज डे, प्रपोज डे मनाने वाली जनरेशन उस भाव को नहीं समझती, जब चार लाइन लिखने में पूरा लेटरपैड खत्म हो जाता था, और कमरे में गोला बना के फेके गए आधे लिखे पत्रों का छोटा मोटा हिमालय खड़ा हो जाता था.. कई रातें किताबो के अंदर छुपाये उस पेपर पर चार लाइने लिखने में बीत जाती थी और फिर भी लगता था कुछ कमी है। और इन सब के लिए किसी #रोजड़े #प्रपोजडे की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती थी..क्योंकि निश्च्छल संवेदनाएं प्रतीक्षा क्यों करें?? उनके लिए वर्ष का कोई भी समय पवित्र है.वो सब आग्रह, अपरिपक्व आकर्षण ही सही मगर प्रेम का पुट लिए हुए था ।
आज रोजड़े प्रपोज डे की प्रतीक्षा होती है..क्योंकि सब कुछ बाजार ने नियंत्रित कर लिया है, आप की भावनाएं भी और "प्रेम का अंतिम अभीष्ट" भी बाज़ार ही निर्धारित करता है, आप को प्रेम नहीं भी होता है तो बाज़ार द्वारा करवाया जाता है बेशक
उसे आप दो महीने बाद त्याग दें.आज लिखने लिखाने के लिए स्मार्टफोन है,पहले से लिखी लाईने हैं जिसमें सिर्फ "To" और "From" बदल बदल कर "Send To Many" कर दिया जाता है। आज कल कई केस में सिर्फ "TO" बदला जाता है क्योंकि प्रेम भी बेहतर विकल्पों की तलाश में है..आज का प्रेम खुद को परिशोधित करता रहता है.रिसर्च करता रहता है और "प्रोडक्ट" में बदलाव का ऑप्शन सदैव खुला रखता है.
आज कल प्रेम में आवाज, व्यक्तित्व और आत्मा को गौड होती जा रही है और बेबी का बेस और होठ प्रधान होता जा रहा हैं...आत्मा से शुरू हुआ आख्यान देह की गोलाइयों में "कभी मेरे साथ एक रात गुजार" को अभीष्ट मान बैठा है.. पहले सिर्फ "प्रेमिका" या "प्रेमी" हुआ करते थे अब "We are just Good friends" वाला रिश्ता आ गया है..इस रिश्ते में सहूलियत है किसी भी सीमा पर जा के वापस लौट आने और फिर से "Just Good friends" बन जाने की.
प्रेम का प्रदर्शन और बाज़ारीकरण ने उसकी राधा,मीरा और सीता रूपी समर्पण की महत्ता को छीनकर "अनारकली डिस्को चली" वाले क्लब में ला के खड़ा कर दिया है.."प्रेम अब समर्पित नहीं होता,प्रेम की बोली लगती है..मॉल्स में,थियेटर में और महंगे महंगे शॉपिंग काम्प्लेक्सेज में...."और जब आप ने "बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होई??" यूरोप की अच्छाइयां तो हम स्वीकार नहीं करेंगे क्योंकि वैसा करने में हमे श्रम और उद्यम करना पड़ेगा..मगर यूरोप बुराइयाँ जरूर ले आएंगे..वो हमें शॉर्टकट में ओवरनाईट मॉडर्न बनाती है..और हमारी समाज और शिक्षा की पद्धति ऐसी ही है कि ये सब अनजाने में हम आने वाली पीढ़ी को ट्रान्सफर भी करते जा रहे हैं. राजीव भाई के व्याख्यान की दो लाइने यहाँ प्रासंगिक लगती है..
पहली ये की "यूरोप में एक समय ऐसा भी था कि प्राथमिक स्कूलों से ज्यादा गर्भपात केंद्रों या अवार्शन सेंटर्स की संख्या थी।'"
दूसरा यह कि यूरोप में "ब्रोथल्स" के सामने एक बोर्ड लगा होता था "सावधान जिसके साथ आप सेक्स करने जा रहे हैं, वो आप की बिटिया हो सकती है।".....
हैप्पी रोज डे, चॉकलेटडे, किश डे, मिस डे.....एंड सो आन टू बी कान्टीन्यूड।
आशुतोष की कलम से

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

जीसस गायत्री मन्त्र ईसाईयों द्वारा धर्मांतरण का नया तरीका (Conversion)

मैंने काफी पहले भाई राजीव दीक्षित भाई के गुरूजी प्रोफेसर धर्मपाल की एक पुस्तक पढ़ी थी "Despoliation and Defaming of India" पुस्तक में ब्रिटेन की संसद,जिसे हाउस ऑफ कामंस के नाम से जाना जाता है, उसकी प्रोसीडिंग्स लिखी थी।मैकाले से लेकर अन्य कई वरिष्ठ ब्रिटेन के सांसदों ने अपने विचार उसमें दिए थे।हाउस ऑफ कामंस ने उस डिबेट का टॉपिक ही था "द ब्रिटिश डिबेट ऑन क्रिश्चिनाइजेशन ऑफ इंडिया"। इस डिबेट में ब्रिटेन की संसद में सांसदों ने अपने अपने विचार रखें 22 जून 1813 को विलियम बिलबर फोर्स जो कि ब्रिटेन के हाउस ऑफ कामंस का सदस्य था, उसने उसने एक "क्रिश्चनाइज्ड इंडिया" को ब्रिटेन की ड्यूटी बताते हुए भारत को किस प्रकार ईसाईकरण किया जाए या भारत का इसाईकरण क्यों आवश्यक है इस पर अपने विचार रखे. 1 जुलाई 1813 को ब्रिटेन हाउस ऑफ कॉमंस में पुनः विलियम बिलबर फोर्स की दूसरी स्पीच हुई मुद्दा वही था भारत का इसाईकरण। इसके बाद जेम्स मिल और टीबी मैकाले की स्पीच हुई जिसमें ये योजना बनाई गई थी कि आने वाले समय में किस प्रकार भारत को एक ईसाई राज्य बनाना है.
आजादी के बाद सत्ता का स्थानांतरण नेहरू जी जैसे व्यक्तियों के हाथ में किया गया इसके पीछे भी टी बी मैकाले की वही नीति थी कि भारत में हमें मानसिक रूप से अंग्रेजों की एक पीढ़ी तैयार करनी है जो देखने में भारतीय हो। नेहरू जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अंग्रेजों की भारत को क्रिश्चनाइज करने की रणनीति को उर्वरा भूमि मिल गई इसी क्रम में अंग्रेजों ने भारत सरकार पर अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए विभिन्न क्रिश्चियन मिशीनरीयों को भारत भेजा और बड़े पैमाने पर भारत में धर्मांतरण का खेल हुआ जिसका परिणाम ये है कि आज पूरा नार्थ ईस्ट ईसाई है. अब चूकि हमारे शासक बौद्धिक रूप से अंग्रेज वर्ग से संबंधित थे और नेहरु जी ने तो स्वयं भी स्वीकार किया है कि वह बाई चांस हिंदू है अगर नेहरू के शब्दों में कहें "आई एम अ हिंदू बाई चांस" इस कारण धर्मान्तरण और आसान हो गया।
जब ईसाई मशीनरी यहां आए तो वह इस बात को अच्छी तरीके से जानते थे कि भारत की जनता को सीधे-सीधे उनके धर्म को गाली देकर, नीचा दिखा कर बड़े पैमाने पर धर्मांतरित नहीं किया जा सकता है। तब उन्होंने एक नया खेल खेला जो की अनवरत आज भी जारी है वह हमारे प्रतीक चिन्हों को स्वीकार करने लगे अगरबत्ती दिखाना,हवन करना,गेरुआ वस्त्र पहनना,यहां तक कि कमंडल खड़ाऊं और चंदन लगाना यह सब करके वह भोले-भाले हिंदुओं की जीवन में प्रवेश करते थे और धीरे-धीरे कृष्ण और राम की तस्वीर के जगह पर ईसा मसीह की तस्वीर रखकर पूजा प्रारंभ कर आते थे और इसी क्रम में उस व्यक्ति की आने वाली पीढ़ी पूर्णतया ईसाई होती थी.. ये कार्यक्रम सन 1813 से आज तक जारी है...
नीचे एक वीडियो आप लोगों से शेयर कर रहा हूं वही रणनीति हिंदुओं को धर्मांतरित करने के लिए हिंदुओं की ही प्रतीक चिन्हों का उपयोग करो अब तक हम सभी गायत्री मंत्र सुनते आए थे अब "जीसस मंत्र" बन गया और यह बनाने वाले भी कोई अंग्रेज नहीं चंद टुकड़ों की खातिर परिवर्तित हुए मैकाले के मानसपुत्र हैं. सरकार और समाज को बहुत गंभीरता से "एंटी कन्वर्जन ला" पर विचार करना होगा अन्यथा इश्लामिक जेहादियों से इतर समाज का एक स्लो प्वाइजन, ये क्रास लटका कर मन्त्र पढ़ने वाले मैकाले विचारों के दलाल भी दे रहे हैं..
आशुतोष की कलम से

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

कश्मीर की राह पर चलता पश्चिम बंगाल.सरस्वती पूजा प्रतिबंधित (Ban Saraswati pooja in WB)


मित्रों आज यह पोस्ट में बहुत ही व्यथित मन से लिख रहा हूँ। हमारी राजनैतिक प्रतिबद्धताएं कुछ भी हो सकती है कोई भारतीय जनता पार्टी का समर्थक हो सकता है कोई सपा बसपा या कांग्रेस का, मगर इन सब से इधर हम एक मनुष्य है और एक हिंदू है। ऐसा माना जाता है कि हिंदू धर्म के अनुयायी स्वभाव से सहिष्णु एवं सर्वधर्म समभाव को मानने वाले होते हैं इसका प्रत्यक्ष उदाहरण पारसी कौम है जिसका अस्तित्व पूरे विश्व से खत्म हो गया मगर वह अपनी मान्यताओं के साथ हिन्दू बहुल भारत में सुख सुविधा एवं शांति से रह रही है।
खैर बात पारसी कौम कि नहीं मैं आज स्पष्टतया वार्ता रेडिकल इस्लाम के अनुयायियों के संदर्भ में करना चाहूंगा। जहां भी इस विशिष्ट प्रकार के इस्लाम धर्म को मानने वाले अनुयायियों की संख्या कुल जनसंख्या का 30% से अधिक हो जाती है वहां अन्य धर्मावलंबियों की स्वतंत्रता का हनन एवं अतिक्रमण शुरू हो जाता है जैसे यह जनसंख्या 50% से ऊपर होती है,अन्य धर्मावलंबियों के पास सिर्फ यही रास्ता बचता है कि या तो वह लोग इस्लाम धर्म स्वीकार कर लें या उस क्षेत्र को छोड़कर चले जाए। जहां पर इस्लामिक अनुयायियों की जनसंख्या 50% से अधिक हो चुकी है तो एक और काम किया जाता है गैर मुस्लिमों को काफिर घोषित करके उनकी हत्या शुरू कर दी जाती है,उनकी बच्चियों का रेप किया जाता है,उनकी महिलाओं को चौराहे पर नंगा किया जाता है और इन सब अत्याचारों से तंग आकर या तो वह इस्लाम स्वीकार कर लेता है या क्षेत्र से छोड़ कर चला जाता है।
आपको यह बात अतिशयोक्ति लग सकती है मगर स्वतंत्र भारत में जम्मू और कश्मीर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जहां इस्लाम के अनुयायियों की जनसंख्या बढ़ते ही कश्मीर के हिंदुओं को उनके घरों से बेघर कर दिया गया।उनकी बच्चियों का बलात्कार हुआ और आज वह दिल्ली और जम्मू के शरणार्थी कैंप में अपने ही देश में शरणार्थी बने 27 साल से जीवन गुजार रहे हैं। भारत में कई अन्य राज्य हैं जहां हिंदू जनसंख्या बहुसंख्यक है वहां पर मुसलमान या अन्य धर्मावलंबी बहुत ही आसानी से अपना जीवन यापन और व्यापार आजीविका चला रहे हैं मगर यह सहिष्णुता इस्लामिक बहुल क्षेत्रों में हिंदू जनसंख्या के साथ कभी नहीं दिखाई जाती है। ईद के अवसर पर बेगानी शादी में दीवाने हिंदू अब्दुल्लाओं को तो आपने देखा ही होगा वह लोग अपने अन्य हिंदू मित्रों को ईद मुबारक ईद मुबारक का संदेश भेजते रहते हैं । मगर जब बात आती है हिन्दू त्योहारों की तो ये सहिष्णुता किस कब्रिस्तान में दफ़न कर दी जाती है..सरस्वती पूजा और दुर्गापूजा हिंदुओं का नहीं पूरे भारत का त्यौहार है भारत की संस्कृति का द्योतक है.कश्मीर में तो हिंदु त्योहार की आप सोच ही नहीं सकते। माँ दुर्गा और विद्या की देवी सरस्वती की पूजा अब पश्चिम बंगाल में प्रतिबंधित कर दी गई और कारण ये है कि मुसलमान बिरादरी सरस्वती पूजा का विरोध कर रही है क्योंकि इस्लाम में सरस्वती पूजा हराम है और एक प्रमुख वजह ये है कि वहां जनसँख्या 30% से ज्यादा पहुच चूंकि है तो दूसरे धर्म वालों के अधिकार ख़त्म होने चाहिए..

.ये बच्ची पश्चिम बंगाल से है..ममता बानो की पुलिस ने इसे बर्बरता से पीटा..
अपराध ये है कि ये एक मुस्लिम बाहुल्य इलाके में रहती है और इसने स्कूल में सरस्वती पूजा मनाने का प्रयास किया..वहां के स्थानीय मुसलमानों ने कहा कि चूंकि इस्लाम में मूर्ति पूजा हराम है बंगाल में सरस्वती पूजन नहीं होगा ममता बैनर्जी सरकार ने भी इसका समर्थन कर दिया कि यदि मुसलमान बिरादरी को आपत्ति है तो पश्चिम बंगाल के स्कूलों में विद्या की देवी सरस्वती की पूजा नहीं होनी चाहिए...इस लड़की ने प्रतिरोध किया तो इसका सर फोड़ दिया गया...
अब न तो महिला अधिकार वाले आएंगे, न मानवाधिकार न बड़की बिंदी गैंग न ही मोमबत्ती गैंग..क्योंकि ये लड़की हिन्दू जो ठहरी और हिन्दू तो लात खाने के लिए ही होता है...
वैसे बंगाली हिंदुओं से मुझे जरा भी संवेदना नहीं है क्योंकि ये भविष्य उन्होंने मतदान करके खुद चुना है.जो कुछ लोगो ने इस चुनाव का विरोध किया उनके प्रति संवेदना है क्योंकि गेंहूँ के साथ घुन को पीसना पड़ता है. अब बस उसी दिन की प्रतीक्षा है को कब कश्मीर के हिंदुओं की तरह बंगालियों के घर के बाहर लिखा जाता है कि या तो बंगाल छोड़ दो,या इस्लाम स्वीकार करो या मरने और बलात्कार के लिए तैयार रहो...
अभी कुछ मित्र हल्ला मचाते आएंगे की सभी मुसलमान एक जैसे नहीं होते.तो मैं अपना प्रसंग बता दूं कि मुझे नवरात्रि, जन्माष्टमी, दुर्गापूजा की बधाइयाँ मेरे मुसलमान मित्र फोन से लेकर मेसेज के रूप में भेजते हैं मगर समस्या ये है मैं जहां रहता हूँ वहां प्रतिशत अभी 10 -12 वाला है..पश्चिमीयूपी में यही प्रतिशत 25 से 30 होते ही मंदिरों से लाउडस्पीकर उतरवाने के लिए आंदोलन होने लगते हैं फतवे जारी होने लगते हैं..बंगाल में सरस्वती और दुर्गा की पूजा प्रतिबंधित हो जाती है और कश्मीर में तो हिंदुओं को जीने का अधिकार नहीं है उन्हें गोली मार दी जाती है.और बाद में एक लाइन में समस्या का समाधान की 4 लाख लोगो को बेघर किसी इस्लाम ने नहीं राजनीति ने किया.. हाँ वही राजनीति जो पाकिस्तान सीरिया सूडान लीबिया मिस्र अफगान तुर्की जार्डन और यमन में चल रही है..वही जिसमें सिंजर की पहाड़ियों में अल्पसंख्यक यजिदियों को कुछ साल पहले तडपा तड़पा कर मार डाला गया और उनकी महिलाएं आज भी "जेहादियों" की सेक्स स्लेव या रखैल बनी हुई हैं..
जहां तक मुद्दा बंगाल का है बंगाल की जनता ने अपनी आत्महत्या स्वयं चुनी है क्योंकि ममता बानो की सरकार सिर्फ 30 से 35% रेडिकल इस्लाम को मानने वाले लोग नहीं बना सकते हैं। इसमें एक बहुत बड़ा सहयोगी वर्ग हमारे उन सेकुलर हिंदुओं का है जिनके निजी स्वार्थ के आगे उनका धर्म उनकी पूजा पद्धति उनकी संस्कृति सभी कुछ गौण हैं। "कश्मीरी पंडितों" ने यही गलती की और खामियाजा वो आज दिल्ली के फुटपाथ पर हैं और उनकी महिलाएं जेहादियों के बलात्कार का शिकार.."बंगाली हिंदुओं" ने इतिहास से सीख नहीं ली और अपनी कब्र खुद खोद ली है ममता बानो की सरकार को चुनकर..इस्लाम तो वही कर रहा है जो महमूद गजनवी,बाबर,औरंगजेब ने किया मगर आप क्या चुन रहे हैं? अपनी अक़्तमहत्या और अपने बच्चों की हत्या???? इस पर विचार कीजिये और इतने लंबे लेख के बाद न समझ आया हो तो नीचे वाला वीडियो देख लीजिये विश्वास मानिये सेकुलरिज्म का बुखार कुछ न कुछ जरूर कम होगा...

आशुतोष की कलम से

सोमवार, 23 जनवरी 2017

सिकंदर(Alexander‬ ‪)- विश्वविजेता या एक पराजित लुटेरा शासक ? Part-3


मित्रों जैसा की लेख के पिछले दो भागों में आप ने पढ़ा की किस प्रकार धूर्तता और अतार्किक कहानियों की सहायता से सिकंदर को विजेता घोषित करने की कोशिश कुछ बिदेशी और भारत विरोधी वामपंथी इतिहासकारों ने की . ग्रीक और रोमन इतिहासकारों के पुस्तकों के सन्दर्भ से ही पिछले दो भागों में ये लगभग साबित हो गया है की सिकंदर की विजय नहीं हुई है आप इस लेख की दोनों कड़ियों को निम्न लिंक पर पढ़ सकते हैं
सिकंदर की पराजय भाग 1 https://goo.gl/TZkB6c
सिकंदर की पराजय भाग 2 https://goo.gl/TeCZ26
महाराजा पोरस को जब यह सूचना मिली की सिकंदर कड़ी के मैदान में पंहुच गया है तो उन्होंने अपने बेटे को सिकंदर से लड़ने के लिए 2000 अश्वरोहीयों और 120 रथ की छोटी सी सेना के साथ भेज दिया. इसका उद्देश्य ये था की इससे यूनानी सेना की शक्ति का अनुमान लगाया जा सके.
यूनानी इतिहासकार एरियन के शब्दों में “ बहुत दिनों की प्रतीक्षा के पश्चात एक दिन सिकंदर घोर अंधकार में नदी को पार कर गया भारतीय राजकुमार के हाथो सिकंदर घायल हुआ और उसका घोडा बकाफल मारा गया.”
यूनानी लेखक जस्टिन (justin) इस बात को स्वीकार नहीं कर पाता है की तथाकथित विश्वविजेता सिकंदर,पोरस के बेटे से युद्ध में घायल हो गया और उसका घोडा मारा गया परन्तु सत्य को लिखने से स्वयं को रोक नहीं पाता और इसका ठीकरा अन्य यूनानी लेखको के सर फोड़ते हुए कहता है की “ Other writers state that there was a fight at actual landing between Alexander’s Cavalry and a force of Indians commanded by porus’s son,who was there ready to oppose them with superior numbers and that in the course of fighting he wounded alexander with his own hand and struck the blow which killed his beloved horse Buccphalus’’
अब यहाँ से ये स्पष्ट हो जा रहा है की शुरुवात में ही सिकंदर के लिए भारत का युद्ध कठिन पड़ने लगा था.पोरस की शक्तिशाली सेना के सामने सिकंदर को झेलम पार करना ही असंभव सा लगने लगा युद्ध जितना तो बहुत ही दुष्कर कार्य था.
रोमन लेखक कर्टियस ने लिखा है “सिकंदर की कुछ सेना नदी के मध्य एक टापू पर पहुच गई,परन्तु सिकन्दर की सेना को शत्रु (पोरस) ने घेर लिया जो गुप्त रूप से टापू पर पहुच गयी थी.पोरस के सैनिको ने यूनानियों का सफाया कर दिया और जो बचा कर भाग निकले वो नदी की बाढ़ में बह गए और मझदार में बैठ गए .पोरस नदी के किनारे से युद्ध के इस उतार चढाव को देख रहा था और अपनी विजय देख उसका आत्मविश्वास और बढ़ गया..”
सिकन्दर झेलम के किनारे जिस स्थान पर आ के रुका था वहां तो पोरस की सुव्यवस्थित सेना खड़ी थी अतः सिकंदर ने 16 मिल दूर जा के एक चढ़ाई से नदी जैसे तैसे पार की शत्रु की गतिविधियों का पूर्ण ज्ञान नहीं होने के कारण पोरस कहीं हट नहीं सकता था और सिकन्दर दुसरे रस्ते से कड़ी ग्राम के पास झेलम पार कर के अपनी बची सेना के साथ पहुच गया और सेना सजा दी. इसकी खबर मिलते ही पोरस की सेना युद्ध के लिए सामने आ गयी.रोमन इतिहास कार लिखते हैं की हालांकि सिकन्दर ने अपनी सुविधा वाले स्थानों पर सेना सजाई थी फिर भी पोरस के सेना में हाथियों की संख्या देखकर सिकंदर के होश उड़ गए
कड़ी का युद्ध :
जैसा की पहले भी बताया जा चूका है की युद्ध के आरम्भ होते ही सिकंदर का घोडा मारा गया इस बात की पुष्टि रोमन लेखक जस्टिन भी करता है उसके अनुसार “प्रथम बार में ही सिकंदर का घोडा मारा गया और वह स्वयं भी सर के बल गिर पड़ा लेकिन उसके रक्षको ने उसे बचा लिया जो वहां पहुच गये थे”
युद्ध की घटनाओं का विवरण देखने पर पता चलता है की पुरे दिन युद्ध चलता रहा और पोरस के हाथियों ने सिकन्दर की सेना को भीषण क्षति पहुचायी. अब इस क्षति का वर्णन
रोमन लेखक कर्टियस के शब्दों में “ सब से भयानक दृश्य तो हाथियों द्वारा सशस्त्र यूनानी सैनिको को अपनी सूंढ़ में पकड़ ऊपर बैठे अपने महावत को देना था जो उनके सर काट कर फेक देता था.युद्ध संदिग्ध रूप में रहा,कभी यूनानी सेना हाथियों का पीछा करती तो कभी स्वयं उनके डर से भाग खड़ी होती थी.इस प्रकार युद्ध होता रहा जb तक की दिन की समाप्ति नहीं हुई.”
यूनानी लेखक /इतिहासकार डायोडोरस लिखता है की “हाथी अपनी विशाल काया और बल के कारण बड़े लाभदायक सिद्ध हुए. बहुत से हाथियों ने शत्रु सैनिको को अपने पैरों तले कुचल डाला और उनके हड्डियों तक को पीस कर रख दिया. भयानक मृत्यु का दृश्य था . हाथी सैनिको को अपनी सूंड में जकड़ कर ऊपर उठाते थे और उन्हें जमीन पर पटक कर समाप्त कर देते थे.
Upon the elephants, applying to good use their prodigious size and strength, killed some of the enemy by trampling under their feet, and crushing their armour and their bones,while upon other they inflicted a terrible death, for they first lifted them aloft with their trunks ,which they are twisted round their bodies, and then dashed them down with their great violence to the ground. Many others they deprived in a moment of life by goring them through and through with their tusks.”
रोमन लेखक एरियन लिखता है की “हाथियों की सेना ने व्यवास्थित यूनानी सेना को कुचल डाला..
”….the monster elephants plunged this way and that among the lines of infantry dealing Destruction in solid mass of the Macedonian phalanax…”(Ibid P. 178)
सिकन्दर और यूनानी सेना की इतनी बड़ी क्षति के स्वीकरोक्ति के बाद किस प्रकार एरियन ने सिकंदर की झूठी शान बनाये रखने के लिए तथ्यों से खिलवाड़ किया वो इस प्रकार है .”झेलम के युद्ध में यूनानी सेना के सिर्फ 80 पैदल और 230 सवार मारे गए लेकिन वही दूसरी और जो भारतीय सेना रोमन सेना को तबाह कर रही थी उसके 20000 पैदल तथा 3000 सवार मारे गए ..सनद रहे की ये वही एरियन है जिसने कहा की “हाथियों की सेना ने व्यवस्थित यूनानी सेना को कुचल कर तहस नहस कर डाला था ..
ठीक इसी प्रकार जिस प्रकार एरियन ने अपने खुद के लिखे को झुठलाते हुए सिकन्दर को विजेता बनाने का प्रयास किया है उसी प्रकार कांग्रेस पोषित वामपंथी लेखकों ने भी किताबो में लिख दिया की सिकंदर की विजय हुई हमने किताबों में पढ़ा और उसे सच मान लिया.. Cambridge-Ancient History Pt IV, के पृष्ठ संख्या 40 का सन्दर्भ लें तो स्पष्ट लिखा है की “झेलम युद्ध में सिकंदर की सैनिक हानि पर बड़ी सावधानी से पर्दा डाला गया है .
एक कहानी जो भारत के विरोधी वामपंथी इतिहासकार अक्सर कहते हैं की पोरस अपनी सेना के साथ हाथियों से सिकन्दर की सेना का कुचलता जा रहा था तभी सिकंदर के सैनिको ने हाथियों पर बरछे भाले इत्यादि से हमला कर दिया और हाथियों ने अनियंत्रित होकर अपने ही सैनिको को कुचलना शुरू कर दिया और पोरस युद्ध हार गया .
यदि ये बाद पश्चिम के लेखक कहते हैं तो उनकी अपनी निश्तायें हो सकती है मगर भारत में वामपंथी लेखकों ने इस बात को सिर्फ इसलिए पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से बढाया क्युकि भारत विरोध इन वामपंथियों के खून में दौड़ता है . खैर मूल प्रश्न पर आते है की पोरस की जितती सेना के हाथी अनियंत्रित हो गए मगर इस सन्दर्भ में यूनानी लेखक डायोडोरस जो लिखता है उस पर विचार किया जाये ..
“Then ensured a great Confusion but porus, who was mounted on the most powerful of all his elephents on seeing what had happened,gathered around him fourty of the animals that were still under control and falling upon the enemy with all the weight of the elephants,made a great Slaughter with his own hand, for he far surpassed in bodily strength and soldiers of his army.’’ (369/167)
डायोडोरस लिखता है कि “ पोरस अपने सबसे ताकतवर हाथी पर सवार था और उसने हाथियों को अनियंत्रित होता देख अपने 40 हाथियों को (जो अब भी उसके नियंत्रण में थे ) लेकर शत्रु सेना अर्थात सिकंदर की सेना पर टूट पड़ा और बड़ा नरसंहार किया.’’ यहाँ तो बड़ा नरसंहार डायोडोरस ने लिख दिया मगर झूठ की पराकाष्ठा ये है कि कई लेखक पर्दा डालते हुए ख रहे हैं कि,युद्ध में पोरस द्वारा किये गए इस भयानक नरसंहार में यूनानी सेना के 80 पैदल और 230 सवार मारे गए लेकिन वही दूसरी और जो भारतीय सेना रोमन सेना को तबाह कर रही थी उस भारतीय सेना के 20000 पैदल तथा 3000 सवार मारे गए...ये दोनों विरोधाभास ये बताने के लिए पर्याप्त हैं इतिहास लेखन में सिकन्दर ही हार को छिपाने का हर संभव प्रयास लेखनो ने किया और बाद में वामपंथी इतिहासकारों ने तो उसे सिकन्दर की जीत घोषित करके उसकी नयी पीढ़ी को उसकी घुट्टी पीने के लिए , सिकन्दर को भारतीय इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में विजेता घोषित कर दिया.
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लेख के अगले भाग में भारतीय सैन्य क्षमता का अद्भुत वर्णन और युद्ध के आगे के कुछ और तथ्य जो ये साबित करेंगे की सिकन्दर पराजित होकर भारत से भागा था.
आशुतोष की कलम से

शनिवार, 7 जनवरी 2017

महिला सशक्तिकरण के मायने..

इस पोस्ट का आशय कहीं से भी पुरुषों के व्यसनों का समर्थन या महिलाओं का अपमान नहीं है...
एक प्रश्न : जब पुरुष दारु सिगरेट चरस पी सकते हैं तो महिलाएं क्यों नहीं? ये कैसा दोगला व्यवहार है पुरुषवादी समाज का???
समाधान: प्रथम तो धर्म की बात करूँ तो नारी स्वाभाविक एवं प्राकृतिक रूप से शील का प्रतिनिधित्व करती हैं अतः व्यसनों से संयम की मर्यादा रेखा अपेक्षाकृत ज्यादा प्रबल रूप से लागू होगी मगर मुझे मालूम है इस उत्तर को मिलते ही कुछ अपरिपक्व नारियां और कुछ तथाकथित लिबरल,महिला अधिकारों के संरक्षक पुरुष ( जो की यथार्थ में मांस को नोचने वाले गिद्ध से ज्यादा मेरी नजर में नहीं हैं) मेरे ऊपर सामंती फासीवादी होने का तमगा लगा देंगे अतः वो जिस विज्ञान को आधार बनाते हैं उसी आधार पर उत्तर देने का प्रयास करता हूँ..
सिर्फ एक तथ्य यदि बच्चे का लें तो मान लीजिए एक पुरुष चरस अफीम दारु सब पीता है( जो पूर्णतया गलत है) मगर वो बच्चे के सेहत पर कितना असर डालेगा? पुरुष का प्राथमिक योगदान तो स्पर्म डोनेशन तक रहता है..इसके बाद की कल्पना कीजिये..एक माँ गर्भवती है मगर नारी सशक्तिकरण के लिए वो भी चरस पीयेगी दारु पीयेगी अपने आवारा पति की तरह...मतलब 9 महीने तक 24 घंटे अजन्मे भ्रूण के पोषण में नशा भी शामिल होता है ..याद कीजिये हमारे घर के दूध पीते बच्चे को बुखार हो जाता है क्योंकि उसकी माँ को बुखार है..बच्चा खाँसता है तो डॉक्टर माँ से कहते है। कि चावल खाना काम कीजिये आप को खांसी होगी तो बच्चे को खांसी हो जायेगी....अब वही माँ सशक्तिकरण के नाम पर कहे की मेरा पति शराबी है तो रोज 4 पैग मेरा अधिकार है क्योंकि नारी सशक्तिकरण करना है..अब उसके बच्चे पर क्या प्रभाव पड़ेगा..चलिए और आगे बढ़ते हैं बच्चे का स्वाभाविक लगाव माँ से ज्यादा होता है तो इस हिसाब से आदते भी माँ की पहले सीखेगा...
बस एक इसी उदाहरण की परिस्थितियों को सामने रखकर बताना चाहता हूँ की क्यों समाज धर्म प्रकृति ने सबके लिए अलग अलग मर्यादाएं निर्धारित की हैं. यदि पुरुष बच्चे को अपने पेट में पालता अपना दूध पिलाता तो सारी स्थितियां पुरुष पर लागू होती...
इस लेख का आशय सिर्फ इतना है कि "महिला सशक्तिकरण" का मतलब ये बिलकुल नहीं की पुरुष की "गलत और वाहियात" आदतों की बराबरी करे महिला सशक्तिकरण तब होगा जब वो पुरुष की अच्छी आदतों से प्रतिस्पर्धा करे और समाज कानून उसे इतनी ताकत दे की वो पुरुष के "नशे आदि जैसे व्यसनों" के विरोध में अपनी आवाज बिना किसी हिचकिचाहट के उठा सके..
वामपंथी और आज के तथाकथित बुद्धिनजीवी इसे नहीं समझेंगे क्योंकि उनकी नजर में महिला सशक्तिकरण ये है पुरुष अगर सिगरेट पिए तो महिला चरस पीयेगी पुरुष अगर किसी लड़की का हाथ पकड़ के लंपटइ करे तो महिला सड़क पर "किसी से कहीं भी कैसे भी" किस आफ लव करेगी....मेरे समझ से ये महिला सशक्तीकरण से ज्यादा कुछ "तथाकथित लिबरल बुद्धिजीवियों" लोगों का अपने भोग के लिए महिलाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना है..
सशक्तिकरण को सकारात्मक रखें, की नकारात्मक सशक्तिकरण व्यक्ति और समाज दोनों के लिए हानिकारक है ...
आशुतोष की कलम से

रविवार, 27 नवंबर 2016

नहीं रहे क्यूबा की क्रांति के जनक और वामपंथ के स्तम्भ फिडेल कास्त्रो



फिडेल कास्त्रो एक घोर अमरीका विरोधी वामपंथी थे। क्यूबा की क्रांति के इस जनक को 1952 में 18 साल की जेल हुई मगर 1955 में माफ़ी दे दी गयी और ये मैक्सिको चले गए वहां इनकी मुलाकात चे घिवेरा से हुई ..वहां से सन 1956 में वामपंथी आतंकी चे घिवेरा के साथ 81 लोग वापस क्यूबा आये और क्यूबा में घुसते ही इनसे क्यूबा की पुलिस से मुठभेड़ हुई और 18 जिन्दा बचे जिसमे फिडेल और घिवेरा भी शामिल थे..2 राइफल और 18 लोगो के साथ शुरू हुआ सत्ता से संघर्ष ,1959 में क्यूबन तानाशाह फुलखेंशियो बतिस्ता को गद्दी से हटाकर फिडेल के सत्ता प्राप्त करने पर खत्म हुआ..कास्त्रो 47 साल तक क्यूबा के प्रधानमंत्री रहे..सिगार तथा बेसबॉल के शौक़ीन और यूएन में सबसे लंबा भाषण (लगभग साढ़े चार घंटे लगातार) देने वाले फिडेल कास्त्रो को सेक्स के लिए दिन में 2 से 3 अलग अलग लड़किया अपने बिस्तर पर चाहिए थी। क्यूबा के इस वामपंथी तानाशाह नेता के नाम कई जनसंहार और बिस्थापन दर्ज है मगर फिडेल के खाते में एक ऐसे क्रन्तिकारी तानाशाह(एकदलीय प्रणाली की छाया में बैठा हुआ तानाशाह) की छवि भी है जो अमरीका को आजीवन नाको चने चबवाता रहा.मगर इसी कारण क्यूबा पूरे विश्व से अलग थलग हो गया और वहां की अर्थव्यस्था तबाह हो गयी..फिडेल कास्त्रो एक ऐसा कम्युनिष्ट तानाशाह जिसके विरोधियों के पास दो ही रास्ते होते थे या तो वो मारे जायेंगे या क्यूबा छोड़ देंगे...फिडेल कास्त्रो एक ऐसा कम्युनिष्ट तानाशाह जिसे अमरीका समेत कई ख़ुफ़िया एजेंसिया मिल कर भी नहीं मार पाई..CIA ने फिडेल कास्त्रो को मारने के लिए 650 से ज्यादा बार प्रयास किये मगर अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी हर बार विफल रही..
एक बार नास्तिक वामपंथी फिडेल कास्त्रो ने कहा था की मैं भगवान को नहीं मानता था मगर CIA और अमरीका द्वारा कई दशको तक मुझे मारने के सैकड़ो प्रयास के बाद भी मैं जीवित बचा हूँ,इससे मुझे लगने लगा है की भगवान होता है...
खैर आज फिडेल कास्त्रो इस दुनिया में नहीं है और शोक के साथ साथ एक बड़ा हिस्सा हवाना में जश्न भी मना रहा है..आने वाला समय और क्यूबा की अगली पीढी इस वामपंथी कम्युनिष्ट तानाशाह का क्यूबा के निर्माण (या विध्वंस)में योगदान को तय करेगी..
आशुतोष की कलम से